उठो! जागो!

लक्ष्य की प्राप्ति तक रूको नहीं! -जयन्ती जैन


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प्राण ऊर्जा बढ़ाने प्राण ऊर्जा संवर्धन तकनीक (PET) का अभ्यास करें

प्राण ऊर्जा हमारा आदि कारण है । प्राण की बदौलत यह जीवन मिला हुआ है । प्राण ऊर्जा के प्रति समझ न होने से हम उसका उपभागे अपने पक्ष में नहीं कर पाते हैं । Pranic energizing techniqueयह अरूचि अज्ञान है । जब हम इसका उपभोग अपने पक्ष में नहीं करते हैं तो यह ऊर्जा हमे नचाती है व दुःखी करती है। इसका ज्ञान होने से ही रूचि होती है । जब तक इसका महत्व नहीं जानते हैं तब तक उसका उपभोग अपने पक्ष में नहीं कर पाते हैं ।
एस. व्यासा, बैंगलोर द्वारा प्राण संवर्धन हेतु एक बढ़िया तकनीक विकसित की है जिसे पेट कहते हैं । हमारे स्थूल शरीर के निर्माण के पीछे प्राण शरीर उत्तरदायी है । प्राण के अवयवस्थित, विकृत या बाधित होने से सारे रोग होते हैं । प्राण ऊर्जा को जगा कर, लयबद्ध कर स्थूल शरीर में आए रोग को ठीक कर सकते हैं । इसीलिए प्राण ऊर्जा सबसे महत्वपूर्ण है ।
इसे जगाने के आठ चरण निम्न है ।
1. प्रार्थना – प्राणस्येदं वशे सर्व यत् प्रतिष्ठतम् ।
मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विदेहि न इति ।।
तीनों लोगों में जो कुछ भी अस्तित्व में है, सब प्राण के नियंत्रण में है । जैसे माता अपेन बच्चों की रक्षा करती है, वैसे ही हे प्राण, हमारी रक्षा करो । हमें श्री-सम्पति दो, हमें प्रज्ञा दो ।

2. शरीर को शिथिल करना – शरीर के समस्त अंगो को पूरी तरह ढीला छोड़ना । तनाव का कम होना।
3. श्वांस के प्रति जागना व उसे संतुलित करना – नाड़ी शुद्धि प्राणायाम कर समश्वांस होना ।
4. संवेदनशीलता एवं पहचानना – स्नायु सचंरण के प्रति जागना, चिन, चिन्मय, आदि एवं नमस्कार मुद्रा के प्रति सचेत होना व स्नायविक परिसंचरण को महसुस करना । श्वसन, रक्त प्रवाह, हृदय का धड़कना, स्नायु, संचरण, प्राण-ऊर्जा में भेद अनुभव करना । (30 सैकण्ड) अन्तर्जगत से सम्पर्क होता है ।
5. प्राण को घुमाना एवं बढ़ाना – प्राण को स्केन कर शरीर के सभी अंगों में उसको अनुभव करना । इससे प्रतिरोध क्षमता बढ़ती है ।
6. अस्तित्व से जुड़ना – प्राण को फैला कर अस्तित्व से जुड़ना, विस्तार अनुभव करना । ब्रह्माण्ड से परिचय बढ़ता है ।
7. संकल्प – अपनी चाह को 9 बार दोहराना । इससे संकल्प खक्ति बढ़ती है । दिव्यता जगती है ।
8. शुभाकांक्षा करना – सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग् भवेत् ।।
सभी सुखी हो, सभी रोग रहित हो, सभी परम तत्व प्राप्त करें, कोई भी दुखी न हो ।


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मन को शांत करने भ्रामरी प्राणायाम कैसे करे

