Posts Tagged ‘खुद- इलाज’

आरोग्यधाम (एस-व्यास) बैंगलोर ,असाध्य रोगों की सर्वांगीण चिकित्सा हेतु श्रेष्ठ जगह

आरोग्यधाम, प्रशान्ती कुटीर बैंगलोर में दिनांक 26.04.2013 से 03.05.2013 तक पत्नी सहित समग्र चिकित्सा हेतु रहा । यह स्वामी विवेकानन्द योग अनुसंधान संस्थान, (एस. व्यासा) डिम्ड विश्वविद्यालय का एक अंग है ।2013-05-01 17.46.15यहां पर योग, आयुर्वेद व नेचुरोपेथी के स्वतन्त्र महाविद्यालय है । यहां योग पर रिसर्च सबसे अधिक हुई हैं एवं अनेक शोध पत्र चिकित्सा, मनोविज्ञान, के अन्तर्राष्ट्रिय जरनल्स छप चुके हैं । यहां पर योग चिकित्सा, आधुनिक विज्ञान, आयुर्वेद, नेचुरोपेथी व फिजियोथैरेपी के आधार से कई रोगों का सफलतापूर्वक ईलाज किया जाता है ।
पत्नी मीना के जोड़ों व सर्वाईकल दर्द में बहुत राहत मिली । वह विगत पांच वर्षों से दाई करवट सो नहीं पा रही थी, वह सोने लगी । वहां पर मीना के दर्द उठने पर तत्काल योगा करा कर पेन किलर देने की तरह दर्द दूर कर दिया ।योग, मसाज, लेप, स्टीम बाथ, सोना बाथ आदि से रीढ़ की हड्डी के सभी प्रकार के दर्द को दूर करने में विशेषज्ञता हासिल है ।
मेरा रक्तचाप 110/70 पर रहने लगा । नाड़ी शोधन व भ्रामरी का जबरदस्त प्रभाव देखा ।
गुरूजी डाॅ0 एच0आर0 नागेन्द्र भूतपूर्व अन्तरिक्ष वैज्ञानिक हैं जो अन्तरिक्ष की यात्रा को छोड़कर अन्तर्मन की यात्रा करा रहे हैं एवं विश्व प्रसिद्ध आधुनिक चिकित्सक डाॅ0 आर0 नागरत्ना दीदी का व्यवहार एवं सेवा अनुकरणीय है ।यह 100 एकड़ में निर्मित प्राकृतिक वातावरण से युक्त है । यहां का स्टाफ, थिरापिस्ट व डाॅक्टर सहयोगी हैं ।

Related posts:

असाध्य रोगों का सामना कैसे करेंः उक्त पुस्तिका फ़्री   डाउनलोड करें

चैतन्य द्वारा , विचारों द्वारा रोगों की चिकित्सा कैसे करें ?

प्रेरक स्वास्थ्य सम्बन्धी अनमोल वचन (कैपसूल)

रिफाइंड तेल से कैंसर हो सकता है?

हमें कौनसा तेल खाना चाहिए ?

