Posts Tagged ‘ऊर्जा’

थकान मिटाने हेतु हर्बल ऊर्जा पेय घर पर बनाएं

यह एक आयुर्वेदिक पेय है जो निम्न मसालों से तैयार करें । इसके सेवन से सभी प्रकार की थकान तत्काल मिट जाती है । एक पाव हर्बल पेय बनाने हेतु निम्न मात्रा में सामग्री लें ।
1. सौंठ – 60 ग्राम
2. काली मिर्च – 25 ग्राम
3. सौंफ – 25 ग्राम
4. धनिया – 25 ग्राम
5. तेज पता – 25 ग्राम
6. ईलाइची छोटी – 12 ग्राम
7. ईलाइची बड़ी – 12 ग्राम
8. दाल चीनी – 12 ग्राम
9. लौंग – 12 ग्राम
10. अजवाईन – 12 ग्राम
11. जायफल – 3 ग्राम
12. पीपल – 3ग्राम
इन उपरोक्त सामग्री को अलग-अलग कुट पीस कर पाउडर बनाकर फिर मिक्स करे । एक कप पानी में उपरोक्त एक चम्मच मिक्स पाउडर को उबाल कर स्वादानुसार शक्कर मिलावें । इस प्रकार ऊर्जा पेय पिने के लिए तैयार है । यह सम्मेदशिखर की 20 किमी0 पैदल यात्रा करने पर पिलाया जाता है । यात्री थकान उतार कर पुनः 10 किमी0 चलते हैं । यह बढि़या हर्बल चाय है, पीकर लाभ देखें ।

Related posts:

पोषक तत्वों के बारे मे डाॅ0 रेण्ड की प्रसिद्ध बढि़या पुस्तक

जिने हेतु सिर्फ़ धन काफी नहीं ,जिने की कला चाहिए

हम सब में कुछ खास बात है: सुखी होने याद रखें

सुखी होने अन्तर्यात्रा करें व अन्तर्मन की सुनंे

“जियो तो ऐसे जियो” यह पुस्तक आपके लिए क्यों उपयोगी है

क्या पोषक आहार के होते हुए पुरक आहार की जरूरत है ?

हमारे आज के भोजन में माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट की मात्रा उपलब्ध नहीं है जो कि हमारे 20-30 वर्ष के पूर्व के भोजन मे सहज उपलब्ध थी । आज का हमारा भोजन प्राकृतिक नहीं है । पहले सब्जियों से माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट मिलते थे । आज हमारी सब्जियां जैविक नहीं रही । तभी जैविक सब्जियांे का बाजार विकसित हो रहा है ।
सब्जियों को उगाते-2 हमारी खेतों की टोप सोइल अब बंजर हो गई । फिर इसको उगाने में रसायनिक खाद डालते हैं जिसमे माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट नहीं होते हैं । फिर इनका उत्पादन बढ़ाने का हम भिन्न-2 तरह के रसायन इन पर डालते हैं । किड़ों से बचाने पेस्टीसाइड्स डालते हैं । इस कारण हमें पहले अपने आहार में सब्जियों के सेवन से आवश्यक माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट में मिल जाते थे जो आज प्राप्त नहीं हो रहे हैं ।
पहले हम प्राकृतिक खनिज नमक खाते थे जिसमे सोडियम क्लोराइड के अलावा अन्य 94 खनिज तत्व मिलते थे । जो अब परिष्कृत नमक खाते हैं जिसमे सिर्फ सोडियम क्लोराइड व आयोडिन होते हैं । अन्य अच्छे खनिज भी फिल्टर के दौरान हटा दिये जाते हैं ।
भले ही सूक्ष्म मात्रा में लेकिन हमे आयोडिन, मेग्निश्यम, केल्शियम, सिलिका पूर्व के आहार में जो मिलते थे वो अब नहीे मिल रहे है । इसलिए हमे तथाकथित पौषक आहार के होते हुए भी पूरक आहार/सप्लीमेन्टरी डाइट की जरूरत है ।

Related Posts:

पोषक तत्वों के बारे मे डाॅ0 रेण्ड की प्रसिद्ध बढि़या पुस्तक

रिफाइंड तेल से ह्नदय रोग, मधुमेह व कैंसर हो सकता है?

