उठो! जागो!

लक्ष्य की प्राप्ति तक रूको नहीं! -जयन्ती जैन


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देसी इलाज का अज्ञान अंग्रेजी इलाज की जीत :देसी इलाज करनेवालो की डायरेक्टरी

सिर्फ एलोपेथी ही चिकित्सा प्रणाली नहीँ हैं,अन्यत्र विकल्प भी हैं जिनका दुष्प्रभाव भी कम होता हैं. एवं जड़ से बीमारी ठीक भी होती हैं.लेकिन उनका हमें ज्ञान एवं पता नहीं होता न ही उनकी विश्वनीयता का ज्ञान होता हैं .अतः हम (स्वास्थ्य सेतु) देसी इलाज करने वालो की एक डायरेक्टरी बना रहे हैं जो हमारी वेबसाइट पर व ऐप में उपलब्ध होगी . हमारा उद्देश्य इन चिकित्सा पद्धतियों का पता उपलब्ध करा कर इनको बचाना एवं सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं देना हैं.उनकी रेटिंग्स भी उसमे होंगी .
हम अपने स्तर पर जानकारी जुटा रहे हैं लेकिन इतने बड़े देश में सिमित साधनो के होने से हमारी सीमा हैं अतः आपसे सहयोग चाहिए .आप निचे दिए गए फॉर्म मेँ देसी इलाज करने वालो की सुचना भरे .ऐप में सूचना देनेवाले का नाम भी होगा .
> Fill Form Here

सहयोग देने के लिए दिल से आभार .
आपका अपना
जयंती जैन ,
संस्थापक :स्वास्थ्य-सेतु
(होलिस्टिक हीलिंग फो रम )

9414289437

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Desi Ilaj Directory and Android App: Need your Help

आहार चिकित्सा द्वारा कैंसर का इलाज : बुडविज का आहार-विहार

 

 

 

 


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Desi Ilaj Directory and Android App: Need your Help

Dear Sir/Madam,

We are building a directory of Desi Ilaj practitioners, this information would be available on Website and Android App. Our aim is to make information about desi ilaj, vaidhys,  Ayurveda acharya, bone setters, homeopathy, yoga instructors etc to everyone. In today’s world allopathy is not the only solution to diseases, there are many other solutions which have no side effects and can treat illnesses in the long run.

There is no proper information about alternate practitioners to allopathy. Even if there is information, it is very hard to find out a person is genuine or taking advantage of your illness. Our aim is to make a directory and rate the practitioners with your help. We have already compiled a list, but India is such a vast country that a lot of support is needed in completing the directory. You can provide the details of such practitioners, and we would add it to our App and display your name as well (for providing information). Please provide details by filling the form below:

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Thank you for your collaboration from Swasthya Setu.

Jayanti
Founder,
Swasthya Setu (Holistic Healing Forum)
9414289437

 

 


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कैंसररोधी बुडविज आहार के अत्यंत महत्वपूर्ण बिन्दु

ये सब इस आहार विहार का महत्वपूर्ण हिस्सा है-

1. डाॅ. योहना कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी, वनस्पति घी, ट्रांस फेट, मक्खन, घी, चीनी, मिश्री, गुड़, रिफाइन्ड तेल, सोयाबीन व सोयाबीन से निर्मित दूध व टाॅफू आदि, प्रिजर्वेटिव, कीटनाशक, रसायन, सिथेंटिक कपड़ों, मच्छर मारने के स्प्रे, बाजार में उपलब्ध खुले व पेकेट बंद खाद्य पदार्थ, अंडा, मांस, मछली, मुर्गा आदि से पूर्ण परहेज करने की सलाह देती थी।
2. वे कैंसर रोगी को सनस्क्रीन लोशन, धूप के चश्में आदि का प्रयोग करने के लिए भी मना करती थी। रोज सूर्य के प्रकाश का सेवन अनिवार्य है। इससे विटामिन-डी भी प्राप्त होता है। रोजाना दस-दस मिनट के लिए दो बार कपड़े उतार कर धूप में लेटना आवश्यक है। पांच मिनट सीधा लेटे और करवट बदलकर पांच मिनट उल्टे लेट जायें ताकि शरीर के हर हिस्से को सूर्य के प्रकाश का लाभ मिले।
3. रोगी को रोजाना अलसी के तेल की मालिश की भी जानी चाहिए इससे शरीर में रक्त का प्रवाह बढ़ता है।
4. रोगी को हर तरह के प्रदूषण (जैसे मच्छर मारने के स्प्रे आदि) और इलेक्ट्रानिक उपकरणों (जैसे ब्त्ज् वाले टी. वी. आदि) से निकलने वाले विकिरण से जहां तक सम्भव हो बचना चाहिए।
5. रोगी को सिन्थेटिक कपड़ो की जगह ऊनी, लिनन और सूती कपड़े प्रयोग करना चाहिए।
6. गद्दे भी फोम और पोलिस्टर फारबर की जगह रुई से बने है।