fatsNoYesहमे अपने पूर्वजों द्वारा खाए जाने वाले तेल हमारे जीन्स में बसे होते हैं । अतः अपने पूर्वजों द्वारा खाए जाने वाले तेल ही खाना उचित है । जैसे पंजाबी सरसों का व दक्षिण भारतीय नारियल का तेल खाता रहा है, इन्हे खाए तो ठीक है । एक व्यक्ति को प्रतिदिन अधिकतम तीन चम्मच घी/तेल आदि वसा का प्रयोग करना चाहिये । वैसे नारियल के तेल में मिडियम चैन फेटीएसीड्स के होने से खाने में अच्छा माना जाता है ।
भोजन पकाने में अधिक स्माकिंग पाॅईन्ट वाला तेल खाना चाहिए ताकि छोंकने पर ट्रान्सफैट कम से कम बने । अधिक तलने पर प्रत्येक तेल ट्रान्सफैट बन जाता है, अतः उससे बचे ।
सभी प्राकृतिक/सहज तिलहन से बने तेल खाना स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक है । सरसों, तिल, मूंगफली, नारियल के कच्ची घाणी से निकले तेल श्रेष्ठ है । सोया, सफोला, राईसब्रान आदि से निकले तेल को खाने योग्य बनाने हेतू रिफाइण्ड करना पड़ता है । केन्सर फैलाने वाले फास्फोरिक एसिड, हेक्जीन एवं कास्टिक सोड़ा रिफाइण्ड में प्रयुक्त होते हैं । इससे रिफाइण्ड तेल हानिकारक है । कृत्रिम तरिके से निकाले गये तेल सभी अखाद्य है, जिन्हें कृत्रिम तरिके से तैयार किया जाकर खाद्य बनाया गया है, इस प्रकार रिफाइण्ड कर अखाद्य तेल को खाद्य बनाया जाता है । रिफाइण्ड की बजाय फिल्टर्ड तेल खाना स्वास्थ्यवर्द्धक है । कच्ची घाणी व एक्सपेलर से निकले तेल खाना चाहिए ।
तेल की पैकिंग पर लिखे किसी भी वाक्य से अप्रभावित रहें । जैसा कि कुछ तेल की पैंकिग पर लिखा होता है कि इसमें काॅलस्ट्रोल नहीं है । किसी भी वनस्पति तेल में काॅलस्ट्रोल नहीं होता है । काॅलस्ट्रोल हमारे शरीर में जाकर बनता है । जैतुन का तेल अच्छा होता हैं, लेकिन इसका प्रयोग पकाने में ठीक नहीं है ।

Related Posts:

रिफाइंड तेल से कैंसर हो सकता है?

क्या पोषक आहार के होते हुए पुरक आहार की जरूरत है ?

वनस्पति घी भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है

धन्यवाद केैसे देना कि वह उन तक पहुँचे

Essential Fatty Acids

ब्लड कैंसर का सामना मेरे पिताजी ने कैसे किया

वर्ष 1980 की शरद ऋतु की बात है। बढ़ती थकान का ईलाज कराने के क्रम में पिताजी उदयपुर के मशहुर डाक्टर शूरवीर सिंह जी से तीसरी बार मिले। तब उन्होंने टी.एल.सी. कराने को कहा। सफेद रक्त कणिकाओं की संख्या औसत से दो-तीन गुना अधिक थी। डाक्टर ने ब्लड कैंसर की घोषणा की।
पतले दुबले शरीर में 50 किलो ग्राम वजन था। जो निरन्तर कम होता जा रहा था। एक वर्ष तक तो हमने उन्हें बताया नहीं कि उन्हें जानलेवा बीमारी हो चुकी है। लेकिन हमारी चतुराई उनकी चैकस निगाहों से बच न सकी। उन्हें संदेह हो गया कि उन्हें घातक बीमारी ने घेर लिया है। यद्यपि उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। हाँ, पूछते जरूर थे कि – उन्हें कौनसा रोग हो गया है। तुम मेरे प्रति बीमारी की बात करते समय गम्भीर क्यों हो जाते हो ?
श्री रतनलाल जी को अपने कर्मों व अपने भाग्य पर भरोसा था। वे एक पक्के जैन अनुयायी थे। उनका दर्शन उम्र को तय मानता है। अतः वे मृत्यु भी तय तारीख से पूर्व आने की बात नहीं मानते थे। वेे कहते थे कि कोई डाक्टर उनकी उम्र एक दिन बढ़ा नहीं सकता है न ही कोई एक दिन उम्र कम कर सकता है। मृत्यु निश्चित है। फिर डरना क्या ?
वे एक नियमित व्यक्ति थे। उन्होंने कभी रात को पानी तक नहीं पीया। पारम्परिक जैन विश्वासों के अनुयायी होने से वे कहा करते थे कि रोग देह को हुआ है। वे तो एक चेतन तत्व भगवान आत्मा है। नित्य आत्मा को कोई पदार्थ छू भी नहीं सकता है।
राजस्थान राज्य में मेरा गांव शक्तावतों का गुडा सोम नदी के किनारे बसा हुआ है। पिताजी प्रातः उठते ही नदी पर जाते थे। उनके दिन का प्रारम्भ नदी से होता था। पिताजी नदी से स्नान कर आते ही मन्दिर जाते थे वे वहां पर प्रतिदिन घंटा-डेढ़ घंटा पूजा करते थे। भोजन से पूर्व यह उनकी शर्त थी । जैन पूजाओं में ईश्वर से शक्ति, साहस व प्रेम मांगा जाता है।
निदान 1980 में ही हो गया था। तभी उन्हें ’माइलरन’ नामक कैप्सूल व रक्त संवर्धन की गोलियाँ दी जाती थी। पिताजी ने केंसर के उपरान्त बारह वर्ष जीवन जीया। इसमें से अन्तिम एक वर्ष ही निष्क्रय रहे। बिस्तर पर तो मात्र वह एक माह रहे। अन्यथा उन्होंने पूरी जिम्मेदारी के साथ सक्रिय जीवन जीया। उन्हें कभी रेडियोथेरेपी, या किमोथेरेपी न करानी पडी। रक्त परिवर्तन भी एक भी बार नहीं कराना पड़ा। इस सबके बिना भी वह सक्रिय जीवन जीते रहें। यह सब कैसे हुआ, बताना कठिन है। यह उनकी अपने प्रति व अपने धर्म के प्रति आस्था व सात्विक भोजन का ही परिणाम होगा। डा. स्वयं इसे चमत्कार बताते थे। 01, अगस्त, 1993 को उनकी देह छूटी। ?
व्यक्ति की देह उसके विचारों का अनुसरण करती है। सकारात्मक विचार रोगी की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते है आधुनिक वैज्ञानिक शोधो से प्रमाणित हुआ है कि स्वस्थ्य विचार से स्वस्थ्य शरीर बनता है।

