Posts Tagged ‘शिक्षान्तर’
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मई
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अवचेतन मन, अवचेतन मस्तिष्क, आत्मछवि, प्रबल इच्छा, बदलना, लेखक, शिक्षान्तर, सेहत. Leave a Comment
देह अपना उपचार स्वतः करती है
अपने हाथ की तरफ देखें यह ठोस दिखता है, दरअसल यह ठोस नहीं है। अगर आप इसे किसी अच्छे माइक्रोस्कोप के नीचे रखेंगे, तो आपको ऊर्जा की बहुत सी तरंगें दिखेंगी। हमारी देह ठोस नहीं है, यह मस्तिष्क की तरंगों के अधीन है।
सभी बीमारियाँ पहले मस्तिष्क में जन्म लेती हैं। जब तक मानसिक पेटर्न उस अनुरूप न बन जाय, तब तक वह शरीर पर प्रकट नहीं होती है। अचेतन रूप से रोग उत्पन्न करने के स्थान पर हम सचेतन रूप से स्वास्थ्य कैसे उत्पन्न करें? अपने शरीर का प्रिन्टआउट बदलने के लिये हमें अपने मस्तिष्क के साफ्टवेअर को नये सिरे से लिखना सीखना पड़ेगा। हम ही अपने रोगों को चुनते हंै, उन्हे नियन्त्रित करते हैं एवं उन्हें बढ़ने की सुविधाएॅ देते है। हम रोगों का चेतन मन द्वारा चयन नहीं करते हंै, यह चयन मन के अचेतन स्तर पर छुपे हुऐ तलो पर चुपचाप होता है। यदि कोई ऐसी क्षमता हमारे पास है तो उसे नियन्त्रित करने की क्षमता भी होनी चाहिये। यह पुस्तिका इस बारे में बताती है।
असाध्य मानसिक या शारीरिक रोग की जड़ें सदा ही गहरे अवचेतन मन में होती है। छिपी हुई जड़ांे को उखाडकर रोग को ठीक किया जा सकता है। मनुष्य की देह (सिक्रेशन) सबसे अधिक दवाएँ बनाने का कारखाना है । हमारी देह के उपचार में काम आने वाली सभी दवाओं के केमिकल्स हमारी देह में बनाए जाते है। इन सब दवाओं का निर्माण हमारी सोच एवं भावनाओं पर निर्भर है। नकारात्मक सोच व नकारात्मक भावनाओं से हमारे सिक्रेशन प्रभावित होते हंै। दुनिया के सबसे धीमे मारने वाले भंयकर जहर भी इसी देह में बनते है।
सतुंलित,सहज व नैसर्गिक देह स्वतः अपना उपचार करती है। देह में एक नैसर्गिक क्षमता है। अपना उपचार करती है। यह स्वतः अपने को संतुलित करती है। जब देह का ताप बढ़ जाता है तो देह स्वतः ही उन रसायनों का निर्माण करती है जो ताप घटाने में सहायक होते हैं। यह कार्य स्वतः चलता रहता है जब तक कि इस नैर्सगिक प्रकिया को बिगाड़ न दिया जाए । बिगड़ने पर देह ताप समान नहीं रख पाती है तभी हमें ताप बढ़ने का ज्ञान होता है।
हमारी स्थूल देह के पीछे क्वान्तम भौतिकीय देह है जो कि सूक्ष्म है, अदृश्य है। स्थूल देह का जन्म इसी सूक्ष्म देह की बदौलत है। उसमें परिवर्तन इसी के आधार पर होते हंै।
वातावरण वास्तव में हमारी देह का विस्तार है।जैसे दो तारो व ग्रहो के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध न होने के उपरान्त वं आपस में भी सम्बंन्धित है। वैसे ही हमारी देह के अणुओं के बीच सम्बन्ध न होने के बावजूद आपस में सम्बन्धित है।
