उठो! जागो!

लक्ष्य की प्राप्ति तक रूको नहीं! -जयन्ती जैन


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बीमारी क्या कहती है?

हमारा शरीर तंत्र हमें फीडबैंक देने के लिए बीमारी उत्पन्न करता है। इसके माध्यम से यह हमें बताता है कि हमारा दृष्टिकोण संतुलित नहीं है या हम प्रेमपूर्ण और कृतज्ञ नहीं हैं। शरीर के संकेत और लक्षण भयंकर चीज़ नहीं हेैं।                                                                   -डाॅ. जाॅन डेमार्टिनी

टालस्टाय की एक प्रसिद्ध कहानी है। प्रारम्भ मंे जब ईश्वर ने जगत् को बनाया तो सब कुछ उपलब्ध था। तब जगत मंे कर्म की आवश्यकता न थी, इन्सान फल-फूल खाते थे। ईश्वर ने देखा कि आदमी प्रसन्न नहीं है। अतः उसने आदमी को प्रसन्न करने के लिए कर्म पैदा किये। मेहनत करो, फसलें बोओ, उन्हें बड़ी करो व खाओ। ईश्वर ने फिर देखा कि इस पर भी मनुष्य प्रसन्न नहीं है। अतः ईश्वर ने मृत्यु अनिश्चित कर दी ताकि लोग लड़े नहीं व प्रेम से रहे। लेकिन फिर भी मनुष्य शान्ति से न रह रहा था। तब उसने रोग पैदा किए ताकि मनुष्य सुख-दुःख को पहचानें व प्रसन्नता से रह सके। अर्थात् रोग का भी जीवन मंे महत्व है। हमें अपनी सीमा मंे रहने, विश्राम करने व विकार निकालने हेतु बीमारी जरुरी है। शरीर में बीमारी संकेत करती है कि हमारी जीवन-शैली ठीक नहीं है।
महाभारत में कुन्ती सदैव दुःख को चुनती है। कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद भी वह राजमाता बन कर राजमहलों मंे रहने की अपेक्षा धृतराष्ट्र-गांधारी, विदूर के साथ वन जाना पंसद करती है। आखिर क्यों? ईश्वर को सदैव याद रखने की इच्छा के कारण कुन्ती दुःख चुनती है, कठिनाईयाँ चुनती है। वह सरल मार्ग पंसद नहीं करती है। सुख में व्यक्ति परम् सत्ता को भूल जाता है, वह अपने आप को भूल जाता है। अर्थात् रोग भी वैसे ही नहीं आते हैं। वे एक संदेश देते हंै। विश्व नियन्ता के अनुसार आए है। शरीर के विषाक्त द्रव्यों को बाहर फेंकने आये है। अतः उसके द्वारा मिलने वाले पाठ को ग्रहण करें तो बीमारी अभिशाप नहीं है। रोग के होने का भी कोई प्रयोजन है। उससे घबराने की जरुरत नहीं है। बीमारी नई दृष्टि देती है एवं अपनो को परखने का अवसर देती है। नार्मन कुजिन्स ने ‘‘ एनाटोमी आफॅ इलनेस’’ मंे लिखा है कि विपत्ति आने पर ही व्यक्ति अपनी आदतें बदलता है। अतः बीमारी वरदान भी बन सकती है।

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क्या मुझे प्रकृति चक्र को तोड़ने मंे शरीक होना चाहिए ?

