उठो! जागो!

लक्ष्य की प्राप्ति तक रूको नहीं! -जयन्ती जैन


टिप्पणी करे

रोग एवं उपचार का विज्ञान:द हीलिंग कोड़ नामक चर्चित पुस्तक से

द हीलिंग कोड़ नामक चर्चित पुस्तक एलेक्जेण्डर लाॅयड एवं बेन जाॅनसन द्वारा लिखी गयी । इसमें उपचार संहिता का विस्तृत वर्णन किया हुआ है । Healingcodeलेखक एलेक्जेण्डर लाॅयड अपनी पत्नि होप का ईलाज 12 वर्ष की खोज के बाद इस विधि से करने में करने में सफल रहे।साथ ही सात आधारभूत रहस्य बताए  है ।
रहस्य नम्बर 1- सभी रोगों का एक ही कारण होता है वह तनाव है ।
रहस्य नम्बर 2- हमारे सभी रोगों का कारण ऊर्जा समस्या है ।
रहस्य नम्बर 3- हृदय हमारे स्वस्थ होने के तन्त्र का अधिपति है ।
रहस्य नम्बर 4- मानव की हार्ड ड्राईव कोशिकीय स्मृतियां है जिसमे तस्वीरें ऊर्जा के रूप में होती है । 90 प्रतिशत तस्वीरें अचेतन में अवस्थित होती है ।
रहस्य नम्बर 5- आपका एन्टी वायरस प्रोग्राम आपको बीमार बनाता है ।
रहस्य नम्बर 6- मेरी धारणाएं ही मेरी कोशिकीय स्मृतियों को प्रभावित करती है। अवचेतन में छुपी धारणाएं स्वतः काम करती है । बीमारी की जड़ काटने तनाव गिराएं, उसे मिटाने स्मृति बदलें । रहस्य नम्बर 7- हृदय एवं मस्तिष्क में द्वन्द्व होने पर हृदय सदैव जीतता है ।
मुख्य विधि (उपचार संहिता)के चरण:-
1. तनाव को मापे – 1 से 10 के अनुपात में (10 सबसे बड़ा दर्द)
2. तनाव से जुड़ी भावनाएं व विश्वास को पहचानें
3. स्मृति में खोजें – जड़ तक जाएं – समान भाव स्थिति में कब थे
4. पूरानी स्मृति को मापे – उसका उपचार करें
5. प्रार्थना करें – उसके उपचार हेतू
मैं प्रार्थना करता हूं कि प्रभु कृपा, विश्व पे्रम, जीवन-शक्ति एवं दिव्य प्रकाश मुझमे भर रहा है । मेरे —-उच्च रक्तचाप—-(बीमारी) सम्बन्धी ज्ञात एवं अज्ञात नकारात्मक सोच, सम्बन्धित तस्वीरें, अस्वास्थकर विश्वास, विनाशकारी कोशिकिय स्मृतियां एवं उससे जुड़ी सभी शारीरिक समस्याओं का कारण प्रकट होता है एवं जिससे उनका उपचार हो रहा है । मैं प्रार्थना करता हूं कि यह इलाज 100 गुणा से भी अधिक हो !
6. चारों स्थिति में उक्त प्रार्थना – बासां पर, कनपटी पर, जबड़ों पर और कंठ के पास दोनो हाथ रख कर 30 सैंकण्ड तक दुहराएं । इससे आपके दिल के घाव भर जाते हंै । उससे बीमारी ठीक होती है ।

( to be continued…..)


टिप्पणी करे

आत्मशक्ति/मस्तिष्क की क्षमता: मुनि अजितचन्द्र का महा श तावधान

जैन मुनि अजितचन्द्र सागर जी द्वारा दिनांक 04.03.2012 को मुम्बई में द्विशतावधान का प्रयोग किया गया ।

शतावधान

शतावधान

तीन हजार दर्शकों के साथ-साथ तत्कालिन विधान सभा स्पीकर श्री दिलीप पाटिल, उच्च न्यायालय के न्यायाधिश श्री कमल किशोर तातेड़ एवं न्यूरोलोजिस्ट डाॅ0 सुधीर शाह भी उपस्थित थे । दर्शकों द्वारा 200 प्रश्न व तथ्य रखे गए । जिनमे गणित के सवाल भी थे । मुनिश्री द्वारा सवालों व तथ्यों को पहले क्रमशः बताया फिर उलटा बताया गया । अन्त में लोगों ने प्रश्न क्रम बताया, उन्होने उत्तर दिया । फिर उन्होने उत्तर बताए उन्होने प्रश्न क्रम बताए । इससे हमारी आत्मा की शक्ति सिद्ध होती है ।

