Related Posts:
What is the Role of Luck in Getting Success ?
एक सफल और असफल व्यक्ति में क्या अन्तर है
10 फ़र
Related Posts:
11 जन
किसी अन्य को प्रेरित करना बहुत कठिन है। हम स्वयं अपनी धारणाओं के आधार पर अपने से ही प्रेरित होते है। व्यक्ति अन्य किसी बात की तुलना में अपनी प्रेरणाओं के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी होता हैं।

आप तो पहले से प्रेरित हैं। यह इस बात से स्पष्ट है कि आप यह ब्लोग पढ़ रहे हैं। फिर भी आप अपने भीतर की उस ऊर्जा को जगाना चाहते हैं, प्राप्त करना चाहते हैं,कि जिससे आपका कार्य निर्विघ्न चल सके।
यदि आप एक विद्यार्थी हैं और आप अध्ययन करना चाहते हंै परन्तु आपकी रुचि टेलीविजन देखने में है, तो यह स्पष्ट है कि आपको अपने अध्ययन की इच्छा को बलवती करना पड़ेगा और तब तक के लिए टेलीवीजन को छोड़ना पड़ेगा। केवल अध्ययन की आकांक्षा ही तीव्र करनी होगी। अन्य आकांक्षाओं, इच्छाओं को दबाना ही पड़ेगा। अर्थात् लक्ष्य-प्राप्ति के मार्ग के अवरोधों को लाख आकर्षणों के बावजूद नष्ट करना ही होगा,ताकि आप अपने लक्ष्य को ठीक से वेध सकें। इसका अर्थ है कि आपको एक विशेष प्रकार के विश्वास को विकसित करना होगा जो आप को विचलित नहीं होने से रोक सके, यही “प्रेरणा” है।
भोजन की तलाश एवं वंश वृद्धि, अन्य प्राणियों की भाँति मानव का भी प्रकृति-प्रदत्त स्वाभाविक गुण है। शरीर का प्रत्येक अंग उक्त कार्यों के संचालन के लिए बना है।फिर भी जैसे आँखें निरन्तर 8-10 घंटे पढ़ते रहने के लिए नहीं बनी हैं। इसी तरह मस्तिक का कार्य भी किसी एक बिन्दु पर केन्द्रित होने के लिए नहीं हुआ, वह अन्य पक्षों या क्रियाओं पर ध्यान देना नहीं है फिर भी, सफलता-प्राप्ति के लिए हमें भी उसे एक बिन्दु पर केन्द्रित करना पड़ेगा । ऐसा करना एक प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं है। हमें स्वयं को ऐसी अप्राकृतिक क्रियाएँ करने के लिए नियंत्रित करना ही पड़ता है। फिर भी सफलता-प्राप्ति के लिए हमें मस्तिष्क में यह विश्वास बिठाना पड़ता है कि एक बात जो हम करना चाहते हैं, उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितना जीवित रहना, अन्य बातों को हमें गौण बनाना पड़ता है, उन्हें कम महत्त्व देना पड़ता है। इस बात को यों समझें कि अपने लक्ष्य के अलावा अन्य सारी बातें निरर्थक हैं। तभी हम अपने लक्ष्य में सफल हो सकते हैं। प्रेरित होने का अर्थ है कुछ करने की पूर्ण तैयारी। प्रेरणा का मतलब उस लक्ष्य के लिए कार्य करने को तैयार रहना जो कि अपनी सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है ।
“आप किसी को प्रेरित नहीं करते हैं। आप केवल इस शक्ति को स्वयं में खोजने में सहयोग करते हैं।”
- गेलिलियो (इटली का महान् वैज्ञानिक)
9 जन
आपकी स्थिति कृष्ण से बेहतर है!अरे! हॅसने की जरुरत नहीं है।
इसके लिए श्री कृष्ण के जीवन से अपने जीवन की परिस्थिति की तुलना करने की जरुरत है।
हमारे में से किसे का जन्म जेल में नहीे हुआ। जबकि योगेश्वर कृष्ण का जन्म जेल में हुआ था। उनके मां बाप दोनों राजा होकर कंस के वहाँ बन्दी थे। आपके मां बाप आपके जन्म के समय बन्दी तो न थे।
किसी ने तुम्हें स्तनों पर जहर लगाकर दूध तो न पिलाया ? जबकि पूतना ने कृष्ण को मारने के लिए यह किया था। मां बाप के होते हुए कृष्ण यशोदा केे पास पले।हमारे मे से अधिकतर लोगों का पालन पोषण तो हमारी मां ने ही किया है।
बचपन में उन्हें गाय चराने भेजा गया। मुख्यतः हममे से किसी को भी जानवरों को चराने के लिए तो नहीं भेजा गया।
कम से कम आपके मामा आपको मारना तो नहीं चाहते थे ?
