Posts Tagged ‘जीवन प्रबन्धन’

हमें कौनसा तेल खाना चाहिए ?

fatsNoYesहमे अपने पूर्वजों द्वारा खाए जाने वाले तेल हमारे जीन्स में बसे होते हैं । अतः अपने पूर्वजों द्वारा खाए जाने वाले तेल ही खाना उचित है । जैसे पंजाबी सरसों का व दक्षिण भारतीय नारियल का तेल खाता रहा है, इन्हे खाए तो ठीक है । एक व्यक्ति को प्रतिदिन अधिकतम तीन चम्मच घी/तेल आदि वसा का प्रयोग करना चाहिये । वैसे नारियल के तेल में मिडियम चैन फेटीएसीड्स के होने से खाने में अच्छा माना जाता है ।
भोजन पकाने में अधिक स्माकिंग पाॅईन्ट वाला तेल खाना चाहिए ताकि छोंकने पर ट्रान्सफैट कम से कम बने । अधिक तलने पर प्रत्येक तेल ट्रान्सफैट बन जाता है, अतः उससे बचे ।
सभी प्राकृतिक/सहज तिलहन से बने तेल खाना स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक है । सरसों, तिल, मूंगफली, नारियल के कच्ची घाणी से निकले तेल श्रेष्ठ है । सोया, सफोला, राईसब्रान आदि से निकले तेल को खाने योग्य बनाने हेतू रिफाइण्ड करना पड़ता है । केन्सर फैलाने वाले फास्फोरिक एसिड, हेक्जीन एवं कास्टिक सोड़ा रिफाइण्ड में प्रयुक्त होते हैं । इससे रिफाइण्ड तेल हानिकारक है । कृत्रिम तरिके से निकाले गये तेल सभी अखाद्य है, जिन्हें कृत्रिम तरिके से तैयार किया जाकर खाद्य बनाया गया है, इस प्रकार रिफाइण्ड कर अखाद्य तेल को खाद्य बनाया जाता है । रिफाइण्ड की बजाय फिल्टर्ड तेल खाना स्वास्थ्यवर्द्धक है । कच्ची घाणी व एक्सपेलर से निकले तेल खाना चाहिए ।
तेल की पैकिंग पर लिखे किसी भी वाक्य से अप्रभावित रहें । जैसा कि कुछ तेल की पैंकिग पर लिखा होता है कि इसमें काॅलस्ट्रोल नहीं है । किसी भी वनस्पति तेल में काॅलस्ट्रोल नहीं होता है । काॅलस्ट्रोल हमारे शरीर में जाकर बनता है । जैतुन का तेल अच्छा होता हैं, लेकिन इसका प्रयोग पकाने में ठीक नहीं है ।

Related Posts:

रिफाइंड तेल से कैंसर हो सकता है?

क्या पोषक आहार के होते हुए पुरक आहार की जरूरत है ?

वनस्पति घी भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है

धन्यवाद केैसे देना कि वह उन तक पहुँचे

Essential Fatty Acids

अवचेतन की धुलाई होली पर:शुभकामनाएँ

 अवचेतन  की  धुलाई होली   परहोली तो बस एक बहाना है रंगों का, ये त्यौहार तो है आपस में दोस्ती और प्यार बढ़ने का, चल सारे गिले सिक्वे दूर कर के, एक दुसरे को खूब रंग लगते हैं मिलकर होली मानते हैं!
होली की आपको हार्दिक शुभकामनायें!

Related Posts:

होली की प्रांसगिकता और शुभकामनाएँ

 

उत्तरी भारत में होली पर बच्चे की ढून्ढ क्यों करतेहै?

सुखी होने अन्तर्यात्रा करें व अन्तर्मन की सुनंे

जीवन प्रबन्धन का महत्व- ‘‘स्विमोलोजी’’की कहानी

 