मुनि अजितचन्द्र ऊंझा में जन्म लिया एवं 12 वर्ष की उम्र में दिक्षा ग्रहण की । इसके बाद साढ़े छः वर्ष तक मौन रहे । उन्होने बताया कि साधना एवं ध्यान के द्वारा यह उपलब्धि प्राप्त की ।

इससे हमारी मस्तिष्क की अपार क्षमता का ज्ञान हमें होता है । हम उसका कितना प्रयोग कहां कर रहे हंै । चैतन्य-आत्मशक्ति का प्रयोग देख कर प्रेरित होने की आवश्यकता है ।

 

Related posts:

In record bid, Jain monk to recall on the spot 500 questions ..

Maha Shat-Avadhan by Munishri Ajitchandra Sagar-ji on 4th …

 


1 टिप्पणी

कब तक गलतियों व क्षमा का क्रम चलेगा ?

प्रिय आत्मन,

 

kshama-yachna

मुझसे गलतियां हुई है। मेरी चुकें बढी है, व्यवहार में रूखा हूं, आपके प्रति कुछ अप्रिय कहा है एवं किया है। इसका खेद है। औपचारिक क्षमा नहीं, दिल पर हाथ रख कर क्षमा चाहता हूं।

अपनें अन्तर में झांकनें पर भूले स्पष्ट दिखती है, जिसकी सजा भी आप दे सकतें हो।

एक प्रश्न मन में आता है कब तक यह क्रम गलतिया करना व क्षमा मांगता रहूगा?

क्षमा प्रार्थी

जयन्ती-मीना जैन

Related Posts:

चेतना की यात्रा से संज्ञान हुआः गड़बड़ है मन में अपराधी हूँ अपना व आपका-मिच्छामि दुक्कड़म

‘पद्मपुरा’ में प्रेतादि बाधा-निवारणः वैज्ञानिक रहस्य

तनावमुक्ति का, सफल होने का उपाय : क्षमा करना

Uncategorized | Tags: , , , , , , , , , , | Permalink.


1 टिप्पणी

मातृत्व जिम्मेदारी नहीं सृजन है ,स्त्री की की अपनी तलाश है

मातृत्व आनन्ददायक है । लेकिन इससे  जिम्मेदारी बढ़ती  है । स्त्री सक्षम होती , प्रवीण होती है  इस भूमिका को निभाने में इसलिए चिन्ता की जरूरत नही है ।
Motherhood-Picassoमां बनना मात्र एक शारीरिक कृत्य से अधिक भावनात्मक कृत्य है । जैविक मां बनने मे 9 माह लगते हैं, लेकिन मातृत्व को निभाने में पूरा जीवन लगता है । जैविक मां बनने के बाद बड़ी चुनौतियां है । चुनौती का यह प्रारम्भ है ।
एक स्त्री की शादी की पूर्णता मां बन कर ही होती है । जीवन मंे सृजन मां बनने से प्रारम्भ होता है । मां का कृत्र्तव्य स्त्री को प्रतिपल सजग व सृजनशील बनाता है । स्त्रीत्व का बड़ा दर्जा मातृत्व है । वह स्वयं प्रकृति में अपनी भूमिका को पूरा करती है । इससे स्वयं के सारे अधुरेपन मिट जाते हैं । अपने शरीर के द्वारा नए शरीर को सफलता पूर्वक गढ़ना बड़ी जीत है । इसके माध्यम से स्त्री की तलाश पूरी होती है । उसके सारे अरमान साकार होते हैं ।  मां विजेता होती है । याद रखो मां मात्र  पुत्र  की नहीं होती, मातृत्व एक अवस्था है ।
तुम्हारी भूमिका बढ़ गई है । तुमसे सृष्टि अवतरित हुई है । पत्नी एवं बहु की भूमिका से बढ़ कर मां की भूमिका होती है । स्त्री को बेटी/बहन/पत्नी/बहू, से बड़ी भूमिका मां की होती है । मातृत्व स्त्री को सबसे बड़ा उपहार प्राप्त है । इसमे सामन्जस्य बेठाते हुए स्वयं को भी नहीं भूलना है । वैसे तुम स्वयं की कीमत पर दूसरों को अधिक महत्व देती रहती हो, क्या यह उचित है ? अपनी वृहतर भूमिका को सजगता से निभाओ, स्वयं तृप्त होओ व सबको भूमिकानुसार तृप्त रखो ।
पुत्र  की प्रथम शिक्षिका प्रथम रहे ! उसकी सृजनक्षमता, आत्म-सम्मान व सहजता को विकसित करंे । बच्चे को किसी रूप में विकृत न होने दे ।  पुत्र ही  उसका नहीं है । उसके आस-पास के परिजन, हवा, मिट्टी व संगी साथी भी उसका हैं । बेटे को स्वतन्त्र समझदार नागरिक बनाना । जातिवाद, पन्थवाद की परम्परा से बचाना है । लालन-पालन मां का विशेषाधिकार के साथ बड़ी जिम्मेदारी है । घ्यान रखें कि अपने पालने में हुई चुके व गलतियां उसे न भुगतनी पड़े ।

