Posts Tagged ‘विवाह’
3
जून
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Self-Healing, Stress Management. Tagged: अलसी, कैंसर, खुद- इलाज, मन, विवाह, समय प्रबन्धन, सेहत. Leave a Comment
हमारा जीवन आजकल अम्लिय हो गया है । एलोपेथिक दवाईयां लेनें से अम्लता बढती है । दूषित भोजन से व प्रदुषित वातावरण से अम्लता बढती है । अम्लता बढनें से पेट एवं गले में जलन होती है ।
अम्लता बढ़ने से बड़ी-बड़ी बीमारियां होती है । स्वस्थ रहने के लिए शरीर के पी0एच0 को नियन्त्रित रखना जरूरी है ।
भूखे पेट एक चमच्च खानें का सोडा लेनें से क्षारता बढती है । जो अम्लता को नियत्रिंत करती है । अतः प्रतिदिन नाश्ते एवं भोजन से पूर्व एक चम्मच सोड़ा पानी के साथ लेना उपयोगी है ।
खानें के सोडे को सोडियम बाई कार्बोनेट कहतें है । इसे ही बेकिंग सोडा कहते है । बच्चों को पिलाया जाने वाला ग्राईपवाटर भी यहीं है । ईनो भी इसी से बनता है, लेकिन उसे स्वादिष्ट बनानें अन्य रसायन डालतें है । अतः खाध्यान्न श्रेणी का टाटा का बैकिंग सोडा लेना बेहतर है ।यह शेम्पू एवं सफाईकारक भी है । सब्जि एवं फल को प्रयोग इससे धो कर उपयोग में लेना चाहिये ।
Related posts:
26
मार्च
Posted by jayantijain in Uncategorized. Tagged: अभिवादन, अलसी, अवचेतन मन, अवचेतन मस्तिष्क, जीवन प्रबन्धन, प्रसन्नता, मन, विवाह, शुभ कामनाएँ, होली. Leave a Comment
होली तो बस एक बहाना है रंगों का, ये त्यौहार तो है आपस में दोस्ती और प्यार बढ़ने का, चल सारे गिले सिक्वे दूर कर के, एक दुसरे को खूब रंग लगते हैं मिलकर होली मानते हैं!
होली की आपको हार्दिक शुभकामनायें!
Related Posts:
24
फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Bloging, Personality, Spirituality, Uncategorized. Tagged: अलसी, अवचेतन मस्तिष्क, असफलता, धन्यवाद, मन, मस्तिष्क, लुईस हे, लेखक, विवाह. 1 टिप्पणी
हमारे जीवन में आंख खोलने वाले, स्वयं को राह दिखाने वाले, मूल्य सीखाने वाले कला-साहित्य आज स्वयं बाजार के शिकार है । जो दीपक है उसे ही बाजार अपने अनुसार करने हेतू प्रयत्नरत है । प्रेमचन्द की बजाय शिवखेड़ा पढ़ा जाता है । विशुद्ध साहित्य नही बल्कि प्रेरक साहित्य बिकता है ।
सिस्टम मनुष्य पर भारी पड़ रहा है । उजाले पर ही पहरे बैठे हैं । आज सब ताकत बाजार के हाथ है । बाजार की शक्ति निर्धारक होती जा रही है । इससे बचना कठिन है । बाजार हर चीज को कीमत में आंकता है । मुनाफा जीवन का मन्त्र हो गया है । हर चीज रूपयों से तोली जाने लगी है ।
मीडिया पूंजीपतियों के चुंगल में है । विज्ञापन दाता क्या छपेगा या दिखेगा हम करते है । मीडिया मालिकों को मूल्यों से सरोकार नहीं है । वे टी.आर.पी. से चलते हैं । सही बात मौलिक दृष्टि गोल है । मांग के अनुरूप परोसा जाने लगा है ।
