Posts Tagged ‘सकारात्मकता’

आरोग्यधाम (एस. व्यासा) बैंगलोर ,असाध्य रोगों की सर्वांगीण चिकित्सा हेतु श्रेष्ठ जगह

आरोग्यधाम, प्रशान्ती कुटीर बैंगलोर में दिनांक 26.04.2013 से 03.05.2013 तक पत्नी सहित समग्र चिकित्सा हेतु रहा । यह स्वामी विवेकानन्द योग अनुसंधान संस्थान, (एस. व्यासा) डिम्ड विश्वविद्यालय का एक अंग है ।2013-05-01 17.46.15यहां पर योग, आयुर्वेद व नेचुरोपेथी के स्वतन्त्र महाविद्यालय है । यहां योग पर रिसर्च सबसे अधिक हुई हैं एवं अनेक शोध पत्र चिकित्सा, मनोविज्ञान, के अन्तर्राष्ट्रिय जरनल्स छप चुके हैं । यहां पर योग चिकित्सा, आधुनिक विज्ञान, आयुर्वेद, नेचुरोपेथी व फिजियोथैरेपी के आधार से कई रोगों का सफलतापूर्वक ईलाज किया जाता है ।
पत्नी मीना के जोड़ों व सर्वाईकल दर्द में बहुत राहत मिली । वह विगत पांच वर्षों से दाई करवट सो नहीं पा रही थी, वह सोने लगी । वहां पर मीना के दर्द उठने पर तत्काल योगा करा कर पेन किलर देने की तरह दर्द दूर कर दिया ।योग, मसाज, लेप, स्टीम बाथ, सोना बाथ आदि से रीढ़ की हड्डी के सभी प्रकार के दर्द को दूर करने में विशेषज्ञता हासिल है ।
मेरा रक्तचाप 110/70 पर रहने लगा । नाड़ी शोधन व भ्रामरी का जबरदस्त प्रभाव देखा ।
गुरूजी डाॅ0 एच0आर0 नागेन्द्र भूतपूर्व अन्तरिक्ष वैज्ञानिक हैं जो अन्तरिक्ष की यात्रा को छोड़कर अन्तर्मन की यात्रा करा रहे हैं एवं विश्व प्रसिद्ध आधुनिक चिकित्सक डाॅ0 आर0 नागरत्ना दीदी का व्यवहार एवं सेवा अनुकरणीय है ।यह 100 एकड़ में निर्मित प्राकृतिक वातावरण से युक्त है । यहां का स्टाफ, थिरापिस्ट व डाॅक्टर सहयोगी हैं ।

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कैन्सर चिकित्सा हेतु ऊर्जा का जागरण एवं सोच में परिवर्तन जरूरी

हम ऊर्जा के पूंज है । जब तक ऊर्जा का बहाव आसानी से पूरी तरह शरीर में होता रहता है तब तक हम स्वस्थ रहते हैं । हमारे ऊर्जा पथ में ज्योंहि बाधा पहुंचती है, शरीर रूग्ण हो जाता है । ऊर्जा पथ मे विकृति शरीर को विकृत कर देती है ।Image ऊर्जा पथ की चाबी हमारे स्वस्थ मन, भाव एवं विचार के अधीन है । स्वस्थ मन के होने पर ऊर्जा निर्बाध बहती रहती है । स्वस्थ भाव व मन के होने पर ही कोशिकिय श्वसन अच्छा होता है । निर्बाध आक्सीजन का बहना कोशिकिय श्वसन के लिए जरूरी है । शरीर में इसका दौड़ना इन्ही भावों व विचारों के अधीन है ।
कैन्सर अर्थात शरीर में ऊर्जा का संचरण सही तरीके से नहीं हो रहा है । ऊर्जा पथ को कैन्सर कोशिकाओं ने अपने नियन्त्रण में ले लिया है । रोगी की सोच एवं भाव अराजक है । कैन्सर होने का अर्थ है कि मन भी विकार ग्रस्त है । अतः सर्व प्रथम मन को कैन्सर केन्द्र से मुक्त करना पड़ता है । भाव एवं विचार की दिशा बदले बिना कैन्सर कौशिकाओं पर नियन्त्रण कठिन है । मात्र पोषक आहार एवं निर्विषिकरण से इसे रोकना मुश्किल है । इस हेतु मन में दबे भावों, गुस्से, ईष्र्या, दुःख, हार, बदले के भाव आदि का रेचन जरूरी है ।

