Posts Tagged ‘जीने की कला’

जिने हेतु सिर्फ़ धन काफी नहीं ,जिने की कला चाहिए

मैं एक सत्य घटना से अपनी बात प्रारम्भ करना चाहता हूं । सन् 1923 अमेरिका में – शिकागों के एजवाटर बीच पर तब के सबसे अमीर 9 व्यापारी एकत्रित हुए। जिनका कुल जमा धन दुनिया की कुल पूंजी का 50ः से अधिक था ।
एक शोधकर्ता ने 25 वर्ष बाद उन सबकी वापस खोज की गई तब उनकी स्थिति निम्न प्रकार पाई गई ।
धनिक का नाम                                व्यवसाय                                                             25 साल बाद परिणाम
1. चाल्र्स श्वाब                             स्टील कम्पनी के मुख्यिा                                                          5 साल ऋण में रह कर मरे
2. सेम्युअल इन्सूल                    सबसे बड़ी यूटिलिटी के अध्यक्ष                                                 विदेश में दिवालिए होकर मरे
3. हार्वड हाप्सन                           सबसे बड़ी गैस कम्पनी के मुखिया                                            पागल हो गये
4. आइवर क्रुजर                           सबसे बड़ी अन्तर्राष्टीªय मैच कम्पनी के मुख्यिा                    गरीबी में मरे
5. लिआॅन फ्रेजिअर                   बैंक आॅफ इन्टरनेशनल सेटलमेन्ट के अध्यक्ष                    आत्महत्या
6. रिचार्ड व्हाटनी                         न्यूयार्क स्टोक एक्सचेन्ज के मुखिया                                        जेल से रिहा
7. आर्थर क्राॅटन                        शेयर दलाल                                                                                  गरीबी में मरे
8. जेसी लीवरमारे                         शेयर दलाल                                                                                आत्महत्या
9. अल्बर्ट फाॅल                            होर्डिंग के केबिनेट मन्त्री                                                           जेल से रिहा
इन 9 अरबपतियों में से 2 ने आत्महत्या कर ली थी । एक अरबपति पागल हो चुके थे । 2 अरबपति जेल से रिहा हुए थे एवं 4 अरबपति गरीब हो गये थे ।
अर्थात सिर्फ धन से सभी समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता है । जीवन शैली से उत्पन्न समस्याओं का समाधान जीवन शैली बदल कर ही किया जा सकता है । तनाव से उत्पन्न समस्याओं का समाधान आराम करके ही किया जा सकता है । धन से आराम की सुविधाएं खरीदी जा सकती है, आराम नहीं । हम स्वयं अपने लिऐ समस्या है । महावीर ने यही कहा है कि स्वयं को बदलने से उलझने मिटाई जा सकती है । समस्याएं डर व लालच जानते है, उनको जीतकर ही उनसे पार हुआ जा सकता है ।

जीवन जीने के लिए पैसे की समझ/वित्तिय साक्षरता/जीने की कला/संयम/स्वयं का ज्ञान होना चाहिऐ । अपनी आवश्यकताओं, उपभोग, सुविधाओं, खर्च, आय की समझ होनी चाहिये । जीवन का मात्र भौतिक तल ही नही है । मानसिक तल व चेतना तल पर भी जीवन है । जीवन का अर्थ ही एक तल नहीं है । स्याद्वाद को आर्थिक क्षैत्र में भी लागू करें ।
हमारा अनुभव व समाज कहता है किThe whole thing is that  सबसे बड़ा रूपया । महावीर ने कहा नही The whole thing is that सबसे बडी Life  है । हम है हमारा जीवन है । हमारी जीवन शैली है । हमारी सहजता है । प्रकृति है ।

हमें खुश रहने हेतू क्या चाहिए ?