5
फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Spirituality, Stress Management, success, Uncategorized. Tagged: अनुभव, अलसी, कृतज्ञता, जीने की कला, टिप्पणी, तनावमुक्ति, भाग्य, मन, मस्तिष्क, विवाह, समय प्रबन्धन. Leave a Comment
किसी भी खतरनाक बीमारी का डाइग्नोसिस रोगी एवं उसके परिजनों को डरा देता है। रोगी जीते हुए भी मृत्यु का अनुभव करता है एवं परिजन भय एवं चिंता में डूब जाते है। एड्स, कैन्सर एवं हेपेटाइटिस-बी जैसी जानलेवा बीमारियों में रोगी एवं उसके परिजन अपना सामान्य जीवन नहीं जी पाते और मृत्यृ का आसन्न भय सबको व्यथित कर देता है।
यर्थाथ में रोग हमारी अस्वस्थता का सूचक है। खतरनाक रोग मृत्यु का भय खड़ा कर संबंधित व्यक्तियों को डरा देता है। मृत्यु तो एक सहज, स्वाभाविक अनिवार्य प्रक्रिया है। यह कोई विशेष बात नहीं है। प्रतिक्षण हम मृत्यु की तरफ आगे बढ़ रहे हेैं।जिन्हें असाध्य रोग नहीं है उनकी उम्र रुकी नहीं रहती है। आयुक्षय सदैव सभी का जारी रहता है। अतः डर का कोई औचित्य नहीं है। स्व में स्थित व्यक्ति को ही स्वस्थ कहते हैं। वास्तव में असाध्य रोग की समस्या भय से उत्पन्न होने के कारण भय की समस्या है।
भय का सामना आशावादी दृष्टिकोण के साथ किया जाना चाहिए। प्रथमतः होनी को स्वीकारने के अतिक्ति और कोई मार्ग नहीं है। मृत्यु को स्वीकारने से डर समाप्त हो जाता है। फिर भय के निकल जाने से आत्मविश्वास बढ़ता है। समय पर असाध्य रोग का पता चल जाना अभिशाप नहीं वरदान है। रोगी इससे सचेत हो जाता है। रोगी के परिजन भी बेहतर इलाज का प्रबंध कर सकते हैं। रोग के ज्ञान से परिवार में तद्नुरुप योजनाएं बनाई जा सकती हैं। इससे निर्णय लेने में सुविधा रहती है। ताकि रोगी को अच्छे से अच्छे चिकित्सक का इलाज मिल सके एवं उसकी सुश्रुषा अच्छी तरह की जा सके। इससे अनेक बार असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं।
समय पर रोग का ज्ञान होने से व्यक्ति अपनी मानसिकता बदल पाता है। हिम्मत एवं धैर्य के साथ रोग का सामना किया जा सकता है। परमार्थिक चिंतन की तरफ ध्यान देकर शारीरिक चिंताओं को कम करने का अवसर मिलता है। रोगी अपने में वैचारिक परिवर्तन लाकर नकारात्मक चिंतन पर लगाम लगा सकता है। सकारात्मक चिंतन द्वारा रोग कि विरुद्ध लड़ने की प्रतिरोधात्मक शक्ति बढ़ाई जा सकती है। सारे दर्द शरीर में नहीं, मस्तिष्क में होते हैं। सारे तनाव का केन्द्र मन है। अतः मन को व्यवस्थित करने का इससे अवसर मिलता है। साथ जीवन मन से चलता है, तभी तो कहते हैं कि मन के जीते जीत है मन के हारे हार।
पूर्वज्ञान रोगी से रोगी अपने शेष जीवन का महत्व जान जाता है। ऐसे में वह अपनी गलत आदतों एवं लारवाहियों को छोड़ सकता है।