Health Benefits

हमारा जीवन कहाँ व कैसे बीतता है:गधे,कुत्ते, उल्लू की तरह तो नहीं?

क्या भले लोग बुरे लोगों से अधिक है?

 

यहाँ सब स्वार्थीं व बेईमान नहीं है। लेकिन दुःख की बात यह है कि बुरे लोगों का वर्चस्व है। अधिकांश लोग भले व सहायता प्रदान करने वाले है। गुणवान लोगों की यहाँ कद्र नहीं होती है क्योंकि वे संगठीत नहीं है। देश की आजादी हेतु कुर्बानी देने वाले क्या स्वार्थीं थे? क्या सूरज, पानी, हवा, पृथ्वी, आकाश आपसे किराया माँगते है? वेदव्यास से लेकर आज तक लेखक, कलाकार,सृजक आपसे व्यक्तिगत कुछ नहीं लेते है। वे सब आपको ज्ञान, संस्कृति, विचार, भावनाओं से आपको समृद्ध करते है। यह जीवन भले लोगो की अच्छाई के कारण ही चल रहा है।

Good people-Bad peopleकुछ लोग चोर-डाकू, हत्याएँ, बलात्कार करते है इससे सारा समाज बुरा नहीं हो गया। यह हमारी नकारात्मकता है कि हम कुछ बुरे लोगों के आधार पर पूरे समाज को दोष देते है।
अच्छे लोगों में दोस्ती प्रायः कम होती है। क्योंकि अच्छाई हमेशा अकेली रहती है। अच्छाई का अहंकार व्यक्ति को दूसरों से जुड़ने नहीं देता। जबकि बुरे व्यक्ति प्रायः शीघ्र ही दोस्ती कर लेते है। क्योंकि एक साथ बुरा काम करने से परस्पर अपनापन आ जाता है। तभी तो कहाँ जाता है कि दारू पीने वालो की दोस्ती मजबूत होती है। बुराई हमेशा अपने परिवार को बढ़ाती है। जबकि अच्छाई अकेले रहना पसन्द करती है। समय आ गया है कि अच्छे लोगों को भी एक-दूसरे को सहयोग करना होगा।

हमें इस धारणा को समाप्त करना है कि सब लोग खराब है। बेवजह अनेक लोग बहुत बढि़या है। मानवता, जीवन, हमारी उन्नति इन्हीं को बदोलत है। यहाँ सर्वत्र प्रेम है, परोपकार के भाव है, सत्य है, नैतिकता है। खुशियाँ बाँटने को बहुत लोग तत्पर है। अच्छाईयाँ समाप्त नहीं हुई है-हम देख नहीं पा रहे है?

तनाव का सामना गुंजन से करें

अपने दबाव व तनाव का सामना गुंजन करके करें। भौरों की तरह गंुजन करो। बस गुनगुनाओं। इस प्रकार गुंजन करने से हमारे सारे दबाव समाप्त हो जाते है। दबी हुई इच्छाएँ व वासनाएँ गंुजन करने से निकल जाती है। वैसे आधा घंटे प्रातः काल सीधे बैठ कर गंुजन करो व दिन में जब भी मौका, मिले गंुजन करें।