7. अलसी को जब आवश्यकता हो तभी पीसें। पीसकर रखने से ये खराब हो जाती है।
8. अलसी का तेल को तापमान 42 डिग्री सेल्सियस पर यह खराब हो जाता है।इसलिए प्रकाश व आॅक्सीजन से बचायें। आप इसे गहरे रंग के पात्र में भरकर डीप फ्रीज में रखें।
9. दिन में कम से कम तीन बार हरी या हर्बल चाय लें।
10. प्राणायाम, ध्यान व जितना संभव हो हल्का फुल्का व्यायाम या योगा करना है।
11. घर का वातावरण तनाव मुक्त, खुशनुमा, प्रेममय, आध्यात्मिक व सकारात्मक रहना चाहिये। आप मधुर संगीतें सुनें, खूब हंसें, खेलें कूदें। क्रोध न करें।
12. सप्ताह में दो-तीन बार वाष्प-स्नान या सोना-बाध लेना चाहिए।
13. पानी स्वच्छ व फिल्टर किया हुआ पियें।
14. अपने दांतो की पूरी देखभाल रखना है। दांतो को इंफेक्शन से बचाना चाहिए।
इस उपचार से धीरे-धीरे लाभ मिलता है और यदि उपचार ठीक प्रकार से लिया जाये तो सामान्यतः एक वर्ष या कम समय में कैंसर पूर्णरूप से ठीक हो जाता है। रोग ठीक होने के पश्चात् भी इस उपचार को 2-3 वर्ष या आजीवन लेते रहना चाहिये।
सबसे महतवपूर्ण बात यह है कि इस उपचार को जैसा ऊपर विस्तार से बताया गया है वैसे ही लेना है अन्यथा फायदा नहीं होता है या धीरे-धीरे होता है। अधिक जानकारी हेतु अंतरजाल पर हमारे इस पृष्ठ ीजजचरूध्ध् सिंगपदकपंण्इसवहेचवजण्बवउ पर चटका मारें। अधिक जानकारी के लिए डाॅ. ओ पी वर्मा कोटा से सम्पर्क कर सकते है। उनका मोबाईल नं. 9460816360 है।

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आहार चिकित्सा द्वारा कैंसर का इलाज : बुडविज का आहार-विहार

जर्मन डाॅक्टर योहाना बुडविज ने 1952 में ठंडी विधि से निकले अलसी के तेल व पनीर के मिश्रण तथा कैंसर रोधी फलों व सब्जियों के साथ कैंसर रोगियों के भोजन द्वारा उपचार उपचार का तरीका विकसित किया जो, बुडविज प्रोटोकोल के नाम से विख्यात हुआ। इस उपचार से कैंसर रोगियों को बहुत लाभ मिलने लगाा था। इस सरल, सुगम उपचार से कैंसर के रोगी ठीक हो रहे थे। इस उपचार से 90 प्रतिशत रोगियों का कैंसर ठीक होता रहा है।

डाॅ. बुडविज आहार में प्रयुक्त खाद्य पदार्थ ताजा , इलेक्ट्रोन्स युक्त और जैविक होने चाहिए। इस आहार में अधिकांश खाद्य पदार्थ सलाद और रसों के रूप में लिये जाते हैं, जिन्हें ताजा तैयार किया जाना चाहिए ताकि रोगी को भरपूर इलेक्ट्रोन्स मिले। डाॅ. बुडविज ने अन्य इलेक्ट्रोन्स युक्त खाद्यान्न भी ज्यादा से ज्यादा लेने की सलाह दी है। इस उपचार मंे छोटी-छोटी बातें भी महत्वपूर्ण है। और जरा सी असावधानी इस आहार के औषधीय प्रभाव को प्रभावित करती है।

