Posts Tagged ‘कृतज्ञता’
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मई
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, आत्मछवि, कृतज्ञता, कैंसर, खुद- इलाज, धन्यवाद, निर्णय, प्रार्थना, मन, शुभ कामनाएँ, सकारात्मकता, सेहत. 1 टिप्पणी
आरोग्यधाम, प्रशान्ती कुटीर बैंगलोर में दिनांक 26.04.2013 से 03.05.2013 तक पत्नी सहित समग्र चिकित्सा हेतु रहा । यह स्वामी विवेकानन्द योग अनुसंधान संस्थान, (एस. व्यासा) डिम्ड विश्वविद्यालय का एक अंग है ।
यहां पर योग, आयुर्वेद व नेचुरोपेथी के स्वतन्त्र महाविद्यालय है । यहां योग पर रिसर्च सबसे अधिक हुई हैं एवं अनेक शोध पत्र चिकित्सा, मनोविज्ञान, के अन्तर्राष्ट्रिय जरनल्स छप चुके हैं । यहां पर योग चिकित्सा, आधुनिक विज्ञान, आयुर्वेद, नेचुरोपेथी व फिजियोथैरेपी के आधार से कई रोगों का सफलतापूर्वक ईलाज किया जाता है ।
पत्नी मीना के जोड़ों व सर्वाईकल दर्द में बहुत राहत मिली । वह विगत पांच वर्षों से दाई करवट सो नहीं पा रही थी, वह सोने लगी । वहां पर मीना के दर्द उठने पर तत्काल योगा करा कर पेन किलर देने की तरह दर्द दूर कर दिया ।योग, मसाज, लेप, स्टीम बाथ, सोना बाथ आदि से रीढ़ की हड्डी के सभी प्रकार के दर्द को दूर करने में विशेषज्ञता हासिल है ।
मेरा रक्तचाप 110/70 पर रहने लगा । नाड़ी शोधन व भ्रामरी का जबरदस्त प्रभाव देखा ।
गुरूजी डाॅ0 एच0आर0 नागेन्द्र भूतपूर्व अन्तरिक्ष वैज्ञानिक हैं जो अन्तरिक्ष की यात्रा को छोड़कर अन्तर्मन की यात्रा करा रहे हैं एवं विश्व प्रसिद्ध आधुनिक चिकित्सक डाॅ0 आर0 नागरत्ना दीदी का व्यवहार एवं सेवा अनुकरणीय है ।यह 100 एकड़ में निर्मित प्राकृतिक वातावरण से युक्त है । यहां का स्टाफ, थिरापिस्ट व डाॅक्टर सहयोगी हैं ।
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अप्रै
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Book Review, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, Uncategorized. Tagged: अलसी, अवचेतन मन, कृतज्ञता, कैंसर, निर्णय, प्रबल इच्छा, मन, मनोवृती, मस्तिष्क, लुईस हे, सेहत. Leave a Comment
एलोपैथी के अतिरिक्त भी कैंसर का इलाज कई तरीकों से होता है । इसका उद्देश्य कैन्सर रोगियों को वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति से अवगत कराना है । इसने एलोपैथी के साथ-साथ वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों का अध्ययन कर बताया है कि बुडविझ प्रोटोकोल इनमे से श्रेष्ठतम है । यह कैंसर रोगियों एवं उनके सम्बन्धियों के लिए एक विश्व कोष है जिसको पढ़ कर उपचार कराने का सही निर्णय ले सकते हैं । लोथर हरनाइसे ने दुनिया भर में कई वर्षों तक शोध कर इसे लिखा है ।
इसके अनुसार रोगी को 3 म् का पालन करना चाहिए ।
पहला म् (इट हेल्दीवेल) स्वस्थ आहार से है । इसमे रोगी को ठण्डी विधि से तैयार अलसी का तेल व पनीर का मिक्सर विभिन्न सुखे मेवे व फलों के साथ दिया जाता है ।
बुडविझ के आहार के साथ-साथ दूसरा म् (एलीमीनेट टाॅक्सीन्स) शरीर के विषाक्त पदार्थो को बाहर निकालना है । इसमे एनिमा लगा कर शरीर को निर्विष बनाया जाता है । इसमे पहले शुद्ध पानी का एनिमा लगाया जाता है । इसके बाद काफी एनिमा व एल्डी तेल एनिमा प्रमुख है ।