आखिर मनुष्य दीर्घ जीवन जीना क्यों चाहता है? जब आयु हमारे हाथ में नहीं है तो हम इसकी कामना क्यों करते हैं? कुछ और वर्ष जीकर भी हम क्या कर लेंगे। थोड़ा सा धन, बड़ा पद एवं प्रतिष्ठा अर्जित कर उसका क्या करेंगे, धन तिजोरियों में, पद कार्यालयों में एवं प्रतिष्ठा लोगों की स्मृति में रहती है। आज तक यह सब अर्जित किया है उसका परिणाम सामने है ।क्या हम अपनी पांचवी पीढ़ी को जानते हैं? किसी को नाम ज्ञात भी हो तो उसके क्या अर्थ हैं? उस शख्त को क्या लाभ है? अर्थात जीवन का लंबा होना नहीं, बेहतर होना महत्वपूर्ण है।
आत्मज्ञान के प्रकाश में कोई भी व्यक्ति अपना प्रत्येक संग्राम लड़ सकता है। फिर असाध्य रोग क्या चीज है, जीवन को समग्रता में समझने पर प्रत्येक समस्या का समाधान संभव है। हम अपने पूर्वाग्रहों, आवेगों एवं वासनाओं से आच्छादित हैं।अतः जीवन का अर्थ नहीं समझते। अध्यात्म मार्ग के सहारे स्वयं को जान कर जानलेवा बीमारियों से लड़े तो नई ऊर्जा मिलती है। तभी जीवन में कायाकल्प संभव है।
प्रार्थना में भी असीम शक्ति होती है। भौतिक शरीर मात्र अणुओं के संचालन से ही नहीं संचालित होता है। डाॅक्टर की दवाई ही नहीं, प्राकृतिक शक्तियां एवं प्रभु का आशीष भी लाभकारी होते हैं।
2
फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Stress Management, success. Tagged: अभिवादन, असफलता, क्षमता, प्रबल इच्छा, बदलना, भाग्य, मन, विवाह. Leave a Comment
वृहदारण्यक उपनिषद् मे लिखा है किः-
जो कुछ तुम हो, वह तुम्हारी प्रबल इच्छा है ।
जैसी तुम्हारी इच्छा है, वैसा ही तुम्हारी संकल्प है ।
जैसा तुम्हारा संकल्प है, वैसा ही तुम्हारा कर्म है ।
जैसा तुम्हारा कर्म है, वैसा ही तुम्हारा भाग्य है ।

अथार्त व्यक्ति अपनी इच्छा एवं सपनों का ही प्ररिणाम होता है । आज हम जो कुछ हैं वह अपनी इच्छाओं के अनुसार हैं । हम जैसा सोचते हैं वैसे ही बनते हैं । तब वैसी ही मनःस्थिति होती है तद्अनुरूप ही कदम उठाते हैं । अपनी सोच के अनुसार ही कर्म करते हैं । क्योंकि हमारी इच्छा से ही संकल्प पैदा होता है एवं संकल्प अनुसार कर्म करते हैं तथा कर्म ही हमारा भाग्य बनाते हैं । क्योंकि कर्मों के अनुसार ही फल आता है । इस तरह हम अपने भविष्य के निर्माता है । इसीलिए नेपोलियन ने लिखा है कि हम ही अपने भाग्य निर्माता हैं । अपना जहाज संसार में अपने सोेच के अनुसार ही चलाते हैं । उसी अनुरूप विजय मिलती है । सफलता प्राप्ति में इच्छा शक्ति की प्रमुख भूमिका है ।
25
जन
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, अवचेतन मन, अवचेतन मस्तिष्क, कृतज्ञता, कैंसर, धन्यवाद, निर्णय, मन, विवाह. 1 टिप्पणी