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चैतन्य द्वारा , विचारों द्वारा रोगों की चिकित्सा कैसे करें ?

प्रत्येक मरीज अपने अंदर खुद के डाॅक्टर को लेकर चलता है। वे हमारे (डाॅक्टरों के) सामने इस सच्चाई की जानकारी के बिना ही आ जाते हैं। हम अपना सर्वोतम तभी कर सकते हेैं जब हम मरीज के अंदर रहने वाले डाॅक्टर को ही काम करने का अवसर प्रदान करें।
-डा. अल्बर्ट श्वीट्जर

चेतना में विचार उत्पन्न हुआ और हमारा निर्माण हुआ। हम विचारों द्वारा बने हैं। अर्थात् चेतना ही जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है। जैसा कि उपनिषद् में लिखा है-प्रत्येक भावना शरीर में संवेदना उत्पन्न करती है। प्रत्यके भावना शरीर में अलग-अलग तरह से संवेदना उत्पन्न करती है। भावना मंे डूब जाने पर हम विचार का महसूस करने लगते हैं और संवेदन को नहीं देख पाते हैं। जैसे ही मन विचार में पड़ा और हम श्वास को देख नहीं पाते है।यही हमारी बेहोशी है। रोग का भाव एवं विचार मन मंे आने पर हम रोगी हो जाते हैं।01
हम जैसे ही संवेदन को देखने में समर्थ हो जाते हैं, तो संवेदन बदलने लग जाते हंै, मिट जाते हैं। इस तरह हम सकारात्मक भावना द्वारा स्वयं को सकारात्मक बना सकते है। स्वयं के प्रति सजग होकर हम अपना नियन्त्रण अपने हाथ मंे लेते हैं। इस तरह हम अपने बदलते मन को देखने मंे समर्थ हो जाते है । अर्थात् हम स्वयं की श्रेष्ठ भावनाओं और विचारों द्वारा चिकित्सा भी कर सकते हंै। स्वसम्मोहन के द्वारा भी स्वयं की चिकित्सा की जा सकती है। अपने दिमाग की प्रोग्रामिंग बदलकर हम अपने को स्वस्थ बना सकते हंै। चिकित्सा के भाव एवं विचार पैदा कर हम अपनी चिकित्सा कर सकते हंै।

जैसे पौधे के बीज मंे पूरी संरचना छिपी रहती हैं वैसे ही हमारी कोशिका के डी. एन. ए. में हमारे व्यक्तित्व/चेतना का पूरा प्रोग्राम अंकित होता है। बीज को प्रभावित कर जैसे पौधे में परिवर्तन लाते है, वैसे ही डी. एन. ए. को बदल कर पूरे जीवन में परिवर्तन लाया जा सकता है।

हमारे व दुनिया के बीच सम्बन्ध हमारी चेतना/मन से ही, या उसके कारण से ही होता है।

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चेतना की यात्रा से संज्ञान हुआः गड़बड़ है मन में अपराधी हूँ अपना व आपका-मिच्छामि दुक्कड़म

