आरोग्यधाम, प्रशान्ती कुटीर बैंगलोर में दिनांक 26.04.2013 से 03.05.2013 तक पत्नी सहित समग्र चिकित्सा हेतु रहा । यह स्वामी विवेकानन्द योग अनुसंधान संस्थान, (एस. व्यासा) डिम्ड विश्वविद्यालय का एक अंग है ।
यहां पर योग, आयुर्वेद व नेचुरोपेथी के स्वतन्त्र महाविद्यालय है । यहां योग पर रिसर्च सबसे अधिक हुई हैं एवं अनेक शोध पत्र चिकित्सा, मनोविज्ञान, के अन्तर्राष्ट्रिय जरनल्स छप चुके हैं । यहां पर योग चिकित्सा, आधुनिक विज्ञान, आयुर्वेद, नेचुरोपेथी व फिजियोथैरेपी के आधार से कई रोगों का सफलतापूर्वक ईलाज किया जाता है ।
पत्नी मीना के जोड़ों व सर्वाईकल दर्द में बहुत राहत मिली । वह विगत पांच वर्षों से दाई करवट सो नहीं पा रही थी, वह सोने लगी । वहां पर मीना के दर्द उठने पर तत्काल योगा करा कर पेन किलर देने की तरह दर्द दूर कर दिया ।योग, मसाज, लेप, स्टीम बाथ, सोना बाथ आदि से रीढ़ की हड्डी के सभी प्रकार के दर्द को दूर करने में विशेषज्ञता हासिल है ।
मेरा रक्तचाप 110/70 पर रहने लगा । नाड़ी शोधन व भ्रामरी का जबरदस्त प्रभाव देखा ।
गुरूजी डाॅ0 एच0आर0 नागेन्द्र भूतपूर्व अन्तरिक्ष वैज्ञानिक हैं जो अन्तरिक्ष की यात्रा को छोड़कर अन्तर्मन की यात्रा करा रहे हैं एवं विश्व प्रसिद्ध आधुनिक चिकित्सक डाॅ0 आर0 नागरत्ना दीदी का व्यवहार एवं सेवा अनुकरणीय है ।यह 100 एकड़ में निर्मित प्राकृतिक वातावरण से युक्त है । यहां का स्टाफ, थिरापिस्ट व डाॅक्टर सहयोगी हैं ।
Posts Tagged ‘शुभ कामनाएँ’
21 मई
आरोग्यधाम (एस-व्यास) बैंगलोर ,असाध्य रोगों की सर्वांगीण चिकित्सा हेतु श्रेष्ठ जगह
26 मार्च
अवचेतन की धुलाई होली पर:शुभकामनाएँ
होली तो बस एक बहाना है रंगों का, ये त्यौहार तो है आपस में दोस्ती और प्यार बढ़ने का, चल सारे गिले सिक्वे दूर कर के, एक दुसरे को खूब रंग लगते हैं मिलकर होली मानते हैं!
होली की आपको हार्दिक शुभकामनायें!
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सुखी होने अन्तर्यात्रा करें व अन्तर्मन की सुनंे
24 मार्च
चैतन्य द्वारा , विचारों द्वारा रोगों की चिकित्सा कैसे करें ?