प्यार का प्रदर्शन आवश्यक है। यदि आप किसी को प्यार करते हो तो उसको प्रकट करिये, दिखाइयें। व्यस्तता से भरे जीवन में प्यार को छिपाने की आवश्यकता नहीं है। अपनी चाहत सामान्य लोगो से तो कहनी ही पड़ेगी। वे आपके प्यार को अन्यथा समझ न पाऐगे तो प्यासे ही रहेंगे। सबसे कमजोर व दुःखी को प्यार की ज्यादा जरुरत है।
यह सत्य है कि बुद्व पुरुषों या ज्ञानियों के सामने चाहत प्रदर्शित करने की जरुरत नहीं हेै। चूंकि आपके प्यार एवं समर्थन की उन्हें जरुरत नहीं है। लेकिन आम जन न तो आपके प्यार को पहचान सकता है, न प्रेम से परिपूर्ण है। उसे आपसे प्यार चाहिए इसलिए प्रदर्शित करों। तभी अमिताभ बच्चन बागवान में कहता है कि अधिकांश लोग अपनी पत्नी के प्रति प्यार को व्यक्त नही करते है। मैं यह गलती नहीं करता। मैं अपनी पत्नी के प्रति प्यार का बार-बार व्यक्त करता हूँ।
वह अन्यथा आपके प्यार से वंचित रह जायेगा। इसलिए प्यार के प्रदर्शन में बुराई नहीं है। व्यक्त करना समय की मांग है। अतः उसे व्यक्त करने की कला जानो। सम्बन्धों की दीवार इसी से मजबूत होगी।
माना कि कोई तुमसे प्यार करता है तो आप चाहते है न कि वह अभिव्यक्त करे। आप इसका आन्नद उठाओं। ठीक अन्य साथी भी उसी प्रकार को प्यार को प्रकट करने पर ही आन्नदित होते है ।
12
दिस
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, असफलता, कृतज्ञता, टिप्पणी, धन्यवाद, प्रार्थना, मन, विवाह, शुभ कामनाएँ. 4s टिप्पणियाँ
तुम अब पूर्व से पश्चिम में की तरफ जा रही हो । अपनीमातृभूमि से दूर जा रही हो ।विवाह करने के 15 दिन बाद ही दूसरी संस्कृति में रहने जा रही हो । इसलिए कुछ चर्चा इस सन्दर्भ में करना मंै उचित समझता हूं ।
यह मात्र एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की यात्रा नहीं है । यह एक संस्कृति व सभ्यता से दूसरी दिशा में जाना है । हमारी आध्यात्मिक संस्कृति से पश्चिमी भौतिकवादी संस्कृति में जाना है । वहां का जीवन यहां से पूरी तरह भिन्न है ।
भौतिकवादी संस्कृतिव्यक्ति प्रधान, धन प्रधानव बाह्य जीवन प्रधान हैैै। वहां सबसे बड़ा मूल्य धन को दिया जाता है । दूसरे सारे मूल्य वहां पर बाद में आतें है । पश्चिम की संस्कृति व्यक्ति या निजता को बहुत महत्व देती है । वहां उन्नति व विकास व्यक्तिगत होता है । प्रदर्शन को पश्चिम में महत्व दिया जाता है । आत्मविश्वास को मुख्य माना है ।
हमारी संस्कृति मानवीय मूल्यों पर आधारित है । यहां व्यक्तिगत सुख, स्वार्थ या धन को प्रमुखता कम दी गई है । यहां दूसरों की सेवा को परमार्थ माना जाता है । अध्यात्म में मानवता, परोपकार एवं त्याग को प्रधानता दी गई है । आन्तरिक विकास एवं सद्गुणों को यहां अधिक महत्व दिया है । यहां आत्मा को प्रधानता दी जाती है । यहां स्थायी एवं नित्य को महत्व दिया जाता है ।
