Posts Tagged ‘भाग्य’

रोगमुक्त होने की तीन शर्ते: स्वस्थ होने की इच्छा,जीवन-लक्ष्य ( सपना )और दृष्टि

स्वस्थ होने के लिए स्वस्थ मानसिकता बहुत जरूरी है । बीमार मन को लेकर हम तन को स्वस्थ नहीं कर सकते हैं । मानसिकता को स्वस्थ बनाने हेतु प्रिय व पसंद के लोगों के बीच रहे जो आपकी ऊर्जा तन्त्र को मजबूत करें । जिनके होने से आपको सकारात्मक ऊर्जा मिले ।आपकी भावनाएं अच्छी होती हो उन लोगों के संग रहे । जिन लोगों को मिलने पर ऊर्जा खर्च होती हो, अच्छा न लगता हो, उनसे दूर रहे । ये नकारात्मक लोग आपकी घनात्मक ऊर्जा को पी जाते हैं । अतः ऐसे लोगों से दूर रहने की आवश्यकता है । अपनी कमजोरियों व दुःखों की बाते न करें । हंसते-गाते रहे ।
अपने लक्ष्य व इच्छाओं की अपनों से चर्चा करें । अपने जीने का मकसद स्पष्ट करें इससे आपको स्वस्थ होने का मार्ग खूलेगा । आपके शरीर की कोशिकाएं स्वतन्त्रता महसूस करेगी। जिससे उनमे बल उत्पन्न होगा ।
हम सब एक तरह के विचार एवं भाव में जीते है । हमारी अपनी धारणाएं है । जिनको बदलने की सख्त जरूरत है, जिसे लोथर हरनाइसे सिस्टम जम्पस कहता है । इस मनोवृति को बदलना बहुत आवश्यक है । तभी तो कहावत है कि रोग का नहीं रोगी का उपचार करो ।
रोगी में स्वस्थ होने की इच्छा, सपना और दृष्टि होनी चाहिए । उसमे जीने की, स्वस्थ होने की तमन्ना होनी चाहिए । अन्यथा कोई भी चिकित्सक चिकित्सा नहीं कर सकता है । रोगी का स्वस्थ होने का मनोबल व सहयोग आवश्यक है।

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दीर्घ नहीं सार्थक जीवन श्रेष्ठ है

किसी भी खतरनाक बीमारी का डाइग्नोसिस रोगी एवं उसके परिजनों को डरा देता है। रोगी जीते हुए भी मृत्यु का अनुभव करता है एवं परिजन भय एवं चिंता में डूब जाते है। एड्स, कैन्सर एवं हेपेटाइटिस-बी जैसी जानलेवा बीमारियों में रोगी एवं उसके परिजन अपना सामान्य जीवन नहीं जी पाते और मृत्यृ का आसन्न भय सबको व्यथित कर देता है।

यर्थाथ में रोग हमारी अस्वस्थता का सूचक है। खतरनाक रोग मृत्यु का भय खड़ा कर संबंधित व्यक्तियों को डरा देता है। मृत्यु तो एक सहज, स्वाभाविक अनिवार्य प्रक्रिया है। यह कोई विशेष बात नहीं है। प्रतिक्षण हम मृत्यु की तरफ आगे बढ़ रहे हेैं।जिन्हें असाध्य रोग नहीं है उनकी उम्र रुकी नहीं रहती है। आयुक्षय सदैव सभी का जारी रहता है। अतः डर का कोई औचित्य नहीं है। स्व में स्थित व्यक्ति को ही स्वस्थ कहते हैं। वास्तव में असाध्य रोग की समस्या भय से उत्पन्न होने के कारण भय की समस्या है।

भय का सामना आशावादी दृष्टिकोण के साथ किया जाना चाहिए। प्रथमतः होनी को स्वीकारने के अतिक्ति और कोई मार्ग नहीं है। मृत्यु को स्वीकारने से डर समाप्त हो जाता है। फिर भय के निकल जाने से आत्मविश्वास बढ़ता है। समय पर असाध्य रोग का पता चल जाना अभिशाप नहीं वरदान है। रोगी इससे सचेत हो जाता है। रोगी के परिजन भी बेहतर इलाज का प्रबंध कर सकते हैं। रोग के ज्ञान से परिवार में तद्नुरुप योजनाएं बनाई जा सकती हैं। इससे निर्णय लेने में सुविधा रहती है। ताकि रोगी को अच्छे से अच्छे चिकित्सक का इलाज मिल सके एवं उसकी सुश्रुषा अच्छी तरह की जा सके। इससे अनेक बार असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं।