हम सब खुशी चाहते हैं । जीवन में हमे यश नहीं, धन नहीं खुशी चाहिए । समाज में नाम नहीं जीवन में खुशी चाहिए। धन व प्रतिष्ठा से खुशी नहीं मिलती है। शांत होने पर ही सच्ची खुशी मिलती है । आज हमारी प्राथमिकताएं स्पष्ट नही है । हम यह भी नहीं जानते कि हमें क्या चाहिए । हमें खुशी कहां मिलती है इसका हमें ज्ञान नही है । दूसरों का पद एवं पैसा उन्हे सुख देता नजर आता है , जो कि वास्तव में सुख का कारण नहीं है । पद एवं पैसे की दौड़ में हमारी उम्र बिती जा रही है ।Happiness
हम अन्दर से अव्यवस्थित व टूटे हुए हैं। हमारे भीतर आन्तरिक दरार बड़ी है । हमारे मूल्य निश्चित नहीं है । हम बाहर कुछ व भीतर कुछ हैं ।
हमे अन्दर से व्यवस्थित, संतुलित व एकरूप होना है । कथनी व करनी के भेद को मिटाना है । वास्तविक उन्नति अन्दर से संतुलित व संगठित होना है।
अन्दर से स्थिर होना, मन में साम्यता-समता पैदा करना विकास है । हम अच्छे सूट व टाई से नहीं बड़े होते हैं ।
हमे अपने आन्तरिक उपद्रवों को मिटाना है । अब महत्वपूर्ण यह है कि स्वयं हमारे विचार कैसे चलते हैं ? भावनाएं कैसे आन्दोलित करती है । स्वयं से नाराजगी कितनी कम करते हैं ।
पदौन्नति नहीं आन्तरिक खुशी चाहिए । पदौन्नति बाहर के परिकर बढ़ाती है जो अशान्ती के कारण है । अतः पदोन्नति से ज्यादा शान्ति चाहिए । हमारा जीवन अन्दर से खोखला व बाहर से बड़ा व्यर्थ है ।

दीर्घ नहीं सार्थक जीवन श्रेष्ठ है

किसी भी खतरनाक बीमारी का डाइग्नोसिस रोगी एवं उसके परिजनों को डरा देता है। रोगी जीते हुए भी मृत्यु का अनुभव करता है एवं परिजन भय एवं चिंता में डूब जाते है। एड्स, कैन्सर एवं हेपेटाइटिस-बी जैसी जानलेवा बीमारियों में रोगी एवं उसके परिजन अपना सामान्य जीवन नहीं जी पाते और मृत्यृ का आसन्न भय सबको व्यथित कर देता है।

यर्थाथ में रोग हमारी अस्वस्थता का सूचक है। खतरनाक रोग मृत्यु का भय खड़ा कर संबंधित व्यक्तियों को डरा देता है। मृत्यु तो एक सहज, स्वाभाविक अनिवार्य प्रक्रिया है। यह कोई विशेष बात नहीं है। प्रतिक्षण हम मृत्यु की तरफ आगे बढ़ रहे हेैं।जिन्हें असाध्य रोग नहीं है उनकी उम्र रुकी नहीं रहती है। आयुक्षय सदैव सभी का जारी रहता है। अतः डर का कोई औचित्य नहीं है। स्व में स्थित व्यक्ति को ही स्वस्थ कहते हैं। वास्तव में असाध्य रोग की समस्या भय से उत्पन्न होने के कारण भय की समस्या है।

भय का सामना आशावादी दृष्टिकोण के साथ किया जाना चाहिए। प्रथमतः होनी को स्वीकारने के अतिक्ति और कोई मार्ग नहीं है। मृत्यु को स्वीकारने से डर समाप्त हो जाता है। फिर भय के निकल जाने से आत्मविश्वास बढ़ता है। समय पर असाध्य रोग का पता चल जाना अभिशाप नहीं वरदान है। रोगी इससे सचेत हो जाता है। रोगी के परिजन भी बेहतर इलाज का प्रबंध कर सकते हैं। रोग के ज्ञान से परिवार में तद्नुरुप योजनाएं बनाई जा सकती हैं। इससे निर्णय लेने में सुविधा रहती है। ताकि रोगी को अच्छे से अच्छे चिकित्सक का इलाज मिल सके एवं उसकी सुश्रुषा अच्छी तरह की जा सके। इससे अनेक बार असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं।