तृतीय म् (ईनर्जी) ऊर्जा के जागरण से है । जीवन का लक्ष्य तय कर जीना मुख्य है । दिशा तय कर ही दशा बदली जा सकती है । इसमे आत्मदर्शन द्वारा सकारात्मक होना व स्वस्थ होने के भाव में जीना प्रमुख है ।
लेखक एक जाने माने कैंसर शौध विशेषज्ञ है । जो दुनिया भर में घुम-घुम कर सभी देशों में उपलब्ध कैंसर उपचार सम्बन्धी विधियों का विश्लेषण करते रहे हैं ।
यह पुस्तक मुलतः जर्मन भाषा में लिखी गयी है । इसका अंग्रेजी संस्करण उपलब्ध हैै
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मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अलसी, कृतज्ञता, खुश, जीने की कला, प्रसन्नता, ब्लॉग लेखन, मन, मस्तिष्क, शुभ कामनाएँ. Leave a Comment
हम सब खुशी चाहते हैं । जीवन में हमे यश नहीं, धन नहीं खुशी चाहिए । समाज में नाम नहीं जीवन में खुशी चाहिए। धन व प्रतिष्ठा से खुशी नहीं मिलती है। शांत होने पर ही सच्ची खुशी मिलती है । आज हमारी प्राथमिकताएं स्पष्ट नही है । हम यह भी नहीं जानते कि हमें क्या चाहिए । हमें खुशी कहां मिलती है इसका हमें ज्ञान नही है । दूसरों का पद एवं पैसा उन्हे सुख देता नजर आता है , जो कि वास्तव में सुख का कारण नहीं है । पद एवं पैसे की दौड़ में हमारी उम्र बिती जा रही है ।
हम अन्दर से अव्यवस्थित व टूटे हुए हैं। हमारे भीतर आन्तरिक दरार बड़ी है । हमारे मूल्य निश्चित नहीं है । हम बाहर कुछ व भीतर कुछ हैं ।
हमे अन्दर से व्यवस्थित, संतुलित व एकरूप होना है । कथनी व करनी के भेद को मिटाना है । वास्तविक उन्नति अन्दर से संतुलित व संगठित होना है।
अन्दर से स्थिर होना, मन में साम्यता-समता पैदा करना विकास है । हम अच्छे सूट व टाई से नहीं बड़े होते हैं ।
हमे अपने आन्तरिक उपद्रवों को मिटाना है । अब महत्वपूर्ण यह है कि स्वयं हमारे विचार कैसे चलते हैं ? भावनाएं कैसे आन्दोलित करती है । स्वयं से नाराजगी कितनी कम करते हैं ।
पदौन्नति नहीं आन्तरिक खुशी चाहिए । पदौन्नति बाहर के परिकर बढ़ाती है जो अशान्ती के कारण है । अतः पदोन्नति से ज्यादा शान्ति चाहिए । हमारा जीवन अन्दर से खोखला व बाहर से बड़ा व्यर्थ है ।
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फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Meditation, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, Uncategorized. Tagged: अवचेतन मस्तिष्क, आत्मछवि, एकाग्रता, कृतज्ञता, कैंसर, टिप्पणी, धन्यवाद, निर्णय, प्रसन्नता, शिक्षान्तर. 2s टिप्पणियाँ
हमारा शरीर एक अद्भुत संयंत्र है जो महच्चेतना की एक अनुपम सृष्टि है। मनुष्य द्वारा निर्मित कोई भी सयंत्र, यहाँ तक कि अत्याधुनिक सुपर कम्प्यूटर भी, इसकी तुलना में अत्यंत तुच्छ है। भौतिक संयंत्र को बाहरी ऊर्जा से संचालित किया जाता है, स्विच आॅफ कर दें तो संयंत्र निष्क्रिय हो जाता है। हमारा शरीर जीवन-पर्यन्त आत्म- चेतना की अन्तर-ऊर्जा से प्रतिक्षण संचालित होता रहता है, निरंतर सक्रिय रहता है। विशालता एवं यांत्रिकता की दृष्टि से यह एक अद्भुत संरचना है।