प्रातः- प्रातः एक ग्लास साॅवरक्राॅट (खमीर की हुई पत्ता गोभी) का रस या एक गिलास छाछ लें। साॅवरक्राॅट में कैंसररोधी तत्व और भरपूर विटामिन-सी होता है और यह पाचन शक्ति भी बढ़ाता है। यह हमारे देश मे उपलब्ध नहीं है परन्तु इसे घर पर पत्ता गोभी को खमीर करके बनाया जा सकता है।

नाश्ताः- नाश्ते से आधा घंटा पहले बिना चीनी की गर्म हर्बल या हरी चाय लें। मीठा करने के लिए एक चम्मच शक्कर स्टेविया (जो डाॅ. स्वीट के नाम से बाजार में उपलब्ध है) का प्रयोग कर सकते हैं। यह पिसी अलसी के फूलने हेतु गर्म तरल माध्यम का कार्य करती है।

अब आपको ‘‘ऊँ खंड’’, जो अलसी के तेल और घर पर बने वसा रहित पनीर या दही से बने पनीर को मिला कर बनाया जायेगा, लेना है। दही को एक घंटे तक कपड़े की गाठ बांद कर लटका देगें ताकि अधिकांश पानी निकल जाएं। पनीर बनाने के लिए गाय या बकरी का दूध सर्वोत्तम रहता है। इसे एकदम ताजा बनायें, तुरंत खूब चबा चबा कर आनंद लेते हुए सेवन करें।
3 बड़ी चम्मच यानी 45 एम. एल. अलसी का तेल और 6 बड़ी चम्मच यानी 90 एम. एल. पनीर को बिजली से चलने वाले हेन्ड ब्लेंडर से एक मिनट तक अच्छी तरह मिक्स करें। तेल और पनीर का मिश्रण क्रीम की तरह हो जाना चाहिये और तेल दिखाई देना नहीं चाहिये। तेल और पनीर को ब्लेंड करते समय यदि मिश्रण गाढ़ा लगे तो 2 चम्मच अगूंर का रस या दूध मिला लें। अब 2 बड़ी चम्मच अलसी ताजा पीस कर मिलायें। अलसी को पीसने के बाद पन्द्रह मिनट के अन्दर काम मंे ले लेना चाहिए।

मिश्रण में स्ट्राबेरी, रसबेरी, चेरी, जामुन आदि फल मिलायें। बेरोें में एलेजिक एसिड होते हैं जो कैंसररोधी हैं। आप चाहें तो आधा कप कटे हुए अन्य फल भी मिला लें। इसे कटे हुए मेवे खुबानी, बादाम, अखरोट, किशमिश, मुनक्के आदि सूखे मेवों का प्रयोग करें। मेवों में सल्फर युक्त प्रोटीन,वसा और विटामिन होते हैं। फल, मेवे और मसाले बदल कर प्रयोग करें। ओम खण्ड को बनाने के दस मिनट क भीतर ले लेना चाहिए।
स्वाद के लिए वनिला, दाल चीनी, ताजा काकाओ, कसा नारियल या नींबू का रस मिला सकते हैं।
इसमें मूंगफली मिलाना वर्जित है।
दिन भर में कुल शहद 3-5 चम्मच से ज्यादा न लें। याद रहे शहद प्राकृतिक व मिलावट रहित हो। डिब्बा बंद या परिष्कृत कतई न हो। दिन भर में 6 या 8 खुबानी के बीज अवश्य ही खायें। इनमें विटामिन बी-17 होता हैं जो कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करता है।

यदि और खाने की इच्छा हो तो टमाटर, मूली, ककड़ी आदि के सलाद के साथ कूटू, ज्वार, बाजरा आदि साबुत अनाजों के आटे की बनी एक रोटी ले लें। कूटू को बुडविज ने सबसे अच्छा अन्न माना है। गैहू में ग्लेटून होता है और पचने में भारी होता है अतः इसका प्रयोग तो कम ही करें।

नाश्ते के एक घंटे बाद घर पर ताजा गाजर, मूली, लौकी, पालक, करेला, टमाटर, चुकंदर गेहूं के जवारों आदि का ताजा रस लें। गाजर और चुकंदर यकृत को ताकत देते हैं और कैंसर रोधी होेते हैं।