प्रकृति में सुन्दर व्यवस्था है । मनुष्य को छोड़ सर्वत्र उसका पालन स्वतः होता है । अपना अपना कार्य स्वतः करते हैं जिससे यह चक्र बना हुआ है । मनुष्य भी पिछले 50 वर्षों से अपनी भूमिका भूल गया है।प्रकृति चक्र
पदार्थ अवस्था, प्राण अवस्था, जीव अवस्था एवं ज्ञान अवस्था परस्पर पूरक है । अन्योन्याश्रित ही नहीं बल्कि एक दूसरे को संवर्धित करते है । चारों साथ रहते हैं, अपनी-अपनी जगह स्वतन्त्र भी है एवं निर्भर भी है । सभी इकाईयां अपनी मौज में दूसरे के साथ रहती है । सिर्फ मनुष्य ने अपनी भूमिका भय एवं प्रलोभन के कारण बदल दी है । इससे पूरा अस्तित्व खतरे में है । इसलिए यह हमारी जिम्मेदारी है कि अपनी भूमिका चक्र अनुसार रखें। अपने ज्ञान का दुरूपयोग चक्र तोड़ने में न करंे । इसी से पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है । अपना ध्यान इधर से हटाकर संतुलन पर करना है । फिर कोई बाधा नहीं है । हम समर्थ है समाधान करने मे समस्या भी असंभव नहीं है ।
मोबाईल निर्माण हेतु कुछ धातु व प्लास्टिक प्रयोग हुआ है । प्लास्टिक पेट्रोलियम के कुछ पदार्थों से बना है । सब कुछ पृथ्वी से ही लिया है । इस अर्थ में मिट्टी से मोबाईल बना है । मिट्टी से मोबाईल बनाने वाला दिमाग सम्बन्धो व पर्यावरण संतुलन रखने के उपाय क्यांे नहीं खोज सकता है ?
चूंकि हमारा ध्यान उधर गया नहीं है । इधर गया तो बहुत सृजनशीलता दिखाई है । हम सुविधाआंे के विस्तार में लगे रहे । अब सम्बन्ध की कला भी सीखे व इस क्षैत्र मंे बुद्धि सृजन लगाएं ।
मैं इस सहज व्यवस्था में विघ्न पैदा करूं ? क्या मुझे संतुलन बनाए रखने में अपनी भूमिका ईमानदारी से नहीं निभानी चाहिए ।

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किलेशन : बिना आपरेशन (शल्य क्रिया) के ब्लोकेज हटाने की विधि

अथेरोस्व्केलेरोसिस रोग के लिए शस्त्रक्रिया द्वारा उपचार करने के बजाय किलेशन थेरपी बहुत सुरक्षित और बेहद असरकारक उपचार पद्धति है । किलेशन थेरपी की मदद से बायपास सर्जरी को टाला जा सकता है । इतना ही नहीं प्रतिरोधक उपचार के तौर पर भी इसका उपयोग किया जा सकता है ।

-लिनस पोलिंग
(दो नोबेल पुरस्कार विजेता)Chelation Therapy

बाईपास सर्जरी एवं एंजियोप्लास्टी के बिना भी ब्लोकेज दूर किए जा सकते हैं । आजकल ई.डी.टी.ए. किलेशन थेरेपी नामक वैकल्पिक चिकित्सा उपलब्ध है ।

इसमें EDTA ड्रिप या ओरली  कुछ सप्लीमेंट्स के साथ दिया जाता हैं ।
सामान्य तौर पर हृदय को शुद्ध रक्त पहुंचाने वाली तीन बड़ी और महत्वपूर्ण नसें होती है । इन नसों में होने वाले रोग को कारोनरी आर्टरी डिसीज (CAD) कहा जाता है । दिल का दौरा कोरोनरी हार्ट डिसीज का एक प्रकार है । दिल का दौरा (हार्ट अटेक) यानी कि हृदय को रक्त की आपूर्ति अचानक बंद हो जाना जिसके कारण हृदय के कई स्नायू आधे मृत या पूरी तरह मृत हो जाते हैं । यह अवस्था बेहद गंभीर होती है । एथेरास्क्लेरासिस (Atherosclerosis) ग्रीक भाषीय शब्द है । उम्र बढ़ने के साथ हर व्यक्ति को यह होता ही है।

मेरे परिजनो ने सफलता पूर्वक उक्त उपचार कराया है ।

( to be continued)


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श्रेष्ठ लोगों से नेटवर्किंग कैसे करें व उनसे कैसे जु ड़ें ?

