Posts Tagged ‘धन्यवाद’
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मई
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, आत्मछवि, कृतज्ञता, कैंसर, खुद- इलाज, धन्यवाद, निर्णय, प्रार्थना, मन, शुभ कामनाएँ, सकारात्मकता, सेहत. 3s टिप्पणियाँ
आरोग्यधाम, प्रशान्ती कुटीर बैंगलोर में दिनांक 26.04.2013 से 03.05.2013 तक पत्नी सहित समग्र चिकित्सा हेतु रहा । यह स्वामी विवेकानन्द योग अनुसंधान संस्थान, (एस. व्यासा) डिम्ड विश्वविद्यालय का एक अंग है ।
यहां पर योग, आयुर्वेद व नेचुरोपेथी के स्वतन्त्र महाविद्यालय है । यहां योग पर रिसर्च सबसे अधिक हुई हैं एवं अनेक शोध पत्र चिकित्सा, मनोविज्ञान, के अन्तर्राष्ट्रिय जरनल्स छप चुके हैं । यहां पर योग चिकित्सा, आधुनिक विज्ञान, आयुर्वेद, नेचुरोपेथी व फिजियोथैरेपी के आधार से कई रोगों का सफलतापूर्वक ईलाज किया जाता है ।
पत्नी मीना के जोड़ों व सर्वाईकल दर्द में बहुत राहत मिली । वह विगत पांच वर्षों से दाई करवट सो नहीं पा रही थी, वह सोने लगी । वहां पर मीना के दर्द उठने पर तत्काल योगा करा कर पेन किलर देने की तरह दर्द दूर कर दिया ।योग, मसाज, लेप, स्टीम बाथ, सोना बाथ आदि से रीढ़ की हड्डी के सभी प्रकार के दर्द को दूर करने में विशेषज्ञता हासिल है ।
मेरा रक्तचाप 110/70 पर रहने लगा । नाड़ी शोधन व भ्रामरी का जबरदस्त प्रभाव देखा ।
गुरूजी डाॅ0 एच0आर0 नागेन्द्र भूतपूर्व अन्तरिक्ष वैज्ञानिक हैं जो अन्तरिक्ष की यात्रा को छोड़कर अन्तर्मन की यात्रा करा रहे हैं एवं विश्व प्रसिद्ध आधुनिक चिकित्सक डाॅ0 आर0 नागरत्ना दीदी का व्यवहार एवं सेवा अनुकरणीय है ।यह 100 एकड़ में निर्मित प्राकृतिक वातावरण से युक्त है । यहां का स्टाफ, थिरापिस्ट व डाॅक्टर सहयोगी हैं ।
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अप्रै
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Personality, Self-Healing, Stress Management, Uncategorized. Tagged: अलसी, ऊर्जा, एकाग्रता, क्षमता, खुद- इलाज, तनावमुक्ति, धन्यवाद, ब्लॉग लेखन, शिखर पर मिलेगे, समय प्रबन्धन, सेहत. 4s टिप्पणियाँ
यह एक आयुर्वेदिक पेय है जो निम्न मसालों से तैयार करें । इसके सेवन से सभी प्रकार की थकान तत्काल मिट जाती है । एक पाव हर्बल पेय बनाने हेतु निम्न मात्रा में सामग्री लें ।
1. सौंठ – 60 ग्राम
2. काली मिर्च – 25 ग्राम
3. सौंफ – 25 ग्राम
4. धनिया – 25 ग्राम
5. तेज पता – 25 ग्राम
6. ईलाइची छोटी – 12 ग्राम
7. ईलाइची बड़ी – 12 ग्राम
8. दाल चीनी – 12 ग्राम
9. लौंग – 12 ग्राम
10. अजवाईन – 12 ग्राम
11. जायफल – 3 ग्राम
12. पीपल – 3ग्राम
इन उपरोक्त सामग्री को अलग-अलग कुट पीस कर पाउडर बनाकर फिर मिक्स करे । एक कप पानी में उपरोक्त एक चम्मच मिक्स पाउडर को उबाल कर स्वादानुसार शक्कर मिलावें । इस प्रकार ऊर्जा पेय पिने के लिए तैयार है । यह सम्मेदशिखर की 20 किमी0 पैदल यात्रा करने पर पिलाया जाता है । यात्री थकान उतार कर पुनः 10 किमी0 चलते हैं । यह बढि़या हर्बल चाय है, पीकर लाभ देखें ।
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मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Self-Healing, Stress Management, Uncategorized. Tagged: अलसी, कैंसर, खुद- इलाज, धन्यवाद, प्रबल इच्छा, मन. 4s टिप्पणियाँ
डायबिटीज या मधुमेह एक चयापचय विकृति या रोग है जिसमें ब्लड शुगर की मात्रा बहुत बढ़ जाती है, क्योंकि शरीर में ब्लड शुगरको नियंत्रित करने वाले इंसुलिन हार्मोन का बनना कम हो जाता है और/या इंसुलिन अपने कार्य को ठीक से नहीं कर पाता है।

डायबिटीज में अलसी कैसे खायें?
