ब्लड कैंसर का सामना मेरे पिताजी ने कैसे किया

आज मेरा जन्म दिन है।शरीर  आधारित  जीवन  जिया ,लेकिन चेतना आधारित  जीवन नहीं  जिया। ऐसे  मे पिता  का कैंसर  के  साथ किया संघर्ष  याद  आया ।

वर्ष 1980 की शरद ऋतु की बात है। बढ़ती थकान का ईलाज कराने के क्रम में पिताजी उदयपुर के मशहुर डाक्टर शूरवीर सिंह जी से तीसरी बार मिले। तब उन्होंने टी.एल.सी. कराने को कहा। सफेद रक्त कणिकाओं की संख्या औसत से दो-तीन गुना अधिक थी। डाक्टर ने ब्लड कैंसर की घोषणा की।

Salute to Family
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पतले दुबले शरीर में 50 किलो ग्राम वजन था। जो निरन्तर कम होता जा रहा था। एक वर्ष तक तो हमने उन्हें बताया नहीं कि उन्हें जानलेवा बीमारी हो चुकी है। लेकिन हमारी चतुराई उनकी चैकस निगाहों से बच न सकी। उन्हें संदेह हो गया कि उन्हें घातक बीमारी ने घेर लिया है। यद्यपि उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। हाँ, पूछते जरूर थे कि – उन्हें कौनसा रोग हो गया है। तुम मेरे प्रति बीमारी की बात करते समय गम्भीर क्यों हो जाते हो ?
श्री रतनलाल जी को अपने कर्मों व अपने भाग्य पर भरोसा था। वे एक पक्के जैन अनुयायी थे। उनका दर्शन उम्र को तय मानता है। अतः वे मृत्यु भी तय तारीख से पूर्व आने की बात नहीं मानते थे। वेे कहते थे कि कोई डाक्टर उनकी उम्र एक दिन बढ़ा नहीं सकता है न ही कोई एक दिन उम्र कम कर सकता है। मृत्यु निश्चित है। फिर डरना क्या ?
वे एक नियमित व्यक्ति थे। उन्होंने कभी रात को पानी तक नहीं पीया। पारम्परिक जैन विश्वासों के अनुयायी होने से वे कहा करते थे कि रोग देह को हुआ है। वे तो एक चेतन तत्व भगवान आत्मा है। नित्य आत्मा को कोई पदार्थ छू भी नहीं सकता है।
राजस्थान राज्य में मेरा गांव शक्तावतों का गुडा सोम नदी के किनारे बसा हुआ है। पिताजी प्रातः उठते ही नदी पर जाते थे। उनके दिन का प्रारम्भ नदी से होता था। पिताजी नदी से स्नान कर आते ही मन्दिर जाते थे वे वहां पर प्रतिदिन घंटा-डेढ़ घंटा पूजा करते थे। भोजन से पूर्व यह उनकी शर्त थी । जैन पूजाओं में ईश्वर से शक्ति, साहस व प्रेम मांगा जाता है।
निदान 1980 में ही हो गया था। तभी उन्हें ’माइलरन’ नामक कैप्सूल व रक्त संवर्धन की गोलियाँ दी जाती थी। पिताजी ने केंसर के उपरान्त बारह वर्ष जीवन जीया। इसमें से अन्तिम एक वर्ष ही निष्क्रय रहे। बिस्तर पर तो मात्र वह एक माह रहे। अन्यथा उन्होंने पूरी जिम्मेदारी के साथ सक्रिय जीवन जीया। उन्हें कभी रेडियोथेरेपी, या किमोथेरेपी न करानी पडी। रक्त परिवर्तन भी एक भी बार नहीं कराना पड़ा। इस सबके बिना भी वह सक्रिय जीवन जीते रहें। यह सब कैसे हुआ, बताना कठिन है। यह उनकी अपने प्रति व अपने धर्म के प्रति आस्था व सात्विक भोजन का ही परिणाम होगा। डा. स्वयं इसे चमत्कार बताते थे। 01, अगस्त, 1993 को उनकी देह छूटी। ?
व्यक्ति की देह उसके विचारों का अनुसरण करती है। सकारात्मक विचार रोगी की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते है आधुनिक वैज्ञानिक शोधो से प्रमाणित हुआ है कि स्वस्थ्य विचार से स्वस्थ्य शरीर बनता है।

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