इस प्राणायाम में अभिज्ञा के और अधिक विकास के लिए ध्वनि-तरंगो का उपयोग किया जाता है। संस्कृत मंे भ्रामरी का अर्थ है भ्रमरी की या मधुमक्खी की-आवाज या ध्वनि इसमें अन्र्तनिहित है। अर्थात भ्रमरी की ध्वनि । यह प्राणायाम इस ध्वनि के साथ किया जाता है।
विधि
हठयोगप्रदीपिका में इसका वर्णन इस प्रकार हैः
वेगाद्घोषं पूरकं भृंगनादं भृंगनादं रेचकं मंदमदम्।
योगींद्राणामेवमभ्यासयोगाच्चिते जाता काचिदानंदलीला।।
भ्रमर की ध्वनि के समान घोष करते हुए तेजी से सांस लीजिए और भ्रमरी के समान ध्वनि करते हुए उसे मंद-मंद छोड़िये। भ्रामरी प्राणायाम में नाक से श्वांस भर कर धीरे-धीरे भ्रमर की गुंजन के साथ श्वांस छोड़ते हैं । यह प्राणायाम पूरी तरह शरीर को शिथिल कर आराम के साथ किया जाता है । इसमे ध्वनि निकालते वक्त न पर जोर रखें । इसे सहज होकर करते हैं ।
ध्यान लगाने वाले आसन में बैठ कर करें कमर, पीठ व गर्दन सीधी रखें । ध्वनि तरंग को मस्तिष्क में अनुभव करें व इसी पर चेतना को केन्द्रित करें ।
भ्रामरी प्राणायाम में नाक से श्वांस भर कर धीरे-धीरे गले से भ्रमर की गुंजन के साथ श्वांस छोड़ते हैं । गंुजन करते वक्त जीभ को तालु से लगायें । दांत बन्द व होठ खुले रखें । यह प्राणायाम पूरी तरह शरीर को शिथिल कर आराम के साथ किया जाता है । इसमे ध्वनि निकालते वक्त ‘न’ के उच्चारण पर जोर रखें । ओम उच्चारण में ‘म‘ पर जोर देते है तब होठ खुले रहते है । ’न’ पर जोर देने से होंठ स्वतः बन्द हो जाते हैं । दोनों में शब्दों के जोर को ध्यान में रखें । आवाज इतनी सी करे कि पड़ौसी को सुनाई दे । इसमे श्वांस लेने में 10 सैकण्ड व छोड़ने में 20 से 30 सैकण्ड तक का समय लगाएं । यह एक आवृति हुई । इसी तरह 5-10 मिनट तक भ्रामरी निरन्तर करें । इसे शान्त व शिथिल होकर करें । इसे करते वक्त शरीर को सहज रखें । पीठ, गर्दन व सिर सीधे रखें ताकि रीढ़ की हड्डी सीधी रहे । इसे करते वक्त गुंजार की ध्वनि को सिर व पूरे शरीर में फैलने दे । साथ ही इसकी प्रतिध्वनि सुने । शरीर में इसके फैलते कम्पनों को महसूस करें ।

सावधानी – कान में संक्रमण हो तो इसे न करें । इसे करते वक्त आसन स्थिर रखें । कन्धों को ढीला छोड़े व हिलाएं नहीं । जबरदस्ती गंुजार को न खींचे । जितना आराम से करेगें उतना ही अच्छा ।
सीमा -यह प्राणायाम कभी भी किया जा सकता है । सोते वक्त लेटे लेटे भी कर सकते है । इसे करने से कभी कोई हानि नहीं होती है ।
यहां


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स्वास्थ्य रक्षक भोजन

मुख्यतः हमारे रोगो का कारण हमारा भोजन है। पोषक भोजन नहीं करने के कारण हम बीमार होेते है। आवश्यक तत्व, खनिज एवं विटामिन जरूरी है। इनसे शरीर की प्रतिरोध शक्ति मजबूत रहती है ताकि रोग न पनप सके।स्वास्थ्य रक्षक भोजन
रोग का सामना भी हम आहार द्वारा कर सकते है। आहार को व्यवस्थित कर हम शरीर को ऊर्जावान व स्वस्थ रख सकते है।
सुबह का नाश्ता न करने से ह्नदय रोग होने की संभावना कम होती है।
नमक का अधिक प्रयोग गुर्दे का कार्य बढ़ाता है।
शक्कर भी अंततः वसा में बदलती है। इसलिए अतिरिक्त शक्कर भी वसा की तरह हानिकारक है। कम वसा मुक्त पैक्ड फूड को स्वादिष्ट बनाने के क्रम में अधिक शक्कर जोड़ी जाती है। प्रसंस्करित भोजन में शक्कर अधिक होती है।अतएव उससे बचने की जरूरत होती है।
जीवाणु विषाणु जनित रोगों को छोड़कर शेष रोग शरीर में किसी न किसी तत्व की अधिकता या कमी से होते है।