हमारी देह का रूपाकार किसी शिल्प कृति से कम नहीं है।भीतर बैठी प्रज्ञा का यह आवरण मूर्ति के रूप में दिखता है। इसके निश्चित आकार-प्रकार हंै। इसके साथ ही हमारी देह के परमाणु बहती हुई नदी की तरह है। हमारी देह में कुछ भी स्थाई नहीं है। हमारी कोशिकाओं के प्रत्येक कण बदलते जाते हैं। हमारी रक्त कणिकाएँ नब्बे दिन में बदल जाती हैं। हड्डियों का ठोस ढांचा जिसके चारों ओर शरीर लिपटा रहता है, वह स्वयं भी एक सौ बीस दिन में पूरी तरह बदल जाता है।
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मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Meditation, Self-Healing, Spirituality, Uncategorized. Tagged: अवचेतन मन, खुद- इलाज, टिप्पणी, नकारात्मता, प्रबल इच्छा, प्रसन्नता, प्रार्थना, मन, शिक्षान्तर, शुभ कामनाएँ, सकारात्मकता, सेहत. 4s टिप्पणियाँ
प्रत्येक मरीज अपने अंदर खुद के डाॅक्टर को लेकर चलता है। वे हमारे (डाॅक्टरों के) सामने इस सच्चाई की जानकारी के बिना ही आ जाते हैं। हम अपना सर्वोतम तभी कर सकते हेैं जब हम मरीज के अंदर रहने वाले डाॅक्टर को ही काम करने का अवसर प्रदान करें।
-डा. अल्बर्ट श्वीट्जर
चेतना में विचार उत्पन्न हुआ और हमारा निर्माण हुआ। हम विचारों द्वारा बने हैं। अर्थात् चेतना ही जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है। जैसा कि उपनिषद् में लिखा है-प्रत्येक भावना शरीर में संवेदना उत्पन्न करती है। प्रत्यके भावना शरीर में अलग-अलग तरह से संवेदना उत्पन्न करती है। भावना मंे डूब जाने पर हम विचार का महसूस करने लगते हैं और संवेदन को नहीं देख पाते हैं। जैसे ही मन विचार में पड़ा और हम श्वास को देख नहीं पाते है।यही हमारी बेहोशी है। रोग का भाव एवं विचार मन मंे आने पर हम रोगी हो जाते हैं।
हम जैसे ही संवेदन को देखने में समर्थ हो जाते हैं, तो संवेदन बदलने लग जाते हंै, मिट जाते हैं। इस तरह हम सकारात्मक भावना द्वारा स्वयं को सकारात्मक बना सकते है। स्वयं के प्रति सजग होकर हम अपना नियन्त्रण अपने हाथ मंे लेते हैं। इस तरह हम अपने बदलते मन को देखने मंे समर्थ हो जाते है । अर्थात् हम स्वयं की श्रेष्ठ भावनाओं और विचारों द्वारा चिकित्सा भी कर सकते हंै। स्वसम्मोहन के द्वारा भी स्वयं की चिकित्सा की जा सकती है। अपने दिमाग की प्रोग्रामिंग बदलकर हम अपने को स्वस्थ बना सकते हंै। चिकित्सा के भाव एवं विचार पैदा कर हम अपनी चिकित्सा कर सकते हंै।
जैसे पौधे के बीज मंे पूरी संरचना छिपी रहती हैं वैसे ही हमारी कोशिका के डी. एन. ए. में हमारे व्यक्तित्व/चेतना का पूरा प्रोग्राम अंकित होता है। बीज को प्रभावित कर जैसे पौधे में परिवर्तन लाते है, वैसे ही डी. एन. ए. को बदल कर पूरे जीवन में परिवर्तन लाया जा सकता है।
हमारे व दुनिया के बीच सम्बन्ध हमारी चेतना/मन से ही, या उसके कारण से ही होता है।
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मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Stress Management, success. Tagged: अलसी, ऊर्जा, कैंसर, तनावमुक्ति, प्रसन्नता, मन, लुईस हे, शिक्षान्तर. 1 टिप्पणी
