Posts Tagged ‘मनोवृती’
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अप्रै
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Book Review, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, Uncategorized. Tagged: अलसी, अवचेतन मन, कृतज्ञता, कैंसर, निर्णय, प्रबल इच्छा, मन, मनोवृती, मस्तिष्क, लुईस हे, सेहत. Leave a Comment
एलोपैथी के अतिरिक्त भी कैंसर का इलाज कई तरीकों से होता है । इसका उद्देश्य कैन्सर रोगियों को वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति से अवगत कराना है । इसने एलोपैथी के साथ-साथ वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों का अध्ययन कर बताया है कि बुडविझ प्रोटोकोल इनमे से श्रेष्ठतम है । यह कैंसर रोगियों एवं उनके सम्बन्धियों के लिए एक विश्व कोष है जिसको पढ़ कर उपचार कराने का सही निर्णय ले सकते हैं । लोथर हरनाइसे ने दुनिया भर में कई वर्षों तक शोध कर इसे लिखा है ।
इसके अनुसार रोगी को 3 म् का पालन करना चाहिए ।
पहला म् (इट हेल्दीवेल) स्वस्थ आहार से है । इसमे रोगी को ठण्डी विधि से तैयार अलसी का तेल व पनीर का मिक्सर विभिन्न सुखे मेवे व फलों के साथ दिया जाता है ।
बुडविझ के आहार के साथ-साथ दूसरा म् (एलीमीनेट टाॅक्सीन्स) शरीर के विषाक्त पदार्थो को बाहर निकालना है । इसमे एनिमा लगा कर शरीर को निर्विष बनाया जाता है । इसमे पहले शुद्ध पानी का एनिमा लगाया जाता है । इसके बाद काफी एनिमा व एल्डी तेल एनिमा प्रमुख है ।
तृतीय म् (ईनर्जी) ऊर्जा के जागरण से है । जीवन का लक्ष्य तय कर जीना मुख्य है । दिशा तय कर ही दशा बदली जा सकती है । इसमे आत्मदर्शन द्वारा सकारात्मक होना व स्वस्थ होने के भाव में जीना प्रमुख है ।
लेखक एक जाने माने कैंसर शौध विशेषज्ञ है । जो दुनिया भर में घुम-घुम कर सभी देशों में उपलब्ध कैंसर उपचार सम्बन्धी विधियों का विश्लेषण करते रहे हैं ।
यह पुस्तक मुलतः जर्मन भाषा में लिखी गयी है । इसका अंग्रेजी संस्करण उपलब्ध हैै
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अग
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Bloging, Personality, Spirituality. Tagged: अभिवादन, धन्यवाद, नकारात्मता, प्रसन्नता, मन, मनोवृती, लुईस हे, शिक्षान्तर. 3s टिप्पणियाँ
बहुत पुरानी कहानी है। किसी गांव में एक चतुर किसान रहता था। मरते समय वह अपनी वसीयत का बंटवारा निम्न प्रकार कर गया।
बड़े बेटे को उसकी सम्पति का आधा हिस्सा मिले, मंझले बेटे को एक चैथाई व उसकी सम्पति का छठाँ भाग सबसे छोटे बेटे को मिले। किसान की कुल जमा पूंजी उसकी ग्यारह गायंे थी। उसके मरने पर बंटवारे का चक्कर पड़ गया। गायों का बंटवारा 1/2, 1/4, 1/6, कैसे करें।
अन्त में गंाव के एक समझदार व्यक्ति ने कहा कि उसकी पूंजी में मेरी एक गाय मिला लो, फिर उसका बंटवारा कर दो। अब तो बात बहुत साफ हो गई। बड़े बेटे को बारह की आधी यानी छः गायें दे दी गई। मझले बेटे को बारह की चैथाई यानी तीन गायंे बांटी गई। छोटे बेटे को बारह का छठा हिस्सा दो गायें दे दी गई।इस प्रकार छः योग तीन योग दो कुल मिलाकर ग्यारह गायें तीनों बेटो में बांट दी गई। बची शेष गाय गांव के समझदार व्यक्ति को पुनः सोंप दी गई।
