जोर से हंसीए , तनाव स्वत भाग जायेंगे

’’हंसने से शक्ति आती है। अब चिकित्सा विज्ञान भी कहता है कि हंसी प्रकृति के द्वारा मनुष्य को दी गई दवाइयों में से सबसे अधिक गहरा प्रभाव डालने वाली दवाई है।’’

— ओशो’

हंसी केवल भौतिक समस्याओं का समाधान ही नहीं है बल्कि यह शारीरिक एवं मानसिक समस्याओं एवं बीमारियों से मुक्ति का अमोघ उपाय भी है। हास्य लाखों दुःखों की अचूक औषधि है। यह स्वास्थ्य का अनोखा मंत्र है। जैसाकि गांधीजी ने एक बार कहा था- ’’मुझमें विनोद का भाव न होता तो मैंने बहुत पहले ही आत्महत्या कर ली होती।’’ हमारे सन्तों ने भी लिखा है कि यदि दुख में भी सुख की अनुभूति चाहते हो तो हंसमुख बनो। एक विक्रेता की मोहक मुस्कान वह कर जाती है जो किसी जेबकतरे की कैंची नहीं कर पाती है। हँसने की विशेषता सिर्फ मनुष्यों में है। जानवर व पेड़ पौधे हँस नहीं सकते हैं। हंसना स्वयं का खिलना है। स्वयं का विस्तार हँसी में है।

हंसने से तनाव कैसे कम होते हैं ?
अब तो वैज्ञानिक ढंग से यह प्रमाणित हो गया है कि मानव शरीर स्वयं ही दर्द निवारक एवं तनाव को कम करने वाले हारमोन्स पैदा करता है। हंसने से इण्डोरफिन नामक हारमोन सक्रिय होता है जो एक प्रभावशाली पेन किलर है।
लोर्ना लिण्डा स्कूल आॅफ पब्लिक हेल्थ, केलिफोर्निया ने हमारी प्रतिरोधक प्रणाली पर हास्य के प्रभाव को मापा। उन्होंने पाया कि हंसने की अवधि के बाद शरीर की श्वेत रक्त कोशिकाओं, टी-कोशिकाओं और शरीर के स्वतन्त्र अंगों सहित सुरक्षा से सम्बंन्धित सभी हिस्सों में बढी हुई गतिशीलता के संकेत दिखाई दिये।
न्यू जर्सी के ओस्टियोपैथिक मेडिसिन स्कूल के डाॅक्टर मार्विन ई. हैरिंग का कहना है कि ’’एक दिल खोलकर अट्टाहास करना, मध्य पटल, वक्ष, पेट, हृदय, फैफडों और जिगर तक की मालिश कर देता है। जैसे कोई अन्दर ही दौड लिया हो।’’ मुम्बई के लाफ्टर क्लब के संस्थापक डाॅक्टर मदन कटारिया कहते हंै – ’’जोरदार हंसी आपके फैफडों से बची हुई वायु को निकाल देती है, और उसे ज्यादा आक्सीजन वाली ताजा वायु से भर देती है।’’ उन्मुक्त हंसी तनाव को समाप्त कर देती है। आधुनिक शोधों से यह भी प्रमाणित हुआ है कि शरीर में किसी भी प्रकार की सूजन हंसने से घटती है, एवं हंसने से रक्तचाप भी घटता है। एक शोध के अनुसार हँसने से शारीरिक व्यायाम भी हो जाता है। 20 सैकण्ड की हंसी 10 मिनट के नौकायान के बराबर है। एक शोध के अनुसार बच्चा दिन में 400 बार हंसता है जबकि बडे़ दिन में सिर्फ 17 बार हंसते है। हमें मुस्कराने हेतु 9 मांस पेशियाँ चाहिये जबकि गुस्सा व्यक्त करने हेतु 19 मांसपेशियाँ उपयोग में आती है।

जब हम हंसते हैं तो एक ध्यान पूर्ण अवस्था में होते है, ‘विचार प्रक्रिया रूक जाती है। हंसने के साथ-साथ विचार करना मुश्किल है। दो बाते’ विपरीत है – या तो तुम हंस सकते है या विचार ही कर सकते हो। यदि तुम वास्तव में हँसों तो विचार रूक जाएगा। यदि तुम हंसते हुए विचार कर रहे हो तो तुम्हारा विचार कमजोर होगा व हंसी अपंग होगी। हास्य लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने वाले चुम्बक की तरह है। लोग हमेशा ऐसे आदमी के आस पास रहना पसंन्द करते है जो हंसने-मुस्कराने और जीवन का आनन्द लेने में उनकी मदद करता है।