श्रेष्ठ लोग आपस में परस्पर नहीं जुड़ते हैं । वे आपस में अधिक व्यवहार नहीं बढ़ाते है । दूसरी तरफ स्वार्थी लोग परस्पर जल्दी मित्र हो जाते हैं । साथ ही श्रेष्ठ लोगों को अपने चुंगल में लेकर उनका दुरूपयोग कर लेते हैं । ऐसे मे संस्था व संगठन के तन्त्र/प्रक्रिया में फिर उनका शोषण होता है एवं उनको अपने अनुरूप ढाल लेते हैं। Networking with good people
सज्जन व्यक्तियों के बीच मेल मिलाप कम होता है । भले लोगों को आपस में जोड़ें । व्यक्तिगत तौर पर बहुत से व्यक्ति श्रेष्ठ होते हैं । वे अच्छे लोगों से सम्पर्क नहीं रखते हैं । उनमे परस्पर मैत्री कम ही होती है । इसलिए समान विचारों के मित्रों को खोजना व जुड़ना महत्वपूर्ण है । किसी जगह पर गिने-चुने व्यक्ति ही श्रेष्ठ नहीं होते हैं । अच्छे लोगों की संख्या खराब व्यक्तियों से अधिक है फिर भी राज दुर्जन लोग करते हैं क्योंकि ऐसे लोग नेटवर्किंग करते हैं । अतः भले लोगांे को परस्पर जोड़ने हेतू प्रयत्न करने चाहिए ।
चालाक लोगों की नेटवर्किंग बड़ी होती है । शराबी परस्पर एक मूलाकात मंे अच्छे मित्र हो जाते हैं । वे एक दूसरे की मदद करते हैं । दुर्जन व्यक्ति अपना ढोल बजा-बजा कर मित्रता स्थापित करते हैं । निज हित साधने के लिए ऐसे लोग शिघ्र जुड़ जाते हैं ।
अच्छे लोग सात्विक अहंकार मंे कैद होते हैं । वे अपनी निजता को ही सर्वश्रेष्ठ मानकर उसमें बन्द रहते हैं । उन्हे अपनी स्वतन्त्रता व स्वाभिमान का बड़ा घुमान होता है । वे अपने अच्छे स्वभाव को ही अपना रक्षा कवच मान कर अन्य सज्जनों को महत्व नही देते हैं । उन्हे परस्पर स्नेह बढ़ाते नहीं देखा जा सकता है । इसलिए वे परस्पर सम्पर्क नहीं रखते हैं ।
भले लोग अपने-2 द्वीप बने रहते हैं । वे परस्पर जल्दी मित्र नहीं बनते हैं । स्वयं को ही उचित मान कर अलग रहते हैं । अपने जैसे श्रेष्ठ लोगों से जुड़ने लालायित नहीं रहते हैं । अपने मानसिक संदूक से बाहर आने की आवश्यकता ही नहीं समझते हैं । शेंष सब को अन्यथा मानकर चलते हैं । अपने में सीमित रहते हैं जिससे उनकी अच्छाई बढ़ती नहीं है व उनके श्रेष्ठ होन का लाभ अन्य व्यक्तियों को मिल नहीं पाता है । ये जुड़ने का उपाय नहीं खोजते हैं । अच्छाई का विस्तार करने से डरते हैं । संकोच इनमे बड़ा होता है । साझा मंच नहीं खोजते हैं । अच्छी आदतों व अच्छी सोच के ढांचे में बन्द हो जाते हैं । अपनी श्रेष्ठता को फैलाते नहीं है । उसे बढ़ाते नहीं है । यह उनकी भूल समाज के लिए घातक है ।

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स्वस्थ रहने के लिए अम्लता से बचे एवं क्षारीय खुराक लें