दोपहर का खानाः- दोपहर के खाने के आधा घंटा पहले एक गर्म हर्बल चाय लें। कच्ची सब्जियां जैसे चुकंदर, शलगम, मूली, गाजर, गोभी, हरी गोभी,, शतावर आदि के सलाद को घर पर बनी सलाद ड्रेसिंग या आॅलियोलक्स के साथ लें।
डेªसिंग को 1-2 चम्मच अलसी के तेल व 1-2 चम्मच पनीर के मिश्रण में एक चम्मच सेब का सिरका या नीबू के रस और मसाले डाल कर बनाएं।
सलाद को मीठा करना हो तो अलसी के तेल में अंगूर, संतरे या सेब का रस या शहद मिला कर लें। यदि फिर भी भूख है तो आप उबली या भाप में पकी सब्जियों के साथ एक दो मिश्रित आटे की रोटी ले सकते हैं। सब्जियों व रोटी पर आॅलियोलक्स (इसे नारियल, अलसी के तेल, प्याज, लहसुन से बनाया जाता है) भी डाल सकते है। मसाले, सब्जियों व फल बदल-बदल कर लेवें। रोज एक चम्मच कलौंजी का तेल भी लें। भोजन तनाव रहित होकर खूब चबा-चबा कर खाएं।

‘‘ऊँ खंड’’ की दूसरी खुराकः-
अब नाश्ते की तरह ही 3 बड़ी चम्मच अलसी के तेल व 6 बड़ी चम्मच पनीर के मिश्रण में ताजा फल, मेवे और मसाले मिलाकर लें। यह अत्यंत आवश्यक हैं। हां पिसी अलसी इस बार न डालें।

दोपहर बादः- अन्नानास, चेरी या अंगूर के रस में एक या दो चम्मच अलसी पीस कर मिलाएं और खूब चबा कर, लार में मिला कर धीरे धीरे चुस्कियां ले लेकर पियें। चाहें तो आधा घंटे बाद एक गिलास रस और ले लें।

तीसरे प्रहरः- पपीता या ब्लू बेरी (नीला जामुन) रस में एक या दो चम्मच अलसी को ताजा पीस कर डालें खूब चबा-चबा कर, लार में मिला कर धीरे-धीरे चुस्कियां ले लेकर पियें। पपीते में भरपूर एंजाइम होते हैं और इससे पाचन शक्ति भी ठीक होती है।

सांयकालीन भोजः-
शाम को बिना तेल डाले सब्जियों का शोरबा या अन्य विधि से सब्जियां बनायें। मसाले भी डालें। पकने के बाद ईस्ट फ्लेक्स और आॅलियोलक्स डालें। ईस्ट फ्लेक्स में विटामिन-बी होते हैं जो शरीर को ताकत देते हैं। टमाटर, गाजर, चुकंदर, प्याज, शतावर, शिमला, मिर्च, पालक, पत्ता गोभी, गोभी, हरी गोभी (ब्राकोली) आदि सब्जियों का सेवन करें। शोरबे को आप उबले कूटू, भूरे चावल, रतालू, आलू, मसूर, राजमा, मटर साबुत दालें या मिश्रित आटे की रोटी के साथ ले सकते हैं।
यदि रोगी को स्थिति बहुत गंभीर हो या ठीक से भोजन नहीं ले पा रहा है तो उसे अलसी के तेल का एनीमा भी देना चाहिए। डाॅ. बुडविज ऐेसे रोगियों के लिए ‘‘ अस्थाई आहार’’ लेने की सलाह देती थी। यह अस्थाई यकृत और अग्नाशय कैंसर के रोगियों को भी दिया जाता है क्योंकि वे भी शुरू में सम्पूर्ण बुडविज आहार नहीं पचा पाते हैं। अस्थाई आहार में रोगी को सामान्य भोजन के अलावा कुछ दिनों तक पिसी हुर्द अलसी और पपीते, अंगूर व अन्य फलों का रस दिया जाता है। कुछ दिनों बाद जब रोगी की पाचन शक्ति ठीक हो जाती है उसे धीरे-धीरे सम्पूर्ण बुडविज आहार शुरू कर दिया जाता है।                                                                                                                   ( courtsey -Dr OP Verma)

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उच्च रक्तचाप भगाए, नाड़ी शोधन व भ्रामरी प्राणायाम करें