यह गाय शब्द है जो आपके भावों को जगा सके। यह मेरी गाय संकेत करती है आपको जगाने हेतु, आपकी पूंजी को प्राप्त करने में। अगर प्राप्त कर सके तो यह लेखक आभारी रहेगा।
4
जुला
Posted by jayantijain in Articles, Book Review, Meditation, Personality, Self-Healing, Spirituality. Tagged: अवचेतन मस्तिष्क, आत्मछवि, तनावमुक्ति, निर्णय, प्रार्थना, भाग्य, मन, मनोवृती, शिखर पर मिलेगे. 1 टिप्पणी
’’जागो मेरे पार्थ’’ यह अपने नाम के अनुरूप जगाने वाली है । यह महाभारत के अर्जुन को नहीं हमारे मन में चलने वाली महाभारत को जीतने के सम्बन्ध में है । यह हमें जीने की कला बताती है ।
यह पुस्तक धार्मिक कम, सफलता संबंधी अधिक है । इसमें जीवन में आई उलझनों का सामना कैसे करें पर खुले मन से दिये दिये गये 18 प्रवचन है । यद्यपि इसका आधार भगवत गीता है लेकिन यह हिन्दु दर्शन की बजाय प्रेरक दर्शन से जुडी है ।
कृष्ण कहते हैं- तुम्हारा अन्तर्हदय ही कुरुक्षेत्र हैं और वही धर्मक्षेत्र भी। युद्ध बाहय नहीं, चित की वृत्तियों से हो, स्वयं के तमस से हो। क्रान्ति हो अन्धकार में प्रकाश की। बाहय युद्ध से समस्याओं का समाधान नहीं हो सकेगा। कृष्ण अन्तरमन में चल रहे युद्ध को जीतने की प्रेरणा देते हैं। वे अन्तर-युद्ध के प्रेरक हैं। अर्जुन तो प्रतीक है वीरत्व का, क्षात्रत्व का, फिसलने का।
यह आज के युवाओं को बोध देने में समर्थ है । यह आधुनिक शैली में निबन्ध है । इसमें कहीं संगठित धर्म या सम्प्रदाय का षोषण नहीं किया हुआ है । जैन सन्त होने से इसमें जैन उद्धरण बहुत है ।
लेखक श्री चन्द्रप्रभ एक प्रसिद्ध जैन सन्त है जो जैन सम्प्रदाय की सीमाओं से बंधे नहीं है । ध्यान व तत्व को जीवन में बहुत महत्व देते है । पुस्तक का प्रकाशन श्री जीतयशा फाउन्डेशन, जयपुर द्वारा किया गया है । पुस्तक की कीमत 50/- रू. है व पृष्ठ 256 है ।
29
जून
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Meditation, Self-Healing, Spirituality. Tagged: अवचेतन मन, धन्यवाद, नकारात्मता, मन, मनोवृती, मस्तिष्क, विवाह, Beliefs, Value of life. Leave a Comment
वास्तव में हम मन में चलते व्यर्थ के विचारों से परेशान है । प्रेम, शान्ति, माधुर्य और आनन्द को विचारों ने घायल कर रखा है । अन्यथा जीवन में कोई परेशानी नहीं है ।
हमारे मन के भीतर अंहकारी दुर्योधन बैठा है, जो सदैव दुश्चक्र रचता रहता है। भीतर बैठा स्वार्थ का शकुनि हमें नचाता हैे। हमारे मन के भीतर एक दुःशासन भी बैठा हुआ है जो अवसर मिलने पर द्रोपदी को नंगा करता रहता हैं। हमारे मन का रावण कई बार सीता का अपहरण करता है। हमारे भीतर बैठा कंस अपनी रक्षा के लिए दूसरों के साथ अत्याचार करता रहता हैं। कंस अपने भांजे कृष्ण को जन्मते ही मारना चाहता है , उसी तरह हम अपने स्वार्थ के लिए अपनो को मारने के लिए तत्पर है। भीतर बैठा शिशुपाल अपने घमंड को स्थापित करने दूसरों को अनवरत सताता हैं।