डायबिटीज के रोगियों के लिए अलसी एक आदर्श और अमृत तुल्य भोजन है, क्योंकि यह जीरो कार्ब भोजन है। अलसी ब्लड शुगर नियंत्रित रखती है, डायबिटीज के शरीर पर होने वाले दुष्प्रभावों को कम करती हैं। चिकित्सक डायबिटीज के रोगी केा कम शर्करा और ज्यादा फाइबर लेने की सलाह देते हैं। अलसी में फाइबर की मात्रा अधिक होती है। इस कारण अलसी सेवन से लंबे समय तक पेट भरा हुआ रहता है, देर तक भूख नहीं लगती है। यह बी. एम. आर. केा बढ़ाती है, शरीर की चर्बी कम करती है और हम ज्यादा कैलोरी खर्च करते हैं। अतः मोटापे के रोगी के लिये अलसी उत्तम आहार है। उपरोक्त सभी बातों का सीधा अर्थ हैः
- ऊर्जा का सर्वोत्तम स्रोत,
- ठससे शरीर में वसा का कम होना,
- स्नायु कोशिकाओं में थकान नहीं होना,
- ऑक्सीजन और अन्य पोषक तत्वों की उपयोगिता में वृद्धि,
- स्वास्थ्य में वृद्धि,
- यानी छरहरी बलिष्ठ मांसल देह
डायबिटीज में अलसी कैसे खायें
संतुलित भोजन में अलसी का समावेश आसान, सस्ता और दूरदर्शी कदम है, लेकिन इसके परिणाम बड़े चमत्कारी मिलते हैं।यदि आप ज्यादा फाइबर लेने के आदी नहीं हैं तो अलसी को कम मात्रा से शुरू करें और फिर धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाएं। अलसी का सेवन करने से पहले इसे पीसना जरूरी है। इसे मिक्सर के ड्राई ग्राइंडर में दरदरा पीसें। इसे दही, दूध, सब्जी, दलिया, सलाद आदि के साथ भी लिया जा सकता है। पानी भी ज्यादा पीयें। डायबिटीज के रोगी को पूरा फायदा लेने के लिए रोजाना 30 से 60 ग्राम अलसी खाना चाहिये।
अलसी की रोटी –डायबिटीज के रोगी को रोज सुबह 20 ग्राम और शाम को 20 ग्राम अलसी का सेवन करना चाहिये। अलसी को पीस कर आटे में मिला कर रोटी बना कर खाना चाहिये। यही खाने का सबसे अच्छा तरीका है।
अलसी का तेल -अलसी के तेल को भी दही या पनीर में मिला कर लिया जा सकता है। यह भी याद रखें कि अलसी के तेल में सिर्फ फैट्स होते हैं। फाइबर, प्रोटीन, लिगनेन, विटामिन और खनिज तत्व हमें सिर्फ बीज द्वारा ही प्राप्त होते हैं। ( courtsy Dr O P Verma)
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फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Bloging, Personality, Spirituality, Uncategorized. Tagged: अलसी, अवचेतन मस्तिष्क, असफलता, धन्यवाद, मन, मस्तिष्क, लुईस हे, लेखक, विवाह. 1 टिप्पणी
हमारे जीवन में आंख खोलने वाले, स्वयं को राह दिखाने वाले, मूल्य सीखाने वाले कला-साहित्य आज स्वयं बाजार के शिकार है । जो दीपक है उसे ही बाजार अपने अनुसार करने हेतू प्रयत्नरत है । प्रेमचन्द की बजाय शिवखेड़ा पढ़ा जाता है । विशुद्ध साहित्य नही बल्कि प्रेरक साहित्य बिकता है ।