कृष्ण को उनकी प्रेमिका राधा बिछुड़ने के बाद शेष जीवन में फिर कभी ना मिली।
राजा होकर महाभारत के युद्ध में अर्जुन का रथ संचालन करना पड़ा। आज की भाषा में कहे तो वाहन चालक की भूमिका निभानी पड़ी। फिर चिन्ता की क्या बात है।
हुई न आपकी स्थिति कृष्ण से बेहतर ।
विपरीत परिस्थितियों के होते हुए महान् कार्य किये। यदि अपनी आत्म छवि एवं आत्म विश्वास है तो आप भी अपना सोचा प्राप्त कर सकते है। आपकी आत्म छवि ही आपको सफलता व सुख दिला सकती है।
14 दिस
यह पँचासवी पोस्ट हैं। इस अवसर पर हिन्दी के नामी पोर्टल वेब दुनिया में प्रकाशित ब्लोग की खबर को ही पुनः पहुँचाना चाहता हूँ। रविन्द्र व्यास ने रूको मत ,जब तक लक्ष्य हासिल न कर सको के नाम लिखा हैं।
23 नव
मैं एक 12 वर्ष की लड़की तसनीम के बारे में बताना चाहूँगा। 6 वर्ष पहले एक गांव छोड़ कर शहर में आकर बस गये। तब से वह अंध विद्यालय में निरन्तर पढ़ने जा रही थी। पर वह कुछ भी नहीं सीख पाई । उसके माता-पिता ने सोचा कि वह दिमाग से कमजोर है। अतः उन्होंने शहर के कई चिकित्सकों से परामर्श लिया, पर सब व्यर्थ रहा। फिर उन्होंने मुम्बई हाॅस्पिटल में भी दिखाया। कोई लाभ नहीं हुआ।
एक दिन वह लड़की अपने पिता के साथ मेरे घर आई। मंैने उससे पूछा कि वह क्यों नहीं पढ़ना चाहती है? उसका उत्तर था, ‘‘पढ़ने का कोई लाभ नहीं है।’’ मैंने उसे उसकी बुआ अजब के जीवन के बारे में बताया। उसके केरियर के बारे में बताया कि कैसे अजब ने लकवाग्रस्त होते हुए भी अपना केरियर बनाया। उससे पूछा कि क्यों तुम्हारी मां घर में ही रहती हैं और तुम्हारी बुआ नौकरी करती हैं। मंैने दोनों का अन्तर उसे समझाया। जब उसे समझ में आया कि अजब, उसकी बुआ,अधिकारी अपनी पढ़ाई की वजह से बनी हुई हैं। वह किसी पर आश्रित नहीं हंै। और चूंकि उसकी मां पढ़ी-लिखी नहीं हंै, उसे घर में ही रहना पड़ता हंै। मंैने, तसनीम को समझाया कि उसमें और उसकी माँ में भी अन्तर है।
मंैने उससे कुछ प्रश्न किये,‘‘तुमसे कौन शादी करेगा ?’’ ‘‘एक दिन जब तुम्हारे माता-पिता नहीं होंगे, कौन तुम्हारी देख-भाल करेगा ?’’ ‘‘क्या तुम अपनी बुआ की तरह अधिकारी बनना चाहोगी ?’’अजब अधिकारी कैसे बनी, यह मंैने उसे समझाया। इस पाँच मिनिट की वार्ता से वह सीखने-पढ़ने को तैयार हो गई। उसके पश्चात् उसने एक माह में ही वह सब सीख लिया जो वह पिछले पाँच वर्षों में नहीं सीख सकी थी। मंैने सिर्फ अध्ययन की आवश्यकता की प्रेरणा दी। मंैने उसकी मान्यताओं को, विश्वासों को बदला। मंैने आधारभूत आवश्यकताओं पर प्रहार किया और वह प्रेरित हो गई। तसनीम अभी 44-रजा काॅलोनी, अम्बामाता स्कीम में रहती है।
10 नव