हमारे आज के भोजन में माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट की मात्रा उपलब्ध नहीं है जो कि हमारे 20-30 वर्ष के पूर्व के भोजन मे सहज उपलब्ध थी । आज का हमारा भोजन प्राकृतिक नहीं है । पहले सब्जियों से माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट मिलते थे । आज हमारी सब्जियां जैविक नहीं रही । तभी जैविक सब्जियांे का बाजार विकसित हो रहा है ।
सब्जियों को उगाते-2 हमारी खेतों की टोप सोइल अब बंजर हो गई । फिर इसको उगाने में रसायनिक खाद डालते हैं जिसमे माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट नहीं होते हैं । फिर इनका उत्पादन बढ़ाने का हम भिन्न-2 तरह के रसायन इन पर डालते हैं । किड़ों से बचाने पेस्टीसाइड्स डालते हैं । इस कारण हमें पहले अपने आहार में सब्जियों के सेवन से आवश्यक माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट में मिल जाते थे जो आज प्राप्त नहीं हो रहे हैं ।
पहले हम प्राकृतिक खनिज नमक खाते थे जिसमे सोडियम क्लोराइड के अलावा अन्य 94 खनिज तत्व मिलते थे । जो अब परिष्कृत नमक खाते हैं जिसमे सिर्फ सोडियम क्लोराइड व आयोडिन होते हैं । अन्य अच्छे खनिज भी फिल्टर के दौरान हटा दिये जाते हैं ।
भले ही सूक्ष्म मात्रा में लेकिन हमे आयोडिन, मेग्निश्यम, केल्शियम, सिलिका पूर्व के आहार में जो मिलते थे वो अब नहीे मिल रहे है । इसलिए हमे तथाकथित पौषक आहार के होते हुए भी पूरक आहार/सप्लीमेन्टरी डाइट की जरूरत है ।
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मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Book Review, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अलसी, कैंसर, मन, लेखक, शिक्षान्तर, शिखर पर मिलेगे, सेहत. 2s टिप्पणियाँ
डाॅ0 रे डी स्ट्रेंड ने एक पोषक तत्वों के बारे में उपयोगी किताब’’व्हाट योर डाॅक्टर डजन्ट नो अबाउट न्यूट्रिश्नल मेडिसिन मे बी किलींग यू’’ लिखी है जिसका हिन्दी अनुवाद ’’क्या आपका डाॅक्टर पोषक तत्वों के बारे में जानता है ?’’ े मंजुल पब्लिसींग हाउस भोपाल से छपी है । 
यह एक सत्य है कि दुनिया भर में डाॅक्टरों को दवाओं के जरिये बीमारियों का इलाज करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है । लेकिन उन्हे हमारे जीवन को स्वस्थ रखने के लिए महत्वपूर्ण और शक्तिशाली तरीकों के बारे में कोई ज्ञान नहीं दिया जाता है ।
यह पुस्तक आपको सिखाएगी कि क्यों सरकार द्वारा पोषक तत्वों की अनुशंसित मात्रा हमारे शरीर के प्राकृतिक रक्षातंत्र को बीमारियों के प्रति शक्तिशाली नहीं बना पाती है – और आपको पोषक तत्वों की कितनी मात्रा की आवश्यकता होती है ।
शरीर के अन्दर आॅक्सीजन का विघटन किस प्रकार विनाश उत्पन्न करता है और आप इससे हुई क्षति से कैसे निपट सकते हैं ।आप लगातार होने वाली एलर्जी और सायनस के संक्रमण से किस प्रकार लड़ सकते हैं ।
आपके डाॅक्टर द्वारा गंभीर क्षयकारी बीमारियों से बचाव के लिए दी गई दवाइयाॅं क्यों बेहतर नहीं होती है ।
बड़े दुख की बात है कि जब तक आपको किसी बीमारी का पता चलता है तब तक आप एक स्वस्थ और उत्साहपूर्ण जीवन खो देते हैं ।
रे स्ट्रैंण्ड की क्रांतिकारी पुस्तक
- आपको वर्तमान और भविष्य में अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के सरल उपायों के बारे में बताती है ।