माँ ! मातृत्व को गौरवान्वित करो, उसकी सर्वोच्च सम्भावना तक पंहुचो !

Related Posts:

मेरा अनुभव…. मातृत्व….

मेरा नमस्कार: अर्थ, भावार्थ एंव प्रयोजन

“भूख रखिए, नासमझ बने रहिए”स्टीव जाॅब्स

रिलैक्स होने तनाव भगाने हेतु ध्यान करें ( योग निद्रा – गौरवा जी के निर्देशों की CD फ्री डाउनलोड )


1 टिप्पणी

यहां मेरा कुछ नहीं है, सब पर के सहयोग से है

मैं जीवन रूपी समुद्र की लहर का एक अंश हूं ।यह जीवन मेरा अकेले का नहीं है । यह मेरे माता-पिता व प्रकृति के योग से निर्मित है। यह अणु-परमाणुओं का फैलाव व जौड़ अस्तित्व के नियमानुसार है । आकाश से यह फैला है, पृथ्वी से जुड़ा है, जल के कारण तरल है, अग्नि से संचलित है एवं हवा से जीवन्त है ।
वास्तव में यहां मेरा अपना कहने लायक कुछ नहीं है । यह विचार कई शक्तियों व प्रेरणाओं से उभरे हैं । अनेक क्रियाओं प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप है । अनेक लेखों, पुस्तको व संदेशों से उपजे हैं । आलोडन व विलोपन का फल है । मन के जालों को बनने बिगड़ने से बने है । न मन मेरा है न तन मेरा है । न विचार मेरे हैं न उद्गार मेरे है । कई संयोगो-वियोगों के परिणाम से है ।
जैसे कि नौकरी कई साथियों के सहयोग से मिली है । यह मेरे अकेले प्रयत्नों का परिणाम नही है । अनेक साथियों व सत्ताओं के भरोसे चल रही है । पढ़ाई से जो ज्ञान-अनुभव हुए उन सबमे स्कूल, शिक्षकांे, पुस्तकों व मित्रों का सहयोग है । सब तरफ से आर्शिवाद मिल रहे हैं तभी तो यह जीवन संभव है ।
मेरे होने से मेरा योगदान यहां पर शून्य है । अनेक साथियों की सहायता, सŸााओ, कर्मों व भावनाओं का यह जोड़ है । यह अपने आप ऐसा नहीं हो सकता था । यह सबके सहयोग का परिणाम है । मेरे पर सबका प्रभाव है । यह अकेला कुछ नहीं है, न यह अकेला कुछ कर सकता है । यह सबका जोड़, जुगाड़ है, फल है ।
इसलिए किसी को यहां पर इतराने की जरूरत नहीं है । यह जीवन अस्तित्व का वरदान है। इसका उपयोग नेक कर्मों को करने हेतु प्रकृति ने रचा है । अतः इसमे अहं कर अपनी चलाने की जरूरत नहीं है । ईश्वरीय सŸाा आपको जैसे रखे, वैसे प्रसन्न रहो । इसमे अपनी इच्छाओं को डालने की जरूरत नहीं है । यह ज्योति उसको जलाने से है । उसने अभी तक न बुझाई है तो यह उसका अहसान है । इसमे तुम्हारा क्या योगदान है जो इतराते हो । बस, उसी का गुणानुवाद करो । उसी का प्रताप मानो । उसी के वरदान को भोग रहे हो तो उसी में मस्त रहो । इसमे चाह की टांग न लड़ाएं। जा विध राखे राम ता विध रहिए राम ।
हम सब बहुत सी शक्तियों, भावों व कर्मों की मिक्सी में पीस कर अवतरित हुए है । प्रतिक्षण सृजन उसका चल रहा है । उसके अंश हो, उसी की लीला के परिणाम हो । यह जीवन तुम्हारा नहीं है। उसका संचालन वही नियन्ता करता है । तुम उसकी कठपूतली हो। फिर बनने, पाने का अहंकार क्यों पाले हुए हो ।
यह जीवन उस लीलाधर का है । यह उसी की लीला है । यहां सफलता पाना तुम्हारे वश का नहीं है । यह सब परम सŸाा का खेल है । तुम यहां हो ही नहीं, जैसे कि बूंद स्वयं को सागर समझे या उड़ता पत्थर कहे कि मैं चल रहा हूं । मैं उड़ता हूं । महल में आया पत्थर समझे कि मैं यहां आया हूं । विजेता हूं । शुक्रिया
मैं जीवन रूपी समुद्र की लहर का एक अंश हूं । व्यक्ति विशेष का यहां कोई वजूद नहीं है। हम समग्र के अंश है । हमारा निज यहां कुछ नहीं है । मुझ पर सबका ऋण है । मै ऋणी हूं । मेरी कोई जीत नहीं है । मेरी कोई हार नहीं है। मैं कुछ जीता नहीं हूं । सब उसके ऐहसानों का योग है । उसी को अपना ’’मैं’’ कहना मेरी भूल है । यह मेरा अज्ञान है ।
हम एक प्रक्रिया है या उसके अंश है । इस प्रक्रिया को अपना बताना नादानी है । इस प्रक्रिया पर हमारा कोई वश नहीं है ।