घर से 15 हजार किलोमीटर दूर मां की जगह सद्व्यवहार आपकी रक्षा करेगा, ज्ञान आपका पिता बनकर सलाह देगा, वहां विवेक ही आपका भ्राता होगा । सद्गुण आपके रिश्तेदार होंगे । इन सबकी भूमिकाएं आपको निभानी है । अपनी जिम्मेदारी स्वयं लेनी है । अपना जहाज स्वयं को चलाना है । वहां तुम ही अपनी सारथी होगी । तुफानों में फंसे जहाज को बाहर लाने की जिम्मेदारी स्वयं की है । कोई दूसरा सार्थक मददगार न मिलेगा ।वहां पर तुम ही अपनी रक्षक, संरक्षक व मालकिन हो ।
बराबरी के नाम पर तुम्हे पुरूष नहीं बनना है । पुरूष व स्त्री समान नहीं भिन्न-भिन्न है । इस जैविक सत्य से इन्कार करना कठिन है । नारी का अर्थ सौन्दर्य, कोमलता, अपनत्व व प्रेम है । इससे घर में प्रेम रस पैदा होता है । परिवार जुड़ा रहता है । पश्चिम में इन मूल्यों को चुनौति मिलेगी । इसलिए संभलकर रहना । अपना स्त्रित्व न भूले ।
विवाह बंधन भी एक तरह का योगाभ्यास है ।अपनी बुरी आदतों रूपी बिगडैल घोड़ों पर नियन्त्रण स्वयं को करना है । जीवन की प्रोग्रामिंग में भी कम्प्यूटर-प्रोग्रामिंग की तरह सतत् सुधार करने पड़ते हैं, करते रहे, आगे बढ़ते रहें…………….
Related Posts:
बेटी की शादी पर उसको क्या विदाई-संदेश दें
विवाह क्या हैं
रिश्ते का मनोविज्ञान, आधार एवं प्रगाढ़ बनाने के उपाय
घर व मकान में क्या अन्तर है एवं मकान को घर कैसे बनाए
4
दिस
Posted by jayantijain in Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अभिवादन, अवचेतन मन, आत्मछवि, एकाग्रता, निर्णय, प्रसन्नता, प्रार्थना, माँ, लेखक, विवाह, शुभ कामनाएँ. 2s टिप्पणियाँ
मेरी माँ तुमने मेरे लिए बहुत कुछ किया, जिसे मै आज तक समझ न पाया। पुरुष वैसे भी स्त्री को समझने में असमर्थ हैं। मैं तुम्हारी सातवीं संतान था, तुम्हें मेरे जन्म पर भी बहुत पीड़ा हुई, उस पर भी मेरे जन्म के तीन दिन बाद तुम अवसाद का शिकार हो गई। एक माह तक डंूगरपुर अस्पताल में भर्ती रही, बहुत दुःख सहा। तब मै अपनी नानी के पास रहा। तुम्हारी हालत इतनी खराब थी कि अपने बच्चे को संभाल न सकती थी। 
मेरी मां सेलिब्रिटी नहीं थी, इसका मतलब यह नहीं कि वह एक महान मां नही थी । ग्लैमरस व प्रसिद्ध होने से ही कोई स्त्री महान मां नहीं हो जाती। अपनी तरह से सामान्य रहते हुए वह मेरे लिए असामान्य थी । वास्तव में सामान्यता बड़ी दुलर्भ हैं। मेरी मां में एक बलिदानी मां के सारे गुण थे । अपने बेटे के लिए दिन भर सचेत रहना, उसके हितों का संवर्धन करना व उसकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखना मुख्य था। वह मेरे हितों के लिए अपने पति से कमजोर होते हुए भी लड़ती थी । उसे अपने बच्चे कि लिए पति से पीटना तक मंजूर था ।