मेरे मित्र राज बापना ने उठो जागो देखकर पुछा कि 250 पेज की क्र्रति का सार एक वाक्य में बताओ ?तब में सोच में पड गया और थोडी देर बाद बताया कि मैने इस पुस्तक मे आत्म छवि बढाने के बारे में लिखा है । सफलता प्राप्ति का जनक आत्मछवि है ।हम अपने मन में व्याप्त अपनी तसवीर से सन्चालित होते है ।हमारी तस्वीर का आधार हमारी धारणाएँ है। हम आत्मछवि के अनुसार ही कर्म,व्यवहार व प्रतिक्रिया करते है। आत्मछवि को पुरानी भाषा में आत्मविश्वास कहते है। आत्म छवि का कमजोर होना मानसिक विकलांगता है । शारीरिक विकलांगता से बडी मानसिक विकलांगता हैं।
प्रोफेसर हाकिन्स शारीरिक रूप से अक्षम होते हुए भी विश्वविख्यात वैज्ञानिक हो सकते हंै तो फिर हम क्यों नहीं जीवन में सफलता प्राप्त कर सकते हैं ? निश्चय ही हम जीवन में इच्छित सफलता को प्राप्त कर सकते हैं। यदि सूरदास अन्धे होकर हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि हो सकते हंै; सुधाचन्द्रन, हिन्दी फिल्म “नाचे मयूरी” की हीरोइन, अपनी नकली टाँग से भी सफल नृत्य कर सकती है, तो हम क्यों नहीं अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते ?
शारीरिक अक्षमता एक यथार्थ है। अधिकतर असफल व्यक्ति वे हैं जिनका मानसिक विकास सीमित होता है। ऐसे लोगों को हम मानसिक रूप से अक्षम कह सकते हैं। वे अपनी दिमागी शक्ति और क्षमता का सही दिशा में एवं सही रूप में सफलता प्राप्ति हेतु उपयोग नहीं करते । लक्ष्यहीन अपनी सफलता के दरवाजे स्वयं ही बन्द कर लेते हंै । वे स्वयं नहीं जानते, वे क्या करना चाहते हंै ? जीवन में प्रमाद, आलस्य, बुरी आदतें लक्ष्यहीन होने के कारण होती हैं। कुछ ऐसे विश्वास पाल लेते हैं कि “मैं अमुक कार्य करने योग्य नहीं हूँ,” “मैं यह नहीं कर पाऊँगा”, “मैं वह नहीं कर पाऊँगा” आदि। ऐसे लोग बहुत अधिक है जो निरुद्देश्य जीवन जी रहे हैं।
मैं सोचता हूँ, साधनों की कमी का होना मार्ग की एक-मात्र बाधा नहीं हो सकती । मेरा विचार है कि कोई भगवान आकाश में बैठा हमारे भविष्य को तय नहीं करता । प्रकृति अपने नियमों से काम करतीहैं।
सफलता कुछ गिने-चुने लोगों की बपौती नहीं है। आप भी, कोई भी, बिना धन और विशेष सम्बन्धों के भी इच्छित सफलता प्राप्त कर सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इच्छित सफलता की प्राप्ति का अधिकार है और उसे प्राप्त करने की स्वाभाविक या प्रकृति-प्रदत्त शक्ति भी उसमें निहित है। आवश्यकता है अपने भीतर की शक्ति को उद्घाटित करने और उसको सही दिशा में प्रयुक्त करने की। सफलता की कोई सीमा नहीं होती। इसकी संभावनाएँ असीमित हंै; अनन्त हंै। जैसे आकाश की कोई सीमा नहीं है। आकाश अनन्त है, असीम है। कोई भी अपने भविष्य को सफलता के सूत्रों से बदल सकता है। यह आपके स्वयं के हाथ में है। अच्छी आत्मछवि के द्वारा ही हम प्रकृति से जुडते है। अच्छी प्राकृतिक शक्तिया तभी साथ देती है।
