सकारात्मक होने मन की बाधा कैसे पार करे?

जीवन में 99 के फेर में न पडे, निन्यानवें एक का 99 गुना होता हैं

ब्लॉग पढने के दौरान नकारात्मकता आपको पढते हुए भी पढने नहीं देगी । शब्दों को समझते हुए भी सकारात्मक होने में कठिनाई अनुभव करेंगे । आप स्वयं प्रतिरोध कर ग्रहण नहीं कर सकते हैं। हमारा मन सदैव अपने अनुकूल बात को हो स्वीकार करता हैं। अपने प्रतिकुल बात का वह विरोध करता हैं।नई बात से बचने का मार्ग सोच लेता हैं,जैसा कि वह कहेगा -मात्र सकारात्मक होने से क्या होगा ?

सकारात्मकता एक आदर्श हैं। इसे व्यवहार में लाना कठिन है। जब सब लोग नकारात्मक है तो   मैं कैसे सकारात्मक बन सकता हूँ? सकारात्मक होने से मैं पिछड़ जाउंगा ,लोग मुझे धोखा दें देंगे ।मेरी परिस्थितियां बहुत खराब हैं,इनमें सकारात्मक होना कठिन हैं । कुछ मित्रों का मन उल्टे तर्क भी खडे. कर सकता हैं । हम तो सकारात्मक ही हैं।ंहम तो सब जानते हैं।

हमारे भीतर एक सतत बडबडाहट चलती रहती हैं। हम अपने ही विचारो से भरे हुए हैं। अनियंत्रित विचारों के तले दबा व्यकित पढ कर भी पढ नहीं सकता । अपनी सोच प्रक्रिया में डूबा मन कूछ सीख नही सकता हैं।

सकारात्मकता के खिलाफ तर्क मत खडे करिये ।ं तर्क खडे करने वाले मन की चालाकियो को दखने का प्रयास करें। मन सदेव सरल रास्ता पसंद करता हैं। ढलान पर फिसलना सरल हैं । नकारात्मक बने रहना ढलान पर लुढकना हैं। सकारात्मक होना चढाई पर चढने जैसा हैं, जो कि कठिन हैं। अपनी नकारात्कता को किसी भी तर्क से बचाओ मत । आपको सकारात्मक होने हेतु कुछ ठोस प्रयत्न करने हैं। सकारात्मकता एक शब्द नही ,जीवन शैली हैं।यह चर्चा का विषय नही प्रयोग का उपक्रम हैं। यह कोई आदर्श नहीं ,अस्तित्वगत सत्य हैं। यह कोई दर्शन नहीं ,यह जीवन जीने की कला का मूल मंत्र हैं। यह कोई धारणा नहीं ,बल्कि जीवन को बदलने का क्रान्तिकारी सूत्र हैं।

जीवन में 99 के फेर में न पडे । 100 में से एक कम हो गया तो रोने या भटकने की जरूरत नही हैं। निन्यानवें कोई कोई कम चिज नहीं होती ।निन्यानवें एक का 99 गुना होता हैं। आपके सुझाव आमंत्रित हैं।

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4 विचार “सकारात्मक होने मन की बाधा कैसे पार करे?&rdquo पर;

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