- यह बीमारियों के कारण हुए नुकसान से भी छुटकारा दिलाती है ।
- अपने शरीर की प्राकृतिक उपचार शक्ति में बढ़ोतरी करें ।दिल की बीमारियों से बचाव के लिए कोलेस्टेराॅल का स्तर महत्वपूर्ण कुंजी क्यों नहीं है
- कैंसर, डायबिटीज, आर्थराइटिस, अल्जाइमर्स, फाइब्रोमाएल्जिया और अन्य बीमारियों की जड़ के बारे में चिकित्सा प्रमाण वास्तव में क्या बताते हैं
- बुढ़ापे को रोकने की सही रणनीति पर अमल करना अभी शुरू करें और खुद को आॅक्सीजन के हानिकारक प्रभावों से बचाएॅ
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फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Meditation, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, Uncategorized. Tagged: अवचेतन मस्तिष्क, आत्मछवि, एकाग्रता, कृतज्ञता, कैंसर, टिप्पणी, धन्यवाद, निर्णय, प्रसन्नता, शिक्षान्तर. 2s टिप्पणियाँ
हमारा शरीर एक अद्भुत संयंत्र है जो महच्चेतना की एक अनुपम सृष्टि है। मनुष्य द्वारा निर्मित कोई भी सयंत्र, यहाँ तक कि अत्याधुनिक सुपर कम्प्यूटर भी, इसकी तुलना में अत्यंत तुच्छ है। भौतिक संयंत्र को बाहरी ऊर्जा से संचालित किया जाता है, स्विच आॅफ कर दें तो संयंत्र निष्क्रिय हो जाता है। हमारा शरीर जीवन-पर्यन्त आत्म- चेतना की अन्तर-ऊर्जा से प्रतिक्षण संचालित होता रहता है, निरंतर सक्रिय रहता है। विशालता एवं यांत्रिकता की दृष्टि से यह एक अद्भुत संरचना है।
इसके भीतर प्रतिघन मिलीमीटर रक्त में पचास लाख रक्त कण (रेड काॅप्सर््यूल) और पचास हजार लाख श्वेत रक्त कण दौड़ते है, मस्तिष्क में सतह सक्रिय सात करोड़ कोशिकाएँ (सेल्स) हैं और साढ़े पाँच फीट के आकारवाले शरीर में दस अरब सनायु – तंत्र हैं। वस्तुतः यह एक ऐसा सूक्ष्म ब्रह्याण्ड (माइक्रो यूनिवर्स) है जो आत्म-चेतना की ऊर्जा से सतत् संचालित रहता है और प्रत्येक सात वर्ष पर अपने पुराने पुर्जो का स्वतः नवीनीकरण कर लेता है। ये हैं इस स्थूल भौतिक शरीर की कुछ अद्भुत विलक्षणताएँ। किन्तु इनमे भी अधिक विस्मयकारी है इसके भीतर छिपी हुई अन्य विशेषताएँ जैसे पंच-इन्द्रियाँ, पंच-तन्मात्राएँ, पंच-प्राण, मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार, राग-विराग की कल्पना ओैर आत्म-चेतना का अखण्ड प्रवाह जो कभी पाणिनि-पतंजलि, कभी वाल्मीकि-कालिदास, कभी तुलसी-टैगोर और कभी विवेकानन्द-गाँधी के रुप में उद्वेलित हो उठता है। यह है हमारे शरीर और उसमें निहित चेतना का चमत्कार!
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फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Meditation, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, अवचेतन मन, असफलता, कृतज्ञता, खुद- इलाज, धन्यवाद, प्रसन्नता, मन, शिक्षान्तर. 4s टिप्पणियाँ
व्यवसाय आपके लिये है, आप व्यवसाय के लिये नहीं है। धन्धा पेट के लिये है, आप धन्धे के लिये नहीं है। जीवन जीने के लिये मिला है, व्यवसाय में डूबने के लिये नहीं। यह मंत्र जिसकी समझ में आ जाता है वह व्यावसायिक जीवन का दास न होकर उसका आनन्द उठाता है।