समय पर रोग का ज्ञान होने से व्यक्ति अपनी मानसिकता बदल पाता है। हिम्मत एवं धैर्य के साथ रोग का सामना किया जा सकता है। परमार्थिक चिंतन की तरफ ध्यान देकर शारीरिक चिंताओं को कम करने का अवसर मिलता है। रोगी अपने में वैचारिक परिवर्तन लाकर नकारात्मक चिंतन पर लगाम लगा सकता है। सकारात्मक चिंतन द्वारा रोग कि विरुद्ध लड़ने की प्रतिरोधात्मक शक्ति बढ़ाई जा सकती है। सारे दर्द शरीर में नहीं, मस्तिष्क में होते हैं। सारे तनाव का केन्द्र मन है। अतः मन को व्यवस्थित करने का इससे अवसर मिलता है। साथ जीवन मन से चलता है, तभी तो कहते हैं कि मन के जीते जीत है मन के हारे हार।
पूर्वज्ञान रोगी से रोगी अपने शेष जीवन का महत्व जान जाता है। ऐसे में वह अपनी गलत आदतों एवं लारवाहियों को छोड़ सकता है।

आखिर मनुष्य दीर्घ जीवन जीना क्यों चाहता है? जब आयु हमारे हाथ में नहीं है तो हम इसकी कामना क्यों करते हैं? कुछ और वर्ष जीकर भी हम क्या कर लेंगे। थोड़ा सा धन, बड़ा पद एवं प्रतिष्ठा अर्जित कर उसका क्या करेंगे, धन तिजोरियों में, पद कार्यालयों में एवं प्रतिष्ठा लोगों की स्मृति में रहती है। आज तक यह सब अर्जित किया है उसका परिणाम सामने है ।क्या हम अपनी पांचवी पीढ़ी को जानते हैं? किसी को नाम ज्ञात भी हो तो उसके क्या अर्थ हैं? उस शख्त को क्या लाभ है? अर्थात जीवन का लंबा होना नहीं, बेहतर होना महत्वपूर्ण है।

आत्मज्ञान के प्रकाश में कोई भी व्यक्ति अपना प्रत्येक संग्राम लड़ सकता है। फिर असाध्य रोग क्या चीज है, जीवन को समग्रता में समझने पर प्रत्येक समस्या का समाधान संभव है। हम अपने पूर्वाग्रहों, आवेगों एवं वासनाओं से आच्छादित हैं।अतः जीवन का अर्थ नहीं समझते। अध्यात्म मार्ग के सहारे स्वयं को जान कर जानलेवा बीमारियों से लड़े तो नई ऊर्जा मिलती है। तभी जीवन में कायाकल्प संभव है।

प्रार्थना में भी असीम शक्ति होती है। भौतिक शरीर मात्र अणुओं के संचालन से ही नहीं संचालित होता है। डाॅक्टर की दवाई ही नहीं, प्राकृतिक शक्तियां एवं प्रभु का आशीष भी लाभकारी होते हैं।

इच्छा शक्ति से सफलता कैसे पाए ?

वृहदारण्यक उपनिषद् मे लिखा है किः-

जो कुछ तुम हो, वह तुम्हारी प्रबल इच्छा है ।
जैसी तुम्हारी इच्छा है, वैसा ही तुम्हारी संकल्प है ।
जैसा तुम्हारा संकल्प है, वैसा ही तुम्हारा कर्म है ।
जैसा तुम्हारा कर्म है, वैसा ही तुम्हारा भाग्य है ।