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हमारी जीवन शैली रोगों की जनक हैं –स्वास्थ्य-सेतु

आज हमारी जीवन शैली बाजारवाद, उपभोक्तावाद एवम् जल्दबाजी से विक्रत हो गई है । हमारा भोजन स्वाद के अधीन हो गया, पोषकता को भूल गये । श्वास की लय टूट गयी है ,उतावल ने उसे असहज बना दिया । हमको व्यस्तता ने स्वंय के प्रति अंधा बना दिया है। हम आदतों के पुतले हो गये । अतः जीवन शैली रोगों की जनक है ।प्रतिक्रियात्मक शैली ने सहजता हमसे छीन ली है । हमारी सोच एवं आपाधापी हमें स्वस्थ नहीं रहने देती है ।सोच सम्यक् नही होने से जीवन भी सम्यक नहीं रहता है । सोच विरोधाभाषी होने से शरीर के स्त्राव भी संतुलित नहीं रहते है । शरीर की प्रज्ञा भी सही दिशा में कार्य नहीं कर पाती है । जीवन में खुशी की लहर रह नहीं पाती है । शरीर में खिंचाव बढते है जिससे रोग बढते है।  I am resposible for my illness
जो अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रह कर निरन्तर निरोगी रहना चाहते है, अपने परिवार एवं इष्ट मित्रांे को आर्दश रूप में स्वस्थ रखना चाहते है। यह ग्रुप उनके लिये है। समग्र चिकित्सा में विश्वास करते है। वैकल्पिक चिकित्सा भी लेने को तत्पर है। चिकित्सा के बाजारीकरण को समझते है। दवा माफिया के प्रपंच से अवगत है। यह उन मित्रो के लिये जो नई संभावना खोजना चाहते है।


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प्रणव साधना से अनाहद नाद

अनाहद नाद को सुनने में सहायक

ओम साधना का उद्वेश्य अनाहद नाद को सुनना है । यह वह ध्वनि है जो हमारे कान के सुनने की क्षमता के बाहर की ध्वनि है। यह आकाशीय एवम् ब्रह्माण्डिय ध्वनि है जो निरन्तर हमारे चारांे ओर विद्वमान है। ओम शब्द में सगुण, निगुर्ण एवम् निर्विशेष आदि सभी भाव विधमान् है। अनाहद सुनने से दिव्यता बढती है।दिव्य शक्तियां जाग्रत होती है।

यह अभ्यास अन्र्तध्यान में सहायक है । इसको करने से शरीर में लयबद्धता बढ़ती है। यह होश बढ़ाता है। इसको करने से शरीर में अराजकता कम होती है । यह ध्यान के पूर्व का अभ्यास है । इसको करने से ध्यान गहरा होता है ।

यह एक श्रेष्ठतम प्राणायाम है। ऊँकार की ध्वनि करने से शरीर के कम्पन सुधरते है। मन शरीर व भावों में संतुलन आता है। ऊँ की ध्वनि करने से उत्पन्न कम्पन हमारी भावनाओं को सुहाते है, दिल को अच्छे लगते है। मन के शोर को कम करते है। स्वयं के प्रति सजग करते है। इस तरह के कम्पन से अशान्ति कम होती है, शान्ति बढ़ती है। स्नायु तन्त्र शिथिल होता है। उत्तेजना कम होती है। अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ संतुलित होकर अपना स्त्राव सही करती है। शरीर में फैले विषैले पदार्थ बाहर निकलते है। हमारी रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है। ओम साधना एक प्राणायाम ही नहीं बल्कि श्रेष्ठतम ध्यान भी है।

 

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स्वयं को जगाने हेतु ओम साधना करें

ऊर्जावान बने रहने व वजन घटाने सूर्य नमस्कार करें


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ओम जपने से भीतरी संतुलन बढ़ता

संतुलन स्थापित करने में सहायक

ओम जपना मात्र शरीरिक क्रिया नहीं हैं। इससे उत्पन्न ध्वनि शरीर को व्यवस्थित करती है। शरीर अपने निज स्वभाव को प्राप्त होता है। असंतुलन,विकृति व अराजकता का नाश होता है। हमारे शरीर के प्रत्येक अणु को शान्ति मिलती है। उन्हें ठीक होने में मदद मिलती है।