हंसते हुए बुद्ध

जापान में हंसते हुए बुद्ध होतेई की एक कहानी है। उसका पूरा उपदेश बस हँसना था। वह एक स्थान से दूसरे स्थान, एक बाजार से दूसरे बाजार घूमता रहता। वह बाजार के बीचों-बीच खडा हो जाता और हंसने लगता-यही उसका प्रवचन था। उसकी हंसी सम्मोहक थी, सक्रांमक थी-एक वास्तविक हंसी, जिससे पूरा पेट स्पंदित हो जाता, तरंगायित हो जाता। वह हंसते-हंसते जमीन पर लोटने लगता। जो लोग जमा होते, वे भी हंसने लगते, और फिर तो हंसी फैल जाती, हंसी की तूफानी लहरें उठतीं, और पूरा गांव हंसी से आप्लावित हो जाता।
लोग राह देखते कि कब होतेई उनके गांव में आए, क्योंकि वह अद्भुत आनंद और आशीष लेकर आता था। उसने कभी भी एक शब्द नहीं बोला-कभी भी नहीं। तुम बुद्ध के बारे मे पूछो और वह हंसने लगता, तुम बुद्धत्व के बारे में पूछो और वह हंसने लगता, तुम सत्य के बारे में पूछते कि वह हंसने लगता। हंसना ही उसका एक मात्र संदेश था।

व्यक्ति के भीतर दबी हुई ऊर्जा बाहर आती है। हंसना मानसिक ही नहीं शारीरिक व्यायाम भी है। हॅंसने से इन्डोरफीन नामक हारमोन्स बनता है। बेवजह गम्भीरता एक रोग है। हंसना एक अच्छी आदत है। हंसने से एक शोध के अनुसार 86 प्रतिशत लोग हंसने के तरीके को नहीं अपनाते और न ही अपने तनाव कम करते हैं। हंसने के लिये कोई कारण ढँूढने की आवश्यकता नहीं है। अरे भाई, हंसने में कोई पैसा थोडे ही लगता है। अभी तक तो सरकार ने भी हंसने पर कोई टैक्स नहीं लगाया है। फिर हम हंसने में कंजूस क्यों है? हंसना फूहडता नहीं है। सामाजिक मर्यादा के नाम पर हंसी को रोकना सदैव सही नहीं है। हमेशा गम्भीर रहना कोई बुद्धिमत्ता नहीं है, एवं हंसना छिछोरपन नहीं है। हमारी आदते हंसने के विरूद्व है इनको बदलने की जरूरत है।

हंसना एक ध्यान है, प्रार्थना है। हंसने से मन में दबी वासनाएं व कुंठाएं बाहर आ जाती हैं। कलुषित भावनाओं का रेचन होता है। अगर आपने हंसना सीख लिया है तो आपने प्रार्थना करना सीख लिया है। तनावग्रस्त अवस्था में गम्भीर मत होइये। सिर्फ वही आदमी हंस सकता है, दूसरों के लिए ही नहीं बल्कि स्वयं के लिए भी धार्मिक हो सकता है। हंसना वर्तमान में जीना है। हंसते वक्त व्यक्ति भूत एवं भविष्य में नहीं रह सकता हैं। मुक्त रूप से हंसते हुए व्यक्ति निर्विचार अवस्था में होता है, जिससे तनाव नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। हंसने से सजगता बढती है। जैसे चुटकुलों पर हंसते हंसते तुम्हें यह ख्याल आयेगा कि अरे! यही हालत तो मेरी भी है। तब आप अपने आप पर भी हंस सकोगे। जब आप अपने ऊपर भी हंस सको तभी संम्भावना पैदा होती है नीद से जागने की, बेहोशी से उठ खडे होने की तब वह चुटकुला एक अलार्म घड़ी की तरह कार्य करता है।
अपने पर इसलिए हंसो कि तुमने संसार को नहीं समझा। संसार पर इसलिए हंसो कि संसार ने तुम्हें नहीं समझा। अपनी भूलों पर इसलिए हंसो कि उनका सुधार असंभव है। अपनी लालसाओं पर इसलिए हंसों कि वे अनाधिकार चेष्टा थी। अपने प्रेमियों पर इस कारण हसों कि उनका प्रेम झूठा था और अपने दुश्मनों पर इसलिए हंसों कि उनकेआरोप झूठे हैं। इससे अधिक हंसने के और क्या कारण हो सकते हैं ?

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7 विचार “जोर से हंसीए , तनाव स्वत भाग जायेंगे&rdquo पर;

  1. यह लेख वाकई एसे लोगों में उर्जा का संचार करने के लिए पर्याप्त है, जो अपने अंदर स्वयं को महान समझते हैं एवं दूसरों को नगण्य ? एसे लोग जो स्वयं को अन्यों की अपेक्षा अधीक बडा समझकर हंसना तक भूल जाते हैं स्वयं तो हंसते नहीं वरन दूसरों को भी ना हंसने पर मजबूर करते हैं। यह बहुत ही अच्छा प्रयास है।

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