I can

अथार्त व्यक्ति अपनी इच्छा एवं सपनों का ही प्ररिणाम होता है । आज हम जो कुछ हैं वह अपनी इच्छाओं के अनुसार हैं । हम जैसा सोचते हैं वैसे ही बनते हैं । तब वैसी ही मनःस्थिति होती है तद्अनुरूप ही कदम उठाते हैं । अपनी सोच के अनुसार ही कर्म करते हैं । क्योंकि हमारी इच्छा से ही संकल्प पैदा होता है एवं संकल्प अनुसार कर्म करते हैं तथा कर्म ही हमारा भाग्य बनाते हैं । क्योंकि कर्मों के अनुसार ही फल आता है । इस तरह हम अपने भविष्य के निर्माता है । इसीलिए नेपोलियन ने लिखा है कि हम ही अपने भाग्य निर्माता हैं । अपना जहाज संसार में अपने सोेच के अनुसार ही चलाते हैं । उसी अनुरूप विजय मिलती है । सफलता प्राप्ति में इच्छा शक्ति की प्रमुख भूमिका है ।

पैसा रास्ता है, मंजिल नहीं

                                  धन आपका दास है, यदि आप उसका उपयोग जानते हैं। वह आपका स्वामी है, यदि आप उसका उपयोग नहीं जानते।

-होरेस

सोने की ईंट और बूढ़ा-
एक बूढ़े व्यक्ति के पास एक सोने की ईंट थी। जिसे उसने लपेट कर बगीचे में गाड़ रखी थी। प्रति सप्ताह थोड़ी सी मिट्टी हटा कर उसे देखता रहता था। एक दिन पोते ने देखा कि दादाजी उस जगह को कभी-कभी खोद कर देखते हैं। उसने एक दिन खोद कर सोने की ईंट निकाल ली व उसी वजन व आकार का पत्थर रख दिया। दादाजी ने जब देखा तो रोने लगे। पोते ने कहा आपने आज तक उसका उपयोग किया नहीं, मात्र देख कर रख देते हैं। इसे देख कर रख लो तो क्या फर्क पड़ता है यह सोने की है या पत्थर की। आपको तो मात्र देखना है।’’Role of money in life
इसी तरह हम धन जमा कर उसे देखते रहते हैं। वह हमारे किसी काम नहीं आता है और हम विदा हो जाते है। एक रुचि कर खबर याद आई । आपने पढ़ा होगा कि मई दो हजार दस के अखबारों में डाॅ. देसाई के घर छापा पड़ा हुई, अठ्ाहरसौ करोड़ रुपये व डेढ़ टन सोना मिला। वे सज्जन इन पैसों को रोज बूढ़े की तरह देखते ही तो थे।
धन के दीवाने न बने। इसको बचाने के क्रम में रिश्तेदार न खोएँ। अगर पास मंे धन है तो जरुरत मन्द को दें। हमारा धन कोई खा सकता है, हमारी किस्मत नहीं। अतः धन हेतु माता-पिता व भाई-बहनों से लड़ना अनुचित है।
‘‘प्यासा सावन’’ एक अच्छी हिन्दी फिल्म है जो धन की सीमाएं दर्शाती है। इसमें नायक-नायिका प्रेम विवाह रचाते हैं। प्रारम्भ में धन नहीं था, प्रेम से रहते थे, बाद मंे नायक बहुत धन कमा लेता है लेकिन समय नहीं है। इधर नायिका को कैन्सर हो जाता है। तब भी धन का उपयोग नहीं कर पाते हंै।

                                                                                                                                               - मेरी  पुस्तक जियो  तो ऐसे  जियो से     ( To be continued)