अपने कार्य, व्यवसाय, नौकरी से प्रेम कर उसका आनन्द उठायें। अपने काम की नकारात्मक बातें याद कर घृणा न करें। कई लोग अपने व्यवसाय को अपने अनुरूप न पाकर उससे शिकायत करते रहते हैं। यह असंतोष उनके जीवन को खोखला करता है व मन को अशांत करता है। इससे वे सदैव नाराज रहते हैं। जबकि वस्तुतः कोई भी व्यवसाय बडा या छोटा, अच्छा या बुरा नहीं होता है। यह उसके प्रति हमारी सोच है। व्यवसाय हमारे पेट के लिए होता है हम व्यवसाय के लिए नहीं बने हैं।
अपने व्यवसाय को सकारात्मक व अच्छा समझ कर हम भी अच्छे बन सकते हैं। हाँ, कुछ व्यवसायों से रिटर्न कम या ज्यादा हो सकता है। व्यवसायों की अपनी अच्छाईयाँ, बुराईया होती हंै। यदि हम अपने व्यवसाय को स्वीकार कर ले तो कोई कठिनाई नहीं है। अपने काम से प्यार करें। हर व्यवसाय में नामचीन लोग हुऐ है। हर व्यवसाय से लोग आगे बढ़ें हैं। दम पेशे में कम, व्यक्ति में अधिक होता है।
कृष्ण के निष्काम कर्म की भावना व्यवसाय के क्षेत्र पर भी लागू होती है। हमें अपने व्यवसाय को कत्र्तव्य समझकर करना चाहिये। निष्काम का अर्थ लक्ष्य बिना कर्म करना नहीं है। निष्काम का अर्थ फल की आसक्ति नहीं रखते हुए कर्म करने से है।
व्यवसाय चुनने के पहले सारा दिमाग लगा दो। अपने मन-माफिक है या नहीं समझ ले। एक बार व्यवसाय विशेष को चुन लिया फिर उसका बुरा पक्ष नहीं देखें। उसका सामना करने के उपाय खोजंे। उसमें भी बहुत सारी चुनौतियां व अच्छाईयां हैं।
हर व्यवसाय में बहुत अवसर हो सकते है। व्यवसाय को अपने ढंग से करंे। उसमें नई राहे खोजंे, अपने व्यवसाय के सफलतम लोगों का अध्ययन कर अपना विश्लेषण करें व अपने कार्य क्षेत्र के दिग्गजों से सम्पर्क में रहें।
व्यावसायिक जीवन में प्रसन्न रहने हेतु उसमें सफल होना जरूरी है। इसलियेे व्यावसायिक दक्षता हासिल करें। अपने व्यवसाय में निपुण होना, उसकी बारीकी को जानना, उसके हेतू उचित सम्पर्क व साथ रहना आना चाहिये। प्रोफेशन में लापरवाही नहीं चलती। प्रतिद्वन्द्विता का जमाना है। सावधान व सजग रहें ताकि धोखा न खा जाएं।
मनुष्य जीवन का अधिकतम् समय अपने व्यवसाय के प्रबन्धन में चला जाता है। व्यावसायिक जीवन संतुलित व प्रसन्नता देने वाला होना चाहिए। अपने व्यवसाय को भार, मजबूरी या खराब समझेेंगे। तो कभी भी आप उससे खुशी नहीं पा सकते ।
वारेन बफेट विश्व के दूसरे नम्बर के सबसे धनाढ्य व्यक्ति शेयर बाजार में निवेश करते हैं लेकिन उलझते नहीं है। निश्चित समय पर पूरी तन्मयता से काम करते है। फिर अपनी मौेज करते है। वे अपने साथ मोबाइल नहीं रखते व घर/ टेबल पर कम्प्यूटर के आगे नहीं बैठे रहते हैं। इतने जोखिम भरे प्रोफेशन में भी मस्ती से रहते हैं। इसका कारण है कि वे अपने धन्धे से दूरी रखने में कुशल हंै। घर पर, बिस्तर पर अपने पेशे को नहीं लाते हैं।
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जन
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Bloging, Life-Management, Personality, success. Tagged: एकाग्रता, नकारात्मता, प्रार्थना, ब्लॉग लेखन, मस्तिष्क, शिक्षान्तर, शिखर पर मिलेगे, सकारात्मकता, सफलता. 2s टिप्पणियाँ