5 टिप्पणियाँ

मधुमेह निवारण शिविर का सार: योग व प्राणायाम एक पूरक चिकित्सा

स्वामी विवेकानन्द योग अनुसंधान संस्थान (एस. व्यासा) विश्वविद्यालय, बैंगलोर के सहयोग से एक सप्ताह का मधुमेह निवारण शिविर का आयोजन किया । मधुमेह जीवन शैली से जुड़ी बीमारियों में से एक प्रमुख व्याधि है । इसका सामना दवाई से करने के बजाय जीवन शैली में आई विकृति को ठीक कर करना चाहिए । जीवन शैली को व्यवस्थित करने मन मस्तिष्क को बदलना पड़ता है ।

Diabetes Camp

Diabetes Camp

इस हेतु अपनी धारणाओं को बदलना पड़ता है । नये विश्वासों को गढ़ना होता है । अपनी छवि को बेहतर बनाना पड़ता है । जिसके लिए अपने से लड़ना पडता है । स्वयं को तपाना पड़ता है । इसलिए आत्म-प्रबन्धन सीखना पड़ता है । इस पर हमारे ऋषियों, योगियों ने 5000 वर्ष पूर्व खुब काम कर मन को जीतने की विद्या सीखलाई है जिसे हम आजकल योग विज्ञान कहते हैं ।
यह चयापचय क्रिया से जुड़ा रोग है । अतः खानपान बदल कर योग प्राणायाम द्वारा ठीक होता है ।

मधुमेह से बचने के लिए निम्न प्रकार प्रतिदिन योगादि करना चाहिए । इसे एक घंटे में किया जा सकता है ।

वार्म अप हेतु-                    जोगिंग व सुक्ष्म व्यायाम
कैलोरी खर्च करने के लिए –   सूर्य नमस्कार (5 से 12 चक्र)
श्वास संतुलित करने –          नाड़ी शोधन प्राणायाम (27-चक्र)
तनाव घटाने –                    भ्रामरी प्राणायाम (9-चक्र)
गहन विश्राम हेतु –              साईक्लिक मेडिटेशन

Related Posts:

योग के अनुसार हमारा निर्माता कौन / जीवन का सत्य क्या है?

डायबिटीज में अलसी कैसे सहायक एवं कैसे खायें?