समय पर रोग का ज्ञान होने से व्यक्ति अपनी मानसिकता बदल पाता है। हिम्मत एवं धैर्य के साथ रोग का सामना किया जा सकता है। परमार्थिक चिंतन की तरफ ध्यान देकर शारीरिक चिंताओं को कम करने का अवसर मिलता है। रोगी अपने में वैचारिक परिवर्तन लाकर नकारात्मक चिंतन पर लगाम लगा सकता है। सकारात्मक चिंतन द्वारा रोग कि विरुद्ध लड़ने की प्रतिरोधात्मक शक्ति बढ़ाई जा सकती है। सारे दर्द शरीर में नहीं, मस्तिष्क में होते हैं। सारे तनाव का केन्द्र मन है। अतः मन को व्यवस्थित करने का इससे अवसर मिलता है। साथ जीवन मन से चलता है, तभी तो कहते हैं कि मन के जीते जीत है मन के हारे हार।
पूर्वज्ञान रोगी से रोगी अपने शेष जीवन का महत्व जान जाता है। ऐसे में वह अपनी गलत आदतों एवं लारवाहियों को छोड़ सकता है।

आखिर मनुष्य दीर्घ जीवन जीना क्यों चाहता है? जब आयु हमारे हाथ में नहीं है तो हम इसकी कामना क्यों करते हैं? कुछ और वर्ष जीकर भी हम क्या कर लेंगे। थोड़ा सा धन, बड़ा पद एवं प्रतिष्ठा अर्जित कर उसका क्या करेंगे, धन तिजोरियों में, पद कार्यालयों में एवं प्रतिष्ठा लोगों की स्मृति में रहती है। आज तक यह सब अर्जित किया है उसका परिणाम सामने है ।क्या हम अपनी पांचवी पीढ़ी को जानते हैं? किसी को नाम ज्ञात भी हो तो उसके क्या अर्थ हैं? उस शख्त को क्या लाभ है? अर्थात जीवन का लंबा होना नहीं, बेहतर होना महत्वपूर्ण है।

आत्मज्ञान के प्रकाश में कोई भी व्यक्ति अपना प्रत्येक संग्राम लड़ सकता है। फिर असाध्य रोग क्या चीज है, जीवन को समग्रता में समझने पर प्रत्येक समस्या का समाधान संभव है। हम अपने पूर्वाग्रहों, आवेगों एवं वासनाओं से आच्छादित हैं।अतः जीवन का अर्थ नहीं समझते। अध्यात्म मार्ग के सहारे स्वयं को जान कर जानलेवा बीमारियों से लड़े तो नई ऊर्जा मिलती है। तभी जीवन में कायाकल्प संभव है।

प्रार्थना में भी असीम शक्ति होती है। भौतिक शरीर मात्र अणुओं के संचालन से ही नहीं संचालित होता है। डाॅक्टर की दवाई ही नहीं, प्राकृतिक शक्तियां एवं प्रभु का आशीष भी लाभकारी होते हैं।

“जियो तो ऐसे जियो” यह पुस्तक आपके लिए क्यों उपयोगी है?

जीवन-मुर्गों की रूसी-कथा

एक प्राचीन रूसी कथा है

एक बड़े टोकरे में बहुत से मुर्गे आपस में लड़ रहे थे। नीचे वाला मुर्गा खुली हवा में सांस लेने के लिए अपने ऊपर वाले को गिराकर ऊपर आने के लिए फड़फड़ाता है। सब भूख-प्यास से व्याकुल हैं। इतने में कसाई छुरी लेकर आ जाता है। एक एक मुर्गे की गर्दन पकड़कर टोकरे से बाहर खींचकर काटकर वापस फेंकता जाता है। सफाई कर पंख आदि बाहर फेंकता जाता है।कटे हुए मुर्गों के शरीर से गर्म लहू की धार फूटती है। भीतर के अन्य जिंदा मुर्गे अपने पेट की आग बुझाने के लिए उस पर टूट पड़ते है। इनकी जिंदा चोंचों की छीना-झपटी में मरा कटा मुर्गे का सिर गेंद की तरह उछलता लुढ़कता है। कसाई लगातार टोकरे के मुर्गे काटता जाता है। टोकरे के भीतर की खाद्य सामग्री में हिस्सा बांटने वालों की संख्या भी घटती है। इस खुशी में बाकी बचे मुर्गो के बीच से एकाध की बांग भी सुनायी पड़ती है। अंत में टोकरा सारे कटे मुर्गो सेे भर जाता है। चारों ओर खामोशी है, कोई झगड़ा या शोर नहीं है।
इस रूसी कथा का नाम है-जीवन।
ऐसा जीवन है। सब यहां मृत्यु की प्रतीक्षा में है। प्रतिपल किसी की गर्दन कट जाती है। लेकिन जिनकी गर्दन अभी तक नहीं कटी है, वे संघर्षरत हैं, वे प्रतिस्पर्धा में जुटे हैं। जितने दिन, जितने क्षण उनके हाथ में है, उनका उन्हें उपयोग कर लेना है। इस उपयोग का एक ही अर्थ है-किसी तरह अपने जीवन को सुरक्षित कर लेना है, जो कि सुरक्षित हो ही नहीं सकता।