हमारे रक्त में अम्ल एवं क्षार दोनो होते हैं । स्वस्थ रहने के लिए इनमे संतुलन आवश्यक है । हमारा भोजन भी दोनों तरह का होता है । हमारे शरीर में अम्लता घातक है, अतः क्षारीय आहार संतुलन लाता है । अम्लता की स्थिति में हाइड्रोजन आयन शरीर को थोड़ा अम्लीय बनाते हैं । क्षारीय भोजन हाइड्रोजन आयन कम करता है । जो शरीर के लिए लाभदायक है । इसलिए रक्त की अम्लता को कम करने के लिए 80 प्रतिशत क्षारीय आहार लेना चाहिए ।Ph- Acid- alkaline diet
भोजन से रक्त बनता है । अम्ल एवं क्षार की मात्रा को नापने के लिए एक पैमाना तय किया है जिसे पीएच कहते हैं । किसी पदार्थ मंे अम्ल या क्षार के स्तर को की मानक ईकाइ पीएच है । पीएच को मान 7 से अधिक अर्थात वस्तु क्षारीय है । शुद्ध पानी का पीएच 7 होता है । पीएच बराबर होने पर पाचन व अन्य क्रियाएं सुचारू रूप से होती है । तभी हमारे शरीर की उपापचय क्रिया सही होती है एवं हारमोन्स सही कार्य कर पाते हैं एवं उनका सही स्त्राव होता है । तभी शरीर की प्रतिरोध क्षमता बढ़ती है ।
बढ़ता प्रदूषण, रसायनों का सेवन व तनाव से शरीर में अम्लता की मात्रा बढ़ती है । तभी आजकल रक्त मे पीएच 7.4 से कम हो गया है । 7.4 आदर्श पीएच माना जाता है । इससे उपर पीएच का बढ़ना क्षारीय व इसका 7.4 से कम होना एसीडीक होना बताता है। आजकल हमारा रक्त का पीएच 6 या 6.5 रहता है । इसी से कैंसर जैसी घातक बीमारियां होती है । शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो गई है । शरीर में दर्द इसी से रहता है । पित्त का बढ़ना, बुखार आना, चिढ़ना सब अम्लता बढ़ने से होता है ।
निम्बू, अंगुर आदि फल खट्टे होते हैं लेकिन पाचन पर ये क्षारीय प्रभाव उत्पन्न करते हैं । इनके अन्तर स्वभाव से नही बल्कि पचने पर जो प्रभाव होता है उसके कारण क्षारीय माना जाता है । पाचन पर जो खनिज तत्व बनाते हैं व सब क्षारीय होते हैं ।
अम्लीय आहार – मनुष्य द्वारा निर्मित आहार प्रायः अम्लीय होता है जिससे एसीडिटी होती है । जैसे तले-भूने पदार्थ, दाल, चावल, कचैरी, सेव, नमकीन, चाय, काॅफी, शराब, तंबाकु, डेयरी उत्पाद, प्रसंस्कृत भोजन, मांस, चीनी, मिठाईयां, नमक, चासनी युक्त फल, गर्म दूध आदि के सेवन से अम्लता बढ़ती है ।
क्षारीय आहार - प्रकृति द्वारा प्रदत आहार (अपक्वाहार) प्रायः क्षारीय प्रभाव उत्पन्न करते हैं । जैसे ताजे फल, सब्जियां, अंकुरित अनाज, पानी में भीगे किशमिश, अंजीर, धारोष्ण दूध, फलियां, छाछ, नारियल, खजूर तरकारी, सुखे मेवे, आदि पाचन पर क्षारीय हैं ।ज्वारे का रस क्षारीय होता है । यह हमारे शरीर को एल्कलाइन बनाता है । शरीर के द्रव्यों को क्षारीय बनाता है । खाने का सोड़ा क्षारीय बनाता है ।

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पूर्वाग्रह व निष्पक्ष तार्किकता को दर्शाती फिल्म ‘एक रूका हुआ फैसला’