इसके भीतर प्रतिघन मिलीमीटर रक्त में पचास लाख रक्त कण (रेड काॅप्सर््यूल) और पचास हजार लाख श्वेत रक्त कण दौड़ते है, मस्तिष्क में सतह सक्रिय सात करोड़ कोशिकाएँ (सेल्स) हैं और साढ़े पाँच फीट के आकारवाले शरीर में दस अरब सनायु – तंत्र हैं। वस्तुतः यह एक ऐसा सूक्ष्म ब्रह्याण्ड (माइक्रो यूनिवर्स) है जो आत्म-चेतना की ऊर्जा से सतत् संचालित रहता है और प्रत्येक सात वर्ष पर अपने पुराने पुर्जो का स्वतः नवीनीकरण कर लेता है। ये हैं इस स्थूल भौतिक शरीर की कुछ अद्भुत विलक्षणताएँ। किन्तु इनमे भी अधिक विस्मयकारी है इसके भीतर छिपी हुई अन्य विशेषताएँ जैसे पंच-इन्द्रियाँ, पंच-तन्मात्राएँ, पंच-प्राण, मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार, राग-विराग की कल्पना ओैर आत्म-चेतना का अखण्ड प्रवाह जो कभी पाणिनि-पतंजलि, कभी वाल्मीकि-कालिदास, कभी तुलसी-टैगोर और कभी विवेकानन्द-गाँधी के रुप में उद्वेलित हो उठता है। यह है हमारे शरीर और उसमें निहित चेतना का चमत्कार!
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फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Stress Management, success. Tagged: अवचेतन मस्तिष्क, कविता, कृतज्ञता, कैंसर, नकारात्मता, प्रबल इच्छा, प्रसन्नता, प्रार्थना, बदलना, मन, लेखक. Leave a Comment
पं0 नरेन्द्र मिश्र, वीर रस के राष्ट्रीय कवि से मुलाकात पर उनसे चर्चा के दौरान यह समझ में आया कि कविता भी परिवर्तन का एक माध्यम है । कविता पढ़ कर भी व्यक्ति बदल सकता है । नये मूल्यों को सिखाने में कविता की बड़ी भूमिका है । 
कविता भाव प्रधान होती है । उसका प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रभाव बहुत गहरा, सूक्ष्म व व्यापक होता है । यह सीधे दिल को छूती है । अचेतन को प्रभावित करती है । इसमे संप्रेषणिता बहुत जबरदस्त होती है । मात्र तुकबन्दी व गेय होने से कविता बढि़या नहीं हो जाती है । उसमे संप्रेषण की क्षमता से कविता बड़ी होती है । संप्रेषणशिलता ही कविता की जान है। कविता व्यक्ति को बदलने का सशक्त माध्यम है । इसके द्वारा किसी भी व्यक्ति को समझाना सरल होता है । तभी तो कवि सम्मेलन में श्रोताओं को प्रेरित होते देखा जाता है ।
कविता अगर सच्ची कविता हो तो असर छोड़ती ही है । कविता में उसके अपने गुण होने चाहिए । पूर्व में युद्ध क्षैत्र में वीर रस की कविता सुनकर योद्धा युद्ध के लिए प्रेरित होते रहे हैं । राणा प्रताप भी पाथल-पीथल की एक कविता पढ़ कर निराशा से बाहर आ जाते हैं, और मुगलांे को पुनः युद्ध करने के लिए ललकारते हैं । अपना खोया साहस पुनः प्राप्त करते है । कविता ही उन्हें स्वयं के गौरव की याद दिलाती है । इस तरह महाराणा प्रताप का रूपान्तरण होता है ।
आज के संदर्भ में छिछली चुटकले रूपी कविताओं एवं तुकबन्दियों के कारण हम उसकी शक्ति भूल गये हैं । कविता को मात्र मनोरंजन का साधन समझने लगे है । जबकि एक समय में निराला ने पृथ्वीराज कपूर को फिल्म के लिए कविता लिखने के लिए मना कर दिया था । कविता ढंग से समयानुकूल उदाहरण सहित रची हुई होनी चाहिए । सही प्रासंगिक कविता आग जैसे बदलाव लाती है ।