दिल के रोग – काॅलस्ट्रोल से कम, घृणा व इर्ष्या से अधिक होते


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प्राण ऊर्जा बढ़ाने प्राण ऊर्जा संवर्धन तकनीक (PET) का अभ्यास करें

प्राण ऊर्जा हमारा आदि कारण है । प्राण की बदौलत यह जीवन मिला हुआ है । प्राण ऊर्जा के प्रति समझ न होने से हम उसका उपभागे अपने पक्ष में नहीं कर पाते हैं । Pranic energizing techniqueयह अरूचि अज्ञान है । जब हम इसका उपभोग अपने पक्ष में नहीं करते हैं तो यह ऊर्जा हमे नचाती है व दुःखी करती है। इसका ज्ञान होने से ही रूचि होती है । जब तक इसका महत्व नहीं जानते हैं तब तक उसका उपभोग अपने पक्ष में नहीं कर पाते हैं ।
एस. व्यासा, बैंगलोर द्वारा प्राण संवर्धन हेतु एक बढ़िया तकनीक विकसित की है जिसे पेट कहते हैं । हमारे स्थूल शरीर के निर्माण के पीछे प्राण शरीर उत्तरदायी है । प्राण के अवयवस्थित, विकृत या बाधित होने से सारे रोग होते हैं । प्राण ऊर्जा को जगा कर, लयबद्ध कर स्थूल शरीर में आए रोग को ठीक कर सकते हैं । इसीलिए प्राण ऊर्जा सबसे महत्वपूर्ण है ।
इसे जगाने के आठ चरण निम्न है ।
1. प्रार्थना – प्राणस्येदं वशे सर्व यत् प्रतिष्ठतम् ।
मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विदेहि न इति ।।
तीनों लोगों में जो कुछ भी अस्तित्व में है, सब प्राण के नियंत्रण में है । जैसे माता अपेन बच्चों की रक्षा करती है, वैसे ही हे प्राण, हमारी रक्षा करो । हमें श्री-सम्पति दो, हमें प्रज्ञा दो ।

2. शरीर को शिथिल करना – शरीर के समस्त अंगो को पूरी तरह ढीला छोड़ना । तनाव का कम होना।
3. श्वांस के प्रति जागना व उसे संतुलित करना – नाड़ी शुद्धि प्राणायाम कर समश्वांस होना ।
4. संवेदनशीलता एवं पहचानना – स्नायु सचंरण के प्रति जागना, चिन, चिन्मय, आदि एवं नमस्कार मुद्रा के प्रति सचेत होना व स्नायविक परिसंचरण को महसुस करना । श्वसन, रक्त प्रवाह, हृदय का धड़कना, स्नायु, संचरण, प्राण-ऊर्जा में भेद अनुभव करना । (30 सैकण्ड) अन्तर्जगत से सम्पर्क होता है ।
5. प्राण को घुमाना एवं बढ़ाना – प्राण को स्केन कर शरीर के सभी अंगों में उसको अनुभव करना । इससे प्रतिरोध क्षमता बढ़ती है ।
6. अस्तित्व से जुड़ना – प्राण को फैला कर अस्तित्व से जुड़ना, विस्तार अनुभव करना । ब्रह्माण्ड से परिचय बढ़ता है ।
7. संकल्प – अपनी चाह को 9 बार दोहराना । इससे संकल्प खक्ति बढ़ती है । दिव्यता जगती है ।
8. शुभाकांक्षा करना – सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग् भवेत् ।।
सभी सुखी हो, सभी रोग रहित हो, सभी परम तत्व प्राप्त करें, कोई भी दुखी न हो ।


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मन को शांत करने भ्रामरी प्राणायाम कैसे करे