जिने हेतु सिर्फ़ धन काफी नहीं ,जिने की कला चाहिए

मैं एक सत्य घटना से अपनी बात प्रारम्भ करना चाहता हूं । सन् 1923 अमेरिका में – शिकागों के एजवाटर बीच पर तब के सबसे अमीर 9 व्यापारी एकत्रित हुए। जिनका कुल जमा धन दुनिया की कुल पूंजी का 50ः से अधिक था ।
एक शोधकर्ता ने 25 वर्ष बाद उन सबकी वापस खोज की गई तब उनकी स्थिति निम्न प्रकार पाई गई ।
धनिक का नाम                                व्यवसाय                                                             25 साल बाद परिणाम
1. चाल्र्स श्वाब                             स्टील कम्पनी के मुख्यिा                                                          5 साल ऋण में रह कर मरे
2. सेम्युअल इन्सूल                    सबसे बड़ी यूटिलिटी के अध्यक्ष                                                 विदेश में दिवालिए होकर मरे
3. हार्वड हाप्सन                           सबसे बड़ी गैस कम्पनी के मुखिया                                            पागल हो गये
4. आइवर क्रुजर                           सबसे बड़ी अन्तर्राष्टीªय मैच कम्पनी के मुख्यिा                    गरीबी में मरे
5. लिआॅन फ्रेजिअर                   बैंक आॅफ इन्टरनेशनल सेटलमेन्ट के अध्यक्ष                    आत्महत्या
6. रिचार्ड व्हाटनी                         न्यूयार्क स्टोक एक्सचेन्ज के मुखिया                                        जेल से रिहा
7. आर्थर क्राॅटन                        शेयर दलाल                                                                                  गरीबी में मरे
8. जेसी लीवरमारे                         शेयर दलाल                                                                                आत्महत्या
9. अल्बर्ट फाॅल                            होर्डिंग के केबिनेट मन्त्री                                                           जेल से रिहा
इन 9 अरबपतियों में से 2 ने आत्महत्या कर ली थी । एक अरबपति पागल हो चुके थे । 2 अरबपति जेल से रिहा हुए थे एवं 4 अरबपति गरीब हो गये थे ।
अर्थात सिर्फ धन से सभी समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता है । जीवन शैली से उत्पन्न समस्याओं का समाधान जीवन शैली बदल कर ही किया जा सकता है । तनाव से उत्पन्न समस्याओं का समाधान आराम करके ही किया जा सकता है । धन से आराम की सुविधाएं खरीदी जा सकती है, आराम नहीं । हम स्वयं अपने लिऐ समस्या है । महावीर ने यही कहा है कि स्वयं को बदलने से उलझने मिटाई जा सकती है । समस्याएं डर व लालच जानते है, उनको जीतकर ही उनसे पार हुआ जा सकता है ।

जीवन जीने के लिए पैसे की समझ/वित्तिय साक्षरता/जीने की कला/संयम/स्वयं का ज्ञान होना चाहिऐ । अपनी आवश्यकताओं, उपभोग, सुविधाओं, खर्च, आय की समझ होनी चाहिये । जीवन का मात्र भौतिक तल ही नही है । मानसिक तल व चेतना तल पर भी जीवन है । जीवन का अर्थ ही एक तल नहीं है । स्याद्वाद को आर्थिक क्षैत्र में भी लागू करें ।
हमारा अनुभव व समाज कहता है किThe whole thing is that  सबसे बड़ा रूपया । महावीर ने कहा नही The whole thing is that सबसे बडी Life  है । हम है हमारा जीवन है । हमारी जीवन शैली है । हमारी सहजता है । प्रकृति है ।

प्रेरणा एवं प्रतिभा दोनो आगे बढ़ने में सहायक

फ्रांसीसी साहित्यकार विक्टर ह्यूगो, ने लिखा है कि प्रेरणा एवं प्रतिभा दोनो एक ही हैInspiration जो व्यक्ति प्रेरित होता है वही प्रतिभाशाली होता है । प्रेरित का अर्थ अपनी क्षमता पर भरोसा करना व कुछ पाने के लिए प्रयत्न करना है । प्रतिभा का अर्थ कार्य करने की क्षमता व कुशलता का होना । प्रतिभा प्रेरणा के अभाव में व्यर्थ है। प्रेरणा भी प्रतिभा के अभाव में व्यर्थ है । प्रेरित होने पर ही प्रतिभा सार्थक होती है । बिना प्रतिभा के प्रेरणा उपादेय नही है ।