प्रत्येक मरीज अपने अंदर खुद के डाॅक्टर को लेकर चलता है। वे हमारे (डाॅक्टरों के) सामने इस सच्चाई की जानकारी के बिना ही आ जाते हैं। हम अपना सर्वोतम तभी कर सकते हेैं जब हम मरीज के अंदर रहने वाले डाॅक्टर को ही काम करने का अवसर प्रदान करें।
-डा. अल्बर्ट श्वीट्जर
चेतना में विचार उत्पन्न हुआ और हमारा निर्माण हुआ। हम विचारों द्वारा बने हैं। अर्थात् चेतना ही जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है। जैसा कि उपनिषद् में लिखा है-प्रत्येक भावना शरीर में संवेदना उत्पन्न करती है। प्रत्यके भावना शरीर में अलग-अलग तरह से संवेदना उत्पन्न करती है। भावना मंे डूब जाने पर हम विचार का महसूस करने लगते हैं और संवेदन को नहीं देख पाते हैं। जैसे ही मन विचार में पड़ा और हम श्वास को देख नहीं पाते है।यही हमारी बेहोशी है। रोग का भाव एवं विचार मन मंे आने पर हम रोगी हो जाते हैं।
हम जैसे ही संवेदन को देखने में समर्थ हो जाते हैं, तो संवेदन बदलने लग जाते हंै, मिट जाते हैं। इस तरह हम सकारात्मक भावना द्वारा स्वयं को सकारात्मक बना सकते है। स्वयं के प्रति सजग होकर हम अपना नियन्त्रण अपने हाथ मंे लेते हैं। इस तरह हम अपने बदलते मन को देखने मंे समर्थ हो जाते है । अर्थात् हम स्वयं की श्रेष्ठ भावनाओं और विचारों द्वारा चिकित्सा भी कर सकते हंै। स्वसम्मोहन के द्वारा भी स्वयं की चिकित्सा की जा सकती है। अपने दिमाग की प्रोग्रामिंग बदलकर हम अपने को स्वस्थ बना सकते हंै। चिकित्सा के भाव एवं विचार पैदा कर हम अपनी चिकित्सा कर सकते हंै।
जैसे पौधे के बीज मंे पूरी संरचना छिपी रहती हैं वैसे ही हमारी कोशिका के डी. एन. ए. में हमारे व्यक्तित्व/चेतना का पूरा प्रोग्राम अंकित होता है। बीज को प्रभावित कर जैसे पौधे में परिवर्तन लाते है, वैसे ही डी. एन. ए. को बदल कर पूरे जीवन में परिवर्तन लाया जा सकता है।
हमारे व दुनिया के बीच सम्बन्ध हमारी चेतना/मन से ही, या उसके कारण से ही होता है।
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7 मार्च
अब्राहम लिंकन का पत्र : अपने पुत्र के शिक्षक के नाम
हे शिक्षक!
मैं जानता हूं और मानता हूं
कि न तो हर व्यक्ति सही होता है
और न ही होता हैं सच्चा
किंतु तुम्हें सिखाना होगा कि
कौन बुरा है और कौन अच्छा।
दुष्ट व्यक्तियों के साथ-साथ आदर्श प्रणेता भी होते हैं,
स्वार्थी राजनीतिज्ञों के साथ-साथ समर्पित नेता भी होते हैं
दुश्मनों के साथ-साथ मित्र भी होते हैं,
हर विरूपता के साथ सुन्दर चित्र भी होते हैं।
समय भले ही लग जाए, पर
यदि सिखा सको तो उसे सिखाना
कि पाए हुए पांच से अध्कि मूल्यवान है -
स्वयं एक कमाना।
पाई हुई हार को कैसे झेले, उसे यह भी सिखाना
और साथ ही सिखाना, जीत की खुशियां मनाना।
यदि हो सके तो उसे ईष्र्या या द्वेष से परे हटाना
और जीवन में छिपी मौन मुस्कान का पाठ पठाना।
जितनी जल्दी हो सके उसे जानने देना
कि दूसरों को आतंकित करने वाला स्वयं कमजोर होता है,
वह भयभीत व चिंतित है
क्योंकि उसके मन में स्वयं चोर होता है।
उसे दिखा सको तो दिखाना -
किताबों में छिपा खजाना।
और उसे वक्त देना चिंता करने के लिए
कि आकाश के परे उड़ते पंछियों का आह्लाद,
सूर्य के प्रकाश में मध्ुमक्खियों का निनाद,
हरी-भरी पहाडि़यों से झांकते पफूलों का संवाद,