हम सब में कुछ खास बात है: सुखी होने याद रखें

हम सब में कुछ खास बात है। हम सबमें किसी न किसी रूप मंे कोई न कोई विशेषता है।दूसरों की तुलना मंे अच्छाई हं।हम अद्वितीय हंै, अनुपम हंै, खास है।
यह दुर्भाग्य की बात है कि हम अपनी खास बात को स्पष्ट रूप से नही जानते हंै। हम अपने को वक्त नही देते है। स्वयं की अनदेखी करते हंै। स्वयं को भूल जाते है। अपने को महत्व नही देते, अपनी विशेषता नही खोजते है। परमात्मा ने, प्र्रकृति ने, अस्तित्व ने आपको, हमको, सबको सकारण बनाया है। हम उसी की योजना के अनुसार हेैं। वह व्यर्थ कुछ नहीं करता हैं। फिर हम बेकार के कैसे हो सकते हैं? हम उसी विराट के अंश है, चाहे कितने ही छोटे हों।
प्रयोग-आॅंखे बंद ( दो मिनट ) सब लोग क्रमशः पाँच चेहरे याद करें। कितनो को माता, पिता, पत्नी, बच्चे याद आए? किसी को खुद का चेहरा दिखा?
मनुष्य एक बरबाद परमात्मा है। उसे अपने भीतर असीम सुख प्राप्त है व उसको प्रकट कर परमात्मा बन सकता है। मनुष्य का जन्म आनन्द को पाने के लिए हुआ है। व्यक्तिगत जीवन, व्यावसायिक जीवन, पारिवारिक जीवन व सामुदायिक जीवन को संभालना, संवारना व रचनात्मक बनाना है, समरस बनाना है। इसमें सामन्जस्य स्थापित करना है। मेरा उद्देश्य आपके जीवन को ऊंचा उठाना है। इसमें आनन्द पैदा करना है। मनुष्य जीवन को समाज के उपयोगी बनाना है। संवेदनशील व नेतृत्व गुणों से युक्त बनाना है।
हम रोते हुए पैदा होते है लेकिन यहाँ से जाते वक्त हँस सकते है।

सफलता का मंत्रः रतन टाटा के अनुसार

रतन टाटा के उत्तराधिकारी के रुप में सायरश मिस्त्री का चयन हुआ हैं। एक कमेटी ने 15 माह की जांच पड़ताल के बाद इनको चयनित किया हैं । पत्रकारो ने रतन टाटा से पूछा की किन गुणों के आधार पर आपने उनका चयन किया। रतन टाटा पहले तो टालते रहे लेकिन बाद में इनके चयन का कारण इनमे निम्न 4 विशेषताओं को बताया हैं।
1. कार्य सम्पादित करने की कला
हमारी सफलता हमारे काम करने की शैली तय करती हैं अर्थात काम करने का तरीका बहुत ही महत्वपूर्ण है । महर्षि पतंजलि ने भी ’’योगः कर्मसु कौशलं’’ लिखा हैं। उन्होनें तो कार्य सम्पादित करने की कौशल को ही योग बताया हैं। सभी उन्ही किताबों व अध्यापकों से पढ़ते है, कुछ अच्छे माक्र्स लाते हैं, कुछ फेल हो जाते हैं, क्यों ? सबके पास पढने के 5-7 घंटे ही होते हैं, मेहनत भी कई लोग करते हैं । फिर भी परिणाम भिन्न-भिन्न रहता हैं। इस सब के लिए पढ़ने का तरीका जिम्मेदार हैं।
पढने का तरीका सबका भिन्न-2 होता है । पढते वक्त एकाग्र होना, पढ़ने में रूचि, स्पीड रिडिंग, स्मरण शक्ति को बढाने का तरीका जानना, मस्तिक की शक्तियों का ज्ञान आदि से पढ़ने की कला विकसित होती हैं। पढ़ने की दक्षता उसकी कला से आती हैं।
हम आज काम कैसे करते हैं ? पेड़ काटने के पूर्व कुल्हाड़ी की धार देखने की आवश्यकता हैं। जब आठ घंटे में पेड़ काटना हो तो छः घंटे कुल्हाड़ी की धार तेज करने में लगाने पर सफलता के अवसर बढ़ जाते हैं।
कार्य करने की कला के मुख्य बिन्दु
कार्य को निर्धारित समय सीमा में पूरा करना
कार्य को आनन्द से करना
बिना चिढे, बिना चिढाये कार्य करना
परिणाम की चिन्ता बगैर कार्य करना
अधूरा/बीच में कार्य नहीं छोड़ना

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 अवचेतन का जादू :काम-वासना का शिकंजा

  मेरी नई पुस्तक “जियो तो ऐसे जियो” का एक परिचय

जीवन में मनोदशा का महत्व

                                                                                                                        ( To be continued…)