प्रतिभा व प्रेरणा दोनो अंधे व लंगड़े की मित्रता के समान है । जंगल में आग लगने पर अंधे के कंधे पर लंगड़ा सवार होकर दोनो जंगल से पार हो जाते हैं । दोनो साथ ही कार्यकारी है । प्रतिभा प्रेरणा का परिणाम है । प्रतिभा प्रेरणा के पंखो से ही उड़ती है । प्रतिभा की जड़ें प्रेरणा में ही होती है । प्रेरणा हो तो कोई अक्षमता नहीं होती । अन्धी होकर हेलन केलर दो बार हवाई जहाज उड़ाती है । तभी तो प्रेरक वक्ता प्रतिभा बढाने पर जोर देते हैं । इन दोनो के सहयोग से ही जीवन में मनचाही सफलता प्राप्त की जा सकती है ।

पैसा रास्ता है, मंजिल नहीं

                                  धन आपका दास है, यदि आप उसका उपयोग जानते हैं। वह आपका स्वामी है, यदि आप उसका उपयोग नहीं जानते।

-होरेस

सोने की ईंट और बूढ़ा-
एक बूढ़े व्यक्ति के पास एक सोने की ईंट थी। जिसे उसने लपेट कर बगीचे में गाड़ रखी थी। प्रति सप्ताह थोड़ी सी मिट्टी हटा कर उसे देखता रहता था। एक दिन पोते ने देखा कि दादाजी उस जगह को कभी-कभी खोद कर देखते हैं। उसने एक दिन खोद कर सोने की ईंट निकाल ली व उसी वजन व आकार का पत्थर रख दिया। दादाजी ने जब देखा तो रोने लगे। पोते ने कहा आपने आज तक उसका उपयोग किया नहीं, मात्र देख कर रख देते हैं। इसे देख कर रख लो तो क्या फर्क पड़ता है यह सोने की है या पत्थर की। आपको तो मात्र देखना है।’’Role of money in life
इसी तरह हम धन जमा कर उसे देखते रहते हैं। वह हमारे किसी काम नहीं आता है और हम विदा हो जाते है। एक रुचि कर खबर याद आई । आपने पढ़ा होगा कि मई दो हजार दस के अखबारों में डाॅ. देसाई के घर छापा पड़ा हुई, अठ्ाहरसौ करोड़ रुपये व डेढ़ टन सोना मिला। वे सज्जन इन पैसों को रोज बूढ़े की तरह देखते ही तो थे।
धन के दीवाने न बने। इसको बचाने के क्रम में रिश्तेदार न खोएँ। अगर पास मंे धन है तो जरुरत मन्द को दें। हमारा धन कोई खा सकता है, हमारी किस्मत नहीं। अतः धन हेतु माता-पिता व भाई-बहनों से लड़ना अनुचित है।
‘‘प्यासा सावन’’ एक अच्छी हिन्दी फिल्म है जो धन की सीमाएं दर्शाती है। इसमें नायक-नायिका प्रेम विवाह रचाते हैं। प्रारम्भ में धन नहीं था, प्रेम से रहते थे, बाद मंे नायक बहुत धन कमा लेता है लेकिन समय नहीं है। इधर नायिका को कैन्सर हो जाता है। तब भी धन का उपयोग नहीं कर पाते हंै।

                                                                                                                                               - मेरी  पुस्तक जियो  तो ऐसे  जियो से     ( To be continued)

सुखी होने अन्तर्यात्रा करें व अन्तर्मन की सुने

ज्यादातर लोग कभी अपनी अन्तरात्मा की आवाज नहीं सुनते है।
                                                                                                                    - स्टीफन आर. कवि

