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सकारात्मकता क्या है एवं SWOT विश्लेषण कैसे करे ?

इस पर मुझे एक कहानी याद आती है। किसी दूधवाले की दूध की केन में एक नटखट बालक ने दुखीराम नामक मेढ़क को पकड़ कर डाल दिया। केन में बन्द होते ही मेढ़क घबरा गया। केन का ढक्कन बन्द था व उसके बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था। नाम से ही नहीं वह सोच से भी दुखीराम था। अतः उस मेढ़क ने पहले तो केन में फेंकने वाले उस बच्चे को व उसके खानदान को अपशब्द कहे। फिर केन निर्माता को गालियां देने लगा। उसके बाद प्रभु को कोसने लगा कि मुझे ड्रिल जितनी शक्ति मूंह में क्यों न दी।  इस प्रकार अपनी कमजोरियों ;ॅमंादमेेद्ध को याद कर स्वयं का जीवन खतरे ;ज्ीतमंजद्ध में डालता रहा। अपनी शक्तियों का उसने तनिक भी विचार नहीं किया। फलस्वरूप दोष देते-देते व थोड़ी देर में डूब गया।

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दूसरे दिन एक नटखट बालक ने सुखीराम नामक मेढ़क को पकड़ कर फिर दूध के केन में चुपके से डाल कर ढक्कन बन्द कर दिया। तब सुखीराम ने अपना विश्लेषण ैॅव्ज् पद्धति के आधार पर किया।
स्वोट पद्धति की मान्यता है कि अपनी शक्तियों ;ैजतमदहजीद्ध को याद करो, कोई न कोई अवसर ;व्चचवतजनदपजलद्ध जरूर निकलेगा। ऐसे में उसे याद आया कि मेढ़क की सबसे बड़ी क्षमता किसी भी द्रव में  तैरने की है। अतः वह तीव्र गति से दूध में तैरने लगा। 10-15 मिनट निरन्तर मेढ़क के तैरने से दूध का मन्थन हो गया व उसमें मक्खन का एक ढ़ेर बन गया जिस पर सुखीराम बैठ गया। तनिक देर बाद ज्यों ही दूध वाले ने केन का ढक्कन खोला वह कूद कर बाहर निकल गया।
देखो दोस्तों, समान परिस्थिति में सुखीराम मेढ़क सकारात्मक वृत्ति के कारण बच जाता है एवं दुखीराम डूब मरता है। हम सबको स्वयं का परीक्षण करना चाहिये कि हम किस वर्ग से हैं। हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक है या नहीं।
अस्तित्व सकारात्मक है। ब्रह्माण्ड  विकासमान है। क्या किसी प्राकृतिक आपदा भूकम्प, बाढ़ या महामारी से हमारी गति रुकी है ? सृष्टि चल रही है। इसकी गति सकारात्मक है। क्या हम इससे सकारात्मकता का सबक नहीं सीख सकते हैं। तभी तो वैदिक ऋषियों ने कहा है, ‘‘चरैवेति, चरैवेति’’।

मानव देह का मूल्य

मैंने सुना है कि स्वामी विवेकानन्द एक बार रेल में यात्रा कर रहे थे। एक भिखारी ने अपनी गरीबी का हवाला देते हुए उनसे भीख मांगी। पहले स्वामीजी मौन हो गये। फिर दूसरी बार भिखारी ने कहा, ‘‘श्रीमान्, मैं बहुत गरीब हूं, मेरे  पास कुछ भी नहीं है, मुझ पर दया करो।’’ दुबारा भीख मांगने पर उनकी आंखों से आंसू टपकने लगे। तपाक से सहयात्री ने पूछा, ‘‘श्रीमान्, क्या बात है ?’’Anatomical-model-001
विवकेकानन्द ने कहा, ‘‘इस अमीर आदमी द्वारा दयनीय जीवन जीने एवं भीख मांगने के कारण मुझे कष्ट हुआ।’’
इस पर सहयात्री ने कहा, ‘‘अरे, यह तो भिखमंगा है। आप इसे अमीर कैसे कह रहे हैं ?’’
तब स्वामीजी ने भिखारी से पूछा, ‘‘क्या आप मुझे अपना बांया हाथ एक लाख रुपयों में बेचोगे ? मैं खरीदना चाहता हूं, रुपये अभी दूंगा।’’ भिखारी ने मना कर दिया।
‘‘क्या दांया हाथ एक लाख में दोगे ?’’ ‘‘नहीं।’’
‘‘क्या बांया पांव एक लाख में दोगे ?’’ ‘‘नहीं।’’
‘‘दूसरा पांव दो लाख में दोगे ?’’ ‘‘नहीं, यह बेचने के लिये नहीं है।’’
‘‘क्या एक आंख दो लाख में दोगे ?’’ यहां पर भी उत्तर नकारात्मक ही था।
‘‘दूसरी आंख के पांच लाख दूंगा।’’ ‘‘नहीं स्वामीजी्, मैं इन्हें कैसे बेच सकता हूं?’’
इस पर स्वामीजी बोले, ‘‘बेच तो नहीं सकते, लेकिन इनका उपयोग भीख मांगने के लिये करते हो। इतना सब कुछ होते हुए भी क्या तुम अब भी गरीब हो ? क्या तुम्हारे पास कुछ नहीं है ?
जिसके पास इतना कीमती मानव शरीर है उसे आप क्या कहेंगे ? भिखारी शरमा कर वहां से चला गया। वह अपनी पूंजी, अपनी शक्तियों, अपनी योग्यताओं, अपनी क्षमताओं, प्राकृतिक वरदानों से अवगत नहीं था। अज्ञान के कारण भिखारी स्वयं की असीम क्षमताओं का उपयोग करना नहीं जानता था।
क्या अधिकांश व्यक्ति उस भिखारी की तरह नहीं जी रहे हैं ? दुनिया का सबसे बड़ा सुपर कम्प्यूटर मानव मस्तिष्क है। वह हम सबके पास है। फिर भी हम उसका पूरा उपयोग नहीं कर दयनीय जीवन जीते हैं।
हम अक्सर भूल जाते हैं कि हमारे पास बहुत कुछ है, पर हम हमेशा जो नहीं है उसी की चिन्ता में दुखी रहते हैं। जबकि हर एक के पास हमारी अपनी क्षमताएं हैं, जिनका हम उपयोग कर सकते हैं। लेकिन होता यह है कि हम दूसरे की प्रतिभा के बारे में ही सोचते हैं, और अपनी क्षमताओं के बारे में विचार ही नहीं करते। यहां कोई भी प्रतिभाहीन नहीं है, ईश्वर ने हम सब में अनेक खूबियां भरी हैं, जरूरत है उन्हें निखारने की। सफलता के रास्ते में बाधाएं तो अक्सर आती हैं। परन्तु विजेता वही बनता है जो स्वयं का मूल्यांकन कर सकता हो। हम सब अनन्त क्षमताओं के धनी है। संसार में कोई भी हमारा विकल्प नहीं बन सकता। हमारी किसी की भी दूसरी प्रति (फोटोस्टेट) या लघु संस्करण मौजूद नहीं है। हम में से प्रत्येक व्यक्ति संसार में अद्वितीय, अनमोल व अनूठा है। अतः मानव के शरीर और मन-मस्तिष्क का मूल्य मुद्रा में आंकना संभव नहीं है।

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