कितना विलक्षण होता है – अविस्मरणीय, अगाध्
उसे यह भी सिखाना -
धेखे से सफलता पाने से असपफल होना सम्माननीय है।
और अपने विचारों पर भरोसा रखना अध्कि विश्वसनीय है।
चाहें अन्य सभी उनको गलत ठहरायें
परंतु स्वयं पर अपनी आस्था बनी रहे यह विचारणीय है।
उसे यह भी सिखाना कि वह सदय के साथ सदय हो,
किंतु कठोर के साथ हो कठोर।
और लकीर का फकीर बनकर,
उस भीड़ के पीछे न भागे जो करती हो – निरर्थक शोर।
उसे सिखाना
कि वह सबकी सुनते हुए अपने मन की भी सुन सके,
हर तथ्य को सत्य की कसौटी पर कसकर गुन सके।
यदि सिखा सको तो सिखाना कि वह दुःख में भी मुस्कुरा सके,
घनी वेदना से आहत हो, पर खुशी के गीत गा सके।
उसे यह भी सिखाना कि आंसू बहते हों तो उन्हें बहने दे,
इसमें कोई शर्म नहीं ़ ़ ़ कोई कुछ भी कहता हो ़ ़ ़ कहने दे।
उसे सिखाना -
वह सनकियों को कनखियों से हंसकर टाल सके
पर अत्यन्त मृदुभाषी से बचने का ख्याल रखे।
वह अपने बाहुबल व बु(िबल का अध्कितम मोल पहचान पाए
परंतु अपने हृदय व आत्मा की बोली न लगवाए।
वह भीड़ के शोर में भी अपने कान बन्द कर सके
और स्वतः की अंतरात्मा की सही आवाज सुन सकेऋ
सच के लिए लड़ सके और सच के लिए अड़ सके।
उसे सहानभूति से समझाना
पर प्यार के अतिरेक से मत बहलाना।
क्योंकि तप-तप कर ही लोहा खरा बनता है,
ताप पाकर ही सोना निखरता है।
उसे साहस देना ताकि वक्त पड़ने पर अध्ीर बने
सहनशील बनाना ताकि वह वीर बने।
उसे सिखाना कि वह स्वयं पर असीम विश्वास करे,
ताकि समस्त मानव जाति पर भरोसा व आस ध्रे।
यह एक बड़ा-सा लम्बा-चैड़ा अनुरोध् है
पर तुम कर सकते हो, क्या इसका तुम्हें बोध् है?
मेरे और तुम्हारे ़ ़ ़ दोनों के साथ उसका रिश्ता हैऋ
सच मानो, मेरा बेटा एक प्यारा-सा नन्हा सा पफरिश्ता है!
1 मार्च
हमें खुश रहने हेतू क्या चाहिए ?
हम सब खुशी चाहते हैं । जीवन में हमे यश नहीं, धन नहीं खुशी चाहिए । समाज में नाम नहीं जीवन में खुशी चाहिए। धन व प्रतिष्ठा से खुशी नहीं मिलती है। शांत होने पर ही सच्ची खुशी मिलती है । आज हमारी प्राथमिकताएं स्पष्ट नही है । हम यह भी नहीं जानते कि हमें क्या चाहिए । हमें खुशी कहां मिलती है इसका हमें ज्ञान नही है । दूसरों का पद एवं पैसा उन्हे सुख देता नजर आता है , जो कि वास्तव में सुख का कारण नहीं है । पद एवं पैसे की दौड़ में हमारी उम्र बिती जा रही है ।
हम अन्दर से अव्यवस्थित व टूटे हुए हैं। हमारे भीतर आन्तरिक दरार बड़ी है । हमारे मूल्य निश्चित नहीं है । हम बाहर कुछ व भीतर कुछ हैं ।
हमे अन्दर से व्यवस्थित, संतुलित व एकरूप होना है । कथनी व करनी के भेद को मिटाना है । वास्तविक उन्नति अन्दर से संतुलित व संगठित होना है।
अन्दर से स्थिर होना, मन में साम्यता-समता पैदा करना विकास है । हम अच्छे सूट व टाई से नहीं बड़े होते हैं ।
हमे अपने आन्तरिक उपद्रवों को मिटाना है । अब महत्वपूर्ण यह है कि स्वयं हमारे विचार कैसे चलते हैं ? भावनाएं कैसे आन्दोलित करती है । स्वयं से नाराजगी कितनी कम करते हैं ।
पदौन्नति नहीं आन्तरिक खुशी चाहिए । पदौन्नति बाहर के परिकर बढ़ाती है जो अशान्ती के कारण है । अतः पदोन्नति से ज्यादा शान्ति चाहिए । हमारा जीवन अन्दर से खोखला व बाहर से बड़ा व्यर्थ है ।
5 जन
अस्तित्व आपके लक्ष्यों को पुरा करने का षड्यन्त्र करे !नव वर्ष की शुभकामनाएँ !
