अन्र्तप्रेरणा सुने और जीना सीखें

हम अपनी क्यों नहीं सुनते हैं ?
हम अपनी व्यस्तता के कारण अपने से ही बहुत दूर चले गयें हैं । हमने अपनी आन्तरिक आवाजा को कुचल रखा हैं । हमारी आत्मा की आवाज हमने दबा दी हैं । पहली बार बिना टिकिट रेल में यात्रा करने पर या रिश्वत लेने पर व्यक्ति का अन्र्तमन उसे रोकता हैं । दोहराने पर मन रोकने की कोशिश करता हैं लेकिन व्यक्ति लोभवश उस आवाज को दबा देता हैं । जिसका नाता खुद से ठीक नहीं होता, वह किसी अन्य से भी रिश्ता नहीं जोड़ पाता हैं । ऐसे में वह सदा अकेला जीवन यापन करता हैं । ऐसे में वह अस्तित्व से भी कटा कटा रहता हैं ।
हमारा दुनिया में दूसरों से बहुत कम संवाद हैं एवं स्वयं से भी संवाद नहीं के बराबर हैं । हम अपने अन्र्तमन के संकेतों व संदेशों को ग्रहण नहीं करते हैं । जिस तरह पृथ्वी पर गुरूत्वाकर्षण बल हैं उसी तरह मानव की अन्र्तआत्मा का भी गुरूत्वाकर्षण बल हैं जो उसे किसी काम को करने से पहले उसे सही व गलत की सूचना जरूर देता हैं । जो व्यक्ति की रक्षा हैतु होती हैं जब आप अपनी बात नहीं सुनते है तो दुनिया में किसी और की बात कैसे सुन सकते हैं । हम अपनी सबसे ज्यादा अनदेखी करते हैं । कई बार मनुष्य का अचेतन घटनाओं को प्रोसेस कर कुछ सूचनाएं व संकेत देता है लेकिन तब हम उस पर ध्यान नहीं देते हैं । आपका शरीर, मस्तिष्क, मन और आत्मा निरन्तर कुछ न कुछ किसी न किसी रूप में आपसे कहते रहते हैं । अपनी अन्र्तप्रेरणा ही आपकी सर्वश्रैष्ठ मार्गदर्शक हैं । इस स्त्रोत का लाभ उठाकर व्यक्ति चाहै जितनी उन्नति कर सकता हैं । पाओलो कोएलो ने एल्केमिस्ट को साफ तौर पर ऐसे संकेत ग्रहण करते हुए दिखाया है । वह प्रकृति द्वारा दिए जाने वाले संकेतों एवं लक्षणों को महत्व देने के कारण ही सफल होता हैं ।
निर्विचार की स्थिति में अन्र्तमन के संकेतों को ग्रहण करना सरल व सहज होता हैं । ध्यान से अन्र्तप्रेरणा की मात्रा बढ़ाई जा सकती हैं ।

अन्र्तप्रेरणा सुने और जीना सीखें&rdquo पर एक विचार;

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