थकान मिटाने हेतु हर्बल ऊर्जा पेय घर पर बनाएं

यह एक आयुर्वेदिक पेय है जो निम्न मसालों से तैयार करें । इसके सेवन से सभी प्रकार की थकान तत्काल मिट जाती है । एक पाव हर्बल पेय बनाने हेतु निम्न मात्रा में सामग्री लें ।
1. सौंठ – 60 ग्राम
2. काली मिर्च – 25 ग्राम
3. सौंफ – 25 ग्राम
4. धनिया – 25 ग्राम
5. तेज पता – 25 ग्राम
6. ईलाइची छोटी – 12 ग्राम
7. ईलाइची बड़ी – 12 ग्राम
8. दाल चीनी – 12 ग्राम
9. लौंग – 12 ग्राम
10. अजवाईन – 12 ग्राम
11. जायफल – 3 ग्राम
12. पीपल – 3ग्राम
इन उपरोक्त सामग्री को अलग-अलग कुट पीस कर पाउडर बनाकर फिर मिक्स करे । एक कप पानी में उपरोक्त एक चम्मच मिक्स पाउडर को उबाल कर स्वादानुसार शक्कर मिलावें । इस प्रकार ऊर्जा पेय पिने के लिए तैयार है । यह सम्मेदशिखर की 20 किमी0 पैदल यात्रा करने पर पिलाया जाता है । यात्री थकान उतार कर पुनः 10 किमी0 चलते हैं । यह बढि़या हर्बल चाय है, पीकर लाभ देखें ।

Related posts:

पोषक तत्वों के बारे मे डाॅ0 रेण्ड की प्रसिद्ध बढि़या पुस्तक

जिने हेतु सिर्फ़ धन काफी नहीं ,जिने की कला चाहिए

हम सब में कुछ खास बात है: सुखी होने याद रखें

सुखी होने अन्तर्यात्रा करें व अन्तर्मन की सुनंे

“जियो तो ऐसे जियो” यह पुस्तक आपके लिए क्यों उपयोगी है

कैन्सर चिकित्सा हेतु ऊर्जा का जागरण एवं सोच में परिवर्तन जरूरी

हम ऊर्जा के पूंज है । जब तक ऊर्जा का बहाव आसानी से पूरी तरह शरीर में होता रहता है तब तक हम स्वस्थ रहते हैं । हमारे ऊर्जा पथ में ज्योंहि बाधा पहुंचती है, शरीर रूग्ण हो जाता है । ऊर्जा पथ मे विकृति शरीर को विकृत कर देती है ।Image ऊर्जा पथ की चाबी हमारे स्वस्थ मन, भाव एवं विचार के अधीन है । स्वस्थ मन के होने पर ऊर्जा निर्बाध बहती रहती है । स्वस्थ भाव व मन के होने पर ही कोशिकिय श्वसन अच्छा होता है । निर्बाध आक्सीजन का बहना कोशिकिय श्वसन के लिए जरूरी है । शरीर में इसका दौड़ना इन्ही भावों व विचारों के अधीन है ।
कैन्सर अर्थात शरीर में ऊर्जा का संचरण सही तरीके से नहीं हो रहा है । ऊर्जा पथ को कैन्सर कोशिकाओं ने अपने नियन्त्रण में ले लिया है । रोगी की सोच एवं भाव अराजक है । कैन्सर होने का अर्थ है कि मन भी विकार ग्रस्त है । अतः सर्व प्रथम मन को कैन्सर केन्द्र से मुक्त करना पड़ता है । भाव एवं विचार की दिशा बदले बिना कैन्सर कौशिकाओं पर नियन्त्रण कठिन है । मात्र पोषक आहार एवं निर्विषिकरण से इसे रोकना मुश्किल है । इस हेतु मन में दबे भावों, गुस्से, ईष्र्या, दुःख, हार, बदले के भाव आदि का रेचन जरूरी है ।

Related Posts:

Welcome to Healing Cancer Naturally!

मन को कैसे जीतना

तम्बाकू कैसे छोड़नी: मित्र का अनुभव

जवारे का रसः बीमारी में अमृत एवं प्राकृतिक प्रतिरोधक शक्ति जगाने हेतु

 

निरोग होने में मददगार स्वास्थ्य सम्बन्धी कहावतें

*मनुष्य कभी मरता नहीं ,वह अपनी हत्या करता है।(Man never dies, he kills himself.)

*डाॅक्टरों से अधिक इलाज भोजन करता है।(Diet cures more than doctors.)
health proverbs*चालीस की उम्र में व्यक्ति या तो आधा डाॅक्टर बन जाता है या मूर्ख रहता है।(A man at 40 is either a physician or a fool.)

*ठोस को पिओं एवं द्रव को चबाओ (Drink your solids and eat your liquid.)

#परहेज इलाज से बेहतर है। (Preventaion is better than cure.)

#तन्दुरूस्ती हजार नियामत।

#रहे निरोगी जो कम खाय, काम न बिगाड़े जो गम खाए।

#यदि अपथ्य नियमित तो औषध क्या कर सकती?
Related Posts:

प्रेरक स्वास्थ्य सम्बन्धी अनमोल वचन (कैपसूल)

हमें खुश रहने हेतू क्या चाहिए ?

हम कोन हैं एवं शरीर का महत्व क्या हैं ?

रिफाइंड तेल से कैंसर हो सकता है?

दीर्घ नहीं सार्थक जीवन श्रेष्ठ है

चैतन्य द्वारा , विचारों द्वारा रोगों की चिकित्सा कैसे करें ?

प्रत्येक मरीज अपने अंदर खुद के डाॅक्टर को लेकर चलता है। वे हमारे (डाॅक्टरों के) सामने इस सच्चाई की जानकारी के बिना ही आ जाते हैं। हम अपना सर्वोतम तभी कर सकते हेैं जब हम मरीज के अंदर रहने वाले डाॅक्टर को ही काम करने का अवसर प्रदान करें।
-डा. अल्बर्ट श्वीट्जर