अगर हमंे आत्म प्रबन्धन की कला नहीं आती है तो जीवन की सारी पढ़ाई एवं सारी तथाकथित उपलब्धियाँ बेकार है। इस पर मुझे पश्चिमी देश की एक कहानी याद आती है-
एक प्रोफेसर, एक जहाज से यात्रा कर रहा था। बहुत पढ़ा-लिखा तो था पर अभी जीवन का अनुभव कम था। उसी जहाज पर एक बहुत बूढ़ा अनपढ़ नाविक भी यात्रा कर रहा था। कभी-कभी वह नाविक प्रोफेसर के केबिन में जाता था और उसकी बड़ी-बड़ी, ऊंची-ऊंची पांडित्यपूर्ण बातें सुनकर अवाक रह जाता था कि वह कितना पढ़ा लिखा, और विद्वान पंडित है।
एक दिन बहुत बातें होने के बाद जब वह जाने लगा तो प्रोफेसर ने पूछ लिया-‘‘अरे बाबा, तूने जियोलोजी (भूगर्भ-शास्त्र) पढ़ी है ?’’
नाविक बोला-‘‘वह क्या होता है साहब ?’’
प्रोफेसर -‘‘इस धरती का एक शास्त्र होता है। तूने पढ़ा है ?’’
नाविक-‘‘साहब, मैं तो बिल्कुल अनपढ़ हंू, मेरे लिए काला अक्षर भैंस बराबर है। मैं किसी स्कूल में गया नहीं। मैंने कुछ नहीं पढ़ा।’’
प्रोफेसर-‘‘अरे बाबा, तूने अपनी एक चैथाई जिंदगी बरबाद कर दी।’’

बूढ़ा बहुत उदास हो गया! इतना बड़ा विद्वान कहता है तो सचमुच मैंने एक चैथाई जिंदगी बरबाद कर दी होगी। दूसरे दिन फिर प्रोफेसर के पास आया। बहुत-सी बड़ी-बड़ी बातें सुनने के बाद जब जाने लगा तो फिर प्रोफेसर पूछ बैठा-‘‘अरे बाबा, तूने ओशनोलोजी (समुद्र-शास्त्र) पढ़ी है ?’’
नाविक-‘‘वह क्या होता है, साहब ?’’
प्रोफेसर-‘‘ अरे,समुद्र का भी एक शास्त्र होता है, तूने पढ़ा है?’’
नाविक-‘‘ महाराज! मैंने कुछ नहीं पढ़ा।’’
प्रोफेसर -‘‘अरे बाबा, तूने अपनी आधी जिंदगी बरबाद कर दी।’’
बूढ़ा बड़ा उदास हुआ!
तीसरे दिन प्रोफेसर ने फिर पूछ लिया-
‘‘अरे बाबा, तूने मिट्रीयोलोजी (मौसम विज्ञान) पढ़ी है ?’’
नाविक-‘‘वह क्या होती है, कभी सुनी ही नहीं।’’
प्राफेसर-‘‘अरे, इस हवा का,पानी का,मौसम का,ऋतु का,इन सबका भी एक शास्त्र होता है, पढ़ा है ?’’
नाविक-‘‘ साहब! मैंने कुछ नहीं पढ़ा।’’
प्रोफेसर -‘‘अरे बाबा, तूने अपनी तीन चैथाई जिंदगी चैपट कर दी। जिस धरती पर रहता है उसका शास्त्र नहीं पढ़ा। जिस समुद्र में रोज यात्रा करता है उसका शास्त्र नहीं पढ़ा। जिस हवा पानी के मौसम से तेरा वास्ता पड़ता है, उसका शास्त्र नहीं पढ़ा। बड़ा अभागा है रे!’’
बूढ़ा, बड़ा उदास। अगले दिन बाबा की बारी आई- भागा भागा आया और पूछा-‘‘प्रोफेसर साहब, प्रोफेसर साहब ! आपने स्विमोलोजी (तैराकी-शास्त्र) पढ़ी है ?’’
प्रोफेसर -‘‘वह क्या होता है ?’’
नाविक-‘‘आप को तैरना आता है ?’’
प्रोफेसर -‘‘नहीं भाई, मुझको तो तैरना नहीं आता।’’
नाविक-‘‘तो प्रोफेसर साहब, आपने अपनी पूरी जिंदगी चैपट कर दी। इस जहाज को टक्कर लग गयी है। यह डूबने ही वाला है। वह किनारा दिखायी दे रहा है जिसको तैरना आता है, वह वहां तक पहुँच जायेगा। जिसको तैरना नहीं आता,वह तो डूब ही जायेगा। आपने तो अपनी पूरी जिंदगी खो दी।’’
तो भाई, सारी दुनियाभर की ‘‘लोजी’’ (शास्त्र) पढ़ लेंगे और ‘‘स्विमोलोजी’’नहीं पढ़ेंगे, तो ये सारी ‘लोजियां’ किस काम आयेंगी ?

 

 

 

 

“जियो तो ऐसे जियो” यह पुस्तक आपके लिए क्यों उपयोगी है?

