भाग्य की भूमिका सफलता-प्राप्ति में

सफलता कुछ गिने-चुने लोगों की बपौती नहीं है। आप भी, कोई भी, बिना धन और विशेष सम्बन्धों के भी इच्छित सफलता प्राप्त कर सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को सफलता की प्राप्ति का अधिकार है और उसे प्राप्त करने की स्वाभाविक या प्रकृति-प्रदत्त शक्ति भी उसमें निहित है। आवश्यकता है अपने भीतर की शक्ति को उद्‌घाटित करने और उसको सही दिशा में प्रयुक्त करने की। कोई भी अपने भविष्य को सफलता प्राप्ति की प्रविद्यियों को अपना कर भाग्य  बदल सकता है। यह आपके स्वयं के हाथ में है।
सामान्यतः सफलता के लिए १०-२० कारण जिम्मेदार होते हैं।  इनमें से कुछ हमें ज्ञात  होते हैं, शेष  अज्ञात होते हैं एवं हमारे वश में नहीं होते। कुछ अद्रच्च्य व सूक्ष्म कारण होते हैं जो समझ में नही आते हैं।  तभी तो सफलता-प्राप्ति कभी निश्चित नहीं होती। इसीलिए सफलता कभी-कभी अनिश्चत होती है। इस अनिश्चितता का दूसरा नाम भाग्य है। मेरा विचार है कि कोई भगवान आकाश में बैठा  हमारे भविष्य को तय नहीं करता । प्रकृति अपने नियमों से काम करती है।
सफलता आकस्मिक नहीं होतीे। लक्ष्य का निर्धारण, आत्मविश्वास, कार्यों की प्राथमिकता तय करना ,शक्ति-प्रेरक धारणाओं, कड़ी मेहनत एवं समय-नियोजन आदि सफलता प्राप्ति के कुछ आवश्यक प्रविद्यियां हैे।ं यदि आपने इन प्रविद्यियों का अभ्यास ठीक से करते है तो आप निश्चित रूप से सफलता प्राप्त कर सकते हैं ।
यह लक्ष्य के निर्धारण, शक्ति-प्रेरक धारणाओं एवं कड ी मेहनत पर निर्भर है।  कार्य-कारण के सिद्धान्त को अपनाइए।  भाग्य की बातें छोडि ए और अपने लक्ष्य की दिशा में कर्म करते जाइए, सफलता अवश्य मिलेगी।
जैसा कि हम जानते हैं और यह तय हैं कि हम अपने निर्माता स्वयं है। अपने भाग्य का निर्धारण हम स्वयं करते हैं। जैसा हम बोएँगे, वैसा ही काटेंगे।
Related Posts:

11 विचार “भाग्य की भूमिका सफलता-प्राप्ति में&rdquo पर;

  1. श्रीमान को विलंबित नमस्कार !
    मार्च की मार्चपास्ट जो चल रही थी !!
    “सफलता” पर श्रीमान की कलम की कालिख एक बार फिर इस नाचीज़ तक पहुंची . धन्यवाद ! शुक्रिया !! सफलता अगर गिने-चुने लोगों की बपौती नहीं होगी तो उसे सफलता कहने में कम से कम मुझे शर्म आएगी . “सफलता” एक सापेक्ष शब्द है . इसकी परिभाषा किसी ख़ास लक्ष्य के सन्दर्भ में ही की जा सकती है . अगर किसी का लक्ष्य धन कमाना या विशेष संबंधों की स्थापना हो तो ‘बिना धन ‘ और ‘विशेष संबंधों’ के सफलता पा सकने का क्या तात्पर्य है??? सफल होना सबका अधिकार भी है और हर कोई इस अधिकार को पाने की शक्ति भी रखता है . फिर भी अधिसंख्यक लोग असफल क्यों हैं ??? या तो उनको अधिकार नहीं है या उनमें शक्ति को पहचानने की शक्ति नहीं है . सफलता के कुल दस-बारह कारण ही हैं और यह हमें ज्ञात हैं ,तो फिर अज्ञात क्या है??? अनिश्चितता का दूसरा नाम भाग्य बताया गया है , साथ ही भाग्य का बदलना हमारे अपने हाथ में बताया गया है तब अनिश्चितता कैसी ??? भगवान् नहीं है , केवल प्रकृति है जो अपने नियमों से काम करती है तो क्या प्रकृति ही भगवान् नहीं हो गयी ???
    सफलता आकस्मिक तो हो सकती है, अकारण नहीं हो सकती . कार्य- कारण सिद्धांत सर आँखों पर !!! लेकिन प्राणी को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जो कारण नज़र आता है वह किसी अन्य कारण का कार्य हो सकता है . जो कार्य नज़र आता है वह किसी अन्य कार्य का कारण हो सकता है . भाग्य कि बातें भी छोड़ी नहीं जा सकती क्योंकि जो हमारे बस में नहीं है वह भी हमें प्रभावित कर सकता है . तूफ़ान में जहाज़ों का डूबना और खड़ी फसलों का अतिवृष्टि में नष्ट होना कोई काल्पनिक घटनाएं नहीं हैं . हाँ अलबत्ता इस वजह से जहाज़ों के लंगर खोलने से डरना और खेती करना छोड़ देना उचित नहीं होगा . जो बोया जायेगा वही काटने को मिलेगा . लेकिन पूरी दुनिया से तरबूज या बैंगन या भिन्डी या कपास या अफीम या कद्दू बोने की अपेक्षा करना क्या मानवता के प्रति अपराध नहीं होगा ???
    आलेख उलझे हुओं को और उलझाता नज़र आया . सुलझे हुओं को आलेख पढने की फुर्सत कब होती है???
    श्रीमान अपने इस स्नेह्भाजक -समालोचक को क्षमा कर अनुग्रहित करें !!!

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s