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फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Meditation, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, अवचेतन मन, असफलता, कृतज्ञता, खुद- इलाज, धन्यवाद, प्रसन्नता, मन, शिक्षान्तर. 3s टिप्पणियाँ
व्यवसाय आपके लिये है, आप व्यवसाय के लिये नहीं है। धन्धा पेट के लिये है, आप धन्धे के लिये नहीं है। जीवन जीने के लिये मिला है, व्यवसाय में डूबने के लिये नहीं। यह मंत्र जिसकी समझ में आ जाता है वह व्यावसायिक जीवन का दास न होकर उसका आनन्द उठाता है।
अपने कार्य, व्यवसाय, नौकरी से प्रेम कर उसका आनन्द उठायें। अपने काम की नकारात्मक बातें याद कर घृणा न करें। कई लोग अपने व्यवसाय को अपने अनुरूप न पाकर उससे शिकायत करते रहते हैं। यह असंतोष उनके जीवन को खोखला करता है व मन को अशांत करता है। इससे वे सदैव नाराज रहते हैं। जबकि वस्तुतः कोई भी व्यवसाय बडा या छोटा, अच्छा या बुरा नहीं होता है। यह उसके प्रति हमारी सोच है। व्यवसाय हमारे पेट के लिए होता है हम व्यवसाय के लिए नहीं बने हैं।
अपने व्यवसाय को सकारात्मक व अच्छा समझ कर हम भी अच्छे बन सकते हैं। हाँ, कुछ व्यवसायों से रिटर्न कम या ज्यादा हो सकता है। व्यवसायों की अपनी अच्छाईयाँ, बुराईया होती हंै। यदि हम अपने व्यवसाय को स्वीकार कर ले तो कोई कठिनाई नहीं है। अपने काम से प्यार करें। हर व्यवसाय में नामचीन लोग हुऐ है। हर व्यवसाय से लोग आगे बढ़ें हैं। दम पेशे में कम, व्यक्ति में अधिक होता है।
कृष्ण के निष्काम कर्म की भावना व्यवसाय के क्षेत्र पर भी लागू होती है। हमें अपने व्यवसाय को कत्र्तव्य समझकर करना चाहिये। निष्काम का अर्थ लक्ष्य बिना कर्म करना नहीं है। निष्काम का अर्थ फल की आसक्ति नहीं रखते हुए कर्म करने से है।
व्यवसाय चुनने के पहले सारा दिमाग लगा दो। अपने मन-माफिक है या नहीं समझ ले। एक बार व्यवसाय विशेष को चुन लिया फिर उसका बुरा पक्ष नहीं देखें। उसका सामना करने के उपाय खोजंे। उसमें भी बहुत सारी चुनौतियां व अच्छाईयां हैं।
हर व्यवसाय में बहुत अवसर हो सकते है। व्यवसाय को अपने ढंग से करंे। उसमें नई राहे खोजंे, अपने व्यवसाय के सफलतम लोगों का अध्ययन कर अपना विश्लेषण करें व अपने कार्य क्षेत्र के दिग्गजों से सम्पर्क में रहें।
व्यावसायिक जीवन में प्रसन्न रहने हेतु उसमें सफल होना जरूरी है। इसलियेे व्यावसायिक दक्षता हासिल करें। अपने व्यवसाय में निपुण होना, उसकी बारीकी को जानना, उसके हेतू उचित सम्पर्क व साथ रहना आना चाहिये। प्रोफेशन में लापरवाही नहीं चलती। प्रतिद्वन्द्विता का जमाना है। सावधान व सजग रहें ताकि धोखा न खा जाएं।
मनुष्य जीवन का अधिकतम् समय अपने व्यवसाय के प्रबन्धन में चला जाता है। व्यावसायिक जीवन संतुलित व प्रसन्नता देने वाला होना चाहिए। अपने व्यवसाय को भार, मजबूरी या खराब समझेेंगे। तो कभी भी आप उससे खुशी नहीं पा सकते ।