जीवन-मुर्गों की रूसी-कथा

एक प्राचीन रूसी कथा है

एक बड़े टोकरे में बहुत से मुर्गे आपस में लड़ रहे थे। नीचे वाला मुर्गा खुली हवा में सांस लेने के लिए अपने ऊपर वाले को गिराकर ऊपर आने के लिए फड़फड़ाता है। सब भूख-प्यास से व्याकुल हैं। इतने में कसाई छुरी लेकर आ जाता है। एक एक मुर्गे की गर्दन पकड़कर टोकरे से बाहर खींचकर काटकर वापस फेंकता जाता है। सफाई कर पंख आदि बाहर फेंकता जाता है।कटे हुए मुर्गों के शरीर से गर्म लहू की धार फूटती है। भीतर के अन्य जिंदा मुर्गे अपने पेट की आग बुझाने के लिए उस पर टूट पड़ते है। इनकी जिंदा चोंचों की छीना-झपटी में मरा कटा मुर्गे का सिर गेंद की तरह उछलता लुढ़कता है। कसाई लगातार टोकरे के मुर्गे काटता जाता है। टोकरे के भीतर की खाद्य सामग्री में हिस्सा बांटने वालों की संख्या भी घटती है। इस खुशी में बाकी बचे मुर्गो के बीच से एकाध की बांग भी सुनायी पड़ती है। अंत में टोकरा सारे कटे मुर्गो सेे भर जाता है। चारों ओर खामोशी है, कोई झगड़ा या शोर नहीं है।
इस रूसी कथा का नाम है-जीवन।
ऐसा जीवन है। सब यहां मृत्यु की प्रतीक्षा में है। प्रतिपल किसी की गर्दन कट जाती है। लेकिन जिनकी गर्दन अभी तक नहीं कटी है, वे संघर्षरत हैं, वे प्रतिस्पर्धा में जुटे हैं। जितने दिन, जितने क्षण उनके हाथ में है, उनका उन्हें उपयोग कर लेना है। इस उपयोग का एक ही अर्थ है-किसी तरह अपने जीवन को सुरक्षित कर लेना है, जो कि सुरक्षित हो ही नहीं सकता।

सफलता सदैव खुशी, शांति व तृप्ति नहीं लाती है। सफलता हमारी प्रतिष्ठा जरुर बढ़ा देती है। सफलता के

साथ शान्ति के आने का कोई नियम नहीं है।

( मेरी पुस्तक जियो तो ऐसे  जियो की प्रस्तावना से )

सुखी होने अन्तर्यात्रा करें व अन्तर्मन की सुने

ज्यादातर लोग कभी अपनी अन्तरात्मा की आवाज नहीं सुनते है।
                                                                                                                    - स्टीफन आर. कवि

हम अपने सूक्ष्म शरीर एवं भाव जगत् को व्यवस्थित करने के लिए आन्तरिक अवलोकन करते हंै।
शरीर एवं उपनिषद् सिखाते हैं,-‘यत् पिण्डे,तत् ब्रह्मांडे’। दीपक चोपड़ा ने लिखा है-मानव देह ब्र्रह्मांड की अभिव्यक्ति है। जिन तत्त्वों और शक्तियों से ब्र्रह्मांड बना है, उन्हीं से हमारा शरीर,मस्तिष्क एवं आत्मा भी बने हैं। सूक्ष्म और विराट दोनों एक ही है। मानव-देह और ब्रह्मांडीय-देह एक ही है। मानवीय-मस्तिष्क और ब्रह्मांडीय-मस्तिष्क एक ही हैं। यही वेदों का मूलभूत संदेश और सिद्धांत है।हम किस प्रकार सोचते हैं, महसूस करते है, स्मरण करते हैं, और कल्पना करते हैं, ये सारी बातें हमारी देह को प्रभावित करती है। लेकिन स्व-संवाद की कमी के कारण हम अपने से दूर चले गये है। स्व संवाद का अर्थ है-आपके मन में चलने वाला वार्तालाप। लोग बाहर से तो अपने आपको बदल लेते हैं परंतु अंदर से वैसे ही रहते हैं। जब तक आप अपने बारे में जो खयालात रखते हैं, उन्हें नहीें बदलते, तब तक आप अंदर से स्वयं को नहीं बदल सकते। आपके विचार आपको जो खबर देते हैं, आप अपने आपको वही मान लेते हैं। इसलिये पहले आपको अपने अंदर चलने वाले विचारों को बदलना हेगा। स्व संवाद बदलने से आप अंदर से बदल जाते हैं, यही स्व संवाद का जादू है।