श्री चन्द्रप्रभ के गीता पर प्रसिद्ध प्रवचनः जागो मेरे पार्थ

’’जागो मेरे पार्थ’’ यह अपने नाम के अनुरूप जगाने वाली है । यह महाभारत के अर्जुन को नहीं हमारे मन में चलने वाली महाभारत को जीतने के सम्बन्ध में है । यह हमें जीने की कला बताती है ।
यह पुस्तक धार्मिक कम, सफलता संबंधी अधिक है । इसमें जीवन में आई उलझनों का सामना कैसे करें पर खुले मन से दिये दिये गये 18 प्रवचन है । यद्यपि इसका आधार भगवत गीता है लेकिन यह हिन्दु दर्शन की बजाय प्रेरक दर्शन से जुडी है ।
कृष्ण कहते हैं- तुम्हारा अन्तर्हदय ही कुरुक्षेत्र हैं और वही धर्मक्षेत्र भी। युद्ध बाहय नहीं, चित की वृत्तियों से हो, स्वयं के तमस से हो। क्रान्ति हो अन्धकार में प्रकाश की। बाहय युद्ध से समस्याओं का समाधान नहीं हो सकेगा। कृष्ण अन्तरमन में चल रहे युद्ध को जीतने की प्रेरणा देते हैं। वे अन्तर-युद्ध के प्रेरक हैं। अर्जुन तो प्रतीक है वीरत्व का, क्षात्रत्व का, फिसलने का।

यह आज के युवाओं को बोध देने में समर्थ है । यह आधुनिक शैली में निबन्ध है । इसमें कहीं संगठित धर्म या सम्प्रदाय का षोषण नहीं किया हुआ है । जैन सन्त होने से इसमें जैन उद्धरण बहुत है ।
लेखक श्री चन्द्रप्रभ एक प्रसिद्ध जैन सन्त है जो जैन सम्प्रदाय की सीमाओं से बंधे नहीं है । ध्यान व तत्व को जीवन में बहुत महत्व देते है । पुस्तक का प्रकाशन श्री जीतयशा फाउन्डेशन, जयपुर द्वारा किया गया है । पुस्तक की कीमत 50/- रू. है व पृष्ठ 256 है ।