हम अपने सूक्ष्म शरीर एवं भाव जगत् को व्यवस्थित करने के लिए आन्तरिक अवलोकन करते हंै।
शरीर एवं उपनिषद् सिखाते हैं,-‘यत् पिण्डे,तत् ब्रह्मांडे’। दीपक चोपड़ा ने लिखा है-मानव देह ब्र्रह्मांड की अभिव्यक्ति है। जिन तत्त्वों और शक्तियों से ब्र्रह्मांड बना है, उन्हीं से हमारा शरीर,मस्तिष्क एवं आत्मा भी बने हैं। सूक्ष्म और विराट दोनों एक ही है। मानव-देह और ब्रह्मांडीय-देह एक ही है। मानवीय-मस्तिष्क और ब्रह्मांडीय-मस्तिष्क एक ही हैं। यही वेदों का मूलभूत संदेश और सिद्धांत है।हम किस प्रकार सोचते हैं, महसूस करते है, स्मरण करते हैं, और कल्पना करते हैं, ये सारी बातें हमारी देह को प्रभावित करती है। लेकिन स्व-संवाद की कमी के कारण हम अपने से दूर चले गये है। स्व संवाद का अर्थ है-आपके मन में चलने वाला वार्तालाप। लोग बाहर से तो अपने आपको बदल लेते हैं परंतु अंदर से वैसे ही रहते हैं। जब तक आप अपने बारे में जो खयालात रखते हैं, उन्हें नहीें बदलते, तब तक आप अंदर से स्वयं को नहीं बदल सकते। आपके विचार आपको जो खबर देते हैं, आप अपने आपको वही मान लेते हैं। इसलिये पहले आपको अपने अंदर चलने वाले विचारों को बदलना हेगा। स्व संवाद बदलने से आप अंदर से बदल जाते हैं, यही स्व संवाद का जादू है।

अपने शरीर के संकेतों को सुनें। हमारा शरीर अपने ऊपर होने वाली ज्यादतियों का विरोध प्रकट करता है। शरीर की थकान,सोने की इच्छा,काम न करने का मन, सरदर्द आदि ऐसे संकेत हैं। जब कभी पानी पीने का भाव जगे, शौच एवं पेशाब करने की इच्छा हो तो उसे तत्काल पूरा करें, संकोच की जरूरत नहीं है।
अन्र्तप्रेरणा सुनंे और जीना सीखें। हम अपनी व्यस्तता के कारण अपने से ही बहुत दूर चले गयें हैं । इस संसार में हमारा दूसरों से बहुत कम संवाद हैं एवं स्वयं से भी संवाद नहीं के बराबर हैं । हम अपने अन्र्तमन के संकेतों व संदेशों को ग्रहण नहीं करते है। जब आप अपनी बात नहीं सुनते है तो दुनिया में किसी ओर की बात कैसे सुन सकते हैं । हम अपनी सबसे ज्यादा अनदेखी करते हैं। कई बार मनुष्य का अचेतन घटनाओं का विश्लेषण कर कुछ सूचनाएं व संकेत देता है लेकिन तब हम उस पर ध्यान नहीं देते हैं । आपका शरीर, मस्तिष्क, मन और आत्मा निरन्तर कुछ न कुछ किसी न किसी रूप में आपसे कहते रहते हैं। अपनी अन्र्तप्रेरणा ही आपकी सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक है । इस स्त्रोत का लाभ उठाकर व्यक्ति चाहै हेे जितनी उन्नति कर सकता हैं । पाओलो कोएलो ने एल्केमिस्ट को साफ तौर पर ऐसे संकेत ग्रहण करते हुए दिखाया है । वह प्रकृति द्वारा दिए जाने वाले संकेतों एवं लक्षणों को महत्व देने के कारण ही सफल होता हैं।