फ्रांसीसी साहित्यकार विक्टर ह्यूगो, ने लिखा है कि प्रेरणा एवं प्रतिभा दोनो एक ही है ।
जो व्यक्ति प्रेरित होता है वही प्रतिभाशाली होता है । प्रेरित का अर्थ अपनी क्षमता पर भरोसा करना व कुछ पाने के लिए प्रयत्न करना है । प्रतिभा का अर्थ कार्य करने की क्षमता व कुशलता का होना । प्रतिभा प्रेरणा के अभाव में व्यर्थ है। प्रेरणा भी प्रतिभा के अभाव में व्यर्थ है । प्रेरित होने पर ही प्रतिभा सार्थक होती है । बिना प्रतिभा के प्रेरणा उपादेय नही है ।
प्रतिभा व प्रेरणा दोनो अंधे व लंगड़े की मित्रता के समान है । जंगल में आग लगने पर अंधे के कंधे पर लंगड़ा सवार होकर दोनो जंगल से पार हो जाते हैं । दोनो साथ ही कार्यकारी है । प्रतिभा प्रेरणा का परिणाम है । प्रतिभा प्रेरणा के पंखो से ही उड़ती है । प्रतिभा की जड़ें प्रेरणा में ही होती है । प्रेरणा हो तो कोई अक्षमता नहीं होती । अन्धी होकर हेलन केलर दो बार हवाई जहाज उड़ाती है । तभी तो प्रेरक वक्ता प्रतिभा बढाने पर जोर देते हैं । इन दोनो के सहयोग से ही जीवन में मनचाही सफलता प्राप्त की जा सकती है ।
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दिस
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Stress Management, success. Tagged: अभिवादन, कृतज्ञता, धन्यवाद, नकारात्मता, प्रबल इच्छा, मन, लेखक, शिक्षान्तर, शिखर पर मिलेगे, शुभ कामनाएँ. 1 टिप्पणी
नया वर्ष आ रहा है । जैसा कि संकल्प लेने का प्रचलन है । अपना पुनरावलोकन करने का समय है । गत वर्ष की उपलब्धियों व अनुपलब्धियों पर मनन की आवश्यकता है ।
स्वयं को जानने-समझने का अवसर है । अपनी आदतें, सपनों व प्रयत्नों को परीक्षण करने का समय है । आदतों को सफलता में सहायक अच्छी आदतों व हानिकारक बुरी आदतों को पहचानना है । हम आदतों मंे ही जीते हैं । आदतें बदलकर ही स्वयं को बदल सकते हैं । एच.डी. थोरो ने लिखा है कि वस्तुए नही बदलती, हम ही बदलते हैं । अतः स्वयं को बदलने की जरूरत है ।
एक विचार को बोइए, एक कर्म को जन्म दीजिए,
एक कर्म को बोइए, एक आदत को जन्म दीजिए,
एक आदत को बोइए, एक चरित्र को जन्म दीजिए,
एक चरित्र को बोइए, एक सफलता को जन्म दीजिए ।
हमे जीवन में स्थायित्व पंसद है । बदलने में सदैव भय रहता है, इसलिए कोई भी बदलना नही चाहता है । परिवर्तन में असुरक्षा है, नयापन है । आदतें व्यक्ति ने अपनी स्थिति, सोच व लक्ष्य के आधार पर बनती है । जीने के बीच रास्ता निकली हुई होती है । आदतों में स्थायित्व होता है व व्यक्ति उनसे एकाकार हो जाता है । उसमे वह रमा हुआ होता है । आदतें उसके जिने की शैली हो जाती है । उसका अपनत्व हो जाता है । उनको वह न्यायोचित ठहराने लगता है । आदतें उसके जीवन मूल्य में समा जाती है । वह उन्हे मूल्य देने लगता है ।
समय बीत रहा है । समय रूपी नदी में इसके साथ हम सब बह रहे हैं । इसके साथ अपने में परिवर्तन करते रहना है, तभी अपटूडेट रहेंगे । नही तो पिछड़ जाऐंगे । जो समय के साथ नहीं बदलता है वह पिछे रह जाता है ।
आप सबको नव वर्ष की शुभकामनाएं !