इस प्राणायाम में अभिज्ञा के और अधिक विकास के लिए ध्वनि-तरंगो का उपयोग किया जाता है। संस्कृत मंे भ्रामरी का अर्थ है भ्रमरी की या मधुमक्खी की-आवाज या ध्वनि इसमें अन्र्तनिहित है। अर्थात भ्रमरी की ध्वनि । यह प्राणायाम इस ध्वनि के साथ किया जाता है।
विधि
हठयोगप्रदीपिका में इसका वर्णन इस प्रकार हैः
वेगाद्घोषं पूरकं भृंगनादं भृंगनादं रेचकं मंदमदम्।
योगींद्राणामेवमभ्यासयोगाच्चिते जाता काचिदानंदलीला।।
भ्रमर की ध्वनि के समान घोष करते हुए तेजी से सांस लीजिए और भ्रमरी के समान ध्वनि करते हुए उसे मंद-मंद छोड़िये। भ्रामरी प्राणायाम में नाक से श्वांस भर कर धीरे-धीरे भ्रमर की गुंजन के साथ श्वांस छोड़ते हैं । यह प्राणायाम पूरी तरह शरीर को शिथिल कर आराम के साथ किया जाता है । इसमे ध्वनि निकालते वक्त न पर जोर रखें । इसे सहज होकर करते हैं ।
ध्यान लगाने वाले आसन में बैठ कर करें कमर, पीठ व गर्दन सीधी रखें । ध्वनि तरंग को मस्तिष्क में अनुभव करें व इसी पर चेतना को केन्द्रित करें ।
भ्रामरी प्राणायाम में नाक से श्वांस भर कर धीरे-धीरे गले से भ्रमर की गुंजन के साथ श्वांस छोड़ते हैं । गंुजन करते वक्त जीभ को तालु से लगायें । दांत बन्द व होठ खुले रखें । यह प्राणायाम पूरी तरह शरीर को शिथिल कर आराम के साथ किया जाता है । इसमे ध्वनि निकालते वक्त ‘न’ के उच्चारण पर जोर रखें । ओम उच्चारण में ‘म‘ पर जोर देते है तब होठ खुले रहते है । ’न’ पर जोर देने से होंठ स्वतः बन्द हो जाते हैं । दोनों में शब्दों के जोर को ध्यान में रखें । आवाज इतनी सी करे कि पड़ौसी को सुनाई दे । इसमे श्वांस लेने में 10 सैकण्ड व छोड़ने में 20 से 30 सैकण्ड तक का समय लगाएं । यह एक आवृति हुई । इसी तरह 5-10 मिनट तक भ्रामरी निरन्तर करें । इसे शान्त व शिथिल होकर करें । इसे करते वक्त शरीर को सहज रखें । पीठ, गर्दन व सिर सीधे रखें ताकि रीढ़ की हड्डी सीधी रहे । इसे करते वक्त गुंजार की ध्वनि को सिर व पूरे शरीर में फैलने दे । साथ ही इसकी प्रतिध्वनि सुने । शरीर में इसके फैलते कम्पनों को महसूस करें ।

सावधानी – कान में संक्रमण हो तो इसे न करें । इसे करते वक्त आसन स्थिर रखें । कन्धों को ढीला छोड़े व हिलाएं नहीं । जबरदस्ती गंुजार को न खींचे । जितना आराम से करेगें उतना ही अच्छा ।
सीमा -यह प्राणायाम कभी भी किया जा सकता है । सोते वक्त लेटे लेटे भी कर सकते है । इसे करने से कभी कोई हानि नहीं होती है ।
यहां


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स्वास्थ्य रक्षक भोजन

मुख्यतः हमारे रोगो का कारण हमारा भोजन है। पोषक भोजन नहीं करने के कारण हम बीमार होेते है। आवश्यक तत्व, खनिज एवं विटामिन जरूरी है। इनसे शरीर की प्रतिरोध शक्ति मजबूत रहती है ताकि रोग न पनप सके।स्वास्थ्य रक्षक भोजन
रोग का सामना भी हम आहार द्वारा कर सकते है। आहार को व्यवस्थित कर हम शरीर को ऊर्जावान व स्वस्थ रख सकते है।
सुबह का नाश्ता न करने से ह्नदय रोग होने की संभावना कम होती है।
नमक का अधिक प्रयोग गुर्दे का कार्य बढ़ाता है।
शक्कर भी अंततः वसा में बदलती है। इसलिए अतिरिक्त शक्कर भी वसा की तरह हानिकारक है। कम वसा मुक्त पैक्ड फूड को स्वादिष्ट बनाने के क्रम में अधिक शक्कर जोड़ी जाती है। प्रसंस्करित भोजन में शक्कर अधिक होती है।अतएव उससे बचने की जरूरत होती है।
जीवाणु विषाणु जनित रोगों को छोड़कर शेष रोग शरीर में किसी न किसी तत्व की अधिकता या कमी से होते है।

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