शरीर की भाषा समझें। जब हल्का सर दर्द हो तो उसे दो रुपये की गोली या पेनकिलर लेकर दबाने की कोशिश न करें। अच्छा हो कि विश्राम करें। कैसी विड़म्बना है कि आप अपने शरीर को रोगी बनाएँ व डाक्टर उसे ठीक करे। दवाइयाँ आपात काल के लिए है। सामान्य परिस्थिति में उनका सेवन ठीक नहीं है। डाॅक्टर व दवाइयाँ आपके लिए ही नहीं है; उनमें डाक्टर व दवा बाजार की ताकतेें शामिल हंै जो आपके पक्ष में नहीं है।
मानव-देह जीवित मन्दिर है। इसके होने से आप हैं। अस्तित्व इसके द्वारा आप को अभिव्यक्त करता है। अतः इसका ध्यान रखंे। शरीर के सकेतों को अनसुना न करें। यह गूंगा जरूर है, लेकिन प्राणवान है। अतः इसे मित्र बनाएँ।
अपने शरीर से संवाद नहीं होने से हमारा उस पर नियन्त्रण नहीं रहताहै। ऐसे में शरीर स्वंय मालिक हो जाता है। वह एक सीमा के बाद अपनी रिपेयरिंग नहीं कर सकता है। ऐसे में हमारी उम्र घटती है।इससे बुढ़ापा शीघ्र आ जाता है।
प्रतिदिन हम भोजन करते हैं। लेकिन क्या खाना चाहिए एंव कितना खाना चाहिए यह बहुत कम लोग जानते हैं। स्वाद के कारण हम इस शरीर पर कई बार अनावश्यक बोझ डाल देते हंैै। फिर कहते हंै कि मुझे अपच है, गैस रहती है। नोबेल पुरस्कार विजेता डा.लिनस पोलिंग ने कहा था कि आप लोग जो भोजन करते हैं वह पच्चीस प्रतिशत आप के लिए है, शेष पिचहतर प्रतिशत भोजन आप डाक्टरों के पेट के लिए करते हैं।
जब कभी हम नकारात्मक होते हैं तो तत्क्षण शरीर में अनेक तरह के हानिप्रद रसायन बनने लगते हैं। हमारा शरीर दुनिया की सबसे बड़ी फार्मास्युटिकल फैक्ट्री है। यह अपने मस्तिष्क के कमाण्ड पर अनेक तरह के रसायन बनाता है।
ईश्वर की सबसे बड़ी कृति इंसान है। हमारे पास सर्वश्रेष्ठ साधन है। प्रकृति की सारी व्यवस्था है। इसके उपरान्त भी हम अपने अहं व लोभवृत्ति के वश में होकर इस शरीर पर अनेक तरह के अनावश्यक बोझ  लादे हुए हैं।

( मेरी पुस्तक जियो तो ऐसे  जियो से)

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सफलता का मंत्रः रतन टाटा के अनुसार- दूसरा भाग

2. बुद्धिमता
मनुष्य के पास मात्र ज्ञान, सूचना या जानकारी होने से सफलता नहीं मिलती । ज्ञान का उपयोग करने की कुशलता होनी चाहिये । वास्तव में ज्ञान का उपयोग अपने पक्ष में करने की कला को ही बुद्धि कहते हैं। मात्र आई. क्यू. से काम पूरा नहीं होता हैं। जीवन में भावनात्मक सन्तुलन (ई. क्यू.) की बड़ी आवश्यकता हैं। परिस्थिति, काल, देश केे अनुसार निर्णय करने में बुद्धि की बड़ी भूमिका हैं। अपनी मात्र धारणाओं व दृष्टि अनुसार न चलें । विवेक से तय करें । तोल मोल के फैसले ले ।
अपनी अक्ल से चलें । चमचों की आंख से न देखें ।
हार्वड विश्वविधालय के प्रोफेसर गार्डनर ने बताया है कि बुद्धि एक तरह की नहीं होती हैं। बहुमुखी बुद्धिमता की धारणा दी है । उनके अनुसार व्यक्ति में मुख्यतः सात तरह की बुद्धि होती हैं। इसमें से प्रत्येक का विकास अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग मा़त्रा में होता हैं।
1. तार्किक/गणितीय
2. भाषायी/शाब्दिक,
3. शारीरिक/गतिक,
4. संगीतीय/आवाज,
5. दृश्य/आकाशीय,
6. दूसरे व्यक्यिों से सम्बन्धित,
7. आत्मिक, (इन्टर परसनल)
जानकारी, ज्ञान, सूचनाओं को अपने पक्ष में प्रयोग करना । उस आधार पर सटीक निर्णय करना ।