सफलता सदैव खुशी, शांति व तृप्ति नहीं लाती है। सफलता हमारी प्रतिष्ठा जरुर बढ़ा देती है। सफलता के

साथ शान्ति के आने का कोई नियम नहीं है।

( मेरी पुस्तक जियो तो ऐसे  जियो की प्रस्तावना से )

मरने के लिए नहीं, जीने के लिए( तनाव मुक्त होने ) जहर पीओं

कायर आत्महत्या करने हेतु जहर एक बार पीते है लेकिन शुरवीर हम है जो जीने के लिए कई बार जहर पीते है। भगवान शिव ने भी तो जहर पीआ था, हमें भी पीना पड़ता है। जैसा शीव ने जहर को गले के नीचे नहीं जाने दिया, वैसे ही हमें भी इस जहर को गले के नीचे नहीं जाने देना है। अर्थात् इस जहर से अपने पूरे शरीर को हानि नहीं पहुँचानी है। जीवन जीने की कला द्वारा उक्त जहर को निष्प्रभावी बनाना है।
जहर अनेक तरह के अपने परिजन ज्यादा पीलाते है। रस्मों, जातिवाद, तेरा-मेरा के जहर होते है। यहाँ हमारी इच्छाओं का सम्मान कोई नहीं करता है। हम कभी भी कहीं समाज में स्वतन्त्र नहीं है। सर्वत्र परम्पराएँ जहर पीलाती रहती है। न चाहते हुए भी हमें उसी अनुसार करना पड़ता है।
हम पर इतने दबाव होते है कि हम अपनी ईच्छा से कपड़े तक नहीं पहन सकते है। बात भी वही करनी पड़ती है जो दूसरों को सुहाती है। जो लोग हमें तरह-तरह से डूबाते है उनका सम्मान कराना पड़ता है। जिन लोगों की हम शक्ल नहीं देखना चाहते है उनकी मेजबानी करनी पड़ती है।
सामाजिक व जातिगत पंचायते हमको व्यक्ति नहीं समझती है। हमारे दुःख में औपचारिकताओं के अलावा काम नहीं आती है। लेकिन उनका जीवन भर दबदबा रहता है। उनके आंतक से हमें गलत निर्णय करने पड़ते है। वे हमारे मन में सदैव भूत की तरह डराती है। हमारे कभी हाल नहीं पूछती है। हमारा आजादी छिनने में उन्हें मजा आता है। वे हमारे प्रत्येक सार्वजनिक कर्म को नियन्त्रित करते है।
हम खुश कब रहे वह भी वे तय करते है। त्यौहार मनाने की विधि व साधन उनके अनुसार होते है। हमारे जीवन में कई बार लगता है कि हम ही अनुपस्थिति है। शेष वे सब है जो न होने चाहिए यह हमारी पराधीनता नहीं तो ओर क्या है।
क्या शीवजी की तरह जहर पीना ही हमारी नियति है। जातिगत समाज धर्म के नाम पर हैवानियत करते हैं। चन्द गुण्डे समाज का नेतृत्व कर व्यक्ति को तुच्छ बना देते है, जबकि व्यक्ति के बिना समाज हो नहीं सकता है। समाज की ठोस इकाई व्यक्ति है। समाज एक कल्पना है। जबकि व्यक्ति एक यथार्थ है। समुह अपने सदस्यों के बल पर इतराता है। सदस्यों के अभाव में समाज हो नहीं सकता है।
मानव समाज जरुरी है, जातिगत समाज गैर-जरुरी है। संगठित रखने, पवित्र रखने व परम्पराओं के नाम पर जातिगत समाज रोज जहर पीलाता है। हम उसके कलपूर्जे बन जाते है। व्यक्तिगत आजादी समाप्त है।
दूध देने वाली गाय की बात सहनी पड़ती है। पश्चिम में जैसा कि कहते है कि मुफ्त में कोई भोजन नहीं कराता है। जीवन में समाज बहुत कुछ सीखाता है, देता है तो थोड़ा जहर भी पीलाता है। यह सब जीवन का क्रम है।
जितना बच सकते है, बचो। वरन् जहर को गले से नीचे मत उतरने दो। अपना जीवन अपनी चाल से चलो। अपनी समझ बढ़ाओं। मौन हो जाओ, नदी में उतरो, लेकिन भीगो मत। संसार में रहना पड़ता है, इसे बदलना मुश्किल है। अपने बच के निकल जाओ। छोटी सी जिन्दगी है, यह भी निकल जायेगी।