वारेन बफेट विश्व के दूसरे नम्बर के सबसे धनाढ्य व्यक्ति शेयर बाजार में निवेश करते हैं लेकिन उलझते नहीं है। निश्चित समय पर पूरी तन्मयता से काम करते है। फिर अपनी मौेज करते है। वे अपने साथ मोबाइल नहीं रखते व घर/ टेबल पर कम्प्यूटर के आगे नहीं बैठे रहते हैं। इतने जोखिम भरे प्रोफेशन में भी मस्ती से रहते हैं। इसका कारण है कि वे अपने धन्धे से दूरी रखने में कुशल हंै। घर पर, बिस्तर पर अपने पेशे को नहीं लाते हैं।
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फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Spirituality, Stress Management, success, Uncategorized. Tagged: अनुभव, अलसी, कृतज्ञता, जीने की कला, टिप्पणी, तनावमुक्ति, भाग्य, मन, मस्तिष्क, विवाह, समय प्रबन्धन. Leave a Comment
किसी भी खतरनाक बीमारी का डाइग्नोसिस रोगी एवं उसके परिजनों को डरा देता है। रोगी जीते हुए भी मृत्यु का अनुभव करता है एवं परिजन भय एवं चिंता में डूब जाते है। एड्स, कैन्सर एवं हेपेटाइटिस-बी जैसी जानलेवा बीमारियों में रोगी एवं उसके परिजन अपना सामान्य जीवन नहीं जी पाते और मृत्यृ का आसन्न भय सबको व्यथित कर देता है।
यर्थाथ में रोग हमारी अस्वस्थता का सूचक है। खतरनाक रोग मृत्यु का भय खड़ा कर संबंधित व्यक्तियों को डरा देता है। मृत्यु तो एक सहज, स्वाभाविक अनिवार्य प्रक्रिया है। यह कोई विशेष बात नहीं है। प्रतिक्षण हम मृत्यु की तरफ आगे बढ़ रहे हेैं।जिन्हें असाध्य रोग नहीं है उनकी उम्र रुकी नहीं रहती है। आयुक्षय सदैव सभी का जारी रहता है। अतः डर का कोई औचित्य नहीं है। स्व में स्थित व्यक्ति को ही स्वस्थ कहते हैं। वास्तव में असाध्य रोग की समस्या भय से उत्पन्न होने के कारण भय की समस्या है।
भय का सामना आशावादी दृष्टिकोण के साथ किया जाना चाहिए। प्रथमतः होनी को स्वीकारने के अतिक्ति और कोई मार्ग नहीं है। मृत्यु को स्वीकारने से डर समाप्त हो जाता है। फिर भय के निकल जाने से आत्मविश्वास बढ़ता है। समय पर असाध्य रोग का पता चल जाना अभिशाप नहीं वरदान है। रोगी इससे सचेत हो जाता है। रोगी के परिजन भी बेहतर इलाज का प्रबंध कर सकते हैं। रोग के ज्ञान से परिवार में तद्नुरुप योजनाएं बनाई जा सकती हैं। इससे निर्णय लेने में सुविधा रहती है। ताकि रोगी को अच्छे से अच्छे चिकित्सक का इलाज मिल सके एवं उसकी सुश्रुषा अच्छी तरह की जा सके। इससे अनेक बार असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं।
समय पर रोग का ज्ञान होने से व्यक्ति अपनी मानसिकता बदल पाता है। हिम्मत एवं धैर्य के साथ रोग का सामना किया जा सकता है। परमार्थिक चिंतन की तरफ ध्यान देकर शारीरिक चिंताओं को कम करने का अवसर मिलता है। रोगी अपने में वैचारिक परिवर्तन लाकर नकारात्मक चिंतन पर लगाम लगा सकता है। सकारात्मक चिंतन द्वारा रोग कि विरुद्ध लड़ने की प्रतिरोधात्मक शक्ति बढ़ाई जा सकती है। सारे दर्द शरीर में नहीं, मस्तिष्क में होते हैं। सारे तनाव का केन्द्र मन है। अतः मन को व्यवस्थित करने का इससे अवसर मिलता है। साथ जीवन मन से चलता है, तभी तो कहते हैं कि मन के जीते जीत है मन के हारे हार।
पूर्वज्ञान रोगी से रोगी अपने शेष जीवन का महत्व जान जाता है। ऐसे में वह अपनी गलत आदतों एवं लारवाहियों को छोड़ सकता है।