आत्मछवि बदलकर हम अपना भाग्य बदल सकते है।जैसा कि हम जानते हैं और यह तय हैं कि हम अपने निर्माता स्वयं है। अपने भाग्य का निर्धारण हम स्वयं करते हैं। जैसी आत्मछवि हम बोएँगे, वैसा ही काटेंगे।
3 नव
सफलता सम्बन्धि साहित्य आज बाजार में बहुत आ गया हैं। यह साहित्य आपको को उस योग्य बनाने में मदद करता हैं । मैं स्वयं ऐसा साहित्य विगत 35 वर्षो से खोजता रहा हूँ। इस क्रम में जो प्रेरित करने ,हिम्मत बढाने व सक्षम बनाने वाली व्यावहारिक पुस्तके मुझे मिली इनकी सूची दे रहा हूँ।
APJ Abdul Kalam : Wings of Fire
Dale Carnegi : How to Win Friends & Influence People
:How to Stop Worry and Start Living
Deepak Chopra : The Seven Spiritual Laws of Success
Kenneth Blanchard : The One Minute Manager
and
Spencer Johnson
Napolean Hill : Think and Grow Rich
Normen V. Peale : The Power of Positive Thinking
Stephen R. Covey : The 7 Habits of Highly Effective People
Zig Ziglar : See You at The Top
J. Krishnamurti : The First And Last Freedom
कृष्णामूर्ति फाउण्डेशन इण्डिया, राजघाट फोर्ट, वाराणसी
Osho : Meditation The First And Last Freedom
रेबेल बुक ओशों कम्यून, पूणे
उपरोक्त पुस्तकांे के हिन्दीअनुवाद उपलब्धहै।
Anthony Robbins : Awaken the Giant Within
:Unlimited Power
Simon & Schuster Inc.
1230 Avenue of the Americas, New York.
Joshpeh Murphy : The Power of Your Subconscious Mind
Bantam Books, USA.
Raj Bapna : Mind Power Study Technique
Mind Power Research Institute, Mind Chambers, Udaipur
Win Wenger : The Einstein Factor
Prima Publishing, California.
सफलता सम्बन्धि आप भी इसमें अपने अनुभव के आधार पर पुस्तको सम्बधि सुझाव दे सकते हैं।
30 अक्टू

See you at The Top का हिंदी अनुवाद प्रकाशक :मंजुल पब्लिशिंग कीमत ;१५० रु
सफलता के शिखर पर चढने का मार्ग क्या हैं?
उठो ! जागो! लिखने के क्रम में कुछ प्रमुख प्रेरक गुरूओं का साहित्य पढने का अवसर मिला कई किताबे उनमे से आज भी सार्थक लगती है।सफलता प्राप्ति हेतू 20सहायक पुस्तकों की सूची जो मेंने उठो जागो में दी हैं उसमें से प्रत्येक की समीक्षा करने का मन है। उनमें से जिग जिगलर की कृति शिखर पर मिलेगे अच्छी लगी थी । जिगलर अमेरिका के बहुत प्रसिद्व प्रेरक गुरू हैं। आप अपने अनुभव से बोलते हैं। इसलिए व्यावहारिक हैं।वास्तव में यह सफलता प्राप्ति हेतु एक पाठ्य पुस्तक हैं।यह किताब बातचीत ,कार्यानुभव पर सरल शैली में लिखी हुई है ।इस किताब ने मुझे कहां छुआ व किस तरह छूआ जिसकी चर्चा करना चाहता हूॅ।