तनाव का सामना गुंजन से करें

अपने दबाव व तनाव का सामना गुंजन करके करें। भौरों की तरह गंुजन करो। बस गुनगुनाओं। इस प्रकार गुंजन करने से हमारे सारे दबाव समाप्त हो जाते है। दबी हुई इच्छाएँ व वासनाएँ गंुजन करने से निकल जाती है। वैसे आधा घंटे प्रातः काल सीधे बैठ कर गंुजन करो व दिन में जब भी मौका, मिले गंुजन करें।

गंुजन एक तरह का प्राणायाम है। भ्रामरी प्राणायाम का यह सरल रूप है। गुुंजन करने से हमारा ध्यान बढ़ता है। गुंजन करने से व्यक्ति स्वयं के पास आता है। इससे स्वयं को जानने में सहायता मिलती है। यह स्वयं पास जाने की मार्ग है, स्वयं से जुड़ने में सहायक है। अपने भटकते मन को नियन्त्रित करने का यह सरल मार्ग है। तभी तो कहते है कि जब गुनगुनाती हुई स्त्री खाना बनाती है तो उसका स्वाद बढ़ जाता है। गंुजन करना मन्त्रों का उच्चारण करने के समान है। गुंजन करने से मन्त्र शक्ति जाग्रत होती है। यह मन्त्र के गुनगुनाने की समान है।

इससे हमारी अवांछित जल्दबाजी पर नियन्त्रण होता है। मन में उठते विचारों पर लगाम लगती है। भागम-भाग पर ब्रेक लगता है। व्यक्ति भटकने से बच जाता है। इससे गुस्सा कम होता है, इससे जीवन मंे संतुलन बढ़ता है। इस तरह भावनात्मक संतुलन स्थापित होता है।

गुंजन करो और प्रसन्न रहो।

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मन की तीन विशेषताएँ पहचाने एवं इसे अपने पक्ष में करें

घर व मकान में क्या अन्तर है एवं मकान को घर कैसे बनाए ?

मकान ईंट, सीमेन्ट व पत्थर से बनता है, जबकि घर परिवार के सदस्यो के बिच स्नेह एवं संबंध से बनता है । जहां पर सुरक्षित व अपनत्व महसूस करते है उसे घर कहते है । घर से हम संबंधित होते है जहां हमारे माता-पिता, चाचा-ताउ, भाई-बहन व बच्चंे रहते हैं, उसे घर कहते है । मकान शरीर है व घर आत्मा है । घर एक आश्रम होता है जंहा पर सभी मिलजुल कर रहते है व एक दूसरे के लिए जीते है ।

घर में सुविधाऐं भले ही कम हो लेकिन सदस्यों का मन बहुत बडा होता है । घर के सदस्य एक दूसरे के लिए त्याग कर खुश होते है । घर की कोई सीमा नहीं होती । घर स्वर्ग-नरक की प्रतिछाया है । यंहा बिना शर्त प्यार एवं संरक्षण मिलता है । सभी लोग अपनी अपनी मर्यादा में रहते है एवं मर्यादा को भलीभातिं पहचानते है ।,घर में मुखिया का अनुशासन होता हैं लेकिन मकान के सदस्य आप मुख्तार होते हैं। यहां कोई किसी की सुनता नही हैं। सदस्य परस्पर रिस्तो को जिते हैं। उनकी प्राथमिकता में अपनत्व पहले होता हैं।

मकान में रहने वाले पैसो को महत्व देते हैं। मुखिया के क्रोध से घर मुक्त नही होता है लेकिन क्रोध के पीछे व्यक्तिगत हित नही वरन् सदस्यों का हित निहित होता है । जिस घर में नकारात्मकता घुस जाती है वो घर नहीं मकान हो जाता है । तभी भाई – भाई इन्च इन्च जमीन के लिए लडते है व माॅ-बाप को वृद्धावस्था में भेजा जाता है ।
विचारे कि हम कहा रहते हैं एवं घर बनाने में कैसे सहयोग कर सकते हैं?

योगी कथामृत :परमहन्स योगानन्द की आत्मकथा

योगी कथामृत एन आॅटोबायोग्राफी आॅफ योगी का हिन्दी अनुवाद है । बीसवीं सदी की अध्यात्म की सौ प्रसिद्ध पुस्तकों में से यह एक है । यह योगदा सत्संग के प्रणेता परमहन्स योगानन्दजी की जीवनी है । इसमें उनके जन्म से लेकर योगदा की स्थापना तक का वर्णन सरल भाषा में किया हुआ है । बचपन में उनके जीवन मूल्य व परिवार का वर्णन है । ईश्वर की खोज योगानन्दजी ने कैसे की इसका वर्णन है । योगानन्दजी का अपने गुरू श्री युक्तेश्वरगिरिजी से मिलना, उनका दर्शन, उनसे दीक्षा लेने का इसमें विस्तृत वर्णन है । अपने गुरू के आत्मज्ञान के इस आन्दोलन को अमेरिका ले जाना व वहां पर इस कार्य को आगे बढाने का इतिहास इसमें है ।
’’क्रियायोग’’ की प्राचीनता, वैज्ञानिक महत्व एवं इसके सिद्धान्त का इसमें वर्णन है । भारतीय दर्शन, गीता एवं कृष्ण की सार्थकता व व्यवहारिकता पर इसमें बहुत कुछ लिखा हुआ है ।हिमालय में उन्होने अनेक तरह के चमत्कार देखे । योगानन्द जी निराहारी योगी से कैसे मिले, बिना आहार जीवन का संचालन कैसे होता है इसका वर्णन इसमें है । योगानन्दजी का अनेक सूक्ष्म सत्ताओं व दिव्य पुरूषों से संपर्क कब व कैसे हुआ, पानी पर चलने वाले, हवा में उडनेवाले संत व उसकी कला पर चर्चा इस पुस्तक में है । इन चमत्कारो के पीछे की सत्ताओं का उल्लेख विस्तार से है । अदृश्य को जानने व अध्यात्म को जीवन में उतारने की पे्ररणा देने वाली यह महान आदर्श पुस्तक है ।
इसमें गांधीजी को क्रिया योग की दीक्षा देने का वर्णन भी है । पुस्तक में अनेक फोटोग्राफ दिये हुए है । किताब की छपाई सुन्दर व अच्छे कागज पर की गयी है । किताब का मूल्य बहुत कम है । विश्व की छब्बीस भाषाओं में इस पुस्तक का अनुवाद हो चुका है । अनेक विश्वविद्यालयों में इसे पाठ्यपुस्तक के रूप में पढाया जाता है । अध्यात्म के विधार्र्थी के लिए यह एक श्रेष्ठ रचना है ।एक योगी की यह आदर्श जीवनी है । नास्तिक को आस्तिक बनाने में यह पुस्तक समर्थ है ।

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मानसिक क्षमता बढ़ाने पर विश्व प्रसिद्ध पुस्तकः टोनी बुजान की ‘‘यूज़ यूअर हेड’’

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अनोखी दुनिया से मुलाकात

स्वार्थ, चालाकी व अहंम् की सफलता प्राप्ति में बड़ी भूमिका :अपना महत्व पहचाने

सफलता पाने के लिए स्वार्थी, बेईमान व अहंकारी होने की जरुरत है। परमार्थ को छोड़ों, पहले अपना स्वार्थ साधों। सक्षम बनो तभी दूसरों का भला कर सकते है। व्यक्ति को अपना ध्यान रखना पड़ता है। अपने को व्यवस्थित करना होता है। खुद के समय का प्रबन्धन करना होता है। अनावश्यक कर्मों से स्वयं को काटना पड़ता है। दूसरों की फालतू बातें छोड़नी पड़ती है। मूर्खों की टिप्पणियों से बचना पड़ता है। इस अर्थ में पहले स्वार्थी बनो तभी सफलता मिलती है। स्वप्रबन्धन एवं समय प्रबन्धन के लिए स्वार्थी होने की जरुरत है।

आज के जमाने में विनम्र बनने की जरुरत नहीं है। सब को अनावश्यक महत्व देने की जरुरत नहीं हैं। पहले अपने को महत्व दो। स्वयं की मानो, उसकी सुनो। तभी उन्नति कर सकते है। अन्यथा मीठी-मीठी बातों में उलझने की पूरी संभावना है। विनम्रता के नाम पर सबको सहने व सुनने की जरुरत नहीं है। हमारे चारों ओर अधिकांश लोग अक्षम, फालतू व बातुनी है, उनके विचार भी वैसे ही है। उसकी नकारात्मकता, ईष्र्या से भरे व क्षूद्र टिप्पणियाँ की अनदेखी अनसुनी करनी पड़ती है। विनम्र होने के लिए पहले कुछ होने की जरुरत है। कमजोर आदमी की विनम्रता भी कमजोरी गिनी जाती है। सक्षम व सफल व्यक्ति को विनम्र होने की जरुरत है।

आगे बढ़ने वाले दूसरों की परवाह नहीं करते है। वे अपने मतलब में होशियार होने चाहिए। अतः अपने मालिक स्वयं बनो। अपनी चाबी दूसरों को मत दो। कोई आपको छोटा महसूस कराए तो उसकी तरफ ध्यान मत दो। वह नादान है, मूर्ख है। ऐसे पागलों के विचारों को मत सुनो। जिन्होंने कुछ नहीं किया है वे सोचते है कि दूसरे भी कुछ नहीं कर सकते है। आपको तो अपना घोड़ा संभालना है। आप अपने कैरियर व जीवन को देखो। हर अर्थ में बहरे बनो।  परायों पर ध्यान मत दो।

अपना महत्व  पहचाने, स्वयं  की क्षमता  जानें

मेरी नई पुस्तक “जियो तो ऐसे जियो” का एक परिचय

जीवन भर हम दूसरों के साथ कैसे रहें ,यह सीखतें हैं,लेकिन स्वयं को भूल जाते है। जबकि अपने प्रथम मित्र तो हम स्वयं हैं। यदि हम अपने साथ सुख एवं खुशी से नहीं रह सकते हैं तो जीवन का क्या अर्थ हैं। हमारी उपलब्धियां एवं जीतने का क्या अर्थ हैं। स्वयं को खोकर कुछ भी पा ले तो बेकार हैं। इस ’स्वयं’ को सुव्यवस्थित करने की कला का नाम जीवन प्रबन्धन हैं। हम स्वयं को पाकर ही जीवन को जान पाते हैं, यही है जीवन प्रबन्धन ।

हो सकता है, जीवन जीने के इन सूत्रो , विधियों, तरिको या उपायो से आप पहले से ही अवगत हों , फिर भी आप इनकी शक्ति को कम न समझे । ये वे उपाय हैं, जो आपको जीवन जीने की कला सिखा सकते हैं। मार्ग पर चलना प्रारंभ करेंगे आगे बढेंगे तभी तक्ष्य को प्राप्त कर पाएंगे
हमारा जीवन अपने मस्तिष्क देह,अर्थ , परिवार, समाज ,मृत्यु व चेतना संबद्व हैं। इसलिए यह पुस्तक सात भागों में विभाजित हैं। प्रत्येक भाग के साथ अतिरिक्त पाठय-सामग्री के रूप में कुछ श्रेष्ठ पुस्तकों का उल्लेख हैं। प्रत्येक पाठ के आगे -पिछे सम्बंधित विषयों पर अनमोल वचन दिए हुए हैं।

इसमें विद्ववान लेखक द्वारा कहानी, तर्क ,शोध, व्यक्तिगत अनुभव एवं उदारण द्वारा अपनी बात स्पष्ट की गई हैं। अपने जीवन में अतियोें से बचने व संतुलन स्थापित करने की विधा सिखाती है यह पुस्तक । जीवन प्रबंधन,धन और कैसे जिएं – को यह विस्तार से बताती हैं। हमें अपने लक्ष्य स्पष्ट करने, उन्हे प्राप्त करने में यह पुस्तक भरपुर मदद करती हैं।

 प्रकाशन :      प्रभात प्रकाशन , 4 /19  आसफ अली रोड ,  नई दिल्ली -110002

 पेज – 176,      कीमत – 125

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