Posts Tagged ‘कैंसर’
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जून
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management. Tagged: कैंसर, खुद- इलाज, तनावमुक्ति, नकारात्मता, भाग्य, लुईस हे, शुभ कामनाएँ, सेहत. Leave a Comment
स्वस्थ होने के लिए स्वस्थ मानसिकता बहुत जरूरी है । बीमार मन को लेकर हम तन को स्वस्थ नहीं कर सकते हैं । मानसिकता को स्वस्थ बनाने हेतु प्रिय व पसंद के लोगों के बीच रहे जो आपकी ऊर्जा तन्त्र को मजबूत करें । जिनके होने से आपको सकारात्मक ऊर्जा मिले ।आपकी भावनाएं अच्छी होती हो उन लोगों के संग रहे । जिन लोगों को मिलने पर ऊर्जा खर्च होती हो, अच्छा न लगता हो, उनसे दूर रहे । ये नकारात्मक लोग आपकी घनात्मक ऊर्जा को पी जाते हैं । अतः ऐसे लोगों से दूर रहने की आवश्यकता है । अपनी कमजोरियों व दुःखों की बाते न करें । हंसते-गाते रहे ।
अपने लक्ष्य व इच्छाओं की अपनों से चर्चा करें । अपने जीने का मकसद स्पष्ट करें इससे आपको स्वस्थ होने का मार्ग खूलेगा । आपके शरीर की कोशिकाएं स्वतन्त्रता महसूस करेगी। जिससे उनमे बल उत्पन्न होगा ।
हम सब एक तरह के विचार एवं भाव में जीते है । हमारी अपनी धारणाएं है । जिनको बदलने की सख्त जरूरत है, जिसे लोथर हरनाइसे सिस्टम जम्पस कहता है । इस मनोवृति को बदलना बहुत आवश्यक है । तभी तो कहावत है कि रोग का नहीं रोगी का उपचार करो ।
रोगी में स्वस्थ होने की इच्छा, सपना और दृष्टि होनी चाहिए । उसमे जीने की, स्वस्थ होने की तमन्ना होनी चाहिए । अन्यथा कोई भी चिकित्सक चिकित्सा नहीं कर सकता है । रोगी का स्वस्थ होने का मनोबल व सहयोग आवश्यक है।
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जून
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Self-Healing, Stress Management. Tagged: अलसी, कैंसर, खुद- इलाज, मन, विवाह, समय प्रबन्धन, सेहत. Leave a Comment
हमारा जीवन आजकल अम्लिय हो गया है । एलोपेथिक दवाईयां लेनें से अम्लता बढती है । दूषित भोजन से व प्रदुषित वातावरण से अम्लता बढती है । अम्लता बढनें से पेट एवं गले में जलन होती है ।
अम्लता बढ़ने से बड़ी-बड़ी बीमारियां होती है । स्वस्थ रहने के लिए शरीर के पी0एच0 को नियन्त्रित रखना जरूरी है ।
भूखे पेट एक चमच्च खानें का सोडा लेनें से क्षारता बढती है । जो अम्लता को नियत्रिंत करती है । अतः प्रतिदिन नाश्ते एवं भोजन से पूर्व एक चम्मच सोड़ा पानी के साथ लेना उपयोगी है ।
खानें के सोडे को सोडियम बाई कार्बोनेट कहतें है । इसे ही बेकिंग सोडा कहते है । बच्चों को पिलाया जाने वाला ग्राईपवाटर भी यहीं है । ईनो भी इसी से बनता है, लेकिन उसे स्वादिष्ट बनानें अन्य रसायन डालतें है । अतः खाध्यान्न श्रेणी का टाटा का बैकिंग सोडा लेना बेहतर है ।यह शेम्पू एवं सफाईकारक भी है । सब्जि एवं फल को प्रयोग इससे धो कर उपयोग में लेना चाहिये ।