दुनिया में तुम्हारा नाम न था, इसका मतलब यह नहीं कि तुम किसी प्रसिद्ध माँ की तुलना में कम थी। तुम्हारा प्यार अपने बच्चों के प्रति किसी से कम न था। वास्तव मे तुम महान माँ थी। मेरे पिता कठोर अनुशासन प्रिय थे। वे बच्चों को अक्सर डाँटते रहते थे। मैं अपने पिता को गाली देने की मशीन समझता था। पिताजी जब भी मुझे क्रोध में डाँटते या पिटने को आतुर होते तब तुम ढाल बनकर आती थी । इस बीच पिता के हाथों कई बार स्वयं पीट जाती थी । तुम्हारी यह सुरक्षा कवच सदैव मुझे याद आता है ।
पिताजी रात्रि में भोजन खिलाने का विरोध करते थे । जैन धर्म के अनुसार रात्रि का भोजन निषेध है । तुम पिताजी की अनुपस्थिति में पीछे से हमे चुपचाप खाना खिलाती थी ।
आई, मां को हम इसी नाम से पुकारते थे । तुम्हारे बलिदानों से यह जीवन संवरता है । मेरे शरीर का कतरा कतरा तुम्हारे ऋण से ग्रस्त है । यह शरीर तुम्हारा अंश है । इसे आज अनुभव करता हूं।
मै आपके जीते जी आपका महत्व समझ न पाया । मेरी 37 वर्ष की उम्र मेें आप धरती से अचानक विदा हो गई । तब मुझे लगा कि मेेरे उपर आपका जो रक्षा कवच था, वह अब हट गया। मै शर्मिन्दा हुॅं कि आप के जीते जी कभी आपको समझ न पाया । पत्नी बार-बार कहती थी कि तुमने अपनी मां की परवाह न की । महत्वकांक्षा के घोड़ों पर सवार होने से मैं आपको समय न दे पाया । आज मातृदिवस को इसका बोध हो रहा है ।
मेरी मां एक औसत निम्न मध्यवर्गीय मां की तरह सामान्य औरत थी जिसने 12 बच्चों को जन्म दिया । वह सदैव गरीबी व उपेक्षा की शिकार रही । उसकी अपनी समस्याएं थी । वह अपनी सोच से हम बच्चों का सदैव बढिया ही सोचती थी । लेकिन मै उसे कभी समझ न पाया । मै बचपन से उद्ण्ड व क्रोधी लड़का था । विवशता के कारण बचपन में रोना बहुत रोता रहता था ।
वह मेरी सुरक्षा को लेकर सदैव चिन्तित रहती थी । मां का ध्यान सदैव बेटे की हरकतों पर रहता है कि अभी वह कहां है, सुरक्षित है या नहीं ?
बच्चा मां को नहीं समझ पाता है । लेकिन मैं तो बड़ा होकर भी 50 के बाद उसके योगदान को अनुभव करता हुं । मेरी मां ने मेरे लिए वो सब किया जो एक मां कर सकती है ।
30
नव
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Spirituality, success, Uncategorized. Tagged: अभिवादन, कृतज्ञता, धन्यवाद, नकारात्मता, बेटी, मन, विवाह, शुभ कामनाएँ, समय प्रबन्धन. 6s टिप्पणियाँ
प्रिय बेटी ,
हमारी सामाजिक परम्परा अनुसार बेटी शादी होने पर घर से विदा होती है । वह एक ऐसा जहाज है जिसे समुद्र में जाना ही पड़ता है । इसके लिए बन्दगाह को छोड़ना ही पड़ता है । लेकिन बेटी माता-पिता के दिल से कभी विदा नहीं होती है । बेटी की जड़ें सदैव पीहर में ही रहती है । बेटी यह तुम्हारा पहला घर है । सदैव तुम्हारा बना रहेगा ।