अपने परिवार में निर्णय कैसे करने चाहिए । आपसी सदस्यों को कैसे समझाना । सामुहिक संवाद से निर्णय करने की कला इससे सीख सकते हैं ।यह दर्शाती है कि हम कैसे फैसले लेते हंै ? यह मानना छोड़ जांचना सिखाती है । फैसला करने के दौरान व्यक्तिगत मान्यता कैसे प्रभावित करती है ऐसा दिखाया गया है । Ek_Ruka_Hua_Faisla
‘एक रूका हुआ फैसला’ नामक हिन्दी फिल्म देखी जिससे निर्णय प्रवृति जांचने मिली कि कैसे हम अपने स्वार्थवश या अज्ञानवश जल्दबाजी में निर्णय करते हंै । अपनी-2 मान्यता के आधार पर सोचते हैं। यह बड़ा घातक है । इसमे दिखाया गया है कि धिरे-धिेरे संवाद से कैसे मान्यताएं बदलती है जिससे निर्णय बदलता जाता है ।
फिल्म में एक व्यक्ति पर आरोप है कि उसने अपने पिताजी का खुन कर दिया है। कोर्ट में गवाही हो चुकी है अब जुरी को यह निर्णय करना है कि वह कसुरवार है कि नहीं । फिल्म के प्रारम्भ में जूरी के ग्यारह सदस्य आरोपी को कसुरवार मानते हैं । मात्र एक सदस्य आरोपी पर संदेह कर अपनी बात रखता है। लेकिन फिल्म का नायक रैना अपना संतुलन नहीं खोते हुए विनम्रतापूर्वक दृढ़ता से अपनी बात रखता है कि शायद वह बेकसुर है । इस जब यह स्पष्ट होने लगता है कि यह एक जिन्दगी का सवाल है। इससे फिल्म आगे बढ़ती है। गवाही का सूक्ष्म परीक्षण होने लगता है। दूसरे जुरी के सदस्य भी अपने निर्णय पर पुर्नविचार करने लगते है। अपने पुर्वाग्रहांे को पहचानते हुए अपना निर्णय बदलने लगते हैं। अपने निर्णय के आधारों पर उन्हे शक होने लगता है। जल्दबाजी व अपनी लापरवाही दिखने लगती है। जो पहले वैसे ही मान लेते हैं वे अब अपने निर्णय को जांचने लगते है कि उन्होने मात्र किसी आवेश या मान्यतावश तो निर्णय नहीं कर लिया । इस क्रम मे जुरी के सभी सदस्य आपस में टकराते है एवं व्यक्तिगत आरोप भी लगाते हैं।सभी सदस्य धिरे-धिरे बदल कर उसे बेकसुर मानने लगते हैं । अन्त में सभी सदस्य आरोपी को बेगुनाह मानते हैं।
तर्क द्वारा शान्ति से अपनी बात खुले मन से करने पर सच्चाई की दिशा में प्रयत्न किए जा सकते हंै । किसी के साथ अपने पूर्वाग्रहों व अनुकरण के कारण अन्याय न करें । मनुष्य एवं मनुष्य के बीच सम्बन्ध न्याय पर ही टिके हुए हैं । अतः व्यवहार बढ़ाना है तो न्याय पर ध्यान देना चाहिए । निर्णय मान्यता के आधार पर नहीं लेकर जानकर लेने चाहिए ।

अंग्रेजी फिल्म ‘‘टवेल्व एन्ग्री मेन’’ से प्रेरित है । यह नाम ज्यादा सार्थक है । जुरी के सभी सदस्य क्षुब्ध व खफा है, गुस्से में है । उसका असर उनके निर्णयों पर आता है । जल्दबाजी के कारण व गम्भीरता से न तो सुनते हैं न ही तय करते है । किसी न किसी आवेश में बस तय कर लेते हैं । जबकि तय करने का कोई स्पष्ट ठोस तार्किक कारण उनके पास नहीं होता है। एक सदस्य को वहां से जरूरी जाना है इसलिए उसे कसूरवार मान कर भागना चाहता है । एक सदस्य सोचता है कि पुलिस ने पकड़ा है, चश्मदीद गवाह है । बस कसूरवार है । एक मानता है कि अधिकांश कसूरवार मान रहे हैं तो ठीक ही मानते होगें तो वह कसूरवार कह देता है । एक नया सदस्य है अधिक विचार न कर बहुमत का साथ देता है । बूढ़े सदस्य पूरा विश्लेषण न कर हां कर देते हैं । तार्किक सदस्य चश्मदीद गवाही व आरोपी की अपराधिक प्रवृति के कारण सजा देना चाहता है ।एक सदस्य निम्न जाति का होने से उसे अपराधी मान लेते हैं । सभी अलग-अलग अपने-अपने कारणों के आधार पर गुनहगार मानते हैं । फिल्म में पंकजकपूर व रैना की एक्टिंग बहुत ही सटीक है । पंकजकपूर का बेटा झगड़ा कर घर छोड़कर चला गया है इसलिए वह सभी बेटों को अपराधी मान लेता है कि बेटे दुष्ट ही होते हैं । वह अपने पुर्वाग्रह के कारण उसे कसुरवार मानते हैं। भावुक पंकज कपूर सारे बेेटों को गुनहगार मानने के कारण सजा देना चाहता है।
संतुलित सदस्य नायक शान्ति से विचार कर निर्णय चाहता है चूंकि उसे गुनहगार होने में संदेह है । माकूल शक का वह निराकरण चाहता है । नायक का कहना है कि चर्चा जारी रहनी चाहिए ताकि निर्णय लेने मे सुविधा हो ।
निर्णय के क्रम में व्यक्तिगत आरोप लगाते हैं एवं परस्पर झगड़ने लगते हैं । अपने-अपने भीतर की कूंठाए व पूर्वाग्रह को अच्छी तरह से दिखाया गया है । क्षेत्र, ऊंच-नीच, तेरा-मेरा बीच में आते है । जबकि उपराध स्वतन्त्र कर्म है, कोई भी भ्रष्ट नहीं है व ईमान से निर्णय करने आए हैं । किसी का निजी हित आरोपी से नहीं है । लेकिन स्वयं के आग्रह हावी है । दर्शक स्वयं अपना निर्णय बदलते जाते हैं व पूरी प्रक्रिया स्पष्टता से जांचने का महत्व समझने लगता है । बिना आधार व कारण के भी गलत निर्णय होता है । हम निरपेक्ष नहीं देखते हैं । देखने में आन्तरिक कारण होते हैं ।