गंुजन एक तरह का प्राणायाम है। भ्रामरी प्राणायाम का यह सरल रूप है। गुुंजन करने से हमारा ध्यान बढ़ता है। गुंजन करने से व्यक्ति स्वयं के पास आता है। इससे स्वयं को जानने में सहायता मिलती है। यह स्वयं पास जाने की मार्ग है, स्वयं से जुड़ने में सहायक है। अपने भटकते मन को नियन्त्रित करने का यह सरल मार्ग है। तभी तो कहते है कि जब गुनगुनाती हुई स्त्री खाना बनाती है तो उसका स्वाद बढ़ जाता है। गंुजन करना मन्त्रों का उच्चारण करने के समान है। गुंजन करने से मन्त्र शक्ति जाग्रत होती है। यह मन्त्र के गुनगुनाने की समान है।

इससे हमारी अवांछित जल्दबाजी पर नियन्त्रण होता है। मन में उठते विचारों पर लगाम लगती है। भागम-भाग पर ब्रेक लगता है। व्यक्ति भटकने से बच जाता है। इससे गुस्सा कम होता है, इससे जीवन मंे संतुलन बढ़ता है। इस तरह भावनात्मक संतुलन स्थापित होता है।

गुंजन करो और प्रसन्न रहो।

Related Posts:

मन की तीन विशेषताएँ पहचाने एवं इसे अपने पक्ष में करें

सफलता का मंत्रः रतन टाटा के अनुसार :अंतिम भाग

3. गहरी पर्यवेक्षण क्षमता
जीवन में सफलता प्राप्ता करने के लिए हमें आखं और कान खुले रखने चाहिए। वस्तुओं, घटनाओं, व्यक्तियों व उनके व्यवहार का बारीकी से अवलोकन करना जरुरी हैं। व्यवस्था पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए व्यवस्था को समझना जरुरी हैं। सभी चीजें शब्दों से न समझी जा सकती हैं न समझाई जा सकती हैं। इसलिए अशाब्दिक संप्रेषण की कला भी आनी चाहिए। शब्दों के पार का संप्रेषण आना चाहिए। व्यक्ति अपनी देह भाषा से सत्तर प्रतिशत बोलता हैं। शब्द तो मात्र संकेत करते हैं। इसलिए आगे बढ़ने के लिए देह भाषा का ज्ञान जरुरी हैं। इसी से समझ पैदा होती हैं। देश, काल, परिस्थिति, वित, नियम-कायदे, रूख को ध्यान में रख कर निर्णय लेना बुद्धिमता है। जल्दबाजी न करना, न निर्णय करने में देरी करना । पर्दे के पीछे को समझना सफलता पाने के लिए जरुरी हैं। व्यक्तियों के पीछे भावार्थ क्या है ?
4. विनम्रता
‘‘विद्या ददाति विनयम‘‘ उच्च अधिकारियों के पास शक्ति होती है । अतः उनमे अंहकार रखने या प्रदर्शन की जरूरत नहीं होती है । वास्तव में शक्तिशाली को उसके प्रदर्शन की जरुरत नहीं होती हैं। सामान्यतः असमर्थ लोग शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। समर्थ व्यक्ति को हमेशा विनम्र होने की जरुरत हैं। उनके निर्णय से बहुत से लोग प्रभावित होते हैं ।
उपरोक्त गुणों के होने पर मिस्त्री टाटा गु्रप के चेयरमैन हो सकते हैं तो कोई भी इन गुणों को जीवन में उतारकर आगे बढ़ सकता हैं।