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मई
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Self-Healing, Spirituality, Stress Management. Tagged: अलसी, कैंसर, खुद- इलाज, प्रार्थना, मन, लुईस हे, सेहत. 1 टिप्पणी
सामान्यतः डाॅक्टर लोग रोगी को देख कर रोगों का ईलाज करते हैं । जबकि रोगी का ईलाज किया जाना चाहिए । क्योंकि प्रत्येक रोगी भिन्न है । प्रत्येक रोगी की कोशिकाएं, डीएनए, प्रतिरोध क्षमता भिन्न होती है ।
एक व्यक्ति का आंतरिक संगठन व संरचना कई तरह से भिन्न होती है । वे एक भौतिक ईकाइ नही है । सबकी अपनी-अपनी विशेषताएं व कमजोरियां है । अतः रोगों को देखकर ईलाज करना उचित नहीं है । तभी तो कहावत है कि एक को बैंगन पच एवं दूसरे को वायु करता है।
मच्छर कई लोगों को काटता है लेकिन सभी को मलेरिया नही होता है । हम सब के शरीर में टीबी के वाइरस है लेकिन सब को टीबी नहीं हुई है । क्यों ? प्रत्येेक व्यक्ति की प्रतिरोध क्षमता भिन्न-2 होती है । मलेरिया परजीवी कुछ व्यक्तियों में बुखार फैला देते हैं । कुछेक व्यक्ति इससे घायल हो जाते हैं । सबके शरीर इनके विकास में सहायता नहीं करते हैं । यह साइको-बायलोजिकल माडल है।
प्रकृति भी प्रत्येक व्यक्ति को समाज की तरह समान नहीं मानती है । क्योंकि सब में कुछ बड़ी समानताओं के उपरान्त असमानताएं भी होती है । तभी तो आज समाज सबको समान मानकर व्यववहार करता है जो उचित नहीं होता है । तन्त्र की असफलता के पिछे सबको समान मानना बड़ा कारण है ।
डाॅक्टर शरीर का ईलाज करता है । हम मात्र शरीर नहीं है । मनुष्य शरीर, मन व चेतना का गठजोड़ है । चिकित्सा विज्ञान के अनुसार ‘‘आप शरीर को ठीक रखो, मन अपने आप ठीक हो जाएगा ।’’ की कहावत बायोमेडिकल माडल अनुरूप है । जो यह मानता है कि शरीर को ठीक कर दो । बाकी सब स्वतः ठीक हो जाएगा । यह ठीक नहीं है।
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मई
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, आत्मछवि, कृतज्ञता, कैंसर, खुद- इलाज, धन्यवाद, निर्णय, प्रार्थना, मन, शुभ कामनाएँ, सकारात्मकता, सेहत. 3s टिप्पणियाँ
आरोग्यधाम, प्रशान्ती कुटीर बैंगलोर में दिनांक 26.04.2013 से 03.05.2013 तक पत्नी सहित समग्र चिकित्सा हेतु रहा । यह स्वामी विवेकानन्द योग अनुसंधान संस्थान, (एस. व्यासा) डिम्ड विश्वविद्यालय का एक अंग है ।
यहां पर योग, आयुर्वेद व नेचुरोपेथी के स्वतन्त्र महाविद्यालय है । यहां योग पर रिसर्च सबसे अधिक हुई हैं एवं अनेक शोध पत्र चिकित्सा, मनोविज्ञान, के अन्तर्राष्ट्रिय जरनल्स छप चुके हैं । यहां पर योग चिकित्सा, आधुनिक विज्ञान, आयुर्वेद, नेचुरोपेथी व फिजियोथैरेपी के आधार से कई रोगों का सफलतापूर्वक ईलाज किया जाता है ।