चेतना में विचार उत्पन्न हुआ और हमारा निर्माण हुआ। हम विचारों द्वारा बने हैं। अर्थात् चेतना ही जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है। जैसा कि उपनिषद् में लिखा है-प्रत्येक भावना शरीर में संवेदना उत्पन्न करती है। प्रत्यके भावना शरीर में अलग-अलग तरह से संवेदना उत्पन्न करती है। भावना मंे डूब जाने पर हम विचार का महसूस करने लगते हैं और संवेदन को नहीं देख पाते हैं। जैसे ही मन विचार में पड़ा और हम श्वास को देख नहीं पाते है।यही हमारी बेहोशी है। रोग का भाव एवं विचार मन मंे आने पर हम रोगी हो जाते हैं।01
हम जैसे ही संवेदन को देखने में समर्थ हो जाते हैं, तो संवेदन बदलने लग जाते हंै, मिट जाते हैं। इस तरह हम सकारात्मक भावना द्वारा स्वयं को सकारात्मक बना सकते है। स्वयं के प्रति सजग होकर हम अपना नियन्त्रण अपने हाथ मंे लेते हैं। इस तरह हम अपने बदलते मन को देखने मंे समर्थ हो जाते है । अर्थात् हम स्वयं की श्रेष्ठ भावनाओं और विचारों द्वारा चिकित्सा भी कर सकते हंै। स्वसम्मोहन के द्वारा भी स्वयं की चिकित्सा की जा सकती है। अपने दिमाग की प्रोग्रामिंग बदलकर हम अपने को स्वस्थ बना सकते हंै। चिकित्सा के भाव एवं विचार पैदा कर हम अपनी चिकित्सा कर सकते हंै।

जैसे पौधे के बीज मंे पूरी संरचना छिपी रहती हैं वैसे ही हमारी कोशिका के डी. एन. ए. में हमारे व्यक्तित्व/चेतना का पूरा प्रोग्राम अंकित होता है। बीज को प्रभावित कर जैसे पौधे में परिवर्तन लाते है, वैसे ही डी. एन. ए. को बदल कर पूरे जीवन में परिवर्तन लाया जा सकता है।

हमारे व दुनिया के बीच सम्बन्ध हमारी चेतना/मन से ही, या उसके कारण से ही होता है।

Related Posts:

असाध्य रोगों का सामना कैसे करेंः उक्त पुस्तिका डाउनलोड करें

डायबिटीज में अलसी कैसे सहायक एवं कैसे खायें?

हम कोन हैं एवं शरीर का महत्व क्या हैं ?

विचारों का प्रभाव: राजा किसी सेठ को फांसी पर क्यों चढा़ना चाहता है ?

चेतना की यात्रा से संज्ञान हुआः गड़बड़ है मन में अपराधी हूँ अपना व आपका-मिच्छामि दुक्कड़म

प्रेरक स्वास्थ्य सम्बन्धी अनमोल वचन (कैपसूल)

  • हमारे आहार एवं विचार का दपर्ण है-हमारा शरीर।                                    -महर्षिं चरक
  • रोगी होकर औषध-सेवन करने मंे जितनी जागरुकता दिखाते है, यदि आप उसका दशांश भी स्वस्थ रहने के प्रति जागरूक बन जाए तो यह निश्चित है कि रोग से पीडि़त न होना पड़ेगा।                                                 -आचार्य बालकृष्ण
  • बिना मन को आरोग्य किए शरीर को अच्छा करने का प्रयत्न करते हैं, जबकि मन और शरीर एक ही हैं। इसीलिए उनकी पृथक्-पृथक् चिकित्सा नहीं होनी चाहिए।                                                                        -प्लेटो
  • कैंसर जैसा प्राणघातक रोग भी ’बाहरी हमला न होकर आन्तरिक विघटन की स्थिति हैं’।  
  •                                                                                                                                                   -कार्ल सिमन्टन
  • कभी दूसरों से मत कहो कि तुम बीमार हो, न कभी बीमार ही बनो। बीमारी एक ऐसी वस्तु है ,जिसे पनपते ही रोकने का प्रयास करना चाहिए। – बुलवर लिटन बीमार होने पर भी बीमारी के अस्तित्व में विश्वास मत करो। इस प्रकार स्वागत न पाकर बीमारी रूपी अतिथि भाग जायेगा।                                                                                                     -योगी कथामृत
  • आप अणुओं और परमाणुओं की प्रवाहमान नदी हैं, जिन्हें ब्रह्यांड के प्रत्येक कोने से एकत्रित किया गया है। आप ऊर्जा के ऐसे भंडार हैं जिसकी लहरें एकीकृत क्षेत्र के कोनों तक विस्तृत होती है। आप बुद्धि के ऐसे भंडार हैं जो कभी रिक्त नहीं होगा, क्योंकि प्रकृति कभी रिक्त नहीं होगी।                                                                                                                                   –   दीपक चोपड़ा             
  • यदि मनुष्य चाहे तो अपनी चिकित्सा स्वयं कर सकता है और बहुत जल्दी सफल भी हो सकता है।      -शेक्सपीयर 
  •   Related Posts:
  •   असाध्य रोगों का सामना कैसे करेंः उक्त पुस्तिका डाउनलोड करें 

  • रिफाइंड तेल से कैंसर हो सकता है?