सिस्टम मनुष्य पर भारी पड़ रहा है । उजाले पर ही पहरे बैठे हैं । आज सब ताकत बाजार के हाथ है । बाजार की शक्ति निर्धारक होती जा रही है । इससे बचना कठिन है । बाजार हर चीज को कीमत में आंकता है । मुनाफा जीवन का मन्त्र हो गया है । हर चीज रूपयों से तोली जाने लगी है ।
मीडिया पूंजीपतियों के चुंगल में है । विज्ञापन दाता क्या छपेगा या दिखेगा हम करते है । मीडिया मालिकों को मूल्यों से सरोकार नहीं है । वे टी.आर.पी. से चलते हैं । सही बात मौलिक दृष्टि गोल है । मांग के अनुरूप परोसा जाने लगा है ।
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फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Meditation, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, Uncategorized. Tagged: अवचेतन मस्तिष्क, आत्मछवि, एकाग्रता, कृतज्ञता, कैंसर, टिप्पणी, धन्यवाद, निर्णय, प्रसन्नता, शिक्षान्तर. 2s टिप्पणियाँ
हमारा शरीर एक अद्भुत संयंत्र है जो महच्चेतना की एक अनुपम सृष्टि है। मनुष्य द्वारा निर्मित कोई भी सयंत्र, यहाँ तक कि अत्याधुनिक सुपर कम्प्यूटर भी, इसकी तुलना में अत्यंत तुच्छ है। भौतिक संयंत्र को बाहरी ऊर्जा से संचालित किया जाता है, स्विच आॅफ कर दें तो संयंत्र निष्क्रिय हो जाता है। हमारा शरीर जीवन-पर्यन्त आत्म- चेतना की अन्तर-ऊर्जा से प्रतिक्षण संचालित होता रहता है, निरंतर सक्रिय रहता है। विशालता एवं यांत्रिकता की दृष्टि से यह एक अद्भुत संरचना है।
इसके भीतर प्रतिघन मिलीमीटर रक्त में पचास लाख रक्त कण (रेड काॅप्सर््यूल) और पचास हजार लाख श्वेत रक्त कण दौड़ते है, मस्तिष्क में सतह सक्रिय सात करोड़ कोशिकाएँ (सेल्स) हैं और साढ़े पाँच फीट के आकारवाले शरीर में दस अरब सनायु – तंत्र हैं। वस्तुतः यह एक ऐसा सूक्ष्म ब्रह्याण्ड (माइक्रो यूनिवर्स) है जो आत्म-चेतना की ऊर्जा से सतत् संचालित रहता है और प्रत्येक सात वर्ष पर अपने पुराने पुर्जो का स्वतः नवीनीकरण कर लेता है। ये हैं इस स्थूल भौतिक शरीर की कुछ अद्भुत विलक्षणताएँ। किन्तु इनमे भी अधिक विस्मयकारी है इसके भीतर छिपी हुई अन्य विशेषताएँ जैसे पंच-इन्द्रियाँ, पंच-तन्मात्राएँ, पंच-प्राण, मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार, राग-विराग की कल्पना ओैर आत्म-चेतना का अखण्ड प्रवाह जो कभी पाणिनि-पतंजलि, कभी वाल्मीकि-कालिदास, कभी तुलसी-टैगोर और कभी विवेकानन्द-गाँधी के रुप में उद्वेलित हो उठता है। यह है हमारे शरीर और उसमें निहित चेतना का चमत्कार!