पत्नी मीना के जोड़ों व सर्वाईकल दर्द में बहुत राहत मिली । वह विगत पांच वर्षों से दाई करवट सो नहीं पा रही थी, वह सोने लगी । वहां पर मीना के दर्द उठने पर तत्काल योगा करा कर पेन किलर देने की तरह दर्द दूर कर दिया ।योग, मसाज, लेप, स्टीम बाथ, सोना बाथ आदि से रीढ़ की हड्डी के सभी प्रकार के दर्द को दूर करने में विशेषज्ञता हासिल है ।
मेरा रक्तचाप 110/70 पर रहने लगा । नाड़ी शोधन व भ्रामरी का जबरदस्त प्रभाव देखा ।
गुरूजी डाॅ0 एच0आर0 नागेन्द्र भूतपूर्व अन्तरिक्ष वैज्ञानिक हैं जो अन्तरिक्ष की यात्रा को छोड़कर अन्तर्मन की यात्रा करा रहे हैं एवं विश्व प्रसिद्ध आधुनिक चिकित्सक डाॅ0 आर0 नागरत्ना दीदी का व्यवहार एवं सेवा अनुकरणीय है ।यह 100 एकड़ में निर्मित प्राकृतिक वातावरण से युक्त है । यहां का स्टाफ, थिरापिस्ट व डाॅक्टर सहयोगी हैं ।
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मई
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Stress Management. Tagged: अलसी, कैंसर, खुद- इलाज, जीवन प्रबन्धन, भोजन, समय प्रबन्धन, सेहत. 1 टिप्पणी
हमे अपने पूर्वजों द्वारा खाए जाने वाले तेल हमारे जीन्स में बसे होते हैं । अतः अपने पूर्वजों द्वारा खाए जाने वाले तेल ही खाना उचित है । जैसे पंजाबी सरसों का व दक्षिण भारतीय नारियल का तेल खाता रहा है, इन्हे खाए तो ठीक है । एक व्यक्ति को प्रतिदिन अधिकतम तीन चम्मच घी/तेल आदि वसा का प्रयोग करना चाहिये । वैसे नारियल के तेल में मिडियम चैन फेटीएसीड्स के होने से खाने में अच्छा माना जाता है ।
भोजन पकाने में अधिक स्माकिंग पाॅईन्ट वाला तेल खाना चाहिए ताकि छोंकने पर ट्रान्सफैट कम से कम बने । अधिक तलने पर प्रत्येक तेल ट्रान्सफैट बन जाता है, अतः उससे बचे ।
सभी प्राकृतिक/सहज तिलहन से बने तेल खाना स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक है । सरसों, तिल, मूंगफली, नारियल के कच्ची घाणी से निकले तेल श्रेष्ठ है । सोया, सफोला, राईसब्रान आदि से निकले तेल को खाने योग्य बनाने हेतू रिफाइण्ड करना पड़ता है । केन्सर फैलाने वाले फास्फोरिक एसिड, हेक्जीन एवं कास्टिक सोड़ा रिफाइण्ड में प्रयुक्त होते हैं । इससे रिफाइण्ड तेल हानिकारक है । कृत्रिम तरिके से निकाले गये तेल सभी अखाद्य है, जिन्हें कृत्रिम तरिके से तैयार किया जाकर खाद्य बनाया गया है, इस प्रकार रिफाइण्ड कर अखाद्य तेल को खाद्य बनाया जाता है । रिफाइण्ड की बजाय फिल्टर्ड तेल खाना स्वास्थ्यवर्द्धक है । कच्ची घाणी व एक्सपेलर से निकले तेल खाना चाहिए ।
तेल की पैकिंग पर लिखे किसी भी वाक्य से अप्रभावित रहें । जैसा कि कुछ तेल की पैंकिग पर लिखा होता है कि इसमें काॅलस्ट्रोल नहीं है । किसी भी वनस्पति तेल में काॅलस्ट्रोल नहीं होता है । काॅलस्ट्रोल हमारे शरीर में जाकर बनता है । जैतुन का तेल अच्छा होता हैं, लेकिन इसका प्रयोग पकाने में ठीक नहीं है ।
(गौरी रोक्कम, एस.व्यासा, डाइटिशियन की वार्ता के आधार पर)
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मई