दोस्तो,मेरे प्रणाम स्वीकारे एवं आप सबको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ !
मेरे भीतर बैठी विराट सत्ता आपके भीतर विराजमान परम सत्ता को सर झुकाती है। आपके निकटस्थ मित्र शरीर को प्रणाम जिसके होने से आपका जीवन हैं। दुनिया के सबसे बडे सुपर कम्प्यूटर आपके मस्तिष्क को प्रणाम। उस दिल को नमन जो आपके जन्म से आज तक साथ दे रहा है। उन फेफड़ों को प्रणाम जो आज तक आपको श्वास लेने में मदद दे रहे है। अस्थि तन्त्र को प्रणाम जो आपके शरीर को आकार दिये हुए हैं। उस पाचन शक्ति को नमन जो पहले दिन से आपके भोजन को ऊर्जा में बदलते है।उस स्नायू तन्त्र को प्रणाम जो दुनिया में व्याप्त समस्त टेलिफोन जाल से सात गूना बड़ा है।अन्तः स्त्रावी ग्रन्थियों व प्रजनन तन्त्र को प्रणाम जो शरीर व दुनिया को सन्तुलित रखने में जिनका योगदान है।
परम सत्ता से प्रार्थना है कि नव वर्ष में आपकी सभी कामनाएँ पूरी करें।आप सबसे महत्वपूर्ण है।आप अनुपम व अद्वितीय हैं चुँकि आप ही जगत हैं।
31 दिस
सफलता हेतु बदले समय के साथः नव वर्ष मंे संकल्प लें
नया वर्ष आ रहा है । जैसा कि संकल्प लेने का प्रचलन है । अपना पुनरावलोकन करने का समय है । गत वर्ष की उपलब्धियों व अनुपलब्धियों पर मनन की आवश्यकता है ।
स्वयं को जानने-समझने का अवसर है । अपनी आदतें, सपनों व प्रयत्नों को परीक्षण करने का समय है । आदतों को सफलता में सहायक अच्छी आदतों व हानिकारक बुरी आदतों को पहचानना है । हम आदतों मंे ही जीते हैं । आदतें बदलकर ही स्वयं को बदल सकते हैं । एच.डी. थोरो ने लिखा है कि वस्तुए नही बदलती, हम ही बदलते हैं । अतः स्वयं को बदलने की जरूरत है ।
एक विचार को बोइए, एक कर्म को जन्म दीजिए,
एक कर्म को बोइए, एक आदत को जन्म दीजिए,
एक आदत को बोइए, एक चरित्र को जन्म दीजिए,
एक चरित्र को बोइए, एक सफलता को जन्म दीजिए ।
हमे जीवन में स्थायित्व पंसद है । बदलने में सदैव भय रहता है, इसलिए कोई भी बदलना नही चाहता है । परिवर्तन में असुरक्षा है, नयापन है । आदतें व्यक्ति ने अपनी स्थिति, सोच व लक्ष्य के आधार पर बनती है । जीने के बीच रास्ता निकली हुई होती है । आदतों में स्थायित्व होता है व व्यक्ति उनसे एकाकार हो जाता है । उसमे वह रमा हुआ होता है । आदतें उसके जिने की शैली हो जाती है । उसका अपनत्व हो जाता है । उनको वह न्यायोचित ठहराने लगता है । आदतें उसके जीवन मूल्य में समा जाती है । वह उन्हे मूल्य देने लगता है ।
समय बीत रहा है । समय रूपी नदी में इसके साथ हम सब बह रहे हैं । इसके साथ अपने में परिवर्तन करते रहना है, तभी अपटूडेट रहेंगे । नही तो पिछड़ जाऐंगे । जो समय के साथ नहीं बदलता है वह पिछे रह जाता है ।
आप सबको नव वर्ष की शुभकामनाएं !
18 दिस
अध्ययन हेतु दूर जाती बिटिया को पत्र
प्रिय बेटी ,
तुम पहली बार पढ़ने के लिए घर से बाहर दूर जा रही हो । हमारी शुभकामनाएं सदैव तुम्हारे साथ है । एक माली जैसे पौधे को नर्सरी में बड़ा करता है, लेकिन एक दिन उसे कोई अपने बगीचे में बड़ा करने ले जाता है। वैसे ही तुम्हे आगे बढ़ने घर से दूर जा रही हो । एक जहाज को समुद्र की यात्रा पर जाना ही पड़ता है । वहां आंधी, तुफान, बर्फ, डाकुओं आदि अनेक आघातों से उसका सामना होता है ।
लेकिन इन विपरित स्थितियों में ही जहाज की क्षमता का परीक्षण होता है । टाईटैनिक की तरह तुम पहली यात्रा मंे डूबने वाली नहीं हो । घर में रह कर कुशलता व क्षमता हासिल नहीं की जा सकती है। एक न एक दिन सबको घर से दूर जाना पड़ता है । अपनी क्षमता जगाने विपरित परिस्थितियों से जुझना पड़ता है ।
ओर, तुम तो विश्वप्रसिद्ध प्ण्प्ण्ज्ण् संस्थान के बरगद के नीचे जा रही हो । वहां जीवन व प्रतिभा के अनेक आयाम दिखेंगे । तरह-तरह की दक्षता व कुशलता के व्यक्ति मिलेंगे । साथ ही नकारात्मक श्रेणी के कुछ लोग भी कहीं मिल सकते हैं । उनको कैसे सुलटना ? उक्त कला आप स्वतः सीखेंगी ।
परदेश में अपने पराये को पहचानने के अनेक अवसर मिलेंगे । सबको सजगता से देखते हुए अपने पक्ष में उन्हे कैसे करना ? यह कला आप जानती है । व्यक्ति को उसकी आवाज, देहभाषा एवं भाषा से समझ कर तद्नुकूल व्यवहार करना तुम्हे आता है। संवाद से कैसे रिश्ते मधुर बनाये जा सकते हैं । अपरिचित एवं अयोग्य को भी अपने पक्ष मेे प्रयोग करना सिखो । एक सुनहरा अवसर मिला है जहां तुम अपनी धार पैनी (तेज) कर सकती हो ।
शारीरिक रूप से दूर होने से तुम घर से दूर न हो । प्रेम व समय से भौगोलिक दूरियां बड़ी नहीं होती है । तुम सदैव हमारे पास व साथ हो ।
कोई कृत्य अपनी अन्तरात्मा को कोसे, ऐसाकोई कार्य न करें । अपना सामना स्वयं कर सके । उन लोगों से, त्ववताप प्ण्प्ण्ज्ण् से सर्वज्ञा कितना सीखती है, महत्वपूर्ण यह है । 4 वर्ष की ठण्ज्मबीण् वाले से ज्यादा एक माह मेें कैसे सीखें ? यह प्रश्न जीतनी बार आप अपने से पूछेगी, उतनी ही तुम्हारी सीखने की क्षमता बढ़ेगी ।
तुम प्रतिभावान, क्षमतावान, साहसी हो, योग्य हो, ओर उसमे कई गुणा वृद्धि कर शीघ्र लौटो । स्व-प्रबन्धन में कुशलता अति आवश्यक है ।
मेरी बातों को उपदेश न समझे । यह मेरी समझ व क्षमता है जिसको तेरे से शेयर कर रहा हूॅ ।
स्वागतातुर,
पापा-मम्मी
12 दिस
विदेश जाती बेटी को क्या संदेश दें ?
