स्वार्थी संसार में सच्चा प्यार कैसे पाएँ ?

प्यार हम सभी पाना चाहते है लेकिन प्यार अपनी शर्तों पर देना चाहते है। पहले हमारी शर्तें कोई पूरा करें तो हम उसके लिए जान तक देने को तैयार हो जाते है। जबकी सामने वाला भी इसी शर्त के अधिन प्यार करता है। इसलिए कोई किसी को प्यार कर नहीं पाता है।

हम खूब प्यार देना भी चाहते है लेंकिन उसको जो हमें खूब प्यार करता हो। दूसरा व्यक्ति भी इसी तरह सोचता है। अतः इस प्यार के खेल में दोनों पक्ष असंतुष्ट रहते है। हम जब तक प्यार करते नहीं है तभी तक दूसरों से प्यार चाहते है। ज्योहि हम प्यार देने लगते है प्यार पाने की समस्या स्वतः ही मिट जाती है। जबकी प्यार देने से संतोष व तृप्ति प्राप्त होते है। अपने को प्यार न करना स्वयं की किलेबन्दी करना है जिससे की दूसरे का प्यार आप तक न पहँुच सकें। प्यार प्राप्त करने का भाव ही नहीं है बल्कि यह देने से मिलता है। जबकि हम यहाँ उल्टा करते है।

प्रत्येक व्यक्ति की अपने मन में स्वयं की गढी हुई तस्वीर होती है। यह तस्वीर हम अपनी इच्छाओं, सपनों और दूसरों से चर्चा के आधार पर बुनते हंै। उक्त छवि अनुकूल आचरण होने पर व्यक्ति स्वयं को पसन्द करता है। क्योंकि तब छवि व वास्तविकता में अन्तर कम होता है। जब व्यक्ति अपनी छवि के विपरीत आचरण करता है तो दोनों छवियों में दूरियाँ बढती है। ऐसे में व्यक्ति स्वयं से दूर हो जाता है। ऐसे में वह स्वयं से प्यार नहीं कर सकता है। तब वह बाहर से प्रसिद्वि, पद, प्यार एवं पैसा खोजता है। वह स्वयं से संघर्ष करता है। यह संघर्ष तनाव का ही एक रूप है। हमारे संबंध स्वयं के साथ ठीक नहीं है। ऐसे में दूसरों के साथ संबंध ठीक नहीं हो सकते है। जब मेरी छवि अनुरूप मैं नहीं हूँ तो दूसरा मेरी छवि अनुरूप कैसे हो सकता है ? और जब दूसरा मेरी छवि अनुरूप नहीं होता है तो मै उससे शिकायतंे करता हूँ। अस्वीकृति हमारे दुःख की जड में है। छवि अनुरूप आचरण करने पर हम स्वयं को पसन्द व प्यार करते हैं।

हमारे पूर्व राष्ट्रपति डाॅ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम वापस विश्वविद्यालय में पढ़ाने में व्यस्त हंै। वहां पर उन्हें पूर्वराष्ट्रपति के रूप में सम्बोधित किया जाता है। उक्त सम्बोधन उनको पसन्द नही आया । डाॅ. कलाम ऐसा कर सके क्योंकि उनकी आत्म छवि उनके मन में ठीक है। हमारी आत्मछवि स्वयं की निगाह में ठीक होने पर हमें दूसरों से तारीफ की जरूरत नहीं रहती है। ठीक ऐसे ही जैसे हम स्वयं को प्यार करते है तो दूसरों से प्यार को पाने की ललक नही रहती है

। अपने मन में बसी स्वयं की छवि आपके लिये आदर्श होती है। आप उस छवि को अपनी धारणाओं से गढते है। वह आपकी ही देन है। फिर जब आपकी करनी के परिणाम आते है तो वह छवि कसौटी की तरह कार्य करती है। आप अपनी प्राप्तियों को छवि के अनुसार मूल्यांकन करते हंै। वह छवि आपका पैमाना बन जाती है।

अपना मूल्यांकन दूसरों से क्यों प्रमाणित करवाना चाहते हो? दूसरा आपकी हैसियत प्रमाणित करता है, इसका अर्थ यह है कि दूसरा मूल्यवान है? आप तो बेकार हैं। आपकी सार्थकता दूसरा नहीं तय कर सकता। किसी दूसरे के प्रमाण पत्रों की, व्याख्या की, वर्णन की जरूरत नहीं है। स्वयं का निर्धारण अपने व्यवहार एवं भावनाओं से मत करो। ये तो आपके उत्पादन ( byproduct) हैं। सह उत्पादन किसी मूल वस्तु का मूल्यांकन तय नहीं करते।

इसलिये प्यार बाजार में न खोजें। वह वहां मिलता भी नहीं है। धोखा, स्वार्थ जरूर प्यार के भेष में मिलसकते हैं।

अगर आप गलत वस्तु खोजने निकले हें तो में मदद नहीं कर सकता हूँ ,क्षमा करे

9 विचार “स्वार्थी संसार में सच्चा प्यार कैसे पाएँ ?&rdquo पर;

  1. सत्य वचन..सार्थक पोस्ट.

    यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

    हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

    मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

    नववर्ष में संकल्प लें कि आप नए लोगों को जोड़ेंगे एवं पुरानों को प्रोत्साहित करेंगे – यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें – यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    वर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

    आपका साधुवाद!!

    नववर्ष की अनेक शुभकामनाएँ!

    समीर लाल
    उड़न तश्तरी

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s