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Meditation, Personality, Self-Healing, Stress Management. Tagged: कैंसर, क्षमता, खुद- इलाज, तनावमुक्ति, नकारात्मता, प्रबल इच्छा, प्रार्थना, मन, मस्तिष्क, लुईस हे, सेहत. 4s टिप्पणियाँ
वर्ष 1980 की शरद ऋतु की बात है। बढ़ती थकान का ईलाज कराने के क्रम में पिताजी उदयपुर के मशहुर डाक्टर शूरवीर सिंह जी से तीसरी बार मिले। तब उन्होंने टी.एल.सी. कराने को कहा। सफेद रक्त कणिकाओं की संख्या औसत से दो-तीन गुना अधिक थी। डाक्टर ने ब्लड कैंसर की घोषणा की।
पतले दुबले शरीर में 50 किलो ग्राम वजन था। जो निरन्तर कम होता जा रहा था। एक वर्ष तक तो हमने उन्हें बताया नहीं कि उन्हें जानलेवा बीमारी हो चुकी है। लेकिन हमारी चतुराई उनकी चैकस निगाहों से बच न सकी। उन्हें संदेह हो गया कि उन्हें घातक बीमारी ने घेर लिया है। यद्यपि उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। हाँ, पूछते जरूर थे कि – उन्हें कौनसा रोग हो गया है। तुम मेरे प्रति बीमारी की बात करते समय गम्भीर क्यों हो जाते हो ?
श्री रतनलाल जी को अपने कर्मों व अपने भाग्य पर भरोसा था। वे एक पक्के जैन अनुयायी थे। उनका दर्शन उम्र को तय मानता है। अतः वे मृत्यु भी तय तारीख से पूर्व आने की बात नहीं मानते थे। वेे कहते थे कि कोई डाक्टर उनकी उम्र एक दिन बढ़ा नहीं सकता है न ही कोई एक दिन उम्र कम कर सकता है। मृत्यु निश्चित है। फिर डरना क्या ?
वे एक नियमित व्यक्ति थे। उन्होंने कभी रात को पानी तक नहीं पीया। पारम्परिक जैन विश्वासों के अनुयायी होने से वे कहा करते थे कि रोग देह को हुआ है। वे तो एक चेतन तत्व भगवान आत्मा है। नित्य आत्मा को कोई पदार्थ छू भी नहीं सकता है।
राजस्थान राज्य में मेरा गांव शक्तावतों का गुडा सोम नदी के किनारे बसा हुआ है। पिताजी प्रातः उठते ही नदी पर जाते थे। उनके दिन का प्रारम्भ नदी से होता था। पिताजी नदी से स्नान कर आते ही मन्दिर जाते थे वे वहां पर प्रतिदिन घंटा-डेढ़ घंटा पूजा करते थे। भोजन से पूर्व यह उनकी शर्त थी । जैन पूजाओं में ईश्वर से शक्ति, साहस व प्रेम मांगा जाता है।
निदान 1980 में ही हो गया था। तभी उन्हें ’माइलरन’ नामक कैप्सूल व रक्त संवर्धन की गोलियाँ दी जाती थी। पिताजी ने केंसर के उपरान्त बारह वर्ष जीवन जीया। इसमें से अन्तिम एक वर्ष ही निष्क्रय रहे। बिस्तर पर तो मात्र वह एक माह रहे। अन्यथा उन्होंने पूरी जिम्मेदारी के साथ सक्रिय जीवन जीया। उन्हें कभी रेडियोथेरेपी, या किमोथेरेपी न करानी पडी। रक्त परिवर्तन भी एक भी बार नहीं कराना पड़ा। इस सबके बिना भी वह सक्रिय जीवन जीते रहें। यह सब कैसे हुआ, बताना कठिन है। यह उनकी अपने प्रति व अपने धर्म के प्रति आस्था व सात्विक भोजन का ही परिणाम होगा। डा. स्वयं इसे चमत्कार बताते थे। 01, अगस्त, 1993 को उनकी देह छूटी। ?