आखिर मनुष्य दीर्घ जीवन जीना क्यों चाहता है? जब आयु हमारे हाथ में नहीं है तो हम इसकी कामना क्यों करते हैं? कुछ और वर्ष जीकर भी हम क्या कर लेंगे। थोड़ा सा धन, बड़ा पद एवं प्रतिष्ठा अर्जित कर उसका क्या करेंगे, धन तिजोरियों में, पद कार्यालयों में एवं प्रतिष्ठा लोगों की स्मृति में रहती है। आज तक यह सब अर्जित किया है उसका परिणाम सामने है ।क्या हम अपनी पांचवी पीढ़ी को जानते हैं? किसी को नाम ज्ञात भी हो तो उसके क्या अर्थ हैं? उस शख्त को क्या लाभ है? अर्थात जीवन का लंबा होना नहीं, बेहतर होना महत्वपूर्ण है।
आत्मज्ञान के प्रकाश में कोई भी व्यक्ति अपना प्रत्येक संग्राम लड़ सकता है। फिर असाध्य रोग क्या चीज है, जीवन को समग्रता में समझने पर प्रत्येक समस्या का समाधान संभव है। हम अपने पूर्वाग्रहों, आवेगों एवं वासनाओं से आच्छादित हैं।अतः जीवन का अर्थ नहीं समझते। अध्यात्म मार्ग के सहारे स्वयं को जान कर जानलेवा बीमारियों से लड़े तो नई ऊर्जा मिलती है। तभी जीवन में कायाकल्प संभव है।
प्रार्थना में भी असीम शक्ति होती है। भौतिक शरीर मात्र अणुओं के संचालन से ही नहीं संचालित होता है। डाॅक्टर की दवाई ही नहीं, प्राकृतिक शक्तियां एवं प्रभु का आशीष भी लाभकारी होते हैं।
25
जन
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, अवचेतन मन, अवचेतन मस्तिष्क, कृतज्ञता, कैंसर, धन्यवाद, निर्णय, मन, विवाह. 1 टिप्पणी
प्यार का प्रदर्शन आवश्यक है। यदि आप किसी को प्यार करते हो तो उसको प्रकट करिये, दिखाइयें। व्यस्तता से भरे जीवन में प्यार को छिपाने की आवश्यकता नहीं है। अपनी चाहत सामान्य लोगो से तो कहनी ही पड़ेगी। वे आपके प्यार को अन्यथा समझ न पाऐगे तो प्यासे ही रहेंगे। सबसे कमजोर व दुःखी को प्यार की ज्यादा जरुरत है।
यह सत्य है कि बुद्व पुरुषों या ज्ञानियों के सामने चाहत प्रदर्शित करने की जरुरत नहीं हेै। चूंकि आपके प्यार एवं समर्थन की उन्हें जरुरत नहीं है। लेकिन आम जन न तो आपके प्यार को पहचान सकता है, न प्रेम से परिपूर्ण है। उसे आपसे प्यार चाहिए इसलिए प्रदर्शित करों। तभी अमिताभ बच्चन बागवान में कहता है कि अधिकांश लोग अपनी पत्नी के प्रति प्यार को व्यक्त नही करते है। मैं यह गलती नहीं करता। मैं अपनी पत्नी के प्रति प्यार का बार-बार व्यक्त करता हूँ।
वह अन्यथा आपके प्यार से वंचित रह जायेगा। इसलिए प्यार के प्रदर्शन में बुराई नहीं है। व्यक्त करना समय की मांग है। अतः उसे व्यक्त करने की कला जानो। सम्बन्धों की दीवार इसी से मजबूत होगी।
माना कि कोई तुमसे प्यार करता है तो आप चाहते है न कि वह अभिव्यक्त करे। आप इसका आन्नद उठाओं। ठीक अन्य साथी भी उसी प्रकार को प्यार को प्रकट करने पर ही आन्नदित होते है ।
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जन
Posted by jayantijain in Art of Living, Life-Management, Personality. Tagged: अभिवादन, एकाग्रता, कृतज्ञता, ब्लॉग लेखन, मन, लेखक, शिखर पर मिलेगे, शुभ कामनाएँ. Leave a Comment
दोस्तो,मेरे प्रणाम स्वीकारे एवं आप सबको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ !

मेरे भीतर बैठी विराट सत्ता आपके भीतर विराजमान परम सत्ता को सर झुकाती है। आपके निकटस्थ मित्र शरीर को प्रणाम जिसके होने से आपका जीवन हैं। दुनिया के सबसे बडे सुपर कम्प्यूटर आपके मस्तिष्क को प्रणाम। उस दिल को नमन जो आपके जन्म से आज तक साथ दे रहा है। उन फेफड़ों को प्रणाम जो आज तक आपको श्वास लेने में मदद दे रहे है। अस्थि तन्त्र को प्रणाम जो आपके शरीर को आकार दिये हुए हैं। उस पाचन शक्ति को नमन जो पहले दिन से आपके भोजन को ऊर्जा में बदलते है।उस स्नायू तन्त्र को प्रणाम जो दुनिया में व्याप्त समस्त टेलिफोन जाल से सात गूना बड़ा है।अन्तः स्त्रावी ग्रन्थियों व प्रजनन तन्त्र को प्रणाम जो शरीर व दुनिया को सन्तुलित रखने में जिनका योगदान है।
परम सत्ता से प्रार्थना है कि नव वर्ष में आपकी सभी कामनाएँ पूरी करें।आप सबसे महत्वपूर्ण है।आप अनुपम व अद्वितीय हैं चुँकि आप ही जगत हैं।
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31
दिस
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Stress Management, success. Tagged: अभिवादन, कृतज्ञता, धन्यवाद, नकारात्मता, प्रबल इच्छा, मन, लेखक, शिक्षान्तर, शिखर पर मिलेगे, शुभ कामनाएँ. 1 टिप्पणी
नया वर्ष आ रहा है । जैसा कि संकल्प लेने का प्रचलन है । अपना पुनरावलोकन करने का समय है । गत वर्ष की उपलब्धियों व अनुपलब्धियों पर मनन की आवश्यकता है ।
स्वयं को जानने-समझने का अवसर है । अपनी आदतें, सपनों व प्रयत्नों को परीक्षण करने का समय है । आदतों को सफलता में सहायक अच्छी आदतों व हानिकारक बुरी आदतों को पहचानना है । हम आदतों मंे ही जीते हैं । आदतें बदलकर ही स्वयं को बदल सकते हैं । एच.डी. थोरो ने लिखा है कि वस्तुए नही बदलती, हम ही बदलते हैं । अतः स्वयं को बदलने की जरूरत है ।
एक विचार को बोइए, एक कर्म को जन्म दीजिए,
एक कर्म को बोइए, एक आदत को जन्म दीजिए,
एक आदत को बोइए, एक चरित्र को जन्म दीजिए,
एक चरित्र को बोइए, एक सफलता को जन्म दीजिए ।
हमे जीवन में स्थायित्व पंसद है । बदलने में सदैव भय रहता है, इसलिए कोई भी बदलना नही चाहता है । परिवर्तन में असुरक्षा है, नयापन है । आदतें व्यक्ति ने अपनी स्थिति, सोच व लक्ष्य के आधार पर बनती है । जीने के बीच रास्ता निकली हुई होती है । आदतों में स्थायित्व होता है व व्यक्ति उनसे एकाकार हो जाता है । उसमे वह रमा हुआ होता है । आदतें उसके जिने की शैली हो जाती है । उसका अपनत्व हो जाता है । उनको वह न्यायोचित ठहराने लगता है । आदतें उसके जीवन मूल्य में समा जाती है । वह उन्हे मूल्य देने लगता है ।
समय बीत रहा है । समय रूपी नदी में इसके साथ हम सब बह रहे हैं । इसके साथ अपने में परिवर्तन करते रहना है, तभी अपटूडेट रहेंगे । नही तो पिछड़ जाऐंगे । जो समय के साथ नहीं बदलता है वह पिछे रह जाता है ।
आप सबको नव वर्ष की शुभकामनाएं !