( To be continued…)

सफलता पाने हेतु भीतर संकल्पशक्ति बढ़ाए

इस प्रसंग में एक कहानी याद आती है। एक बार गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ किसी पर्वतीय स्थल पर ठहरे थे। शाम के समय वह अपने एक शिष्य के साथ भ्रमण के लिए निकले। दोनों प्रकृति के मोहक दृश्य का आनंद ले रहे थे।
विशाल और मजबूत चट्टानों को देख शिष्य के भीतर उत्सुकता जागी। उसने पूछा,‘इन चट्टानों पर तो किसी का शासन नहीं होगा क्योंकि ये अटल, अविचल और कठोर हैं।’ शिष्य की बात सुनकर बुद्ध बोले, ‘नहीं, इन शक्तिशाली चट्टानों पर भी किसी का शासन है।

लोहे के प्रहार से इन चट्टानों के भी टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं।’ इस पर शिष्य बोला, ‘तब तो लोहा सर्वशक्तिशाली हुआ?’ बुद्ध मुस्कराए और बोले,‘नहीं। अग्नि अपने ताप से लोहे का रूप परिवर्तित कर सकती है।’ उन्हें धैर्यपूर्वक सुन रहे शिष्य ने कहा, ‘मतलब अग्नि सबसे ज्यादा शक्तिवान है।’‘ नहीं।’ बुद्ध ने फिर उसी भाव से उत्तर दिया, ‘जल, अग्नि की उष्णता को शीतलता में बदलता देता है तथा अग्नि को शांत कर देता है।’ शिष्य कुछ सोचने लग गया। बुद्ध समझ गए कि उसकी जिज्ञासा अब भी पूरी तरह शांत नहीं हुई है। शिष्य ने फिर सवाल किया, ‘आखिर जल पर किसका शासन है?’ बुद्ध ने
उत्तर दिया, ‘वायु का। वायु का वेग जल की दिशा भी बदल देता है।’ शिष्यकुछ कहता उससे पहले ही बुद्ध ने कहा, ‘अब तुम कहोगे कि पवन सबसे शक्तिशाली हुआ। नहीं। वायु सबसे शक्तिशाली नहीं है।’सबसे शक्तिशाली है मनुष्य की संकल्पशक्ति क्योंकि इसी से पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि को नियंत्रित किया जा सकता है। अपनी संकल्पशक्ति से ही अपने भीतर व्याप्त कठोरता, ऊष्णता और शीतलता के आगमन को नियंत्रित किया जा सकता है, इसलिए संकल्पशक्ति ही सर्वशक्तिशाली है। जीवन में कुछ भी महत्वपूर्ण कार्य संकल्पशक्ति के बगैर असंभव है। इसलिए अपने भीतर संकल्पशक्ति का विकास
करो।’ सफलता एवं उन्नति का आधारः संकल्प शक्ति है।

तन्त्र पर फिलिप राॅसन की प्रसिद्ध पुस्तक-’’द आर्ट आॅफ तन्त्र’’

