वासना और प्रेम में अंतर : आर्ट ऑफ़ लिविंग के अनुसार

प्रेम में एक वस्तु भी जीवन्त हो उठती है। पत्थर और वृक्ष तुमसे बातें करते हैं, चाँद, सूरज और समस्त सृष्टि सजीव और दिव्य हो जाती है। वासना में एक सजीव प्राणी भी केवल वस्तु बन कर रह जाता है।
  • वासना तनाव लाती है, प्रेम विश्वास लाता है।
  • वासना में कपट और छल है, प्रेम में विनोदिता, लीला है।
  • वासना एक अंग पर केन्द्रित होती है, प्रेम पूरे अस्तित्व पर।
  • वासना में तुम झपटना चाहते हो, कब्जा करना; प्रेम में तुम देना चाहते हो, समर्पण करना।
  • वासना में प्रयत्न है, प्रेम प्रयत्नहीन है।
  • वासना हिंसा लाती है, प्रेम बलिदान लाता है।
  • वासना में मांग है, प्रेम में अधिकार है।
  • वासना तुम्हें दुविधा देती है, प्रेम तुम्हें केन्द्रित करता है।
  • वासना नीरस और अँधकारमय है, प्रेम के अनेक रुप रंग हैं।
  • वासना  कहती है, ‘‘जो मैं चाहूँ, वही तुम्हें मिले’’
  • प्रेम कहता है,‘‘ जो तुम चाहो वही तुम्हे मिले,।’’
  • वासना ज्वर और कुन्ठा देती है, प्रेम उत्कण्ठा और मीठा दर्द लाती है।
  • वासना जकड़ती है, विनाश करती है; प्रेम स्वतंत्रता लाता है, मुक्त करता है।
वासना में बाधा होने पर व्यक्ति क्रोधित होता है और नफरत करने लगता है। आज संसार में फैली घृणा प्रेम के कारण नहीं, बल्कि वासना के कारण है।
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9 विचार “वासना और प्रेम में अंतर : आर्ट ऑफ़ लिविंग के अनुसार&rdquo पर;

  1. नमस्ते,

    आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

  2. हिंदी पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. आप हिंदी bloggers का ये बहुत अच्छा प्रयास है की हम जैसे दूर परदेसों में बैठे लोग हिंदी से जुड़े रह सकते हैं.
    मुझे श्री रविशंकर जी को Detroit में देखने और सुनने का मौका मिला था. मुख्य बिंदु share करने का धन्यवाद. अच्छा लिखते रहें.
    Kulveer Virk

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