व्यक्ति की देह उसके विचारों का अनुसरण करती है। सकारात्मक विचार रोगी की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते है आधुनिक वैज्ञानिक शोधो से प्रमाणित हुआ है कि स्वस्थ्य विचार से स्वस्थ्य शरीर बनता है।
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अप्रै
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Meditation, Personality, Self-Healing, Spirituality, Uncategorized. Tagged: अलसी, अवचेतन मस्तिष्क, एकाग्रता, कैंसर, खुद- इलाज, लुईस हे, सकारात्मकता, सेहत. Leave a Comment
हम ऊर्जा के पूंज है । जब तक ऊर्जा का बहाव आसानी से पूरी तरह शरीर में होता रहता है तब तक हम स्वस्थ रहते हैं । हमारे ऊर्जा पथ में ज्योंहि बाधा पहुंचती है, शरीर रूग्ण हो जाता है । ऊर्जा पथ मे विकृति शरीर को विकृत कर देती है ।
ऊर्जा पथ की चाबी हमारे स्वस्थ मन, भाव एवं विचार के अधीन है । स्वस्थ मन के होने पर ऊर्जा निर्बाध बहती रहती है । स्वस्थ भाव व मन के होने पर ही कोशिकिय श्वसन अच्छा होता है । निर्बाध आक्सीजन का बहना कोशिकिय श्वसन के लिए जरूरी है । शरीर में इसका दौड़ना इन्ही भावों व विचारों के अधीन है ।
कैन्सर अर्थात शरीर में ऊर्जा का संचरण सही तरीके से नहीं हो रहा है । ऊर्जा पथ को कैन्सर कोशिकाओं ने अपने नियन्त्रण में ले लिया है । रोगी की सोच एवं भाव अराजक है । कैन्सर होने का अर्थ है कि मन भी विकार ग्रस्त है । अतः सर्व प्रथम मन को कैन्सर केन्द्र से मुक्त करना पड़ता है । भाव एवं विचार की दिशा बदले बिना कैन्सर कौशिकाओं पर नियन्त्रण कठिन है । मात्र पोषक आहार एवं निर्विषिकरण से इसे रोकना मुश्किल है । इस हेतु मन में दबे भावों, गुस्से, ईष्र्या, दुःख, हार, बदले के भाव आदि का रेचन जरूरी है ।
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अप्रै
Posted by jayantijain in Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, success. Tagged: कैंसर, क्षमता, खुद- इलाज, प्रबल इच्छा, प्रार्थना, मन, लुईस हे, सेहत. Leave a Comment
*मनुष्य कभी मरता नहीं ,वह अपनी हत्या करता है।(Man never dies, he kills himself.)
*डाॅक्टरों से अधिक इलाज भोजन करता है।(Diet cures more than doctors.)
*चालीस की उम्र में व्यक्ति या तो आधा डाॅक्टर बन जाता है या मूर्ख रहता है।(A man at 40 is either a physician or a fool.)
*ठोस को पिओं एवं द्रव को चबाओ (Drink your solids and eat your liquid.)
#परहेज इलाज से बेहतर है। (Preventaion is better than cure.)
#तन्दुरूस्ती हजार नियामत।
#रहे निरोगी जो कम खाय, काम न बिगाड़े जो गम खाए।
#यदि अपथ्य नियमित तो औषध क्या कर सकती?