जीवन के बाहययु़द्ध में तो अन्ततः हार ही होती हैं। विश्वविजेता सिकन्दर तक बाहययुद्ध में हारा- हम क्या चीज हैं? पौराणिक कथा के अनुसार ययाति एक हजार वर्ष जीकर भी तृृृप्त न हुआ। उसकी इच्छाऐं पूरी न हुई । कुरुक्षेत्र भूलोक में कहीं बाहर हैं या नहीं, मैं नहीं जानता लेकिन हमारे मन में निश्चित हैं। इसे देख सकता हूं। महाभारत का युद्ध ऐतिहासिक हैं या नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन मन में चलने वाली महाभारत को मैं रोज देखता हूं। यहां कौरव-पाण्डवों का युद्ध हुआ की नहीं, यह घटना ऐतिहासिक हैं या नहीं, मैं नहीं जानता। परन्तु हमारे मन में रोज महाभारत लड़ी जाती हैं। विषय वासना व सत्य के बीच, भलों व बुरे के बीच, सत्य -झूठ के बीच, काम व अकाम के बीच, धर्म व अधर्म के बीच युद्ध जारी हैं। अन्यायी दुर्योधन व धर्मात्मा युधिष्ठिर मन में रोज लड़ते रहते हैं। यह करुं या नहीं, इधर जाए या नहीं, इस तरह जीउं या नहीं, यह उचित हैं या अनुचित का विश्लेषण मन में चलता रहता हैं।
कृष्ण द्वारा अर्जुन का बताया मार्ग गीता में है । जीवन में ’’जो है’’ उसको स्वीकारते हुए उसका पूर्ण होश से सामना करो । निर्लिप्त भाव से ’’जो है’’ उसका सामना करोें । गीता कहती है अपने अधिकारों के लिए लडाई भी जायज है ।
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5
जून
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Bloging, Life-Management, Personality. Tagged: अनुभव, एकाग्रता, नकारात्मता, प्रसन्नता, मन, मनोवृती, लुईस हे, लेखक, शिक्षान्तर, शिखर पर मिलेगे. 2s टिप्पणियाँ
स्वंय को माफ करो । खुद को कुचलना बन्द करों । अपने उपर अत्याचार सबसे बडा गुनाह है । खुद को क्षमा करने से खुदा मिलता है । अपने पास आने स्वंय को स्वीकारना पडता है । जैसे भी हो आप आप हो । अपने को अपनाने से भटकन मिटती है । अपने को जाना-मानों तभी शान्त हो जाओगे । जो खुद के पास न आ सकते है वे किसी के पास जाकर भी अधूरे ही रहते है । अपने को जाने बिना पर को नहीं जान सकते ।
अपनी गलती भी मात्र अपने से न हुई, सम्बन्ध, विचार, सपने, शिक्षा, अहम्, राग-द्वेष, लालच सब जिम्मेदार है । तुम मात्र तुम ही नही हो । अन्य स्थितियां, आदतें, वस्तुऐं, प्रकृति, बेहोशी, नकल की वृत्ति सब साथ है ।
हमें माफ करने की प्रक्रिया में स्वंय का ज्ञान होता है। अघ्यात्म का प्रवेश होगा । सूर्य की, सत्य की किरण जीवन में प्रवेश करेगी । खुद से नाराज होकर ही दूसरों को महत्व देते है ।
जीवन हमसे बाहर नहीं है । कहीं अन्यत्र नहीं है किसी ओर जगह, व्यक्ति या समय में नहीं है । जिन्दगी सपनों में, शब्दों में कईयों में नही है । वह अभी में है । यह क्षण आनन्ददायक है तो सब ठीक है । बलात्कार, हत्या, जबरदस्ती करने कराने में भय है । आकुलता है, अतः सुख नही है । यह वर्तमान में जीना नही है । बदला लेना, सजा देना, अतीत में होना है । कल खुश नहीं रहना है । हो सकता है तो अभी खुश होना है ।