अधिक शक्ति जगाने के लिए रिलेक्स होने के 10 सूत्र

1. अपने को तनावग्रस्त मत करो। अपने को इतना गम्भीर मत बनाओ। परेशान होने की जरूरत नहीं हैं,हिमालय गिरने वाला नहीं है ।
2. अपने कार्य को पसंद करो। तब यह भार नहीं आनन्द होगा। तब शायद तुम्हें अपना व्यवसाय नहीं बदलना पड़े। स्वयं को बदलो,दृष्टी बदलेगी तबव्यवसाय बदला हुआ नजर आयेगा।
3. कार्य की योजना बनाओ। योजना पर कार्य करो ’ मैं थक-हार गया हॅू ’ की सोच बताती है कि आप के कार्य करने की शैली ठीक नहीं है, उसमें सुधार की जरूरत है।
4. बहुत से कार्यो को एक समय में एक साथ मत करो, इससे तनाव होता है। ऐसे में तत्क्षण निणर्य करो कि ’’ यह एक काम मैं अभी करता हॅू’’
5. कार्य के प्रति सकारात्मक नजरिया रखें। कार्य को खराब और अच्छा हमारी सोच बनाती है। कार्य के विरूद्ध सोचे तो कार्य कठिन हो जाता है। कार्य को सहज माने तो वह सरल हो जाता है।
6. अपने कार्य में प्रवीण बनो। अपने व्यवसाय के बारे में ज्ञान बढ़ाओ। ज्ञान ही शक्ति है। तब कार्य को सही करना आसान होता है।
7. रिलेक्स रहने का अम्भास करें। कार्य से जी न चुरायें न उसे टाले। निर्णय लेकर अपनी तरह से चरण बद्ध तरीके से कार्य करते जाये।
8. जिस कार्य को आज किया जा सकता है उसे कल के लिये नहीं टालें। बचे हुए कार्य आपके कार्य एवं लक्ष्य को
कठिन बनाते हैं। प्राथमिकता अनुसार उन्हंे निपटाते चलें।
9. कार्य हेतु प्रार्थना करो। कार्य पूरा होने पर शान्ति व शुकून का अनुभव करें।
10. अपने कार्य में ’ अदृश्य भागीदार’ यानि परमात्मा पर यकीन करंे। वह आपके सकारात्मक बोझ को आश्चर्यजनक ढं़ग से कम कर देगा। परमात्मा जैसा वह मन्दिर में है, वैसा ही घर, दुकान कार्यालय, फैक्ट्री व रसाईघर में भी है । वह आपके कार्य के बारे में आपसे ज्यादा जानता है। उसकी सहायता आपके कार्य को सहज बनाती है।

Related posts:

Free Download CD to Relax & Energize

रिलैक्स कैसे रहेंः उक्त पुस्तिका फ्री डाउनलोड करें

तन्त्र पर फिलिप राॅसन की प्रसिद्ध पुस्तक-’’द आर्ट आॅफ तन्त्र’’