अवचेतन का जादू :काम-वासना का शिकंजा

मेरे भीतर अभी भी कामदेव जीवित है। मैंने उनका सामना कई तरह से किया। काम-भोग को देखा, भोगा लेकिन प्यास अभी भी कायम है। अवचेतन का प्रभाव  गहरा होता  है।
यह आग अभी तक क्यों दहक रही है। किशोर अवस्था में जैसी प्यास थी, नारी जितनी अच्छी लगती थी आज भी उतनी ही आकर्षित करती है। चुपके से नारी, उसके उभारों को देखना, उसके अन्तः वस्त्रों कोे देखना अभी भी मन को अच्छा लगता है। काम को उत्तेजित करने वाले व काम सम्बन्धी बातों में अभी भी रस मौजूद है। नैसर्गिक माँग अनैसर्गिक ओर हो जाती है, कई बार। आखिर यह मन कब तक यूं ही भटकता रहता है?
इससे उसमें कुछ नया न मिलता है, फिर भी चाह मरती नहीं है। वही प्रयोग बार-बार होता है। भोगने के बाद कुछ घंटे तृप्ति तो रहती है। फिर कुछ समय बाद वासना अंगड़ाई लेती है। उपलब्ध में कमी नजर आती है व अप्राप्त आकर्षित करती है। यह खेल यथावत जारी है। जबकि ओशो को समझने के बाद भावनाओं का दमन अधिक न किया। जागृत रहने का प्रयत्न किया। फिर भी मन से वासना न गई।
शायद मैंने शर्तों पर सोचा है। ऐसी सुन्दर है, इतनी वफादार हो, पूर्व समर्पित हो तभी पूर्ति होगी। अन्यथा प्राप्त में कमी निकाल कर उसे बेकार कर देता हूँ व कहीं ओर से पूर्ति का सपना देखता हूँ। कई बार अपनों से शिकायत नहीं, फिर भी गैर मन को सुहाते है। मन कभी प्रयोग करना चाहता हूँ। कभी निकटता आकर्षित कर लेती हूँ तो कभी मौके का लाभ देखता हूँ।
शरीर के तल पर मिलन से मन का तल तृप्त नहीं होता। विचार के तल पर मिलन चाहिए। प्रेमपूर्ण चित्त नहीं है। आध्यात्मिक तल पर प्रेम को जाना नहीं है। इसलिए कामुकता जीवन से गई नहीं है।
समाजिक वर्जना ने सेक्स ओबशेसन पैदा किया है। सेक्स को दबाने के क्रम वह मरा नहीं बल्कि जहरीला हो गया है। यह जहर मुझे बेहोश करता है व मादाएं मुझे लुभाती है। सजगता से जीवन यापन नहीं कर पाता हूँ।
अधुरा भोग प्सास मिटाता नहीं है। पूर्णता में भोगने का समग्र मन न था। अर्थात् मैं समर्थ न था। विचारों के साथ भोगा जो तृप्त न हुआ। तभी तो भयभीत हूँ, खण्डित हूँ, अधुरा हूँ,एवं अप्रामाणिक हूँ। मूच्र्छा में जीने के कारण समग्र भोग न पा सका।
मैं सिद्धान्त, शास्त्र एवं विचारों से बंधा हुआ हूँ। अतः सेक्स को सूक्ष्म रूप से अचेतन रूप से दबाता रहा हूँ। एक तरफ नीति शास्त्र के बंधन है, तो शिक्षा के ताप अपनी जगह पर है।
मैं भीड़ से, समाज से, दूसरो से प्रभावित होता हूँ। उनसे डर कर सेक्स को दबाता रहा हूँ। सेक्स पर परिवार, पड़ौसियों की मर्यादा के नियम है। उनकी बुद्धि से भी चलता हूँ। मैं अकेला नहीं हूँ। सामाजिक रीति-रिवाज, प्रचलन, फैशन, कला सब सेक्स के विरुद्ध है। एक तरह से उससे नाराज होना लड़ना ही है। मैं सेक्स से बंध गया क्योंकि मैं सेक्स को पराजित करना चाहता हूँ। यह लड़ाई क्या सेक्स को भाव नहीं दे रही है?
विज्ञापनों से प्रभावित मन भटकता है। बाजारवाद मन को वासना में ले जाता है। बुद्ध ने इसी कारण वासना को दुष्पूर कहा है। यह पूरी नहीं होती। ऐसा इसका स्वभाव है। जबकि उपनिषद् कहते है भोगो तो छुटेगा। अर्थात् मैं इस ऊर्जा को समझ न पाया। इसके नियमों को पहचान न सका।
सेक्स में समय-शून्यता, शरीर-शून्यता व अहं-शून्यता की झलक मिलती है। यह झलक मैं बार-बार लपकना चाहता हूँ।
मैं प्रेमपूर्ण नहीं हूँ। मेरा मन घृणा, ईष्र्या, चिन्ता से भरा है। इसलिए मैं कामूक हूँ।
मेरी दृष्टि काम के प्रति सही नहीं रही। विरोध की दृष्टि से काम बढ़ा। मैंने उसे सहज नहीं लिया। उसे दुष्टमन समझा। इससे काम को बल मिलता रहा।

मन को कैसे जीतना?