  •  स्वस्थ रहने हेतु लुइस हे की प्रार्थना

  • हम सब में कुछ खास बात है: सुखी होने याद रखें

  •    तम्बाकू कैसे छोड़नी: मित्र का अनुभव                                          
  •                                                                                                                       

डायबिटीज में अलसी कैसे सहायक एवं कैसे खायें?

डायबिटीज या मधुमेह एक चयापचय विकृति या रोग है जिसमें ब्लड शुगर की मात्रा बहुत बढ़ जाती है, क्योंकि शरीर में ब्लड शुगरको नियंत्रित करने वाले इंसुलिन हार्मोन का बनना कम हो जाता है और/या इंसुलिन अपने कार्य को ठीक से नहीं कर पाता है।

डायबिटीज में अलसी कैसे खायें?

डायबिटीज में अलसी कैसे खायें?

 डायबिटीज के रोगियों के लिए अलसी एक आदर्श और अमृत तुल्य भोजन है, क्योंकि यह जीरो कार्ब भोजन है। अलसी ब्लड शुगर नियंत्रित रखती है, डायबिटीज के शरीर पर होने वाले दुष्प्रभावों को कम करती हैं। चिकित्सक डायबिटीज के रोगी केा कम शर्करा और ज्यादा फाइबर लेने की सलाह देते हैं। अलसी में फाइबर की मात्रा अधिक होती है। इस कारण अलसी सेवन से लंबे समय तक पेट भरा हुआ रहता है, देर तक भूख नहीं लगती है। यह बी. एम. आर. केा बढ़ाती है, शरीर की चर्बी कम करती है और हम ज्यादा कैलोरी खर्च करते हैं। अतः मोटापे के रोगी के लिये अलसी उत्तम आहार है। उपरोक्त सभी बातों का सीधा अर्थ हैः

  • ऊर्जा का सर्वोत्तम स्रोत,
  •  ठससे शरीर में वसा का कम होना,
  •  स्नायु कोशिकाओं में थकान नहीं होना,
  •  ऑक्सीजन और अन्य पोषक तत्वों की उपयोगिता में वृद्धि,
  •  स्वास्थ्य में वृद्धि,
  •  यानी छरहरी बलिष्ठ मांसल देह

डायबिटीज में अलसी कैसे खायें

संतुलित भोजन में अलसी का समावेश आसान, सस्ता और दूरदर्शी कदम है, लेकिन इसके परिणाम बड़े चमत्कारी मिलते हैं।यदि आप ज्यादा फाइबर लेने के आदी नहीं हैं तो अलसी को  कम मात्रा से शुरू करें और फिर धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाएं। अलसी का सेवन करने से पहले इसे पीसना जरूरी है। इसे मिक्सर के ड्राई ग्राइंडर में दरदरा पीसें। इसे दही, दूध, सब्जी, दलिया, सलाद आदि के साथ भी लिया जा सकता है। पानी भी ज्यादा पीयें। डायबिटीज के रोगी को पूरा फायदा लेने के लिए रोजाना 30 से 60 ग्राम अलसी खाना चाहिये।

अलसी की रोटीडायबिटीज के रोगी को रोज सुबह 20 ग्राम और शाम को 20 ग्राम अलसी का सेवन करना चाहिये। अलसी को पीस कर आटे में मिला कर रोटी बना कर खाना चाहिये। यही खाने का सबसे अच्छा तरीका है।

अलसी का तेल -अलसी के तेल को भी दही या पनीर में मिला कर लिया जा सकता है। यह भी याद रखें कि अलसी के तेल में सिर्फ फैट्स होते हैं। फाइबर, प्रोटीन, लिगनेन, विटामिन और खनिज तत्व हमें सिर्फ बीज द्वारा ही प्राप्त होते हैं।                                                              ( courtsy Dr O P Verma)

रिफाइंड तेल से कैंसर हो सकता है?