सुख अभी और यही है तो है । अन्यथा कहीं नही है ।
मुझे मुक्ति नहीं चाहिए । मोक्ष नहीं चाहिए । अगर मैं अभी मुक्त नहीं हूॅ तो भविष्य मे मुक्त कैसे हो सकता हूॅ। भविष्य का जन्म इस क्षण में से होकर होता है ।
25
अप्रै
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Meditation, Self-Healing, Spirituality. Tagged: अवचेतन मन, एकाग्रता, खुद- इलाज, प्रार्थना, बदलना, मन, मनोवृती, शिक्षान्तर, शुभ कामनाएँ, सेहत. 1 टिप्पणी
स्वस्थ रहने हेतु लुइस हे की निम्न प्रार्थना को रोज मन से करे फिर चमत्कारिक परिणाम
पाए।
इस जीवन की अनंतता में, जहाँ में हूँ, सब संपूर्ण और परिपूर्ण है।
फिर भी जीवन सदैव बदलता रहता है।
यहाँ न कोई आरंभ है और न कोई अंत।
केवल अस्तित्व और अनुभवों का अनवरत चक्र और पुनर्चक्र है।
जीवन कभी रुकता या ठहरता नहीं, न ही नीरस होता है।
क्योंकि हर क्षण होता है सदैव नया और नूतन।
मैं उस शक्ति के साथ एकाकार हूँ, जिसने मुझे बनाया
और इस शक्ति ने मुझे अपनी परिस्थितियों का सृजन करने की शक्ति दी।
मैं अपने इस ज्ञान से आनंदित हूँ कि मेरे पास अपनी इच्छा अनुसार प्रयोग के लिए मस्तिष्क की शक्ति है।
जीवन का हर क्षण एक नई शुरुआत है
जैसे कि हम पुराने नए की तरफ बढ़ते हैं।
यहाँ अभी, इसी क्षण मेरे लिए आरंभ करने को एक नया बिंदु है
मेरी दुनिया में सबकुछ अच्छा है।
इस जीवन की अनंनता में, जहाँ मैं हूँ, सब संपूर्ण और परिपूर्ण है।
मैं अपने शरीर को एक अच्छा मित्र मानता हूँ।
मेरे शरीर की हर कोशिका में दिव्य ज्ञान है।
मैं शरीर की सुनता हूँ, जो वह मुझे बताता है और जानता हूँ कि उसकी सलाह सही है।
मैं हमेशा सुरक्षित हूँ और दिव्य शक्ति द्वारा सुरक्षित और प्रेरित हूँ।
मैं स्वस्थ और मुक्त रहना चाहता हूँ।
मेरी दुनिया में सबकुछ अच्छा है।
जीवन की अनंतता में, जहाँ मैं हूँ, सब संपूर्ण और परिपूर्ण है।
6
अप्रै
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: आत्मछवि, कैंसर, तनावमुक्ति, प्रबल इच्छा, मन, मनोवृती, मस्तिष्क. 2s टिप्पणियाँ
व्यक्ति अपनी मानसिक स्थिति से ही संचालित होता है । मनोदशा अच्छी होने पर व्यक्ति आशावादी एवं उत्साह से जीता है अन्यथा वह उदासीनता के अंधेरे में घिर जाता है । उदासीनता अन्ततः व्यक्ति को निराश एवं हताश करती है ।
अपनी मनोदशा अच्छी रखने के लिए उजले पक्ष को देखना पडता है । मनोदशा अच्छी होने पर व्यक्ति स्वंय को पसन्द करता है । स्वंय को पसन्द करने वाला दुसरों का भी सम्मान करता है । जो स्वंय से ही टूट जाता है वह औरो को भी निराश ही करता है । मनोदशा अच्छी नही होने पर मनोरोग बढते है ।
मनोरोग केंसर से भी अधिक घातक है जबकि समाज मनोरोगों को रोग ही नही मानता है । मनारोग शारीरिक व्याधि से अधिक घातक है । मनस्थिति ठीक नही रहने पर व्यक्ति कोई न कोई नशे का आदि हो जाता है । चाहे वो सिगरेट, गुटखा, पान या शराब का सेवन हो ।