Om sadhanaओम जपना मानसिक ग्रन्थियों को भी खोलता है। योग व्यक्ति को व्यर्थ की सोच से ऊपर उठाता है तथा व्यक्ति के भीतर बैठी घृणा, ईष्र्या, लोभ, काम आदि को मिटाता है । हम अपनी नकारात्मकता को पहचानने लगते हैं, जिससे उसकी मात्रा घटती है। आत्म देह की पहचान जीवन की सार्थकता बताती है। शरीर से मन की शक्ति बहुत ज्यादा है और मन से आत्मा की शक्ति अनन्तगुना है। हम आत्मा की सत्ता को ही भूल गये हैं, जब हम आत्मा को जानेगें तो मन की शक्ति जाग्रत कर पायेगें। मन द्वारा स्वस्थ होने की क्षमता को पुनस्र्थापित करना है। देह को बनाने वाले डी.एन.ए. (डीआक्सीराइबो न्यूक्लिक एसीड- जीन) एवं डी.एन.ए. बनाने वाले मन को बदलता है।
भावो को गहन
इनको भावपूर्ण तरीके से, संकल्प के साथ करने पर पूरा लाभ मिलता है। ओम जपना को जोर से करने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें भाव से करना है। समर्पण के साथ करना है। पूरी श्रद्धा के साथ करना है। विराट के साथ एक होकर करना है। भावमय होकर होश के जप के साथ करें तो लाभ पांच गुना बढ़ जाता है। ओम जपते हुए भावना करें कि दैवीय शक्तियों की कृपा बरस रही है, मुक्तलाभ पुरूषो के आशीर्वाद मुझे मिल रहे हैं।े ओम जपने से हमारे रक्त में आक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है। प्राणांे का प्रवाह शरीर में सुचारुरूप से होने लगता है। मन शान्त रहता है जिससे अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियों से हारमोन्स का स्त्राव नियमित होनेलगता है। इससे मानव देह की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। इससे देह में व्याप्त रोग स्वतः ठीकहोने लगते हैं। बिना पर्याप्त आॅक्सीजन के स्नायुतंत्र और ग्रन्थितंत्र दोनों असंतुलित हो जाते हैं।

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अन्तर्यात्रा में सहायक ओम साधना

अन्तर्यात्रा में सहायक

स्नायविक शक्ति प्रवाह के प्रति जागने से मन प्रकाशित होता है। प्राण का प्रवाह महसूस होता है जो अन्तर यात्रा में सहायक है। ऊँकार की ध्वनि से उत्पन्न कम्पन हमारे शरीर के स्नायुतन्त्र को संतुलित करते है। इनमें उत्पन्न विकार का शमन करते है।

Pranav Sadhanaओम का बार 2 उच्चारण आन्तरिक सत्संग पैदा करता हैं। शरीर पर पडने वाले प्रभाव देखने की आवश्यकता हैं। इससे शब्द के अर्थ पर ध्यान रहता है जिससे ज्ञानलोक जगता है एवम् आत्मा प्रकाशित होती है। अ, ऊ, म व ओम का उच्चारण अलग-अलग इस तरह करें कि शरीर मे सूक्ष्म कम्पन्न उत्पन्न हो सके । शरीर के प्राकृतिक कम्पन्नों के अनुरूप उच्चारण होने पर ही अनुनाद उत्पन्न होता है । इसलिए इन ध्वनियांे का उच्चारण इस तरह करें कि शरीर में अनुनाद उत्पन्न हो सके । इस तरह के अनुनाद उत्तेजक का कार्य करते हैं एवं अनुनाद के बाद का मौन हमारे होश को बढ़ाता है जो सुक्ष्म तनावों को समाप्त करता है ।
परमाणु सदृश्य मन में उठती तरंग में भी कम्पन्न होता है। ये कम्पन्न चित्त में रहते है। ओंकार से ये कम्पन्न मन में छुपे कम्पन्नों को पुनः जगाते र्है क्यों कि समष्टी में कम्पन्न कभी नष्ट नहीं होते। ऐसे आध्यात्मिक कम्पन्न हमें सहज बनाते है, अपनी याद कराते है। अपना इससे गठजोड भीतर बढता है। चित्त में होने वाले सब कम्पन्न अदृश्य अवश्य हो जाते है, फिर भी परमाणु के कम्पन्न के समान उनकी सूक्ष्म गति अक्षुण्ण बनी रहती है।

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