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फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Meditation, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, अवचेतन मन, असफलता, कृतज्ञता, खुद- इलाज, धन्यवाद, प्रसन्नता, मन, शिक्षान्तर. 4s टिप्पणियाँ
व्यवसाय आपके लिये है, आप व्यवसाय के लिये नहीं है। धन्धा पेट के लिये है, आप धन्धे के लिये नहीं है। जीवन जीने के लिये मिला है, व्यवसाय में डूबने के लिये नहीं। यह मंत्र जिसकी समझ में आ जाता है वह व्यावसायिक जीवन का दास न होकर उसका आनन्द उठाता है।
अपने कार्य, व्यवसाय, नौकरी से प्रेम कर उसका आनन्द उठायें। अपने काम की नकारात्मक बातें याद कर घृणा न करें। कई लोग अपने व्यवसाय को अपने अनुरूप न पाकर उससे शिकायत करते रहते हैं। यह असंतोष उनके जीवन को खोखला करता है व मन को अशांत करता है। इससे वे सदैव नाराज रहते हैं। जबकि वस्तुतः कोई भी व्यवसाय बडा या छोटा, अच्छा या बुरा नहीं होता है। यह उसके प्रति हमारी सोच है। व्यवसाय हमारे पेट के लिए होता है हम व्यवसाय के लिए नहीं बने हैं।
अपने व्यवसाय को सकारात्मक व अच्छा समझ कर हम भी अच्छे बन सकते हैं। हाँ, कुछ व्यवसायों से रिटर्न कम या ज्यादा हो सकता है। व्यवसायों की अपनी अच्छाईयाँ, बुराईया होती हंै। यदि हम अपने व्यवसाय को स्वीकार कर ले तो कोई कठिनाई नहीं है। अपने काम से प्यार करें। हर व्यवसाय में नामचीन लोग हुऐ है। हर व्यवसाय से लोग आगे बढ़ें हैं। दम पेशे में कम, व्यक्ति में अधिक होता है।
कृष्ण के निष्काम कर्म की भावना व्यवसाय के क्षेत्र पर भी लागू होती है। हमें अपने व्यवसाय को कत्र्तव्य समझकर करना चाहिये। निष्काम का अर्थ लक्ष्य बिना कर्म करना नहीं है। निष्काम का अर्थ फल की आसक्ति नहीं रखते हुए कर्म करने से है।
व्यवसाय चुनने के पहले सारा दिमाग लगा दो। अपने मन-माफिक है या नहीं समझ ले। एक बार व्यवसाय विशेष को चुन लिया फिर उसका बुरा पक्ष नहीं देखें। उसका सामना करने के उपाय खोजंे। उसमें भी बहुत सारी चुनौतियां व अच्छाईयां हैं।
हर व्यवसाय में बहुत अवसर हो सकते है। व्यवसाय को अपने ढंग से करंे। उसमें नई राहे खोजंे, अपने व्यवसाय के सफलतम लोगों का अध्ययन कर अपना विश्लेषण करें व अपने कार्य क्षेत्र के दिग्गजों से सम्पर्क में रहें।
व्यावसायिक जीवन में प्रसन्न रहने हेतु उसमें सफल होना जरूरी है। इसलियेे व्यावसायिक दक्षता हासिल करें। अपने व्यवसाय में निपुण होना, उसकी बारीकी को जानना, उसके हेतू उचित सम्पर्क व साथ रहना आना चाहिये। प्रोफेशन में लापरवाही नहीं चलती। प्रतिद्वन्द्विता का जमाना है। सावधान व सजग रहें ताकि धोखा न खा जाएं।
मनुष्य जीवन का अधिकतम् समय अपने व्यवसाय के प्रबन्धन में चला जाता है। व्यावसायिक जीवन संतुलित व प्रसन्नता देने वाला होना चाहिए। अपने व्यवसाय को भार, मजबूरी या खराब समझेेंगे। तो कभी भी आप उससे खुशी नहीं पा सकते ।