मनोरोगी को जीवन में कुछ भी अच्छा नही लगता है । अवसादग्रस्त व्यक्ति कई बार आत्महत्या तक कर लेता है । मन के हारे हार है मन के जीते जीत । मन को प्रसन्न रखना व मन से प्रसन्न रखना जीने के जरूरी आॅक्सिजन है ।
दुनिया के अधिकांश लोग शरीर से नही मन के रोगी है । मन के रोगी स्वंय को ठीक नही कर सकते अतः उनसे आदर्शवादी या सकारात्मक सोच के उपदेशों से वो ठीक नही हो सकते । मनोरोग के कई स्तर होते है । चिडचिडा होने से लेकर आत्महत्या करने तक का अलग-अलग स्तर होता है । मनोरोगी को समाज रोगी के रूप मे स्वीकार नही करता जिससे मनोरोग ओैर बढता जाता है ।
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19
मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Book Review, Personality, Spirituality, Stress Management, success, Uncategorized. Tagged: एकाग्रता, कैंसर, जीने की कला, नकारात्मता, मन, मनोवृती, मस्तिष्क, लेखक, सकारात्मकता. 2s टिप्पणियाँ
योगी कथामृत एन आॅटोबायोग्राफी आॅफ योगी का हिन्दी अनुवाद है । बीसवीं सदी की अध्यात्म की सौ प्रसिद्ध पुस्तकों में से यह एक है । यह योगदा सत्संग के प्रणेता परमहन्स योगानन्दजी की जीवनी है । इसमें उनके जन्म से लेकर योगदा की स्थापना तक का वर्णन सरल भाषा में किया हुआ है ।
बचपन में उनके जीवन मूल्य व परिवार का वर्णन है । ईश्वर की खोज योगानन्दजी ने कैसे की इसका वर्णन है । योगानन्दजी का अपने गुरू श्री युक्तेश्वरगिरिजी से मिलना, उनका दर्शन, उनसे दीक्षा लेने का इसमें विस्तृत वर्णन है । अपने गुरू के आत्मज्ञान के इस आन्दोलन को अमेरिका ले जाना व वहां पर इस कार्य को आगे बढाने का इतिहास इसमें है ।
’’क्रियायोग’’ की प्राचीनता, वैज्ञानिक महत्व एवं इसके सिद्धान्त का इसमें वर्णन है । भारतीय दर्शन, गीता एवं कृष्ण की सार्थकता व व्यवहारिकता पर इसमें बहुत कुछ लिखा हुआ है ।हिमालय में उन्होने अनेक तरह के चमत्कार देखे । योगानन्द जी निराहारी योगी से कैसे मिले, बिना आहार जीवन का संचालन कैसे होता है इसका वर्णन इसमें है । योगानन्दजी का अनेक सूक्ष्म सत्ताओं व दिव्य पुरूषों से संपर्क कब व कैसे हुआ, पानी पर चलने वाले, हवा में उडनेवाले संत व उसकी कला पर चर्चा इस पुस्तक में है । इन चमत्कारो के पीछे की सत्ताओं का उल्लेख विस्तार से है । अदृश्य को जानने व अध्यात्म को जीवन में उतारने की पे्ररणा देने वाली यह महान आदर्श पुस्तक है ।
इसमें गांधीजी को क्रिया योग की दीक्षा देने का वर्णन भी है । पुस्तक में अनेक फोटोग्राफ दिये हुए है । किताब की छपाई सुन्दर व अच्छे कागज पर की गयी है । किताब का मूल्य बहुत कम है । विश्व की छब्बीस भाषाओं में इस पुस्तक का अनुवाद हो चुका है । अनेक विश्वविद्यालयों में इसे पाठ्यपुस्तक के रूप में पढाया जाता है । अध्यात्म के विधार्र्थी के लिए यह एक श्रेष्ठ रचना है ।एक योगी की यह आदर्श जीवनी है । नास्तिक को आस्तिक बनाने में यह पुस्तक समर्थ है ।