13
नव
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अभिवादन, अवचेतन मन, अवचेतन मस्तिष्क, असफलता, एकाग्रता, कृतज्ञता, टिप्पणी, दिवाली, धन्यवाद, लेखक, शिक्षान्तर. 3s टिप्पणियाँ
अवचेतन की धुलाई जीवन में मनोरंजन में सहायक है।
मन को स्वस्थ करने हेतु मन का रंजन करना अत्यावश्यक है। खुशी का सृजन मन में ही होता है। अतः खुश रहने में मनोरजंन सहायक है। हम स्वयं जिस तरह का जीवन जी रहे हैं अब उसमें सुगन्ध, मिठास एंव मस्ती नहीं है, त्वरा नहीं है, उत्साह नहीं है, जीने की ललक नहीं है। ऐसे मेें हम जिस तरह से जी रहे हैं, उस पर विचारने की जरूरत है। उसे बदलने की दरकार है। इसे बदले बिना जीवन में रस, ऊर्जा, रगं नहीं आ सकते है। 
अच्छे मनोरजनं का उद्देश्य हमारी विचार शक्ति को धार देना तथा भावनाओं को विकसित करना है। भावनाओं का विरेचन भी इससे होता है। हम जब देवदास की त्रासदी पर रोते हैं तो हमारा दुःख भी बहता है। भावनाओं का उदात्तीकरण देख कर भी उच्च भावनाएँ मजबूत होती है। बुरी भावनाओं का बुरा परिणाम देख कर हमारी बुरी भावनाएं कमजोर होती है। हमारी भावनाओं का रेचन हो जाता है। हमारा अवचेतन का बोझ हल्का हो जाता है।
मनोरजनं समय काटने का उपक्रम नहीं है। यह हमें अपने से परिचय कराता है। हमारी सोच को स्पष्ट करता है व नये उदाहरण से हमारी धारणाओं को पुष्ट करता है। यह हमारे भावजगत को फैलाता है। हमारे भीतर सच्चाई को सहलाता है। तभी तो इसे मन बहलाने का साधन भी कहते हैं। यह मन को नहीं हमारे दुखों को भी धोता है। व हमारे मुल्यों को मजबूत करता है। तभी तो कहते है कि मनोरंजन के वो साधन अच्छे हैं जो उच्च मूल्यों को बढ़ावा देतें हैं।
मनोरंजन के साधनों से मनुष्य के मन का बोझ हल्का होता है तथा मस्तिष्क और नसों का तनाव दूर होता है।इससे नव जीवन का संचार होता है। पाचन क्रिया भी ठीक होती है। देह को रक्त संचार में सहायता मिलती है।विज्ञान ने हमारी मनोवृत्ति को बहुत बदल दिया है। बहुत सारे साधनों से मनोरंजन के साथ- साथ पर्याप्त व्यायाम भी होता है। परन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि अति सर्वत्र बुरी है। इसलिये समयानुसार ही मनोरंजन के साधनों का लाभ उठाना चाहिये। मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञानार्जन भी होना चाहिये। सस्ता मनोरंजन बहुमूल्य समय को नष्ट करता है। मनोरंजन के साधन से हमारी रुचि, दृष्टिकोण एवं स्तर का पता चलता है। विनाश और पतन की ओर ले जाने वाले मनोरंजन से अवश्य बचना चाहिये। मनोरंजन वही बढि़या है जो हमारे ज्ञान एवं चरित्र-बल को विकसित करे। स्वस्थ और सोद्देश्य मनोरंजन किसी भी स्वस्थ व समृद्ध समाज की मूलभूत आवश्यकता भी होता है और पहचान भी।
मनोरजंन का प्रबन्धन स्वंय को राजी रखने हेतु बहुत जरूरी है। किसी भी तरह से स्वंय को खुश रखंे। मनोंरजन उद्योग निरन्तर फैलता जा रहा है। इसकी दिशा व दशा किसी से छिपी नहीं है। कम से कम उसे आज स्वस्थ तो नहीं कहा जा सकता है। बाजारवाद व विज्ञापन इसे तय करते हैं। हम नहीं जानते कि मनोंरजन का स्वरूप कैसा होना चाहिए ? हमें कैसा मनोंरजन चाहिए ? हमें क्या अच्छा लगता है,व क्या हमें तरोताजा करता है? कहां हमें आनन्द आता है?
