विज्ञान के आलोक में दीपावली अभिनन्दनः अर्थ, प्रयोजन एवं सार्थकता

हम दिवाली की शुभकामनाएँ लेने  देने में विगत दो तीन दिनो सें व्यस्त हैं,लेकिन इन शुभकामनाओं की लेनदेन का हमारे जीवन पर सतही खुशी के अतिरिक्त  कोई गहरा असर नजर नही आता हैं। फिर शुभकामनाओ का क्या अर्थ हैं?
अभिनन्दन का प्रारम्भ कब से हुआ? क्या त्योहारो पर बधाई देने में सार है या यह मात्र एक  सामाजिक औपचारिकता है। इस तरह की परम्पराओं का तर्क प्रारम्भ में पवित्र था, लेकिन आज यह बाजारवाद का fशकार हो गया हैं। यह एक पाखण्ड बन कर रह गया है। इस पर वैज्ञानिक दृश्टि से चिन्तन की जरूरत हैं।
मनोविज्ञान के अनुसार दिवाली की शुभ कामनाएँ हमारी आत्म-छवि को सुधारती है इससे हमें अपने पर  भरोसा बढता हैं। स्वयं को महत्वपुर्ण समझते है।  हमारी दक्षता बढती है अर्थात हमारी कार्य निश्पादन में क्षमता बढती हैं। इन सबसे हीनताग्रन्थि कमजोर होती हैं। अर्थात दीवाली की शुभकामनाएँ दिल से देने में ही सार्थकता हैं। इसको मात्र स्वार्थ वस देने में हा्रस है यह औपचारिकताओ ,पाखप्ड व बाजारवाद का त्योहार नहीं हैं। यह भावजगत का त्योहार दिल का दिलो से  जुडनेका त्योहार हैं

वस्तुतः दिल से शुभकामनाऐं देने का बडा महत्व है। औपचारिक रूप से शुभकामनाऐं देना व्यर्थ है।  सच्चे दिल से शुभकामनाएँ देने से हमारे भाव शुभ होते हैं । शुभकामनाओं से शुभ विचार बनते हैं। आधुनिक विज्ञान के अनुसार विचारों की सबसे छोटी ईकाई थाॅट्ट्राॅन है। ये थाॅट्ट्रान एवं विचार ही हमारे सुक्ष्मषरीर एवं आभामंड़ल बनाते है। सुक्ष्म शरीर ही हमारे स्थुलशरीर को चलाते हैं। दुसरी भाषा में कहे तो शुभकामानाओं के अपने कम्पन होते है।  ये कम्पन अच्छी भावनाओं को मजबुत करते है।  इससे हमारी दिव्यता में ,प्रेम में व्रद्वि होती हैं । हमारा आभामंडल पवित्र होता हैं। शुभ भावनाओं से  नकारात्मक कम्पन कम  होते हैं।   शुभभाव जीवन में शुभकार्य के कारण होते हैं इस प्रकार शुभकामनाओं की भूमिका साफ हैं। अतः विज्ञानं के अनुसार   शुभकामनाऐं औपचारिक रूप से न दे, दिल  से  दे  ।

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