’’द आर्ट आॅफ तन्त्र’’ की विषयवस्तु तन्त्र के द्वारा जीवन-ऊर्जा के रूपान्तरण से संबंधित है । इसमें बताया गया है कि तन्त्र अध्यात्म से कैसे जुडा हुआ है ? तन्त्र के द्वारा जीवन ऊर्जा का रूपान्तरण हो सकता है, यह अच्छी तरह समझाया हुआ है । तन्त्र यौन-ऊर्जा को ब्रह्माण्डीय एवं रचनात्मक ऊर्जा मानता है । इसमें हिन्दु व बौद्ध तन्त्र को आधार बनाया हुआ है । शिवलिंग की पूजा क्यों की जाती है ? अघोरी मल या शव के टुकडे क्यों खातें है ? तान्त्रिक खोपडी में पानी क्यों पीते है ? खजुराहो के मंदिरोें में काम संबंधी मूर्तियां क्यों है ?उपरोक्त सभी प्रश्नों के सटीक जवाब इस पुस्तक में है ।
तन्त्र भोग को बुरा नहीं मानता है । यह सामान्य नैतिकता एवं शुचिता से उपर उठकर बताता है । योग और तन्त्र में अंतर यही है कि योग संयम के समय होश की बात करता है जबकि तन्त्र भोग में होश को अध्यात्मिक उन्नति का मार्ग मानता है । योग संकल्प का मार्ग है जबकि तन्त्र समर्पण पर आधारित है ।
विकसित होती वैज्ञानिक दृष्टि से तन्त्र की बारिकियों को समझने के लेखक ने नये दृष्टिकोण दिये है । मनोवैज्ञानिक शोधों ने तन्त्र को समझने मंे मदद की है । तन्त्र विज्ञान को गूढ, जादू टोना, मारक, वशीकरण एवं रहस्यात्मक माना जाता है । यह पुस्तक उस दृष्टि को बदलती है । तान्त्रिकों की दुष्टता के कारण कोई शास्त्र बुरा नही हो जाता है । आज के तान्त्रिकों के आचरण को देखकर तन्त्र विज्ञान को नकारन उचित नही है ।
आज के तान्त्रिकों के योग, भोग, कामुकता, गणित, जादु और तत्वज्ञान/अध्यात्म का तन्त्र एक मिश्रण है जो आधुनिक युग के तनावों का सामना करने में हमारी मदद करता है । यह अपनी खोज में, स्वंय को जानने का व्यावहारिक मार्ग दिखाता है ।
संभोग एक कामुक कृत्य नही है, परन्तु अनुभव को गहराने हेतु है, स्त्री पुरूष के बीच आकर्षण एक भूख नहीं, आंखों की प्यास नहीं, एक दूसरे को समझने का अवसर देते है । प्यार एक प्रतिक्रिया नहीं, परन्तु सजगतापूर्वक पोषित करने वाली उत्कृष्ट रचना है । यह पूर्णता को महसूस कराने वाला अवसर है । इसके द्वारा असीम, अनन्त को अनुभव किया जा सकता है । अहं-शून्यता व समय शून्यता का बोध इसमें होता है । इस द्वार से भी स्वंय को खोजा जा सकता है ।
इस कृति को समझने के लिए भैरव विज्ञान तन्त्र व इस पर ओशो के प्रवचन सहायक है । लेखक तन्त्र कला का विशेषज्ञ है । तन्त्र संबंधी सामग्री को लेखक ने पश्चिम के दृष्टिकोण से लिखा है । पुस्तक सारी आर्ट पेपर पर छपी हुई है । इसमें तन्त्र सम्बन्धी 169 महत्वपूर्ण चित्र है लेकिन वे कामुकता को जगाने वाले नही है । तान्त्रिक यन्त्र, मन्त्र व देवियों के महत्वपूर्ण चित्र भी बहुत से है । यह तन्त्र शास्त्र पर अंग्रेजी में लिखा गया श्रेष्ठतम ग्रन्थ है ।

घर व मकान में क्या अन्तर है एवं मकान को घर कैसे बनाए ?

मकान ईंट, सीमेन्ट व पत्थर से बनता है, जबकि घर परिवार के सदस्यो के बिच स्नेह एवं संबंध से बनता है । जहां पर सुरक्षित व अपनत्व महसूस करते है उसे घर कहते है । घर से हम संबंधित होते है जहां हमारे माता-पिता, चाचा-ताउ, भाई-बहन व बच्चंे रहते हैं, उसे घर कहते है । मकान शरीर है व घर आत्मा है । घर एक आश्रम होता है जंहा पर सभी मिलजुल कर रहते है व एक दूसरे के लिए जीते है ।

घर में सुविधाऐं भले ही कम हो लेकिन सदस्यों का मन बहुत बडा होता है । घर के सदस्य एक दूसरे के लिए त्याग कर खुश होते है । घर की कोई सीमा नहीं होती । घर स्वर्ग-नरक की प्रतिछाया है । यंहा बिना शर्त प्यार एवं संरक्षण मिलता है । सभी लोग अपनी अपनी मर्यादा में रहते है एवं मर्यादा को भलीभातिं पहचानते है ।,घर में मुखिया का अनुशासन होता हैं लेकिन मकान के सदस्य आप मुख्तार होते हैं। यहां कोई किसी की सुनता नही हैं। सदस्य परस्पर रिस्तो को जिते हैं। उनकी प्राथमिकता में अपनत्व पहले होता हैं।