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1
फ़र
Posted by jayantijain in Bloging, Life-Management, Personality, Self-Healing, Stress Management, success. Tagged: मन, मनोवृती, रिश्ते, विवाह, शिखर पर मिलेगे, सफलता. Leave a Comment
हम सामाजिक प्राणी है अतः रिश्तों में ही जीते है। पशुओं में रिश्ते नहीं होते। इनसे ही जीवन खिलता है। व्यक्ति अपने जीवन के लुत्फ़ इन्हें व्यवस्थित करके ही उठा सकता है।
सम्बन्ध शब्द सम और बन्ध दो शब्दों से मिल कर बना है जिसका अर्थ है कि समान सम्बन्ध यह विषम बन्ध या विषमय बन्धन न हो। हम रिश्ते में बन्धे है इन्हें रिसते हुए घाव न बनाएँ।
हमें रिश्तों को गहरा करने के लिए परस्पर गहरी समझ पैदा करने की जरुरत है। एक दूसरे को समझने की जरुरत है। इसके अभाव में गलतफमियाँ पैदा होती है। परस्पर धारणाएँ, लक्ष्य व सोच को समझने की जरुरत है। ताकि दूसरे को उचित सम्मान दिया जा सके। ताकि हमारा व्यवहार दूसरे को चुभे नहीं। सामने वाले के व्यवहार विशेष के पीछे क्या कारण था, कहीं कोई संवाद की कमी तो नहीं थी, या कोई मजबूरी तो नहीं थी। रिश्तांे की बुनियाद में प्रेम होता है। प्रेम ही सत्य है। उच्चता का भाव व अलगाव का भाव से अपनत्व घटता है।
रिश्तों से हिसाब निकल जाए तभी रिश्ते कामयाब होते है। जब तक रिश्तोें में हिसाब है, तब तक वे लौकिक रिश्ते है। कामचलाउ है, उनसे बदबू आने की गुंजाइश है।
जिनके जीवन में प्रेम नहीं होता वे दूसरो को प्रेम नहीं दे सकते है। जिनको अभिनय में, चतुराई में विश्वास हो वे उसे नहीं दे सकते है। तभी तो कहा जाता है कि जीवन एक गुन्ज की तरह है, वहीं वापिस लौटता है जो हम उसे देते है।
6
दिस
Posted by jayantijain in Art of Living, Life-Management, Personality, Self-Healing, Stress Management. Tagged: अनुभव, असफलता, तनावमुक्ति, प्रबल इच्छा, प्रसन्नता, मनोवृती, सकारात्मकता, सेहत. 2s टिप्पणियाँ
हम सभी अधुरे है। मन के अधीन जीते है इसलिए समग्रता में नहीं जी पाते है। हम सभी द्वन्द्व में जीते है। जीवन में साकार को ही आधार मानकर जीते है। तर्क के आधार पर जीते है। विचारों के सहारे जीते है इसलिए पूर्णता को नहीं जान पाते है। इसी कारण अधूरे है। इंसान पूर्ण होते ही भगवान बन जाता है। हम अपूर्ण होने के कारण पूरी तरह सुखी नहीं हो सकते है। हर रिश्ते में अपूर्णता है, शिकायतें है। सभी इच्छाएँ किसी की पूरी नहीं हो सकती है। इसलिए यहाँ कोई पूरी तरह सुखी नहीं हो सकता है। कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता, दूसरों के सपनों के अनुरूप पूरी तरह नहीं हो सकता है। यहाँ हमें इन्हीं में मार्ग निकालना पड़ता है। एक दूसरे को सहना पड़ता है। तभी तोे आदर्श प्रेमी भी शादी के बाद लड़ते देखे जाते है। हम कोई भी पूर्ण नहीं है तो सामने वाले से पूर्णता की आशा क्यों करते हैं? आदर्श सिर्फ कला जगत में होता है। संसार समझोता है। लोक व्यवहार में यही सब चलता है।
