टिप्पणी का शास्त्र और मनोविज्ञान: भाग- दो

टिप्पणी कौनसी पोस्ट पर करे व टिप्पणी मे क्या लिखे?

प्रत्येक उस पोस्ट पर टिप्पणी करें जो आपको आपको सुहाती है, पढ़ने पर कुछ नया ज्ञान  सीखाती है, । कुछ नया ज्ञान एवं विचार देती है। यदि पढ़ने मे रस आता है तो उसकी मिठास को पहचाने व दुसरो तक टिप्पणी द्वारा पहुचांए। ब्लाॅग में आपने क्या पाया ? अगर आपने कुछ अच्छा या बुरा पाया हैं उसकी सूचना ब्लाॅगर को देना चाहते है तो जरूर टिप्पणी करे। ताकि ब्लाॅगर को अपने आलेख के मुल्यांकन का  अवसर मिले।
टिप्पणियाँ भी पोस्ट की समृद्व करती है। यही तो टिप्पणी करने का उद्वेश्य है। टिप्पणी अपने आप मे एक तरह से पोस्टमार्टम रपट भी हैं।पाठक को  अपना विश्लेषण  दर्शाने का हक है।

टिप्पणी करने के आधार क्या हो सकते है?

पोस्ट पढ़ने पर आपके मन मे जो भी प्रतिक्रिया होती है उसे लिख दे। आपको अच्छी लगी हो क्या बात अच्छी लगी व अच्छी लगने के आधार लिखे।  यदि पोस्ट मे लिखे पर सन्तुष्ट नहीं है तो उसका कारण लिखे। पोस्ट पर सुझ्ााव भी दिये जा सकते है। सुझ्ााव का तर्क एवं आधार लिखे।अपनी असहमति भी सकारण पोस्ट पर लिखे। इसी तरह का आपका अनुभव हो जो दुसरो को भी कुछ नई बात या नई सोचने की दिशा देता है तो उसे जरूर लिखे। समर्थक दोहे, शायरी, महापुरूषो के अनमोल वचन, सुक्ति या सम्बन्धित वैज्ञानिक शोध का उल्लेख कर टिप्पणी की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती है।

इसमे पूरे विषय को कवर किया हैं ? सभी आयाम एवं पक्ष स्पष्ट है? कहीं  कोई पुर्वागृह तो नहीं है? कहीं बात अधुरी , अस्पष्ट , असंगत तो नहीं है? ब्लाॅगर अपनी बात सही कर पाया है या नहीं ?उसकी भाषा, विषय के प्रति समझ , अभिव्यक्ति व शैली कैसी है? इस पर भी टिप्पणी की जा सकती है।

टिप्पणी में क्या लिखना चाहिए?

वैसे तो टिप्पणीयाॅ व्यक्तिगत होती है। पाठक की निजी प्रतिक्रिया है। सबकी अपनी आजादी है। अपनी आजादी है तो अगले की भी आजादीे का सम्मान रखें। टिप्पणी की भाषा सरल व सकारात्मक भाषा मे करें। कलिश्ट एवं असंगत टिप्पणी न करे। नकारात्मक द्वश्टिकोण भी मधुर शब्दो मे लिखे व व्यक्तिगत आक्षेप न करे। न किसी की खिल्ली उड़ाए। न ही भिन्नता पर अंगुली बेवजह उठाएं। आलेख मे अनावश्यक त्रुटियां न खोजे, न उल्लेख करे। उलाहना न लिखे। बता सके तो बीमारी की बजाए टिप्पणी मे औषधि दें।

’’ जमाये रहिये जी ’’ ’’मामला तो तगडा है, सर’’ ’’अच्छा,महान’’ ’’वाह’’ ’’खुब लिखा’’, ’’सहमत हुॅ’’, ’’सही लिखा’’ इस तरह की टिप्पणी सार्थक नहीं है। इस तरह की औपचारिक टिप्पणी न करें । पूर्वाग्रह मुक्त होकर  वस्तुनिष्ठ तरीके से टिप्पणी करें।  ठोस व काम की बात टिप्पणी में होनी चाहिए । सार्थक टिप्पणी करें। अपने उसी तरह के अनुभव साझा करे या अनुभव बाटें।
टिप्पणी करते समय मर्यादित रहंे। एक सीमा न लाॅधे। टिप्पणीकार परीक्षक नहीं है। नकारात्मक टिप्पणी रचनात्मक व सार्थक होनी चाहिए । र्दुभावनावश टिप्पणी नहीं  करनी चाहिए । टिप्पणिया भी विवाद पैदा करती है । जैसा कि विगत में ’’मौहल्ला’’ नामक ब्लाॅग पर टिप्पणी ने गर्मागर्म विवाद पैदा किया। नारद ब्लाॅग एग्रीगेटर भी इसका शिकार हुआ। अतः संयत भाषा में टिप्पणीै करें ।  आलोचना नर्म भाषा में करें, अप्रत्यक्ष रूप से करें अपने पर जोर न देते हुए विनम्र शैली मे करें ।

(निरन्तर…………………)

3 विचार “टिप्पणी का शास्त्र और मनोविज्ञान: भाग- दो&rdquo पर;

  1. बात आप सही कह रहे हैं.

    वैसे अगर सिर्फ नमस्ते करके निकलना पड़े और हाल चाल पूछने और बताने की कोई वजह या समय न हो तो क्या मुलाकात की सार्थकता के मद्दे नजर मूँह फेर कर निकल जाना उचित है या नमस्ते कह कर.

    कई बार सिर्फ अभिवादन कर आप अपनी भावनाऐं एवं उपस्थिति दर्ज कर देते हैं.

    वैसे आप इस सार्थक आलेख को आगे बढ़ायें. मेरी शुभकामनाऐं.

    जमाये रहिये. :)

  2. आपने बहुत अच्छा विषय उठाया है। निश्चित रूप से जो बातें आपने रखी हैं वह बहुत ही पाजिटिव सोच वाली हैं। तमाम पुराने ब्लॉगर्स ऐसा कर भी रहे हैं। आपको इसके लिए कोटि-कोटि बधाई। लेकिन मैं आपकी बात में एक बात औप जोड़ना चाहता हूं जो शायद सभी के काम आए।
    वह बहुत ही सामान्य सी बात है।
    मेरा सवाल है कि मैं आपके ब्लॉग तक कैसे पहुंचा, मुझे क्या पता कि जयंती जैन नामक कोई शख्स ब्लॉग भी चला रहा है।
    अब मैं इसका जवाब देता हूं। आप मेरे ब्लॉग पर आए, आपने संक्षिप्त टिप्पणी लिखी। मैं उस लिंक को देखकर आपके ब्लॉग तक आया और आपका यह सार्थक लेख पढ़ा। यानी अगर आप किसी के ब्लॉग पर जा रहे हैं और अपनी उपस्थिति दर्ज किए बिना लौट रहे हैं तो आपके ब्लॉग तक न तो लोग आएंगे और न ही टिप्पणी करेंगे।
    …तो हे ब्लॉगर साथियों, अगर किसी ब्लॉग पर जा रहे हैं तो अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज कराइए। वरना जंगल में मोर नाचा किसने देखा…

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