मकान में रहने वाले पैसो को महत्व देते हैं। मुखिया के क्रोध से घर मुक्त नही होता है लेकिन क्रोध के पीछे व्यक्तिगत हित नही वरन् सदस्यों का हित निहित होता है । जिस घर में नकारात्मकता घुस जाती है वो घर नहीं मकान हो जाता है । तभी भाई – भाई इन्च इन्च जमीन के लिए लडते है व माॅ-बाप को वृद्धावस्था में भेजा जाता है ।
विचारे कि हम कहा रहते हैं एवं घर बनाने में कैसे सहयोग कर सकते हैं?

शुभ दिवाली !

प्रिय बंधुवर,

सादर नमस्कार

प्रकाश-पर्व दीपावली आपको एवं आपके

परिवार को निरोगी बनाए एवं प्रगति का

पथ प्रशस्त करे! ऐसी प्रभु से कामना है।

शुभकामनाओंसहित सहित

जयंती जैन , मीना जैन

कुमार वीतराग एवं

 सर्वज्ञा
Related Posts:

‘जब मैंने मौत को बहुत नजदीक से देखा, तब मुझे मौत भी लाभकारी थी’ – स्टीव जाॅब्स

20 की उम्र में स्टीव जाॅब्स ने अभिभावक के गैराज में एप्पल कंपनी की शुरुआत की।
30 की उम्र में अपनी ही कंपनी एप्पल से बेदखल जाॅब्स। 1997 में बतौर सलाहकार एप्पल में वापसी हुई।

 स्टीव जाॅब्स  की  तीसरी कहानी :