’’द आर्ट आॅफ तन्त्र’’ की विषयवस्तु तन्त्र के द्वारा जीवन-ऊर्जा के रूपान्तरण से संबंधित है । इसमें बताया गया है कि तन्त्र अध्यात्म से कैसे जुडा हुआ है ? तन्त्र के द्वारा जीवन ऊर्जा का रूपान्तरण हो सकता है, यह अच्छी तरह समझाया हुआ है । तन्त्र यौन-ऊर्जा को ब्रह्माण्डीय एवं रचनात्मक ऊर्जा मानता है । इसमें हिन्दु व बौद्ध तन्त्र को आधार बनाया हुआ है । शिवलिंग की पूजा क्यों की जाती है ? अघोरी मल या शव के टुकडे क्यों खातें है ? तान्त्रिक खोपडी में पानी क्यों पीते है ? खजुराहो के मंदिरोें में काम संबंधी मूर्तियां क्यों है ?उपरोक्त सभी प्रश्नों के सटीक जवाब इस पुस्तक में है ।
तन्त्र भोग को बुरा नहीं मानता है । यह सामान्य नैतिकता एवं शुचिता से उपर उठकर बताता है । योग और तन्त्र में अंतर यही है कि योग संयम के समय होश की बात करता है जबकि तन्त्र भोग में होश को अध्यात्मिक उन्नति का मार्ग मानता है । योग संकल्प का मार्ग है जबकि तन्त्र समर्पण पर आधारित है ।
विकसित होती वैज्ञानिक दृष्टि से तन्त्र की बारिकियों को समझने के लेखक ने नये दृष्टिकोण दिये है । मनोवैज्ञानिक शोधों ने तन्त्र को समझने मंे मदद की है । तन्त्र विज्ञान को गूढ, जादू टोना, मारक, वशीकरण एवं रहस्यात्मक माना जाता है । यह पुस्तक उस दृष्टि को बदलती है । तान्त्रिकों की दुष्टता के कारण कोई शास्त्र बुरा नही हो जाता है । आज के तान्त्रिकों के आचरण को देखकर तन्त्र विज्ञान को नकारन उचित नही है ।
आज के तान्त्रिकों के योग, भोग, कामुकता, गणित, जादु और तत्वज्ञान/अध्यात्म का तन्त्र एक मिश्रण है जो आधुनिक युग के तनावों का सामना करने में हमारी मदद करता है । यह अपनी खोज में, स्वंय को जानने का व्यावहारिक मार्ग दिखाता है ।
संभोग एक कामुक कृत्य नही है, परन्तु अनुभव को गहराने हेतु है, स्त्री पुरूष के बीच आकर्षण एक भूख नहीं, आंखों की प्यास नहीं, एक दूसरे को समझने का अवसर देते है । प्यार एक प्रतिक्रिया नहीं, परन्तु सजगतापूर्वक पोषित करने वाली उत्कृष्ट रचना है । यह पूर्णता को महसूस कराने वाला अवसर है । इसके द्वारा असीम, अनन्त को अनुभव किया जा सकता है । अहं-शून्यता व समय शून्यता का बोध इसमें होता है । इस द्वार से भी स्वंय को खोजा जा सकता है ।
इस कृति को समझने के लिए भैरव विज्ञान तन्त्र व इस पर ओशो के प्रवचन सहायक है । लेखक तन्त्र कला का विशेषज्ञ है । तन्त्र संबंधी सामग्री को लेखक ने पश्चिम के दृष्टिकोण से लिखा है । पुस्तक सारी आर्ट पेपर पर छपी हुई है । इसमें तन्त्र सम्बन्धी 169 महत्वपूर्ण चित्र है लेकिन वे कामुकता को जगाने वाले नही है । तान्त्रिक यन्त्र, मन्त्र व देवियों के महत्वपूर्ण चित्र भी बहुत से है । यह तन्त्र शास्त्र पर अंग्रेजी में लिखा गया श्रेष्ठतम ग्रन्थ है ।

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