गलती सबसे होती है। गलती इंसान की मजबूरी है एवं यही हमारी सीमा है। भूल हो जाती है। अब सपनों में, चर्चा में वह अपनी गलती स्वीकार कर माफी मांग चुकी है। आपको माफ करना चाहिए। अतीत में बार-बार जाने की जरुरत नहीं है। संसार में जीने हेतु बहुत से जहर पीने पड़ते है। एक जहर यही सही। भौतिक जगत में स्वार्थ ऐसे ही नचाता है। पुत्र की शादी करनी ही है। सर्वश्रेष्ठ बहू होगी तो हमारे पुत्र से ही शादी क्यों रचायेगी। वह भी अपना अधुरापन मिटाने आपके बेटे से ब्याह करती है। अर्थात् वह अपने में पूर्ण नहीं है। उसे जीवन साथी की जरुरत है। किसी पूर्ण को शादी करने की जरुरत नहीं है।
अपनी तरह से श्रेष्ठ व्यवहार करो। यह हमारा सोचा-परखा निर्णय है। अपने पर भरोसा रखों। उन्होंने अच्छे व्यवहार का स्वांग किया होगा। हम असल में बढि़या व्यवहार अपनी तरह से करेंगे, फिर परिणाम जो भी हो। आशंका करके कांटे न बिछाएँ। अपनी नकारात्मकता हानिकारक है।
मेरी, या किसी की किस्मत कोई नहीं निगल सकता है। बहुत चालाक व घमण्डी होंगे। हमारा क्या बिगाड़ लेगें। हमें उनके घर जाकर कौनसा रहना है। बदमाश व्यापारी को भी वक्त सर्वेंक्षण निभाते है, जैसे निभा लेना। अपने-अपने गीत अपनी तरह से गाने ही पड़ते है। संसार या सत्य से भागने का विकल्प अधिक बुरा है।
अधुरापन, अपूर्णता, थोड़ी बेईमानी, थोड़ी सच्चाई, कभी खुशी कभी गम को ही संसार कहते है। यहाँ सब चलता है। इन सब के बीच रास्ता अपनी अक्ल से निकालना पड़ता है। फिर भी हँसना पड़ता है, हँसाना पड़ता है। एक तर्क, घटना, बात लेकर रोते रहने में सार नहीं है। इस क्रम में बहुत कुछ खोना पड़ सकता है। अतः बीच का व्यावहारिक पथ चुनों, संतुलित रहो। भावुक होने की जरुरत नहीं है। सब कुछ दाँव पर नहीं लगा है। हमारा जीवन हमारे हाथ में है। हमें कोई दुःखी नहीं कर सकता। हम अपने मालिक है। आप अनावश्यक खीचों मत। तुरन्त निर्णय करो। दो घोड़ों की सवारी न करें। मेरी बेहोशी अब अधिक नहीं चलेगी। जागो! जागो!
पूर्ण सुखी होने के आकांक्षी हो तो ‘‘जो है’’ उसका आनन्द लेना सीखो। संसार में तो इसी तरह होना निश्चित है। जब इसमें रहना है तो जैसा है वैसा स्वीकार करो, इसे अधुरा ही स्वीकारों। जीवन सहने का दूसरा नाम है। थोड़ा बहुत बेवकूफ बनना व सहना उचित है। संसार में थोड़े धोखे खाना भी सफल जीवन हेतु जरुरी है। इनसे सबक लो, इनको पहचानों व शान्त रहो। मानव की अपनी सीमाएँ है। व्यवहार की सीमाएँ है। दूसरे भी किसी न किसी से बँधे हुए है। वे कोई बुद्ध पुरुष नहीं है। उनकी अपनी समझ अनुसार कुछ गलती की है तो क्षमा कर आगे देखो। अत्यधिक मीनमेख घातक है। वे तो आपके स्नेह के आकांक्षी है। हमें मूर्ख बनाना, धोखा देना उनका व्यवसाय नहीं है। तीर्थकरों का जीवन बताता है कि संसार में सुख नहीं है। तभी तो वे आत्मज्ञान की राह पकड़ते हेतु वन को जाते है।
कोई दूसरा ऐसी गलती नहीं करेगा इसकी क्या गारन्टी है। एक बार बँध गए है तो निभा के देखो। एक मौका देना चाहिए।