आज मनोंरजन के साधन बाजारवाद के शिकार हो गये है। उनमें तरह-तरह की विकृतियां आ गई है। तभी तो जीवन से स्वस्थ मनोंरजन गायब होता जा रहा है। फूहड़ता, हास्य, व्यंग्य, टांग खिंचाई ही रह गये है। सांस्कृतिक शून्यता के माहौल में नग्नता,अश्लीलता फूहड़ता ही राहत देते हंै। हमारे यहां सांस्कृतिक-शून्य कुछ ऐसा है कि ऊब के मारे लोग वक्त काटने के लिए मनोरजंन के नाम पर कुछ भी बरदाश्त कर लेते हैं।
ऊब का अर्थ है-अनचाहे काम में डूबे रहना। थकें मादें दर्शक ऊब के शिकार है।आज-कल सीरियल ऊब से ऊब को मारने के प्रयास हैं। यह वैसा ही है जैसा कि निराशा दूर करने के लिए शराब पीना। जबकि मेडिकल साईन्स शराब को निराशा बढ़ाने वाला पेय मानती है।
जैसे कि मैं आधी सदी पार करके भी नहीं जानता कि मुझे क्या अच्छा लगता है। मुझे कहां से ताजगी मिल सकती है ? फिल्म का स्वाद लेना मुझे नहीं आता है। निर्मल आनन्द से मेरा वास्ता कम ही पड़ता है। फिल्म का मजा कैसे लेना ?
मसाला फिल्में सार्थक फिल्म से कैसे भिन्न है। कला फिल्मों में क्या होता है ?
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अक्टू
Posted by jayantijain in Articles, Book Review, Life-Management, Personality. Tagged: अवचेतन मन, पटकथा, प्रबल इच्छा, ब्लॉग लेखन, लेखक, शिक्षान्तर, सफलता. Leave a Comment
उदयपुर इन्टरनेशनल फिल्म फेस्टीवल के क्रम में स्क्रिप्टराईटिंग पर वर्कशाॅप के दूसरें दिन श्री गौरव पंजवानी द्वारा ली गयी । मैने भी इसमे भाग लियज्ञं पंजवानी पहले एड फिल्मे एवं लघु फिल्में बनाते थे । उनकी चर्चित लघू फिल्म फैसपेक नामक है ।
उन्होने प्रारम्भ में बताया कि पटकथा लिखने के कोई नियम नहीं हो सकते है।कभी भी, कहीं भी किसी भी तरहकी स्थिति में लिखि जा सकती है।यह सृजन का कार्य है, इस हेतु लिखनें का मन होना चाहिये । यह नियमो से परे रूचि और सृजन का काम है।
उपन्यास कहानी की जीवनी है ।इसमें विस्तार से बारीक चीजों का वर्णन होता है ।जैसे खिडकी से झांकती लडकी का वर्णन करतें वक्त आकाश मेंबादल, उडती चिडियां, पडोैस में खडा पेड या सडक पर की हलचल की दास्तान भी महत्वपुर्ण है ।अर्थात विस्तार से लिखना चाहिये फिल्मी पटकथा में भी जितना विस्तृत वर्णन होता है,वह उतना ही महत्वपुर्ण है ।
पात्रों को सामान्य से विशिष्ठ बनाय अर्थात लार्जर देन लाईफ। स्टिरियोटाईप पात्रों में कोई विशिष्ठता जोडकर उसमे ंप्राण फुंके ।इसके लिये हमारें पुराण, महाभारत एवं रामायण उपयोगी है ।पात्र एवं धटनाओं को नया रंग देनें की जरूरत है ।
पटकथा के फिल्म निर्माण पर श्रोताओं को उस धटना का एहसास होना चाहिये ।दर्शक हाल भूलकर वहां पहूंच जाना चाहिये ।
पटकथा लिखतें समय विषय या लक्ष्य पर न्याय करना जरूरी है ।पूर ेविषय का खूलासा एवं परिणाम आना चाहिये ।अपनें बीज को पूरा वृक्ष बनाओं ।इसमेंव् यक्तिगत मूल्य बीच में न आनेें दो ।दर्शक का मनोरजंन या स्वयं के सृजन का सूख ध्यानमें रखों। टी.वी. धारावाहिकों की पटकथा लिखनें का अभ्यास इसमें उपादेय है । पटकथा लिखें, पुनर्ःलिखे । जब तक स्वयं सन्तुष्ठ न हो जाये संशोधन करते रहे । यह अभ्यास तकनिकी बारिकीयां सिखा देगा
ं व्यवसायिक सिनेमा के साथ-2 अब कला फिल्मों के भी दर्शक बढे हैं ।
फार्मूला िफल्में ही सिर्फ नहीं चलती है ।सिनेमा में नये प्रयोग करनें के अवसर बढे है ।अतः नई लहर पैदा करें ।