तुम हमारे दिल में ही नहीं इस घर में भी पूर्ववत् ही सदैव रहोगी । यह घर पूर्ववत् तुम्हारा भी है । इसे पराया न समझना । यहां पर जो संस्कार, मूल्य व सोच पायी है यह तुम्हारे जीवन की आधार शीला है । ससुराल तुम्हारा अपना दूसरा घर होगा । तुम इस घर की आधी वारिश हो और सदैव रहोगी । तुम्हारा दान मैने नहीं किया है । मैने कन्यादान नही किया है । मेरी कन्या वस्तु नहीं है । मेरी बेटी एक व्यक्ति है । तुम्हारे साथी/दोस्त से तुम्हे मिलाया है ताकि साथ मिलकर बेहतर जी सको । गृहस्थ धर्म का पालन कर सको । ताकि जीवन की पूर्णताः प्राप्त कर सको एवं विश्व की सृजन वाटिका में अपना सहयोग दे सको । पुरूष व स्त्री दोनो एक दूसरे के बिना अधुरे हैं । तभी तो हमारे यहां अर्द्धनारीश्वर की कल्पना शिवजी में की गई है । स्त्री व पुरूष समान नही होकर एक दूसरे के सहयोगी है । स्वतंत्रा की वेदी पर सामन्जस्य की वृद्धि न खोयें । एक दूसरे के सहयोग से जीवन संवरता व सजता है । आज से तुम मुझे जरूर कुछ जिम्मेदारियों से मुक्त कर रही हो । अथार्त खुद अपनी जिम्मेदारी ले रही हो ।अब तुम समझदार हो गयी हो । इसे याद रखना । इससे आगे की यात्रा का भार तुम्हे वहन करना है, तुम समर्थ हो । किसी के भी माता-पिता सदैव साथ में नहीं रहते है एवं कोई भी बच्चा अपनी जिम्मेदारी लेने पर बच्चा नही रहता है ।
अपनी प्रतिक्रियाओं को जानो । बेहोशी में जवाब मत दो । सुनना एक कला है । छोटी-छोटी बात पर तत्क्षण बड़ी प्रतिक्रिया मत करो । पिता की तरह तनुक मिजाज मत रहना । सोच-समझ कर प्रतिक्रिया करना । गुरूजिएफ के अनुसार नकारात्मक प्रतिक्रिया के पूर्व चैबिस घंटे न रूक सको तो चैबिस मिनिट जरूर रूकना । इससे आप बहुत सारे झंझटों से बच जाओगे व गृहस्थ धर्म अच्छी तरह निभा पाओगे । घर की चारदिवारी के भीतर स्त्री का शासन हो व बाहर पुरूष का शासन अच्छा माना गया है ।
शादी एक समझौता भी है । अपने साथी को तत्काल जवाब मत दो । किसी को बदलना सरल नहीं है । लचीलापन पैदा करो । सहने वाला जीतता है । तर्क से बात नहीं बनती है । पति पर झुंझलाना ठीक नहीं है । बिगड़ी बात सम्भालना सीखो । झगड़े के बाद पुनः अपना बनाना आना चाहिये । इसमे तुम अपनी मम्मी से प्रेरणा ले सकती हो।
मेरी दुआएं सदैव तुम्हारे साथ है । तुम और अधिक पाओ । तुम्हे ओर ज्यादा मिले । वधु ससुराल में कैसे जिते दिल ? प्रेम में बड़ी शक्ति है । जब कोई कार्य प्रेम से नहीं हो सकता है तो वह भय से भी नहीं करा सकते हैं । परिवार में सम्बन्ध बहुत नाजुक होते हैं । इन सम्बन्धों को सम्भालना पड़ता है । उनके लिए विशेष कौशल की जरूरत पड़ती है जो तुम्हारे पास है । प्रारम्भ में ससुराल में सभी लोग विनम्रता की अपेक्षा रखते हैं ।
शादी के प्रति स्वप्निल न रहे, यथार्थ को स्वीकारें, अपनाएं । हम ज्यादा दिन रोमांटिक नहीं रह सकते । परिवार व जीवन की वास्तविकताओं से रूबरू होना पड़ता है । अतः कल्पनाओं से बचें । तथ्यों को स्वीकारें । 24 घंटे साथ रहने पर छोटी-छोटी बातें कई बार चिढ़ाती है । आपको संतुलन कायम रखना है । अपने लिए वक्त निकालना है ।