वारेन बफेट विश्व के दूसरे नम्बर के सबसे धनाढ्य व्यक्ति शेयर बाजार में निवेश करते हैं लेकिन उलझते नहीं है। निश्चित समय पर पूरी तन्मयता से काम करते है। फिर अपनी मौेज करते है। वे अपने साथ मोबाइल नहीं रखते व घर/ टेबल पर कम्प्यूटर के आगे नहीं बैठे रहते हैं। इतने जोखिम भरे प्रोफेशन में भी मस्ती से रहते हैं। इसका कारण है कि वे अपने धन्धे से दूरी रखने में कुशल हंै। घर पर, बिस्तर पर अपने पेशे को नहीं लाते हैं।
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जन
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, अवचेतन मन, अवचेतन मस्तिष्क, कृतज्ञता, कैंसर, धन्यवाद, निर्णय, मन, विवाह. 1 टिप्पणी
प्यार का प्रदर्शन आवश्यक है। यदि आप किसी को प्यार करते हो तो उसको प्रकट करिये, दिखाइयें। व्यस्तता से भरे जीवन में प्यार को छिपाने की आवश्यकता नहीं है। अपनी चाहत सामान्य लोगो से तो कहनी ही पड़ेगी। वे आपके प्यार को अन्यथा समझ न पाऐगे तो प्यासे ही रहेंगे। सबसे कमजोर व दुःखी को प्यार की ज्यादा जरुरत है।
यह सत्य है कि बुद्व पुरुषों या ज्ञानियों के सामने चाहत प्रदर्शित करने की जरुरत नहीं हेै। चूंकि आपके प्यार एवं समर्थन की उन्हें जरुरत नहीं है। लेकिन आम जन न तो आपके प्यार को पहचान सकता है, न प्रेम से परिपूर्ण है। उसे आपसे प्यार चाहिए इसलिए प्रदर्शित करों। तभी अमिताभ बच्चन बागवान में कहता है कि अधिकांश लोग अपनी पत्नी के प्रति प्यार को व्यक्त नही करते है। मैं यह गलती नहीं करता। मैं अपनी पत्नी के प्रति प्यार का बार-बार व्यक्त करता हूँ।
वह अन्यथा आपके प्यार से वंचित रह जायेगा। इसलिए प्यार के प्रदर्शन में बुराई नहीं है। व्यक्त करना समय की मांग है। अतः उसे व्यक्त करने की कला जानो। सम्बन्धों की दीवार इसी से मजबूत होगी।
माना कि कोई तुमसे प्यार करता है तो आप चाहते है न कि वह अभिव्यक्त करे। आप इसका आन्नद उठाओं। ठीक अन्य साथी भी उसी प्रकार को प्यार को प्रकट करने पर ही आन्नदित होते है ।
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जन
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Stress Management, success. Tagged: अभिवादन, ऊर्जा, एकाग्रता, क्षमता, टिप्पणी, धन्यवाद, नकारात्मता, प्रार्थना, ब्लॉग लेखन, मन, लेखक. Leave a Comment
यहाँ सब स्वार्थीं व बेईमान नहीं है। लेकिन दुःख की बात यह है कि बुरे लोगों का वर्चस्व है। अधिकांश लोग भले व सहायता प्रदान करने वाले है। गुणवान लोगों की यहाँ कद्र नहीं होती है क्योंकि वे संगठीत नहीं है। देश की आजादी हेतु कुर्बानी देने वाले क्या स्वार्थीं थे? क्या सूरज, पानी, हवा, पृथ्वी, आकाश आपसे किराया माँगते है? वेदव्यास से लेकर आज तक लेखक, कलाकार,सृजक आपसे व्यक्तिगत कुछ नहीं लेते है। वे सब आपको ज्ञान, संस्कृति, विचार, भावनाओं से आपको समृद्ध करते है। यह जीवन भले लोगो की अच्छाई के कारण ही चल रहा है।
कुछ लोग चोर-डाकू, हत्याएँ, बलात्कार करते है इससे सारा समाज बुरा नहीं हो गया। यह हमारी नकारात्मकता है कि हम कुछ बुरे लोगों के आधार पर पूरे समाज को दोष देते है।
अच्छे लोगों में दोस्ती प्रायः कम होती है। क्योंकि अच्छाई हमेशा अकेली रहती है। अच्छाई का अहंकार व्यक्ति को दूसरों से जुड़ने नहीं देता। जबकि बुरे व्यक्ति प्रायः शीघ्र ही दोस्ती कर लेते है। क्योंकि एक साथ बुरा काम करने से परस्पर अपनापन आ जाता है। तभी तो कहाँ जाता है कि दारू पीने वालो की दोस्ती मजबूत होती है। बुराई हमेशा अपने परिवार को बढ़ाती है। जबकि अच्छाई अकेले रहना पसन्द करती है। समय आ गया है कि अच्छे लोगों को भी एक-दूसरे को सहयोग करना होगा।
हमें इस धारणा को समाप्त करना है कि सब लोग खराब है। बेवजह अनेक लोग बहुत बढि़या है। मानवता, जीवन, हमारी उन्नति इन्हीं को बदोलत है। यहाँ सर्वत्र प्रेम है, परोपकार के भाव है, सत्य है, नैतिकता है। खुशियाँ बाँटने को बहुत लोग तत्पर है। अच्छाईयाँ समाप्त नहीं हुई है-हम देख नहीं पा रहे है?
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दिस
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Stress Management, success. Tagged: अभिवादन, कृतज्ञता, धन्यवाद, नकारात्मता, प्रबल इच्छा, मन, लेखक, शिक्षान्तर, शिखर पर मिलेगे, शुभ कामनाएँ. 1 टिप्पणी
नया वर्ष आ रहा है । जैसा कि संकल्प लेने का प्रचलन है । अपना पुनरावलोकन करने का समय है । गत वर्ष की उपलब्धियों व अनुपलब्धियों पर मनन की आवश्यकता है ।
स्वयं को जानने-समझने का अवसर है । अपनी आदतें, सपनों व प्रयत्नों को परीक्षण करने का समय है । आदतों को सफलता में सहायक अच्छी आदतों व हानिकारक बुरी आदतों को पहचानना है । हम आदतों मंे ही जीते हैं । आदतें बदलकर ही स्वयं को बदल सकते हैं । एच.डी. थोरो ने लिखा है कि वस्तुए नही बदलती, हम ही बदलते हैं । अतः स्वयं को बदलने की जरूरत है ।
एक विचार को बोइए, एक कर्म को जन्म दीजिए,
एक कर्म को बोइए, एक आदत को जन्म दीजिए,
एक आदत को बोइए, एक चरित्र को जन्म दीजिए,
एक चरित्र को बोइए, एक सफलता को जन्म दीजिए ।
हमे जीवन में स्थायित्व पंसद है । बदलने में सदैव भय रहता है, इसलिए कोई भी बदलना नही चाहता है । परिवर्तन में असुरक्षा है, नयापन है । आदतें व्यक्ति ने अपनी स्थिति, सोच व लक्ष्य के आधार पर बनती है । जीने के बीच रास्ता निकली हुई होती है । आदतों में स्थायित्व होता है व व्यक्ति उनसे एकाकार हो जाता है । उसमे वह रमा हुआ होता है । आदतें उसके जिने की शैली हो जाती है । उसका अपनत्व हो जाता है । उनको वह न्यायोचित ठहराने लगता है । आदतें उसके जीवन मूल्य में समा जाती है । वह उन्हे मूल्य देने लगता है ।
समय बीत रहा है । समय रूपी नदी में इसके साथ हम सब बह रहे हैं । इसके साथ अपने में परिवर्तन करते रहना है, तभी अपटूडेट रहेंगे । नही तो पिछड़ जाऐंगे । जो समय के साथ नहीं बदलता है वह पिछे रह जाता है ।
आप सबको नव वर्ष की शुभकामनाएं !
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दिस
Posted by jayantijain in Life-Management, Personality, Stress Management, success. Tagged: असफलता, क्षमता, टिप्पणी, धन्यवाद, निर्णय, प्रबल इच्छा, बदलना, बेटी, मन, शिखर पर मिलेगे, शुभ कामनाएँ. 2s टिप्पणियाँ
प्रिय बेटी ,
तुम पहली बार पढ़ने के लिए घर से बाहर दूर जा रही हो । हमारी शुभकामनाएं सदैव तुम्हारे साथ है । एक माली जैसे पौधे को नर्सरी में बड़ा करता है, लेकिन एक दिन उसे कोई अपने बगीचे में बड़ा करने ले जाता है। वैसे ही तुम्हे आगे बढ़ने घर से दूर जा रही हो । एक जहाज को समुद्र की यात्रा पर जाना ही पड़ता है । वहां आंधी, तुफान, बर्फ, डाकुओं आदि अनेक आघातों से उसका सामना होता है ।
लेकिन इन विपरित स्थितियों में ही जहाज की क्षमता का परीक्षण होता है । टाईटैनिक की तरह तुम पहली यात्रा मंे डूबने वाली नहीं हो । घर में रह कर कुशलता व क्षमता हासिल नहीं की जा सकती है। एक न एक दिन सबको घर से दूर जाना पड़ता है । अपनी क्षमता जगाने विपरित परिस्थितियों से जुझना पड़ता है ।
ओर, तुम तो विश्वप्रसिद्ध प्ण्प्ण्ज्ण् संस्थान के बरगद के नीचे जा रही हो । वहां जीवन व प्रतिभा के अनेक आयाम दिखेंगे । तरह-तरह की दक्षता व कुशलता के व्यक्ति मिलेंगे । साथ ही नकारात्मक श्रेणी के कुछ लोग भी कहीं मिल सकते हैं । उनको कैसे सुलटना ? उक्त कला आप स्वतः सीखेंगी ।
परदेश में अपने पराये को पहचानने के अनेक अवसर मिलेंगे । सबको सजगता से देखते हुए अपने पक्ष में उन्हे कैसे करना ? यह कला आप जानती है । व्यक्ति को उसकी आवाज, देहभाषा एवं भाषा से समझ कर तद्नुकूल व्यवहार करना तुम्हे आता है। संवाद से कैसे रिश्ते मधुर बनाये जा सकते हैं । अपरिचित एवं अयोग्य को भी अपने पक्ष मेे प्रयोग करना सिखो । एक सुनहरा अवसर मिला है जहां तुम अपनी धार पैनी (तेज) कर सकती हो ।
शारीरिक रूप से दूर होने से तुम घर से दूर न हो । प्रेम व समय से भौगोलिक दूरियां बड़ी नहीं होती है । तुम सदैव हमारे पास व साथ हो ।
कोई कृत्य अपनी अन्तरात्मा को कोसे, ऐसाकोई कार्य न करें । अपना सामना स्वयं कर सके । उन लोगों से, त्ववताप प्ण्प्ण्ज्ण् से सर्वज्ञा कितना सीखती है, महत्वपूर्ण यह है । 4 वर्ष की ठण्ज्मबीण् वाले से ज्यादा एक माह मेें कैसे सीखें ? यह प्रश्न जीतनी बार आप अपने से पूछेगी, उतनी ही तुम्हारी सीखने की क्षमता बढ़ेगी ।
तुम प्रतिभावान, क्षमतावान, साहसी हो, योग्य हो, ओर उसमे कई गुणा वृद्धि कर शीघ्र लौटो । स्व-प्रबन्धन में कुशलता अति आवश्यक है ।
मेरी बातों को उपदेश न समझे । यह मेरी समझ व क्षमता है जिसको तेरे से शेयर कर रहा हूॅ ।
स्वागतातुर,
पापा-मम्मी