तुम अब पूर्व से पश्चिम में की तरफ जा रही हो । अपनीमातृभूमि से दूर जा रही हो ।विवाह करने के 15 दिन बाद ही दूसरी संस्कृति में रहने जा रही हो । इसलिए कुछ चर्चा इस सन्दर्भ में करना मंै उचित समझता हूं ।
यह मात्र एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की यात्रा नहीं है । यह एक संस्कृति व सभ्यता से दूसरी दिशा में जाना है । हमारी आध्यात्मिक संस्कृति से पश्चिमी भौतिकवादी संस्कृति में जाना है । वहां का जीवन यहां से पूरी तरह भिन्न है ।
भौतिकवादी संस्कृतिव्यक्ति प्रधान, धन प्रधानव बाह्य जीवन प्रधान हैैै। वहां सबसे बड़ा मूल्य धन को दिया जाता है । दूसरे सारे मूल्य वहां पर बाद में आतें है । पश्चिम की संस्कृति व्यक्ति या निजता को बहुत महत्व देती है । वहां उन्नति व विकास व्यक्तिगत होता है । प्रदर्शन को पश्चिम में महत्व दिया जाता है । आत्मविश्वास को मुख्य माना है ।
हमारी संस्कृति मानवीय मूल्यों पर आधारित है । यहां व्यक्तिगत सुख, स्वार्थ या धन को प्रमुखता कम दी गई है । यहां दूसरों की सेवा को परमार्थ माना जाता है । अध्यात्म में मानवता, परोपकार एवं त्याग को प्रधानता दी गई है । आन्तरिक विकास एवं सद्गुणों को यहां अधिक महत्व दिया है । यहां आत्मा को प्रधानता दी जाती है । यहां स्थायी एवं नित्य को महत्व दिया जाता है ।
घर से 15 हजार किलोमीटर दूर मां की जगह सद्व्यवहार आपकी रक्षा करेगा, ज्ञान आपका पिता बनकर सलाह देगा, वहां विवेक ही आपका भ्राता होगा । सद्गुण आपके रिश्तेदार होंगे । इन सबकी भूमिकाएं आपको निभानी है । अपनी जिम्मेदारी स्वयं लेनी है । अपना जहाज स्वयं को चलाना है । वहां तुम ही अपनी सारथी होगी । तुफानों में फंसे जहाज को बाहर लाने की जिम्मेदारी स्वयं की है । कोई दूसरा सार्थक मददगार न मिलेगा ।वहां पर तुम ही अपनी रक्षक, संरक्षक व मालकिन हो ।
बराबरी के नाम पर तुम्हे पुरूष नहीं बनना है । पुरूष व स्त्री समान नहीं भिन्न-भिन्न है । इस जैविक सत्य से इन्कार करना कठिन है । नारी का अर्थ सौन्दर्य, कोमलता, अपनत्व व प्रेम है । इससे घर में प्रेम रस पैदा होता है । परिवार जुड़ा रहता है । पश्चिम में इन मूल्यों को चुनौति मिलेगी । इसलिए संभलकर रहना । अपना स्त्रित्व न भूले ।
विवाह बंधन भी एक तरह का योगाभ्यास है ।अपनी बुरी आदतों रूपी बिगडैल घोड़ों पर नियन्त्रण स्वयं को करना है । जीवन की प्रोग्रामिंग में भी कम्प्यूटर-प्रोग्रामिंग की तरह सतत् सुधार करने पड़ते हैं, करते रहे, आगे बढ़ते रहें…………….