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अप्रै
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Book Review, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, Uncategorized. Tagged: अलसी, अवचेतन मन, कृतज्ञता, कैंसर, निर्णय, प्रबल इच्छा, मन, मनोवृती, मस्तिष्क, लुईस हे, सेहत. 1 टिप्पणी
एलोपैथी के अतिरिक्त भी कैंसर का इलाज कई तरीकों से होता है । इसका उद्देश्य कैन्सर रोगियों को वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति से अवगत कराना है । इसने एलोपैथी के साथ-साथ वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों का अध्ययन कर बताया है कि बुडविझ प्रोटोकोल इनमे से श्रेष्ठतम है । यह कैंसर रोगियों एवं उनके सम्बन्धियों के लिए एक विश्व कोष है जिसको पढ़ कर उपचार कराने का सही निर्णय ले सकते हैं । लोथर हरनाइसे ने दुनिया भर में कई वर्षों तक शोध कर इसे लिखा है ।
इसके अनुसार रोगी को 3 म् का पालन करना चाहिए ।
पहला म् (इट हेल्दीवेल) स्वस्थ आहार से है । इसमे रोगी को ठण्डी विधि से तैयार अलसी का तेल व पनीर का मिक्सर विभिन्न सुखे मेवे व फलों के साथ दिया जाता है ।
बुडविझ के आहार के साथ-साथ दूसरा म् (एलीमीनेट टाॅक्सीन्स) शरीर के विषाक्त पदार्थो को बाहर निकालना है । इसमे एनिमा लगा कर शरीर को निर्विष बनाया जाता है । इसमे पहले शुद्ध पानी का एनिमा लगाया जाता है । इसके बाद काफी एनिमा व एल्डी तेल एनिमा प्रमुख है ।
तृतीय म् (ईनर्जी) ऊर्जा के जागरण से है । जीवन का लक्ष्य तय कर जीना मुख्य है । दिशा तय कर ही दशा बदली जा सकती है । इसमे आत्मदर्शन द्वारा सकारात्मक होना व स्वस्थ होने के भाव में जीना प्रमुख है ।
लेखक एक जाने माने कैंसर शौध विशेषज्ञ है । जो दुनिया भर में घुम-घुम कर सभी देशों में उपलब्ध कैंसर उपचार सम्बन्धी विधियों का विश्लेषण करते रहे हैं ।
यह पुस्तक मुलतः जर्मन भाषा में लिखी गयी है । इसका अंग्रेजी संस्करण उपलब्ध हैै
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मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Stress Management, success. Tagged: अलसी, ऊर्जा, कैंसर, तनावमुक्ति, प्रसन्नता, मन, लुईस हे, शिक्षान्तर. 1 टिप्पणी
हमारे आज के भोजन में माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट की मात्रा उपलब्ध नहीं है जो कि हमारे 20-30 वर्ष के पूर्व के भोजन मे सहज उपलब्ध थी । आज का हमारा भोजन प्राकृतिक नहीं है । पहले सब्जियों से माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट मिलते थे । आज हमारी सब्जियां जैविक नहीं रही । तभी जैविक सब्जियांे का बाजार विकसित हो रहा है ।
सब्जियों को उगाते-2 हमारी खेतों की टोप सोइल अब बंजर हो गई । फिर इसको उगाने में रसायनिक खाद डालते हैं जिसमे माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट नहीं होते हैं । फिर इनका उत्पादन बढ़ाने का हम भिन्न-2 तरह के रसायन इन पर डालते हैं । किड़ों से बचाने पेस्टीसाइड्स डालते हैं । इस कारण हमें पहले अपने आहार में सब्जियों के सेवन से आवश्यक माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट में मिल जाते थे जो आज प्राप्त नहीं हो रहे हैं ।
पहले हम प्राकृतिक खनिज नमक खाते थे जिसमे सोडियम क्लोराइड के अलावा अन्य 94 खनिज तत्व मिलते थे । जो अब परिष्कृत नमक खाते हैं जिसमे सिर्फ सोडियम क्लोराइड व आयोडिन होते हैं । अन्य अच्छे खनिज भी फिल्टर के दौरान हटा दिये जाते हैं ।
भले ही सूक्ष्म मात्रा में लेकिन हमे आयोडिन, मेग्निश्यम, केल्शियम, सिलिका पूर्व के आहार में जो मिलते थे वो अब नहीे मिल रहे है । इसलिए हमे तथाकथित पौषक आहार के होते हुए भी पूरक आहार/सप्लीमेन्टरी डाइट की जरूरत है ।
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