अपने शरीर के संकेतों को सुनें। हमारा शरीर अपने ऊपर होने वाली ज्यादतियों का विरोध प्रकट करता है। शरीर की थकान,सोने की इच्छा,काम न करने का मन, सरदर्द आदि ऐसे संकेत हैं। जब कभी पानी पीने का भाव जगे, शौच एवं पेशाब करने की इच्छा हो तो उसे तत्काल पूरा करें, संकोच की जरूरत नहीं है।
अन्र्तप्रेरणा सुनंे और जीना सीखें। हम अपनी व्यस्तता के कारण अपने से ही बहुत दूर चले गयें हैं । इस संसार में हमारा दूसरों से बहुत कम संवाद हैं एवं स्वयं से भी संवाद नहीं के बराबर हैं । हम अपने अन्र्तमन के संकेतों व संदेशों को ग्रहण नहीं करते है। जब आप अपनी बात नहीं सुनते है तो दुनिया में किसी ओर की बात कैसे सुन सकते हैं । हम अपनी सबसे ज्यादा अनदेखी करते हैं। कई बार मनुष्य का अचेतन घटनाओं का विश्लेषण कर कुछ सूचनाएं व संकेत देता है लेकिन तब हम उस पर ध्यान नहीं देते हैं । आपका शरीर, मस्तिष्क, मन और आत्मा निरन्तर कुछ न कुछ किसी न किसी रूप में आपसे कहते रहते हैं। अपनी अन्र्तप्रेरणा ही आपकी सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक है । इस स्त्रोत का लाभ उठाकर व्यक्ति चाहै हेे जितनी उन्नति कर सकता हैं । पाओलो कोएलो ने एल्केमिस्ट को साफ तौर पर ऐसे संकेत ग्रहण करते हुए दिखाया है । वह प्रकृति द्वारा दिए जाने वाले संकेतों एवं लक्षणों को महत्व देने के कारण ही सफल होता हैं।

शरीर की भाषा समझें। जब हल्का सर दर्द हो तो उसे दो रुपये की गोली या पेनकिलर लेकर दबाने की कोशिश न करें। अच्छा हो कि विश्राम करें। कैसी विड़म्बना है कि आप अपने शरीर को रोगी बनाएँ व डाक्टर उसे ठीक करे। दवाइयाँ आपात काल के लिए है। सामान्य परिस्थिति में उनका सेवन ठीक नहीं है। डाॅक्टर व दवाइयाँ आपके लिए ही नहीं है; उनमें डाक्टर व दवा बाजार की ताकतेें शामिल हंै जो आपके पक्ष में नहीं है।
मानव-देह जीवित मन्दिर है। इसके होने से आप हैं। अस्तित्व इसके द्वारा आप को अभिव्यक्त करता है। अतः इसका ध्यान रखंे। शरीर के सकेतों को अनसुना न करें। यह गूंगा जरूर है, लेकिन प्राणवान है। अतः इसे मित्र बनाएँ।
अपने शरीर से संवाद नहीं होने से हमारा उस पर नियन्त्रण नहीं रहताहै। ऐसे में शरीर स्वंय मालिक हो जाता है। वह एक सीमा के बाद अपनी रिपेयरिंग नहीं कर सकता है। ऐसे में हमारी उम्र घटती है।इससे बुढ़ापा शीघ्र आ जाता है।
प्रतिदिन हम भोजन करते हैं। लेकिन क्या खाना चाहिए एंव कितना खाना चाहिए यह बहुत कम लोग जानते हैं। स्वाद के कारण हम इस शरीर पर कई बार अनावश्यक बोझ डाल देते हंैै। फिर कहते हंै कि मुझे अपच है, गैस रहती है। नोबेल पुरस्कार विजेता डा.लिनस पोलिंग ने कहा था कि आप लोग जो भोजन करते हैं वह पच्चीस प्रतिशत आप के लिए है, शेष पिचहतर प्रतिशत भोजन आप डाक्टरों के पेट के लिए करते हैं।
जब कभी हम नकारात्मक होते हैं तो तत्क्षण शरीर में अनेक तरह के हानिप्रद रसायन बनने लगते हैं। हमारा शरीर दुनिया की सबसे बड़ी फार्मास्युटिकल फैक्ट्री है। यह अपने मस्तिष्क के कमाण्ड पर अनेक तरह के रसायन बनाता है।
ईश्वर की सबसे बड़ी कृति इंसान है। हमारे पास सर्वश्रेष्ठ साधन है। प्रकृति की सारी व्यवस्था है। इसके उपरान्त भी हम अपने अहं व लोभवृत्ति के वश में होकर इस शरीर पर अनेक तरह के अनावश्यक बोझ  लादे हुए हैं।

( मेरी पुस्तक जियो तो ऐसे  जियो से)

Related Posts:

मरने के लिए नहीं, जीने के लिए( तनाव मुक्त होने ) जहर पीओं

कायर आत्महत्या करने हेतु जहर एक बार पीते है लेकिन शुरवीर हम है जो जीने के लिए कई बार जहर पीते है। भगवान शिव ने भी तो जहर पीआ था, हमें भी पीना पड़ता है। जैसा शीव ने जहर को गले के नीचे नहीं जाने दिया, वैसे ही हमें भी इस जहर को गले के नीचे नहीं जाने देना है। अर्थात् इस जहर से अपने पूरे शरीर को हानि नहीं पहुँचानी है। जीवन जीने की कला द्वारा उक्त जहर को निष्प्रभावी बनाना है।
जहर अनेक तरह के अपने परिजन ज्यादा पीलाते है। रस्मों, जातिवाद, तेरा-मेरा के जहर होते है। यहाँ हमारी इच्छाओं का सम्मान कोई नहीं करता है। हम कभी भी कहीं समाज में स्वतन्त्र नहीं है। सर्वत्र परम्पराएँ जहर पीलाती रहती है। न चाहते हुए भी हमें उसी अनुसार करना पड़ता है।
हम पर इतने दबाव होते है कि हम अपनी ईच्छा से कपड़े तक नहीं पहन सकते है। बात भी वही करनी पड़ती है जो दूसरों को सुहाती है। जो लोग हमें तरह-तरह से डूबाते है उनका सम्मान कराना पड़ता है। जिन लोगों की हम शक्ल नहीं देखना चाहते है उनकी मेजबानी करनी पड़ती है।
सामाजिक व जातिगत पंचायते हमको व्यक्ति नहीं समझती है। हमारे दुःख में औपचारिकताओं के अलावा काम नहीं आती है। लेकिन उनका जीवन भर दबदबा रहता है। उनके आंतक से हमें गलत निर्णय करने पड़ते है। वे हमारे मन में सदैव भूत की तरह डराती है। हमारे कभी हाल नहीं पूछती है। हमारा आजादी छिनने में उन्हें मजा आता है। वे हमारे प्रत्येक सार्वजनिक कर्म को नियन्त्रित करते है।
हम खुश कब रहे वह भी वे तय करते है। त्यौहार मनाने की विधि व साधन उनके अनुसार होते है। हमारे जीवन में कई बार लगता है कि हम ही अनुपस्थिति है। शेष वे सब है जो न होने चाहिए यह हमारी पराधीनता नहीं तो ओर क्या है।
क्या शीवजी की तरह जहर पीना ही हमारी नियति है। जातिगत समाज धर्म के नाम पर हैवानियत करते हैं। चन्द गुण्डे समाज का नेतृत्व कर व्यक्ति को तुच्छ बना देते है, जबकि व्यक्ति के बिना समाज हो नहीं सकता है। समाज की ठोस इकाई व्यक्ति है। समाज एक कल्पना है। जबकि व्यक्ति एक यथार्थ है। समुह अपने सदस्यों के बल पर इतराता है। सदस्यों के अभाव में समाज हो नहीं सकता है।
मानव समाज जरुरी है, जातिगत समाज गैर-जरुरी है। संगठित रखने, पवित्र रखने व परम्पराओं के नाम पर जातिगत समाज रोज जहर पीलाता है। हम उसके कलपूर्जे बन जाते है। व्यक्तिगत आजादी समाप्त है।
दूध देने वाली गाय की बात सहनी पड़ती है। पश्चिम में जैसा कि कहते है कि मुफ्त में कोई भोजन नहीं कराता है। जीवन में समाज बहुत कुछ सीखाता है, देता है तो थोड़ा जहर भी पीलाता है। यह सब जीवन का क्रम है।
जितना बच सकते है, बचो। वरन् जहर को गले से नीचे मत उतरने दो। अपना जीवन अपनी चाल से चलो। अपनी समझ बढ़ाओं। मौन हो जाओ, नदी में उतरो, लेकिन भीगो मत। संसार में रहना पड़ता है, इसे बदलना मुश्किल है। अपने बच के निकल जाओ। छोटी सी जिन्दगी है, यह भी निकल जायेगी।

घर व मकान में क्या अन्तर है एवं मकान को घर कैसे बनाए ?

मकान ईंट, सीमेन्ट व पत्थर से बनता है, जबकि घर परिवार के सदस्यो के बिच स्नेह एवं संबंध से बनता है । जहां पर सुरक्षित व अपनत्व महसूस करते है उसे घर कहते है । घर से हम संबंधित होते है जहां हमारे माता-पिता, चाचा-ताउ, भाई-बहन व बच्चंे रहते हैं, उसे घर कहते है । मकान शरीर है व घर आत्मा है । घर एक आश्रम होता है जंहा पर सभी मिलजुल कर रहते है व एक दूसरे के लिए जीते है ।

घर में सुविधाऐं भले ही कम हो लेकिन सदस्यों का मन बहुत बडा होता है । घर के सदस्य एक दूसरे के लिए त्याग कर खुश होते है । घर की कोई सीमा नहीं होती । घर स्वर्ग-नरक की प्रतिछाया है । यंहा बिना शर्त प्यार एवं संरक्षण मिलता है । सभी लोग अपनी अपनी मर्यादा में रहते है एवं मर्यादा को भलीभातिं पहचानते है ।,घर में मुखिया का अनुशासन होता हैं लेकिन मकान के सदस्य आप मुख्तार होते हैं। यहां कोई किसी की सुनता नही हैं। सदस्य परस्पर रिस्तो को जिते हैं। उनकी प्राथमिकता में अपनत्व पहले होता हैं।

मकान में रहने वाले पैसो को महत्व देते हैं। मुखिया के क्रोध से घर मुक्त नही होता है लेकिन क्रोध के पीछे व्यक्तिगत हित नही वरन् सदस्यों का हित निहित होता है । जिस घर में नकारात्मकता घुस जाती है वो घर नहीं मकान हो जाता है । तभी भाई – भाई इन्च इन्च जमीन के लिए लडते है व माॅ-बाप को वृद्धावस्था में भेजा जाता है ।
विचारे कि हम कहा रहते हैं एवं घर बनाने में कैसे सहयोग कर सकते हैं?

अवचेतन का जादू :काम-वासना का शिकंजा

मेरे भीतर अभी भी कामदेव जीवित है। मैंने उनका सामना कई तरह से किया। काम-भोग को देखा, भोगा लेकिन प्यास अभी भी कायम है। अवचेतन का प्रभाव  गहरा होता  है।
यह आग अभी तक क्यों दहक रही है। किशोर अवस्था में जैसी प्यास थी, नारी जितनी अच्छी लगती थी आज भी उतनी ही आकर्षित करती है। चुपके से नारी, उसके उभारों को देखना, उसके अन्तः वस्त्रों कोे देखना अभी भी मन को अच्छा लगता है। काम को उत्तेजित करने वाले व काम सम्बन्धी बातों में अभी भी रस मौजूद है। नैसर्गिक माँग अनैसर्गिक ओर हो जाती है, कई बार। आखिर यह मन कब तक यूं ही भटकता रहता है?
इससे उसमें कुछ नया न मिलता है, फिर भी चाह मरती नहीं है। वही प्रयोग बार-बार होता है। भोगने के बाद कुछ घंटे तृप्ति तो रहती है। फिर कुछ समय बाद वासना अंगड़ाई लेती है। उपलब्ध में कमी नजर आती है व अप्राप्त आकर्षित करती है। यह खेल यथावत जारी है। जबकि ओशो को समझने के बाद भावनाओं का दमन अधिक न किया। जागृत रहने का प्रयत्न किया। फिर भी मन से वासना न गई।
शायद मैंने शर्तों पर सोचा है। ऐसी सुन्दर है, इतनी वफादार हो, पूर्व समर्पित हो तभी पूर्ति होगी। अन्यथा प्राप्त में कमी निकाल कर उसे बेकार कर देता हूँ व कहीं ओर से पूर्ति का सपना देखता हूँ। कई बार अपनों से शिकायत नहीं, फिर भी गैर मन को सुहाते है। मन कभी प्रयोग करना चाहता हूँ। कभी निकटता आकर्षित कर लेती हूँ तो कभी मौके का लाभ देखता हूँ।
शरीर के तल पर मिलन से मन का तल तृप्त नहीं होता। विचार के तल पर मिलन चाहिए। प्रेमपूर्ण चित्त नहीं है। आध्यात्मिक तल पर प्रेम को जाना नहीं है। इसलिए कामुकता जीवन से गई नहीं है।
समाजिक वर्जना ने सेक्स ओबशेसन पैदा किया है। सेक्स को दबाने के क्रम वह मरा नहीं बल्कि जहरीला हो गया है। यह जहर मुझे बेहोश करता है व मादाएं मुझे लुभाती है। सजगता से जीवन यापन नहीं कर पाता हूँ।
अधुरा भोग प्सास मिटाता नहीं है। पूर्णता में भोगने का समग्र मन न था। अर्थात् मैं समर्थ न था। विचारों के साथ भोगा जो तृप्त न हुआ। तभी तो भयभीत हूँ, खण्डित हूँ, अधुरा हूँ,एवं अप्रामाणिक हूँ। मूच्र्छा में जीने के कारण समग्र भोग न पा सका।
मैं सिद्धान्त, शास्त्र एवं विचारों से बंधा हुआ हूँ। अतः सेक्स को सूक्ष्म रूप से अचेतन रूप से दबाता रहा हूँ। एक तरफ नीति शास्त्र के बंधन है, तो शिक्षा के ताप अपनी जगह पर है।
मैं भीड़ से, समाज से, दूसरो से प्रभावित होता हूँ। उनसे डर कर सेक्स को दबाता रहा हूँ। सेक्स पर परिवार, पड़ौसियों की मर्यादा के नियम है। उनकी बुद्धि से भी चलता हूँ। मैं अकेला नहीं हूँ। सामाजिक रीति-रिवाज, प्रचलन, फैशन, कला सब सेक्स के विरुद्ध है। एक तरह से उससे नाराज होना लड़ना ही है। मैं सेक्स से बंध गया क्योंकि मैं सेक्स को पराजित करना चाहता हूँ। यह लड़ाई क्या सेक्स को भाव नहीं दे रही है?
विज्ञापनों से प्रभावित मन भटकता है। बाजारवाद मन को वासना में ले जाता है। बुद्ध ने इसी कारण वासना को दुष्पूर कहा है। यह पूरी नहीं होती। ऐसा इसका स्वभाव है। जबकि उपनिषद् कहते है भोगो तो छुटेगा। अर्थात् मैं इस ऊर्जा को समझ न पाया। इसके नियमों को पहचान न सका।
सेक्स में समय-शून्यता, शरीर-शून्यता व अहं-शून्यता की झलक मिलती है। यह झलक मैं बार-बार लपकना चाहता हूँ।
मैं प्रेमपूर्ण नहीं हूँ। मेरा मन घृणा, ईष्र्या, चिन्ता से भरा है। इसलिए मैं कामूक हूँ।
मेरी दृष्टि काम के प्रति सही नहीं रही। विरोध की दृष्टि से काम बढ़ा। मैंने उसे सहज नहीं लिया। उसे दुष्टमन समझा। इससे काम को बल मिलता रहा।

मन को कैसे जीतना?

महाराजा जनक संसार में रहते हुए कैसे ऋषिवत जीते

मन के निर्णय या ज्ञान को हम अपना समझ बैठते है। जैसा कि आँख, नाक, कान, जिन्हा व स्पर्श इन्द्रिय की सीमा है। वे भी अपनी सीमा से बाहर अनुभव नहीं कर पाते है। वैसे ही मन भी अपनी सीमा से बाहर जाकर अनुभव नहीं कर सकता है। जबकि सत्य इसके पार होता है तभी चेतना के अनुभव पर उपनिषद् के ऋषियों ने नेति-नेति की बात कहीं है। मन के इसी स्वभाव के कारण हमारे जीवन में हर चीज भली-बुरी थोड़े समय में समस्या बन जाती है। हम किसी भी सम्बन्ध, घटना, वस्तु, व्यक्ति से सुख उठाते-उठाते अचानक दुःख पाने लग जाते है। हमारी प्राप्ति कब व्यर्थ हो जाती है हमें पता ही नहीं लगता है।
मित्रों, वैसे मन हमारा दुश्मन नहीं है। यह चेतन ने ही बनाया है। आकार से उपर उठने, निराकार को जानने मन के पार जाना पड़ता है। बेईमान होने का अवसर होने पर ईमानदार होना ही उपयोगी है।
संसार हम अपनी मन की आंख से देखते है। हम जगत को हमारे मन के चश्मे से देखते है। अर्थात् ‘‘जो है’’ कि बजाय ‘‘जो नहीं है’’ वह स्व-निर्माण कर देखता है। अर्थात् हम अपना ही प्रक्षेपण करते है। अपनी बुद्धि व स्वार्थ से देखते है। इस अर्थ में हम अन्धे हो जाते है।
महाराजा जनक संसार में रहते हुए कैसे ऋषिवत जीते है? शक्तिशाली होकर भ्रष्ट नहीं थे। जीवन जीने की कला के गुरु है। इस मन को पहचान कर ही वे घर में वैरागी थे। सब कार्य करते हुए भी अकत्र्ता थे, उनकी क्रिया में अक्रिया थी। सारे उपद्रवों के वे दृष्टा थे। यह कला मन के स्वभाव को जान कर ही संभव है। इस कला का सार यही है। अपने भीतर उठते विचार, भाव व शब्दीकरण को सतत देखो। दो विचारों, के बीच पड़ते अन्तराल को देखो। इसी तरह साक्षी भाव बढ़ेगा, मन मिटेगा। अन्यथा मन को मिटाया नहीं जा सकता है।

Related posts:

मेरी आदर्श प्रेरणापुंज तेजस्वी धावक विल्मा रुडोल्फ

जिसने मरना सीख लिया जीने का अधिकार उसी को

मैंरे आदर्श एवं प्रेरणा स्रोत :डाॅ. स्टीफन हाॅकिंग

मन की तीन विशेषताएँ पहचाने एवं इसे अपने पक्ष में करें

मन - विकिपीडिया


मन की तीसरी विशेषता तर्क आधारित सोचना एवं इसे अपने पक्ष में करें

मन की तीसरी विशेषता तर्क को महत्त्व देना है। वह तर्क से ही समझाता व समझता है। तर्क द्वारा समग्र को नहीं समझा जा सकता है। क्योंकि तर्क भी वस्तुओं को खण्डित करता है। तर्क मन की ही ईजाद है। उसके द्वारा उसके पार सोच नहीं पाते है। तर्क शास्त्र ऐसा ज्ञान है ‘‘जो है’’ उसको नहीं सिद्ध करें एंव ‘‘जो नहीं है’’ उसको प्रमाणित कर दे। अर्थात् यह वायवीय है। बातुनी है, उपरी-उपरीे है। इसको जीवन में समझने का आधार नहीं बनाया जा सकता। जैसे की प्लेट में रखे दो अमरुदों को तर्क तीन सिद्ध कर सकता है। एक पहला जो है, व दूसरा दो नम्बर का अमरुद। अब एक एवं दो जोड़ो-यह तीन होता है। जबकि प्लेट में दो अमरुद ही है। तर्क द्वारा तीन अमरुद सिद्ध किये जा सकते है लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता है।
लेकिन मन के अधिन व्यक्ति को यह बात तो गले नहीं उतरती है। हमारी आदत तर्क प्रधान हो गई है। जबकि तर्क भी एक साधन है समझने-समझाने का। वह भी सब कुछ नहीं है। जिसके कारण जीवन को गहरे सत्यों को हम समझ नहीं पाते है। तर्क ही ज्ञान की कसौटी नहीं है। तर्क से सत्य को पकड़ा नहीं जा सकता। लेकिन तर्कातीत को ख्याल में लेने में मात्र तर्क सहायह है। जैसे तबला बजाने वाला बजाने के पूर्व हथोड़े से तबला ठोंकता है, वह संगीत नहीं है। वह संगीत की पूर्व तैयारी है। इस कारण जीवन में अन्धेरा छिटकता नहीं है।
मन का स्वभाव ही ऐसा है। फिर इसके कहने पर चल कर हम दुःखी होते है व कर्म भाग्य आदि को दोष देते रहते है। अरे! मन रूपी में नाव में ही छेद है तो भवसागर कैसे पार लगेगा। इस नांव में तो एक नहीं तीन-तीन बड़े छेद है। मन की इस स्वभाव, विशेषता व इसकी कुशलता को ध्यान में रख कर निर्णय लें।

Related Posts:

मन की तीन विशेषताएँ पहचाने एवं इसे अपने पक्ष में करें

मन की दूसरी विशेषता सदा दूसरों की तरफ देखना

तम्बाकू कैसे छोड़नी: मित्र का अनुभव

सोच एवं समझ में सबसे बड़ी बाधा :पूर्वाग्रह

‘जब मैंने मौत को बहुत नजदीक से देखा, तब मुझे मौत भी लाभकारी थी’ – स्टीव जाॅब्स

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 377 other followers