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मातृत्व जिम्मेदारी नहीं सृजन है ,स्त्री की की अपनी तलाश है

मातृत्व आनन्ददायक है । लेकिन इससे  जिम्मेदारी बढ़ती  है । स्त्री सक्षम होती , प्रवीण होती है  इस भूमिका को निभाने में इसलिए चिन्ता की जरूरत नही है ।
Motherhood-Picassoमां बनना मात्र एक शारीरिक कृत्य से अधिक भावनात्मक कृत्य है । जैविक मां बनने मे 9 माह लगते हैं, लेकिन मातृत्व को निभाने में पूरा जीवन लगता है । जैविक मां बनने के बाद बड़ी चुनौतियां है । चुनौती का यह प्रारम्भ है ।
एक स्त्री की शादी की पूर्णता मां बन कर ही होती है । जीवन मंे सृजन मां बनने से प्रारम्भ होता है । मां का कृत्र्तव्य स्त्री को प्रतिपल सजग व सृजनशील बनाता है । स्त्रीत्व का बड़ा दर्जा मातृत्व है । वह स्वयं प्रकृति में अपनी भूमिका को पूरा करती है । इससे स्वयं के सारे अधुरेपन मिट जाते हैं । अपने शरीर के द्वारा नए शरीर को सफलता पूर्वक गढ़ना बड़ी जीत है । इसके माध्यम से स्त्री की तलाश पूरी होती है । उसके सारे अरमान साकार होते हैं ।  मां विजेता होती है । याद रखो मां मात्र  पुत्र  की नहीं होती, मातृत्व एक अवस्था है ।
तुम्हारी भूमिका बढ़ गई है । तुमसे सृष्टि अवतरित हुई है । पत्नी एवं बहु की भूमिका से बढ़ कर मां की भूमिका होती है । स्त्री को बेटी/बहन/पत्नी/बहू, से बड़ी भूमिका मां की होती है । मातृत्व स्त्री को सबसे बड़ा उपहार प्राप्त है । इसमे सामन्जस्य बेठाते हुए स्वयं को भी नहीं भूलना है । वैसे तुम स्वयं की कीमत पर दूसरों को अधिक महत्व देती रहती हो, क्या यह उचित है ? अपनी वृहतर भूमिका को सजगता से निभाओ, स्वयं तृप्त होओ व सबको भूमिकानुसार तृप्त रखो ।
पुत्र  की प्रथम शिक्षिका प्रथम रहे ! उसकी सृजनक्षमता, आत्म-सम्मान व सहजता को विकसित करंे । बच्चे को किसी रूप में विकृत न होने दे ।  पुत्र ही  उसका नहीं है । उसके आस-पास के परिजन, हवा, मिट्टी व संगी साथी भी उसका हैं । बेटे को स्वतन्त्र समझदार नागरिक बनाना । जातिवाद, पन्थवाद की परम्परा से बचाना है । लालन-पालन मां का विशेषाधिकार के साथ बड़ी जिम्मेदारी है । घ्यान रखें कि अपने पालने में हुई चुके व गलतियां उसे न भुगतनी पड़े ।

माँ ! मातृत्व को गौरवान्वित करो, उसकी सर्वोच्च सम्भावना तक पंहुचो !

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