आरोग्यधाम (एस. व्यासा) बैंगलोर ,असाध्य रोगों की सर्वांगीण चिकित्सा हेतु श्रेष्ठ जगह

दिल के रोग – काॅलस्ट्रोल से कम, घृणा व इर्ष्या से अधिक होते

जब कठिन आसन व प्राणायाम न कर सको तो सूक्ष्म व्यायाम करें


6 टिप्पणियाँ

ब्लड कैंसर का सामना मेरे पिताजी ने कैसे किया

वर्ष 1980 की शरद ऋतु की बात है। बढ़ती थकान का ईलाज कराने के क्रम में पिताजी उदयपुर के मशहुर डाक्टर शूरवीर सिंह जी से तीसरी बार मिले। तब उन्होंने टी.एल.सी. कराने को कहा। सफेद रक्त कणिकाओं की संख्या औसत से दो-तीन गुना अधिक थी। डाक्टर ने ब्लड कैंसर की घोषणा की।
पतले दुबले शरीर में 50 किलो ग्राम वजन था। जो निरन्तर कम होता जा रहा था। एक वर्ष तक तो हमने उन्हें बताया नहीं कि उन्हें जानलेवा बीमारी हो चुकी है। लेकिन हमारी चतुराई उनकी चैकस निगाहों से बच न सकी। उन्हें संदेह हो गया कि उन्हें घातक बीमारी ने घेर लिया है। यद्यपि उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। हाँ, पूछते जरूर थे कि – उन्हें कौनसा रोग हो गया है। तुम मेरे प्रति बीमारी की बात करते समय गम्भीर क्यों हो जाते हो ?
श्री रतनलाल जी को अपने कर्मों व अपने भाग्य पर भरोसा था। वे एक पक्के जैन अनुयायी थे। उनका दर्शन उम्र को तय मानता है। अतः वे मृत्यु भी तय तारीख से पूर्व आने की बात नहीं मानते थे। वेे कहते थे कि कोई डाक्टर उनकी उम्र एक दिन बढ़ा नहीं सकता है न ही कोई एक दिन उम्र कम कर सकता है। मृत्यु निश्चित है। फिर डरना क्या ?
वे एक नियमित व्यक्ति थे। उन्होंने कभी रात को पानी तक नहीं पीया। पारम्परिक जैन विश्वासों के अनुयायी होने से वे कहा करते थे कि रोग देह को हुआ है। वे तो एक चेतन तत्व भगवान आत्मा है। नित्य आत्मा को कोई पदार्थ छू भी नहीं सकता है।
राजस्थान राज्य में मेरा गांव शक्तावतों का गुडा सोम नदी के किनारे बसा हुआ है। पिताजी प्रातः उठते ही नदी पर जाते थे। उनके दिन का प्रारम्भ नदी से होता था। पिताजी नदी से स्नान कर आते ही मन्दिर जाते थे वे वहां पर प्रतिदिन घंटा-डेढ़ घंटा पूजा करते थे। भोजन से पूर्व यह उनकी शर्त थी । जैन पूजाओं में ईश्वर से शक्ति, साहस व प्रेम मांगा जाता है।
निदान 1980 में ही हो गया था। तभी उन्हें ’माइलरन’ नामक कैप्सूल व रक्त संवर्धन की गोलियाँ दी जाती थी। पिताजी ने केंसर के उपरान्त बारह वर्ष जीवन जीया। इसमें से अन्तिम एक वर्ष ही निष्क्रय रहे। बिस्तर पर तो मात्र वह एक माह रहे। अन्यथा उन्होंने पूरी जिम्मेदारी के साथ सक्रिय जीवन जीया। उन्हें कभी रेडियोथेरेपी, या किमोथेरेपी न करानी पडी। रक्त परिवर्तन भी एक भी बार नहीं कराना पड़ा। इस सबके बिना भी वह सक्रिय जीवन जीते रहें। यह सब कैसे हुआ, बताना कठिन है। यह उनकी अपने प्रति व अपने धर्म के प्रति आस्था व सात्विक भोजन का ही परिणाम होगा। डा. स्वयं इसे चमत्कार बताते थे। 01, अगस्त, 1993 को उनकी देह छूटी। ?
व्यक्ति की देह उसके विचारों का अनुसरण करती है। सकारात्मक विचार रोगी की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते है आधुनिक वैज्ञानिक शोधो से प्रमाणित हुआ है कि स्वस्थ्य विचार से स्वस्थ्य शरीर बनता है।

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 608 other followers