जब मैं 17 साल का था, मैंने एक उद्धरण पढ़ा था, जो कुछ इस तरह से था-अगर आप हर दिन को अपने आखिरी दिन की तरह जीते हैं, तो किसी दिन आप निश्चित रूप से सही साबित होंगे। इस बात ने मेरे ऊपर गहरा प्रभाव छोड़ा और तब ये यानी पिछले 33 साल से मैं रोज सुबह आईने में देखकर खुद से पूछता हूं कि अगर आज मेरा आखिरी दिन होता, तो क्या मैं यही करना चाहता, जो आज करने वाला हूं और जब काफी दिनों तक इस सवाल का जवाब ना में होता है, तो मैं समझ जाता हूं कि मुझे कुछ बदलने की जरुरत है।
करीब एक साल पहले मैंने कैंसर की जांच कराई। मैंने सुबह 7.30 बजे स्कैन कराया और इसमें मेरे अग्नाशय पर गांठ होने का साफ पता चल गया। मैं इससे पहले कभी जानता तक नहीं था कि अग्नाश्य क्या है? चिकित्सकों ने बताया कि मुझे निश्चित तौर पर एक तरीके का कैंसर है, जो लाइलाज है। मुझे यह मानकर चलना चाहिए कि मैं तीन से छह माह से ज्यादा जिंदा नहीं रहूंगा। मेरे चिकित्सक ने मुझे सलाह दी कि मैं घर जाऊं और अपने काम को एक क्रम में निपटाऊं, जो कि एक तरह से चिकित्सक का मरने के लिए तैयार हो जाने का एक कोड होता है। इसका मतलब कि कोशिश करके जो भी तुमने सोचा था, वो सब अपने बच्चों को बता दो, जो कि तुम अगले 10 सालों में बताने वाले थे। इसका मतलब कि यह सुनिश्चित करने का वक्त आ गया कि अब आगे कुछ भी नहीं है। इसका मतलब अलविदा कहने का वक्त आ गया है।
मैंने उस रोज कैंसर की जांच-प्रक्रिया (निदान) को पूरा जीया। देर शाम मेरी बायोप्सी हुई,जहां उन्होंने मेरे गले में नीचे पेट से होते हुए आंतो तक एक एंडोस्कोप डाला। अग्नाश्य में एक सुई चुभोई और कुछ कोशिकाएँ निकालीं। मैं बेहोश था, लेकिन मेरी पत्नी जो वहां मौजूद थी, उसने मुझे बताया कि चिकित्सकों ने मेरी कोशिकाओं को माइक्रोस्कोप से देखा और जांचकर वे चिल्लाने लगे कि मुझे बहुत ही दुर्लभ किस्म का अग्नाश्य कैंसर है, जिसका सर्जरी से निदान सम्भव है। इसके बाद मेरी सर्जरी की गई और अब मैं स्वस्थ हूं।
यह हो वक्त था, जब मैंने मौत को सबसे नजदीक से देखा और उम्मीद करता हूं कि अगले कुछ दशकों में बस यही सबसे नजदीकी हो। उस दौर को जीकर अब मैं आपसे ये ज्यादा मजबूती से कह सकता हूं, मुझे मौत लाभकारी लगी। लेकिन मृत्यु पूरी तरह से आध्यात्मिक अवधारणा है। दुनिया मंे कोई भी आदमी मरना नहीं चाहता। यहां तक कि जो लोग दिल से स्वर्ग की ख्वाहिश पाले रखते हैं, वे भी मरना नहीं चाहते। ऐसी नाटकीय बातों के लिए क्षमा चाहता हूं, पर हकीकत तो यहीं ठहरती है।
आप के पास समय बहुत कम है, इसलिए इसे किसी और की जिंदगी जीने के लिए बर्बाद करो। सिद्धांतों के भवर में मत उलझो। किसी और के मत को अपनी आवाज पर हावी मत होने दो। सबसे अहम अपने दिल और अन्तज्र्ञान की सुनो और उसका अनुसरण करो।
जब मैं जवान था, द होल अर्थ केटलाॅग का अद्भुत प्रकाशन हुआ करता था, जो मेरी पीढ़ी के लोगों में बाइबिल की तरह था। यह मेरे साथी स्टीवर्ड ब्रांड द्वारा तैयार किया गया था। यह 60 के अंतिम दशक में पसर्नल कम्प्यूटर और डेस्कट्राॅप पब्लिशिंग से पहले मौजूद था। यह पूरा गं्रथ टाइपराइटर, कैंचियों और ध्रुवीय कैमरों से तैयार किया जाता था। यह गूगल के आने के 35 साल पहले पेपरबैक स्वरूप में गूगल का एक ही रूप था। यह आदर्शवादी, ज्ञान से भरपूर और विचारों से लबालब था। स्टीवर्ट और उसकी टीम ने इसके कई संस्करण निकाले और जब इसने अपना उद्देश्य लगभग पूरा कर दिया, तब उन्होंने आखिरी संस्करण निकाला। यह 70 के दशक के मध्य की बात है। आखिरी संस्करण के पिछले कवर पर उन्होंने एक देश की किसी सड़क पर सुबह के दृश्य का चित्र लगाया था। इसके नीचे लिखा गया था-स्टे हंग्री, बी फूलिश (भूख रखिए,नासमझ बने रहिए) यह उनको आखिरी संदेश था। मैंने इन शब्दों को हमेशा खुद की इच्छाओं में शामिल रखा है और अब आप स्नातक हो गए हैं, तो मैं आपके लिए भी यही दुआ करता हूं। स्टे हंग्री-स्टे फूलिश।

 Related Posts:

Steve Jobs: How to live before you die   VIdeo

“भूख रखिए, नासमझ बने रहिए”-स्टीव जाॅब्स

सफलता पाने हेतु एकाग्रता कैसे बढ़ाए?

मित्र की बात सुनने के पूर्व ३ परीक्षण करके सुने ताकि मित्रता बनी रहें

सफलता पाने हेतु प्राणऊर्जा कैसे विकसित करें?

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 396 other followers