अमरीका में प्रकाशित “द हैन्ड बुक ऑफ नेचुरल हैल्थ” में डॉ. बुडविज ने लिखा है कि कृत्रिम हाइड्रोजिनेटेज फैट स्वास्थ्य के लिए एक विष के सिवा कुछ नहीं है तथा स्वस्थ और निरोग शरीर के लिए आवश्यक वसा अम्ल बहुत जरूरी है प्रसिद्ध डाॅ0 योहाना बुडविज मूलतः वसा विशेषज्ञ थी जिन्होंने पेपर क्रोमेटिक तकनीक विकसित की है। डाॅ0 बुडविज के अनुसार रिफाईन्ड तेल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। वैज्ञानिक यूडो इरेसमस की पुस्तक ‘‘फेट्स देट हील फेट्स देट कील’’ बताती है कि परिष्कृत तेल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। रिफाइंड तेल में कैंसर पैदा करने वाले घातक तत्व होते है।cancer
गृहणियों को खाना बनाने के लिए रिफाइंड तेल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। बल्कि फील्टर्ड तेल का प्रयोग करना चाहिए। इससे भी अच्छा कच्ची घाणी से निकला तेल होता है। हमें कच्ची घाणी से निकला नारियल तेल ,सरसों का तेल या तील का तेल काम में लेना चाहिए। क्योंकि ये तेल हानिकारक नहीं होते है।
तेलों का परिष्करण एक आधुनिक तकनीक है। जिसमें बीजों को 200-500 डिग्री सेल्सेयस के बीच कई बार गरम किया जाता है। घातक पैट्रोलियम उत्पाद हेग्जेन का प्रयोग तेल को रंगहीन और गन्धहीन बनाने के लिए किया जाता है। कई घातक रसायन कास्टिक सोड़ा, फोसफेरिक एसीड, ब्लीचिंग क्लेज आदि मिलाए जाते है ताकि निर्माता हानिकारक व खराब बीजों से भी तेल निकाले तो उपभोक्ता को उसको पता न चले। इसलिए इन तेलों को गन्ध रहित, स्वाद रहित व पारदर्शी बनाया जाता है। रिफाइंड, ब्लीच्ड एवं डिओडोराइन्ड की प्रक्रिया में तेल के अच्छे तत्व समाप्त हो जाते है व घातक जहर घुल जाते है।
तेलों की सेल्फ लाईफ बढ़ाने के लिए तेलों का निकल तथा हाइडाªेजन की मदद से हाइड्रोजिनेशन किया जाता है। यह तेल सफेद ठोस कड़ा और देखने में घी जैसा लगता है। यह तेल जो कभी खराब नहीं होता इसमें होते है। केमिकल्स द्वारा परिवर्तित फैटी एसीड, ट्रांसफेट और निकिल के अवशेष होते है जो शरीर के लिए चयापचित करना कठिन है। इस पूरी प्रक्रिया में बीजों में विद्यमान वनस्पतिक तत्व , विटामिन आदि पूरी तरह नष्ट हो जाते है।
सबसे बढि़या तेल जैतून का तेल होता है जो हमारे यहाँ बहुत मंहगा मिलता है। इसके बाद तिल का तेल (शीसेम आॅयल) एवं सरसों का तेल खाना चाहिए। मूंगफली के तेल में कोलोस्ट्राल की मात्रा ज्यादा होती है अतः वह भी कम खाना चाहिए। तलने के प्रक्रिया में तेल में मौजूद फैटी एसीड ट्रांस फैटी एसीड में बदल जाते है और उसमें उपस्थित सारे एन्टी आॅक्सीडेन्ट नष्ट हो जाते है। इसलिए तलना भी हानिकारक है। इसलिए तली-गली चीजें नहीं खानी चाहिए।

Related Posts:

रिफाइंड तेल से ह्नदय रोग, मधुमेह व कैंसर हो सकता है? अन्तिम भाग

आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक अलसी से आहार चिकित्सा: उक्त पुस्तिका डाउनलोड करें

वनस्पति घी भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 377 other followers