इस पुस्तक में सफलता प्राप्ति हेतु मुख्यतः छः विषयो के बारे में लिखा है। इस में शिखर पर चढने के लिए छः सोपान बताए हैं। आत्म छवि ,दूसरो के साथ आपका रिस्ता ,ध्येय , नजरिया ,कार्य और इच्छा। आत्मविश्वास से आत्मछवि बनती हैं। हिन भावना के होने पर सफलता नही पाई जा सकती है। सफलता पाने हेतु रिश्ते भी सहायक हैं। ध्येय के बिना मंजिल नही मिलती हैं। सकारात्मक नजरिये की भी सफलता प्राप्ति में अहम् भूमिका हैं। सफलता का आधार कर्म यानि कार्य ही तो हैं।ज्वलन्त इच्छा के बिना प्रयत्न सम्भव नही हैं।इस तरह इन छः ही मुख्य बातो को ध्यान में रखने के लेखक ने अनेेक उपाय बताए हैं।
शिखर पर मिलेंगे एक दर्शन है,परन्तु इसमें कुछ सिद्वान्त शामिल हैं। ये विचार ,कार्यविधियां ,एवं तकनीक एक पुरा जीवन जी लेनंे से आती हैं। इसमें तीस वर्ष का सेल्स व मानव विकास का अनुभव ,साथ ही साथ जीवन के लगभग सभी क्षे़त्रों से जुडे विश्व के उच्च व्यावसायिक लोगो से व्यक्तिगत लगाव शामिल हैं।
जिग-जिगलर की निम्न बातो के साथ इसे पुरा करना चाहुगाँ।
आदमी की अभिकल्पना उपलब्धि के लिए की गयी थी , उसका निर्माण सफलता के लिए किया गया, और उसे महानता के बिज सहायता के लिए प्रदान किये गये।
26 अक्टू
ब्लाॅग पर ट्राफिक बढ़ाना टेढ़ी खीर है। इ़स पर मुझे टेढ़ी खीर नामक एक कहानी याद आती है।
जीवन भर हम सफ़लता के लिए लालायित रहते हैं परन्तु कुछ ज्ञात-अज्ञात कारणों से हम आंशिक सफ़लता ही प्राप्त कर पाते हैं। ऐसा ही एक कारण है “नासमझी”।
दो गरीब लड़के थे, जो भीख माँगा करते थे। उनमें से एक जन्मान्ध था और दूसरा उसे सहयोग किया करता था।
एक दिन अन्धा लड़का बीमार हो गया। उसके साथी ने कहा “यहीं ठहरो और विश्राम करो। मैं जाकर हम दोनों के लिए माँग कर लाता हूँ।’’
उस दिन, उस लड़के को बहुत स्वादिष्ट भोजन “खीर” भीख में मिली। परन्तु उसके पास लाने हेतु कोई बर्तन न था इसलिए उसने वहीं सारी खीर खा ली।
लौटकर उसने अपने अन्धे साथी से कहा, ‘‘ मुझे क्षमा करना भाई! आज मुझे भीख में खीर मिली थी। परन्तु मैं उसे तुम्हारे लिए न ला सका, क्योंकि उसे लाने के लिए मेरे पास बर्तन नहीं था।’’
अन्धे लड़के ने पूछा, “यह खीर क्या होती है ?” “अरे यह सफ़ेद होती है, दूध सफ़ेद होता है।” अन्धा लड़का समझा नहीं सका। चूंकि वह जन्म से अन्धा था। उसने पूछा “यह सफ़ेद क्या होता है?” “तुम नहीं जानते, सफ़ेद क्या होता है?”