महाराजा जनक संसार में रहते हुए कैसे ऋषिवत जीते

मन के निर्णय या ज्ञान को हम अपना समझ बैठते है। जैसा कि आँख, नाक, कान, जिन्हा व स्पर्श इन्द्रिय की सीमा है। वे भी अपनी सीमा से बाहर अनुभव नहीं कर पाते है। वैसे ही मन भी अपनी सीमा से बाहर जाकर अनुभव नहीं कर सकता है। जबकि सत्य इसके पार होता है तभी चेतना के अनुभव पर उपनिषद् के ऋषियों ने नेति-नेति की बात कहीं है। मन के इसी स्वभाव के कारण हमारे जीवन में हर चीज भली-बुरी थोड़े समय में समस्या बन जाती है। हम किसी भी सम्बन्ध, घटना, वस्तु, व्यक्ति से सुख उठाते-उठाते अचानक दुःख पाने लग जाते है। हमारी प्राप्ति कब व्यर्थ हो जाती है हमें पता ही नहीं लगता है।
मित्रों, वैसे मन हमारा दुश्मन नहीं है। यह चेतन ने ही बनाया है। आकार से उपर उठने, निराकार को जानने मन के पार जाना पड़ता है। बेईमान होने का अवसर होने पर ईमानदार होना ही उपयोगी है।
संसार हम अपनी मन की आंख से देखते है। हम जगत को हमारे मन के चश्मे से देखते है। अर्थात् ‘‘जो है’’ कि बजाय ‘‘जो नहीं है’’ वह स्व-निर्माण कर देखता है। अर्थात् हम अपना ही प्रक्षेपण करते है। अपनी बुद्धि व स्वार्थ से देखते है। इस अर्थ में हम अन्धे हो जाते है।
महाराजा जनक संसार में रहते हुए कैसे ऋषिवत जीते है? शक्तिशाली होकर भ्रष्ट नहीं थे। जीवन जीने की कला के गुरु है। इस मन को पहचान कर ही वे घर में वैरागी थे। सब कार्य करते हुए भी अकत्र्ता थे, उनकी क्रिया में अक्रिया थी। सारे उपद्रवों के वे दृष्टा थे। यह कला मन के स्वभाव को जान कर ही संभव है। इस कला का सार यही है। अपने भीतर उठते विचार, भाव व शब्दीकरण को सतत देखो। दो विचारों, के बीच पड़ते अन्तराल को देखो। इसी तरह साक्षी भाव बढ़ेगा, मन मिटेगा। अन्यथा मन को मिटाया नहीं जा सकता है।

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मन की तीन विशेषताएँ पहचाने एवं इसे अपने पक्ष में करें

मन - विकिपीडिया


मन की तीसरी विशेषता तर्क आधारित सोचना एवं इसे अपने पक्ष में करें

मन की तीसरी विशेषता तर्क को महत्त्व देना है। वह तर्क से ही समझाता व समझता है। तर्क द्वारा समग्र को नहीं समझा जा सकता है। क्योंकि तर्क भी वस्तुओं को खण्डित करता है। तर्क मन की ही ईजाद है। उसके द्वारा उसके पार सोच नहीं पाते है। तर्क शास्त्र ऐसा ज्ञान है ‘‘जो है’’ उसको नहीं सिद्ध करें एंव ‘‘जो नहीं है’’ उसको प्रमाणित कर दे। अर्थात् यह वायवीय है। बातुनी है, उपरी-उपरीे है। इसको जीवन में समझने का आधार नहीं बनाया जा सकता। जैसे की प्लेट में रखे दो अमरुदों को तर्क तीन सिद्ध कर सकता है। एक पहला जो है, व दूसरा दो नम्बर का अमरुद। अब एक एवं दो जोड़ो-यह तीन होता है। जबकि प्लेट में दो अमरुद ही है। तर्क द्वारा तीन अमरुद सिद्ध किये जा सकते है लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता है।
लेकिन मन के अधिन व्यक्ति को यह बात तो गले नहीं उतरती है। हमारी आदत तर्क प्रधान हो गई है। जबकि तर्क भी एक साधन है समझने-समझाने का। वह भी सब कुछ नहीं है। जिसके कारण जीवन को गहरे सत्यों को हम समझ नहीं पाते है। तर्क ही ज्ञान की कसौटी नहीं है। तर्क से सत्य को पकड़ा नहीं जा सकता। लेकिन तर्कातीत को ख्याल में लेने में मात्र तर्क सहायह है। जैसे तबला बजाने वाला बजाने के पूर्व हथोड़े से तबला ठोंकता है, वह संगीत नहीं है। वह संगीत की पूर्व तैयारी है। इस कारण जीवन में अन्धेरा छिटकता नहीं है।
मन का स्वभाव ही ऐसा है। फिर इसके कहने पर चल कर हम दुःखी होते है व कर्म भाग्य आदि को दोष देते रहते है। अरे! मन रूपी में नाव में ही छेद है तो भवसागर कैसे पार लगेगा। इस नांव में तो एक नहीं तीन-तीन बड़े छेद है। मन की इस स्वभाव, विशेषता व इसकी कुशलता को ध्यान में रख कर निर्णय लें।

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