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सुखी होने अन्तर्यात्रा करें व अन्तर्मन की सुने
4 दिस
हे माँ! तुझे सलाम, मेरी माँ को प्रणाम
मेरी माँ तुमने मेरे लिए बहुत कुछ किया, जिसे मै आज तक समझ न पाया। पुरुष वैसे भी स्त्री को समझने में असमर्थ हैं। मैं तुम्हारी सातवीं संतान था, तुम्हें मेरे जन्म पर भी बहुत पीड़ा हुई, उस पर भी मेरे जन्म के तीन दिन बाद तुम अवसाद का शिकार हो गई। एक माह तक डंूगरपुर अस्पताल में भर्ती रही, बहुत दुःख सहा। तब मै अपनी नानी के पास रहा। तुम्हारी हालत इतनी खराब थी कि अपने बच्चे को संभाल न सकती थी। 
मेरी मां सेलिब्रिटी नहीं थी, इसका मतलब यह नहीं कि वह एक महान मां नही थी । ग्लैमरस व प्रसिद्ध होने से ही कोई स्त्री महान मां नहीं हो जाती। अपनी तरह से सामान्य रहते हुए वह मेरे लिए असामान्य थी । वास्तव में सामान्यता बड़ी दुलर्भ हैं। मेरी मां में एक बलिदानी मां के सारे गुण थे । अपने बेटे के लिए दिन भर सचेत रहना, उसके हितों का संवर्धन करना व उसकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखना मुख्य था। वह मेरे हितों के लिए अपने पति से कमजोर होते हुए भी लड़ती थी । उसे अपने बच्चे कि लिए पति से पीटना तक मंजूर था ।
दुनिया में तुम्हारा नाम न था, इसका मतलब यह नहीं कि तुम किसी प्रसिद्ध माँ की तुलना में कम थी। तुम्हारा प्यार अपने बच्चों के प्रति किसी से कम न था। वास्तव मे तुम महान माँ थी। मेरे पिता कठोर अनुशासन प्रिय थे। वे बच्चों को अक्सर डाँटते रहते थे। मैं अपने पिता को गाली देने की मशीन समझता था। पिताजी जब भी मुझे क्रोध में डाँटते या पिटने को आतुर होते तब तुम ढाल बनकर आती थी । इस बीच पिता के हाथों कई बार स्वयं पीट जाती थी । तुम्हारी यह सुरक्षा कवच सदैव मुझे याद आता है ।
पिताजी रात्रि में भोजन खिलाने का विरोध करते थे । जैन धर्म के अनुसार रात्रि का भोजन निषेध है । तुम पिताजी की अनुपस्थिति में पीछे से हमे चुपचाप खाना खिलाती थी ।
आई, मां को हम इसी नाम से पुकारते थे । तुम्हारे बलिदानों से यह जीवन संवरता है । मेरे शरीर का कतरा कतरा तुम्हारे ऋण से ग्रस्त है । यह शरीर तुम्हारा अंश है । इसे आज अनुभव करता हूं।
मै आपके जीते जी आपका महत्व समझ न पाया । मेरी 37 वर्ष की उम्र मेें आप धरती से अचानक विदा हो गई । तब मुझे लगा कि मेेरे उपर आपका जो रक्षा कवच था, वह अब हट गया। मै शर्मिन्दा हुॅं कि आप के जीते जी कभी आपको समझ न पाया । पत्नी बार-बार कहती थी कि तुमने अपनी मां की परवाह न की । महत्वकांक्षा के घोड़ों पर सवार होने से मैं आपको समय न दे पाया । आज मातृदिवस को इसका बोध हो रहा है ।
मेरी मां एक औसत निम्न मध्यवर्गीय मां की तरह सामान्य औरत थी जिसने 12 बच्चों को जन्म दिया । वह सदैव गरीबी व उपेक्षा की शिकार रही । उसकी अपनी समस्याएं थी । वह अपनी सोच से हम बच्चों का सदैव बढिया ही सोचती थी । लेकिन मै उसे कभी समझ न पाया । मै बचपन से उद्ण्ड व क्रोधी लड़का था । विवशता के कारण बचपन में रोना बहुत रोता रहता था ।
वह मेरी सुरक्षा को लेकर सदैव चिन्तित रहती थी । मां का ध्यान सदैव बेटे की हरकतों पर रहता है कि अभी वह कहां है, सुरक्षित है या नहीं ?
बच्चा मां को नहीं समझ पाता है । लेकिन मैं तो बड़ा होकर भी 50 के बाद उसके योगदान को अनुभव करता हुं । मेरी मां ने मेरे लिए वो सब किया जो एक मां कर सकती है ।