“नहीं! मैं नहीं जानता।”
“यह काले का विलोम होता है।”
उसने पूछा, “अच्छा, यह काला क्या होता है।” वह यह भी नहीं जानता था कि काला क्या होता है।
‘‘अरे, समझने की कोशिश करो, सफ़ेद को।” अन्धा लड़का बिल्कुल नहीं समझ पाया कि सफ़ेद क्या होता है। अतः उसके मित्र ने इधर-उधर दृष्टि दौड़ाई और ऐसा संकेत ढूँढने की कोशिश की कि जिसका उदाहरण देकर अंधे मित्र को “सफ़ेद” के बारे में समझा सके। इतने में उसे एक सफ़ेद बगुला दिखाई दिया। उसने बगुले को पकड़ कर अन्धे मित्र से छुआते हुए समझाया कि सफे़द इस चिड़िया जैसा होता है।
अन्धे ने बगुले को छुआ, उस पर हाथ फिराया और कहा, “अरे यह तो मुलायम है। सफ़ेद मुलायम होता है।”
“नहीं, नहीं, इसका मुलायम होने से कुछ लेना देना नहीं है। सफ़ेद, सफ़ेद होता है। समझने की कोशिश करो।“
“परन्तु तुमने कहा कि ‘सफ़ेद’ इस बगुले जैसा होता है।” यह कहते हुए अन्धे लड़के ने बगुले पर फिर से हाथ फिराया – आगे से पीछे, ऊपर से नीचे – और कहा “अच्छा, यह टेढ़ा होता है।” अब समझा, खीर टेढ़ी होती है।
अन्धा लड़का तब भी समझ नहीं पाया कि “सफ़ेद” क्या होता है। क्योंकि, उसे यह समझने, जानने के लिए जिन चक्षुओं की आवश्यकता थी, वह दृष्टि उसके पास नहीं थी।
इसी भाँति अन्धे लड़के की तरह हम कई बार जीवन को सही रूप से समझ नहीं पाते, जबकि हम हमेशा सफलता-प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हंै।
तथ्यों पर आधारित हमारी समझ का एक स्तर होता हंै। समस्या वहाँ खड़ी होती है जहाँ हम सोचतें हंै कि हम सही है,ं जबकि कई बार ऐसा होता नहीं है। ऐसी स्थिति में हम सोचते हैं, कठोर प्रयास करने पर भी हमें सफलता नहीं मिल रही है। हम लक्ष्य-प्राप्ति के लिए क्या करें ?
इस उत्तर की खोज आपको अपने ब्लाग पर ट्राफिक बढाएगी।
15 अक्टू
नकारात्मकता को पहचाने बिना उसे सकारात्मकता में नही बदला जा सकता है। नकारात्मकता क्या है ? इसे समझने हम अपने महाकाव्यों में झांकते हैं। रामायण के युद्ध के पीछे क्या कारण है ? लक्ष्मण भैया द्वारा शूर्पनखा की नाक काटना है। नाक काटना अर्थात किसी प्रकार की शारीरिक हिंसा सकारात्मक नहीं हो सकती। सारा जगत रावण को दोष देता है लेकिन लक्ष्मण की नकारात्मकता को हम नहीं देख पाते हैं। आपको अगर कोई महिला शादी का प्रस्ताव रखे या प्रेम का स्वांग रचे तो क्या आप उसकी नाक काट देंगे ?
इसी तरह महाभारत के मूल में भी नकारात्मकता ही है। दुर्योधन द्वारा हस्तिनापुर के पाण्डवों के महलों में फिसलने पर द्रोपदी का हंसना नकारात्मकता है। व्यंग्य मारना कि अन्धे का बेटा अन्धा ही होता है, नकारात्मकता है। क्या दुर्योधन ने साड़ी इसलिये नहीं खींची थी ? हंसने की बजाय द्रोपदी को क्षमा मांगते हुए अपने जेठजी की मदद को दौड़ना था। यह होती सकारात्मकता।
किसी की बुराई करना, आलोचना करना नकारात्मकता है। पर में कमजोरियां खोजना, उसका अहित चाहना, भय, शक, सन्देह करना भी नकारात्मकता की श्रेणी में आते हैं। स्वयं को हीन समझना, स्वयं को धिक्कारना, पछताना, रोना नकारात्मकता है।
अपने जीवन से सभी प्रकार की नकारात्मकता को समाप्त करना होगा। नकारात्मकता हमारे विकास में बाधक है। नकारात्मकता की मात्रा ज्यों-ज्यों घटती है त्यों-त्यों सकारात्मकता की मात्रा बढ़ती जाती है। हमारे सोच, बोली एवं व्यवहार में सकारात्मकता झलकनी चाहिये। अपने सोच को रचनात्मक बनायें। अपनी उर्जा को उपयोग की दिशा में लगाएं।