ब्लोगिंग पर “नई दुनिया” में आलोक मेहता का छपा व्यंग्य

नई दुनिया में ब्लोग पर कपड़ा फाड होली पर प्रकाशित  आलोक मेहता का व्यंग बहुत महत्वपूर्ण है।शब्द की व्यजंना शक्ति द्वारा निकला अर्थ व्यंग्य है। आन्तरिक भाव प्रकट करने वाला उपहासात्मक व सांकेतिक चित्रण करने वाला लेख व्यंग्य है। अतः व्यंग्य का आन्नद लेने इसी भाव से ही पढ़े।  यह ‘‘बुरा न मानो होली है ’’के तहत छपा है। यह कुछ हद तक कड़वा सच बताता है, कुछ इसमें होली का रंग भी है।यह हिन्दी ब्लागिंग पर एक तरह का कटाक्ष है।यह हमें अपना आईना दिखा रहा है।अपने ब्लोग लेखन का परीक्षण करने का पक्षधर है। साथ ही यह कह रहा है कि हमें ब्लाग में उलूल-जुलूल, अनावश्यक व व्यर्थ के लेख न लिखें।
यह मात्र परस्पर टिप्पणियां कर एक दूसरे को महत्व देने की जगह नहीं है। यह मात्र स्वान्तः सुखाय नहीं है। पर हिताय का ब्लोगिंग में बहुत महत्व है।
जैसा कि हम सब जानते है कि ब्लागिंग टाईम पास करने का जरिया नहीं है।एवं न ही अपने लेखक होने की भड़ास निकालने का साधन है। यह निरर्थक लेखन नहीं है। ब्लाग साहित्य व पत्रकारिता के समकक्ष है। यह व्यक्तिगत डायरी न होकर सार्वजनिक प्रकाशन है।इसमें स्वयं ही सम्पादक व प्रकाशक होने से जिम्मेदारी हम पर अधिक है। इसके अपने प्रयोजन है। यह सार्थक लेखन है।
क्या यह हम सबको अपने ब्लोग का स्तर बढ़ाने की प्रेरणा देता है?
अरे! मैं भी उपदेशक बनने के मूड़ में क्या लिख गया!

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9 विचार “ब्लोगिंग पर “नई दुनिया” में आलोक मेहता का छपा व्यंग्य&rdquo पर;

  1. पता नहीं लोगों को क्यों दर्द होने लगता है. जिसे अच्छा न लगे वह न पढ़े. कोई जबरदस्ती आकर पाप-अप की तरह तो नहीं कूद पड़ता कि भईया ये देखो, ये पढ़ो, लिखने वाले ने पोस्ट कर दिया. डाक्टर ने थोड़े न बताया है कि चार ब्लाग सुबह-शाम पढ़ो.

  2. बिलकुल सहमत हूँ
    ब्लॉग का मतलब स्वानतः सुखाय, या ऊल जलूल लिख कर लोगों का दयां खींचना नहीं है …. ये अभिव्यक्ति का साधन अवश्य है, हमें पूरा अधिकार है कुछ भी लिखने का … किन्तु यदि लेखन किसी समाज, देश या सभ्यता में धनात्मक अभिवृद्धि नहीं करता है तो ऐसे में लेखन का कोई महत्व नहीं… स्तरहीन लेखन आप और आपकी संस्कृति दोनों को प्रभावित और बदनाम करती है … हिन्दी ब्लोगिंग अभी शैशव में है ,… बहुत बड़ी संभावनाएं है आगे … तो हमें अपने लेखन का सृजनात्मक उपयोग करना चाहिए यही हमारी सलाह है … शेष तो सब स्वतंत्र है
    “महत्वपूर्ण ये नहीं कि हमें विरासत में क्या मिला है ”
    “महत्वपूर्ण ये है कि हम विरासत में क्या दे के जा रहे हैं”

  3. बिलकुल सहमत हूँ
    ब्लॉग का मतलब स्वानतः सुखाय, या ऊल जलूल लिख कर लोगों का ध्यान खींचना नहीं है …. ये अभिव्यक्ति का साधन अवश्य है, हमें पूरा अधिकार है कुछ भी लिखने का … किन्तु यदि लेखन किसी समाज, देश या सभ्यता में धनात्मक अभिवृद्धि नहीं करता है तो ऐसे में लेखन का कोई महत्व नहीं… स्तरहीन लेखन आप और आपकी संस्कृति दोनों को प्रभावित और बदनाम करती है … हिन्दी ब्लोगिंग अभी शैशव में है ,… बहुत बड़ी संभावनाएं है आगे … तो हमें अपने लेखन का सृजनात्मक उपयोग करना चाहिए यही हमारी सलाह है … शेष तो सब स्वतंत्र है
    “महत्वपूर्ण ये नहीं कि हमें विरासत में क्या मिला है ”
    “महत्वपूर्ण ये है कि हम विरासत में क्या दे के जा रहे हैं”

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