बड़ी समस्या हमसे शेयर करो । हमसे अनावश्यक बड़ी बात मत छुपाना । छोटी-छोटी वो बात जो भावी जीवन को खतरे में डाल सकती है, ऐसी हो तो जरूर बताएं। मम्मी-पापा चिन्ता करेगें-इस तर्क पर ध्यान न दे । बात बिगड़ेगी तो उन्हे ही परेशानी होगी । इसलिए अपनो से छिपाना मत ।
तुम्हारे मम्मी-पापा
(गत दिनों मेरी बेटी की शादी हुई उस पर निम्न संदेश दिया )
Related Posts:
29
जून
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Meditation, Self-Healing, Spirituality. Tagged: अवचेतन मन, धन्यवाद, नकारात्मता, मन, मनोवृती, मस्तिष्क, विवाह, Beliefs, Value of life. Leave a Comment
वास्तव में हम मन में चलते व्यर्थ के विचारों से परेशान है । प्रेम, शान्ति, माधुर्य और आनन्द को विचारों ने घायल कर रखा है । अन्यथा जीवन में कोई परेशानी नहीं है ।
हमारे मन के भीतर अंहकारी दुर्योधन बैठा है, जो सदैव दुश्चक्र रचता रहता है। भीतर बैठा स्वार्थ का शकुनि हमें नचाता हैे। हमारे मन के भीतर एक दुःशासन भी बैठा हुआ है जो अवसर मिलने पर द्रोपदी को नंगा करता रहता हैं। हमारे मन का रावण कई बार सीता का अपहरण करता है। हमारे भीतर बैठा कंस अपनी रक्षा के लिए दूसरों के साथ अत्याचार करता रहता हैं। कंस अपने भांजे कृष्ण को जन्मते ही मारना चाहता है , उसी तरह हम अपने स्वार्थ के लिए अपनो को मारने के लिए तत्पर है। भीतर बैठा शिशुपाल अपने घमंड को स्थापित करने दूसरों को अनवरत सताता हैं।
जीवन के बाहययु़द्ध में तो अन्ततः हार ही होती हैं। विश्वविजेता सिकन्दर तक बाहययुद्ध में हारा- हम क्या चीज हैं? पौराणिक कथा के अनुसार ययाति एक हजार वर्ष जीकर भी तृृृप्त न हुआ। उसकी इच्छाऐं पूरी न हुई । कुरुक्षेत्र भूलोक में कहीं बाहर हैं या नहीं, मैं नहीं जानता लेकिन हमारे मन में निश्चित हैं। इसे देख सकता हूं। महाभारत का युद्ध ऐतिहासिक हैं या नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन मन में चलने वाली महाभारत को मैं रोज देखता हूं। यहां कौरव-पाण्डवों का युद्ध हुआ की नहीं, यह घटना ऐतिहासिक हैं या नहीं, मैं नहीं जानता। परन्तु हमारे मन में रोज महाभारत लड़ी जाती हैं। विषय वासना व सत्य के बीच, भलों व बुरे के बीच, सत्य -झूठ के बीच, काम व अकाम के बीच, धर्म व अधर्म के बीच युद्ध जारी हैं। अन्यायी दुर्योधन व धर्मात्मा युधिष्ठिर मन में रोज लड़ते रहते हैं। यह करुं या नहीं, इधर जाए या नहीं, इस तरह जीउं या नहीं, यह उचित हैं या अनुचित का विश्लेषण मन में चलता रहता हैं।
कृष्ण द्वारा अर्जुन का बताया मार्ग गीता में है । जीवन में ’’जो है’’ उसको स्वीकारते हुए उसका पूर्ण होश से सामना करो । निर्लिप्त भाव से ’’जो है’’ उसका सामना करोें । गीता कहती है अपने अधिकारों के लिए लडाई भी जायज है ।
Related Posts: