Posts Tagged ‘आत्मछवि’

स्वसंवाद द्वारा अचेतन मन को स्वास्थ्य के पक्ष में करें

देह अपना उपचार स्वतः करती है


अपने हाथ की तरफ देखें यह ठोस दिखता है, दरअसल यह ठोस नहीं है। अगर आप इसे किसी अच्छे माइक्रोस्कोप के नीचे रखेंगे, तो आपको ऊर्जा की बहुत सी तरंगें दिखेंगी। हमारी देह ठोस नहीं है, यह मस्तिष्क की तरंगों के अधीन है।01
सभी बीमारियाँ पहले मस्तिष्क में जन्म लेती हैं। जब तक मानसिक पेटर्न उस अनुरूप न बन जाय, तब तक वह शरीर पर प्रकट नहीं होती है। अचेतन रूप से रोग उत्पन्न करने के स्थान पर हम सचेतन रूप से स्वास्थ्य कैसे उत्पन्न करें? अपने शरीर का प्रिन्टआउट बदलने के लिये हमें अपने मस्तिष्क के साफ्टवेअर को नये सिरे से लिखना सीखना पड़ेगा। हम ही अपने रोगों को चुनते हंै, उन्हे नियन्त्रित करते हैं एवं उन्हें बढ़ने की सुविधाएॅ देते है। हम रोगों का चेतन मन द्वारा चयन नहीं करते हंै, यह चयन मन के अचेतन स्तर पर छुपे हुऐ तलो पर चुपचाप होता है। यदि कोई ऐसी क्षमता हमारे पास है तो उसे नियन्त्रित करने की क्षमता भी होनी चाहिये। यह पुस्तिका इस बारे में बताती है।
असाध्य मानसिक या शारीरिक रोग की जड़ें सदा ही गहरे अवचेतन मन में होती है। छिपी हुई जड़ांे को उखाडकर रोग को ठीक किया जा सकता है। मनुष्य की देह (सिक्रेशन) सबसे अधिक दवाएँ बनाने का कारखाना है । हमारी देह के उपचार में काम आने वाली सभी दवाओं के केमिकल्स हमारी देह में बनाए जाते है। इन सब दवाओं का निर्माण हमारी सोच एवं भावनाओं पर निर्भर है। नकारात्मक सोच व नकारात्मक भावनाओं से हमारे सिक्रेशन प्रभावित होते हंै। दुनिया के सबसे धीमे मारने वाले भंयकर जहर भी इसी देह में बनते है।
सतुंलित,सहज व नैसर्गिक देह स्वतः अपना उपचार करती है। देह में एक नैसर्गिक क्षमता है। अपना उपचार करती है। यह स्वतः अपने को संतुलित करती है। जब देह का ताप बढ़ जाता है तो देह स्वतः ही उन रसायनों का निर्माण करती है जो ताप घटाने में सहायक होते हैं। यह कार्य स्वतः चलता रहता है जब तक कि इस नैर्सगिक प्रकिया को बिगाड़ न दिया जाए । बिगड़ने पर देह ताप समान नहीं रख पाती है तभी हमें ताप बढ़ने का ज्ञान होता है।
हमारी स्थूल देह के पीछे क्वान्तम भौतिकीय देह है जो कि सूक्ष्म है, अदृश्य है। स्थूल देह का जन्म इसी सूक्ष्म देह की बदौलत है। उसमें परिवर्तन इसी के आधार पर होते हंै।
वातावरण वास्तव में हमारी देह का विस्तार है।जैसे दो तारो व ग्रहो के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध न होने के उपरान्त वं आपस में भी सम्बंन्धित है। वैसे ही हमारी देह के अणुओं के बीच सम्बन्ध न होने के बावजूद आपस में सम्बन्धित है।
हमारी देह का रूपाकार किसी शिल्प कृति से कम नहीं है।भीतर बैठी प्रज्ञा का यह आवरण मूर्ति के रूप में दिखता है। इसके निश्चित आकार-प्रकार हंै। इसके साथ ही हमारी देह के परमाणु बहती हुई नदी की तरह है। हमारी देह में कुछ भी स्थाई नहीं है। हमारी कोशिकाओं के प्रत्येक कण बदलते जाते हैं। हमारी रक्त कणिकाएँ नब्बे दिन में बदल जाती हैं। हड्डियों का ठोस ढांचा जिसके चारों ओर शरीर लिपटा रहता है, वह स्वयं भी एक सौ बीस दिन में पूरी तरह बदल जाता है।

अब्राहम लिंकन का पत्र : अपने पुत्र के शिक्षक के नाम

हे शिक्षक!
मैं जानता हूं और मानता हूं
कि न तो हर व्यक्ति सही होता है
और न ही होता हैं सच्चा
किंतु तुम्हें सिखाना होगा कि
कौन बुरा है और कौन अच्छा।Abrham Lincon
दुष्ट व्यक्तियों के साथ-साथ आदर्श प्रणेता भी होते हैं,
स्वार्थी राजनीतिज्ञों के साथ-साथ समर्पित नेता भी होते हैं
दुश्मनों के साथ-साथ मित्र भी होते हैं,
हर विरूपता के साथ सुन्दर चित्र भी होते हैं।
समय भले ही लग जाए, पर
यदि सिखा सको तो उसे सिखाना
कि पाए हुए पांच से अध्कि मूल्यवान है -
स्वयं एक कमाना।
पाई हुई हार को कैसे झेले, उसे यह भी सिखाना
और साथ ही सिखाना, जीत की खुशियां मनाना।
यदि हो सके तो उसे ईष्र्या या द्वेष से परे हटाना
और जीवन में छिपी मौन मुस्कान का पाठ पठाना।
जितनी जल्दी हो सके उसे जानने देना
कि दूसरों को आतंकित करने वाला स्वयं कमजोर होता है,
वह भयभीत व चिंतित है
क्योंकि उसके मन में स्वयं चोर होता है।
उसे दिखा सको तो दिखाना -
किताबों में छिपा खजाना।
और उसे वक्त देना चिंता करने के लिए
कि आकाश के परे उड़ते पंछियों का आह्लाद,
सूर्य के प्रकाश में मध्ुमक्खियों का निनाद,
हरी-भरी पहाडि़यों से झांकते पफूलों का संवाद,
कितना विलक्षण होता है – अविस्मरणीय,  अगाध्
उसे यह भी सिखाना -
धेखे से सफलता पाने से असपफल होना सम्माननीय है।
और अपने विचारों पर भरोसा रखना अध्कि विश्वसनीय है।
चाहें अन्य सभी उनको गलत ठहरायें
परंतु स्वयं पर अपनी आस्था बनी रहे यह विचारणीय है।
उसे यह भी सिखाना कि वह सदय के साथ सदय हो,
किंतु कठोर के साथ हो कठोर।
और लकीर का फकीर बनकर,
उस भीड़ के पीछे न भागे जो करती हो – निरर्थक शोर।
उसे सिखाना
कि वह सबकी सुनते हुए अपने मन की भी सुन सके,
हर तथ्य को सत्य की कसौटी पर कसकर गुन सके।
यदि सिखा सको तो सिखाना कि वह दुःख में भी मुस्कुरा सके,
घनी वेदना से आहत हो, पर खुशी के गीत गा सके।
उसे यह भी सिखाना कि आंसू बहते हों तो उन्हें बहने दे,
इसमें कोई शर्म नहीं ़ ़ ़ कोई कुछ भी कहता हो ़ ़ ़ कहने दे।
उसे सिखाना -
वह सनकियों को कनखियों से हंसकर टाल सके
पर अत्यन्त मृदुभाषी से बचने का ख्याल रखे।
वह अपने बाहुबल व बु(िबल का अध्कितम मोल पहचान पाए
परंतु अपने हृदय व आत्मा की बोली न लगवाए।
वह भीड़ के शोर में भी अपने कान बन्द कर सके
और स्वतः की अंतरात्मा की सही आवाज सुन सकेऋ
सच के लिए लड़ सके और सच के लिए अड़ सके।
उसे सहानभूति से समझाना
पर प्यार के अतिरेक से मत बहलाना।
क्योंकि तप-तप कर ही लोहा खरा बनता है,
ताप पाकर ही सोना निखरता है।
उसे साहस देना ताकि वक्त पड़ने पर अध्ीर बने
सहनशील बनाना ताकि वह वीर बने।
उसे सिखाना कि वह स्वयं पर असीम विश्वास करे,
ताकि समस्त मानव जाति पर भरोसा व आस ध्रे।
यह एक बड़ा-सा लम्बा-चैड़ा अनुरोध् है
पर तुम कर सकते हो, क्या इसका तुम्हें बोध् है?
मेरे और तुम्हारे ़ ़ ़ दोनों के साथ उसका रिश्ता हैऋ
सच मानो, मेरा बेटा एक प्यारा-सा नन्हा सा पफरिश्ता है!

हम कोन हैं एवं शरीर का महत्व क्या हैं ?

हमारा शरीर एक अद्भुत संयंत्र है जो महच्चेतना की एक अनुपम सृष्टि है। मनुष्य द्वारा निर्मित कोई भी सयंत्र, यहाँ तक कि अत्याधुनिक सुपर कम्प्यूटर भी, इसकी तुलना में अत्यंत तुच्छ है। भौतिक संयंत्र को बाहरी ऊर्जा से संचालित किया जाता है, स्विच आॅफ कर दें तो संयंत्र निष्क्रिय हो जाता है। हमारा शरीर जीवन-पर्यन्त आत्म- चेतना की  अन्तर-ऊर्जा से प्रतिक्षण संचालित होता रहता है, निरंतर सक्रिय रहता है। विशालता एवं यांत्रिकता की दृष्टि से यह एक अद्भुत संरचना है।who am I

इसके भीतर प्रतिघन मिलीमीटर रक्त में पचास लाख रक्त कण (रेड काॅप्सर््यूल) और पचास हजार लाख श्वेत रक्त कण दौड़ते है, मस्तिष्क में सतह सक्रिय सात करोड़ कोशिकाएँ (सेल्स) हैं और साढ़े पाँच फीट के आकारवाले शरीर में दस अरब सनायु – तंत्र हैं। वस्तुतः यह एक ऐसा सूक्ष्म ब्रह्याण्ड (माइक्रो यूनिवर्स) है जो आत्म-चेतना की ऊर्जा से सतत् संचालित रहता है और प्रत्येक सात वर्ष पर अपने पुराने पुर्जो का स्वतः नवीनीकरण कर लेता है। ये हैं इस स्थूल भौतिक शरीर की कुछ अद्भुत विलक्षणताएँ। किन्तु इनमे भी अधिक विस्मयकारी है इसके भीतर छिपी हुई अन्य विशेषताएँ जैसे पंच-इन्द्रियाँ, पंच-तन्मात्राएँ, पंच-प्राण, मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार, राग-विराग की कल्पना ओैर आत्म-चेतना का अखण्ड प्रवाह जो कभी पाणिनि-पतंजलि, कभी वाल्मीकि-कालिदास, कभी तुलसी-टैगोर और कभी विवेकानन्द-गाँधी के रुप में उद्वेलित हो उठता है। यह है हमारे शरीर और उसमें निहित चेतना का चमत्कार!

हे माँ! तुझे सलाम, मेरी माँ को प्रणाम

मेरी माँ तुमने मेरे लिए बहुत कुछ किया, जिसे मै आज तक समझ न पाया। पुरुष वैसे भी स्त्री को समझने में असमर्थ हैं। मैं तुम्हारी सातवीं संतान था, तुम्हें मेरे जन्म पर भी बहुत पीड़ा हुई, उस पर भी मेरे जन्म के तीन दिन बाद तुम अवसाद का शिकार हो गई। एक माह तक डंूगरपुर अस्पताल में भर्ती रही, बहुत दुःख सहा। तब मै अपनी नानी के पास रहा। तुम्हारी हालत इतनी खराब थी कि अपने बच्चे को संभाल न सकती थी। Mother
मेरी मां सेलिब्रिटी नहीं थी, इसका मतलब यह नहीं कि वह एक महान मां नही थी । ग्लैमरस व प्रसिद्ध होने से ही कोई स्त्री महान मां नहीं हो जाती। अपनी तरह से सामान्य रहते हुए वह मेरे लिए असामान्य थी । वास्तव में सामान्यता बड़ी दुलर्भ हैं। मेरी मां में एक बलिदानी मां के सारे गुण थे । अपने बेटे के लिए दिन भर सचेत रहना, उसके हितों का संवर्धन करना व उसकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखना मुख्य था। वह मेरे हितों के लिए अपने पति से कमजोर होते हुए भी लड़ती थी । उसे अपने बच्चे कि लिए पति से पीटना तक मंजूर था ।
दुनिया में तुम्हारा नाम न था, इसका मतलब यह नहीं कि तुम किसी प्रसिद्ध माँ की तुलना में कम थी। तुम्हारा प्यार अपने बच्चों के प्रति किसी से कम न था। वास्तव मे तुम महान माँ थी। मेरे पिता कठोर अनुशासन प्रिय थे। वे बच्चों को अक्सर डाँटते रहते थे। मैं अपने पिता को गाली देने की मशीन समझता था। पिताजी जब भी मुझे क्रोध में डाँटते या पिटने को आतुर होते तब तुम ढाल बनकर आती थी । इस बीच पिता के हाथों कई बार स्वयं पीट जाती थी । तुम्हारी यह सुरक्षा कवच सदैव मुझे याद आता है ।
पिताजी रात्रि में भोजन खिलाने का विरोध करते थे । जैन धर्म के अनुसार रात्रि का भोजन निषेध है । तुम पिताजी की अनुपस्थिति में पीछे से हमे चुपचाप खाना खिलाती थी ।
आई, मां को हम इसी नाम से पुकारते थे । तुम्हारे बलिदानों से यह जीवन संवरता है । मेरे शरीर का कतरा कतरा तुम्हारे ऋण से ग्रस्त है । यह शरीर तुम्हारा अंश है । इसे आज अनुभव करता हूं।
मै आपके जीते जी आपका महत्व समझ न पाया । मेरी 37 वर्ष की उम्र मेें आप धरती से अचानक विदा हो गई । तब मुझे लगा कि मेेरे उपर आपका जो रक्षा कवच था, वह अब हट गया। मै शर्मिन्दा हुॅं कि आप के जीते जी कभी आपको समझ न पाया । पत्नी बार-बार कहती थी कि तुमने अपनी मां की परवाह न की । महत्वकांक्षा के घोड़ों पर सवार होने से मैं आपको समय न दे पाया । आज मातृदिवस को इसका बोध हो रहा है ।
मेरी मां एक औसत निम्न मध्यवर्गीय मां की तरह सामान्य औरत थी जिसने 12 बच्चों को जन्म दिया । वह सदैव गरीबी व उपेक्षा की शिकार रही । उसकी अपनी समस्याएं थी । वह अपनी सोच से हम बच्चों का सदैव बढिया ही सोचती थी । लेकिन मै उसे कभी समझ न पाया । मै बचपन से उद्ण्ड व क्रोधी लड़का था । विवशता के कारण बचपन में रोना बहुत रोता रहता था ।
वह मेरी सुरक्षा को लेकर सदैव चिन्तित रहती थी । मां का ध्यान सदैव बेटे की हरकतों पर रहता है कि अभी वह कहां है, सुरक्षित है या नहीं ?
बच्चा मां को नहीं समझ पाता है । लेकिन मैं तो बड़ा होकर भी 50 के बाद उसके योगदान को अनुभव करता हुं । मेरी मां ने मेरे लिए वो सब किया जो एक मां कर सकती है ।

सुखी होने अन्तर्यात्रा करें व अन्तर्मन की सुनंे

 

ज्यादातर लोग कभी अपनी अन्तरात्मा की आवाज नहीं सुनते है।
- स्टीफन आर. कवि

हम अपने सूक्ष्म शरीर एवं भाव जगत् को व्यवस्थित करने के लिए आन्तरिक अवलोकन करते हंै।
शरीर एवं उपनिषद् सिखाते हैं,-‘यत् पिण्डे,तत् ब्रह्मांडे’। दीपक चोपड़ा ने लिखा है-मानव देह ब्र्रह्मांड की अभिव्यक्ति है। जिन तत्त्वों और शक्तियों से ब्र्रह्मांड बना है, उन्हीं से हमारा शरीर,मस्तिष्क एवं आत्मा भी बने हैं। सूक्ष्म और विराट दोनों एक ही है। मानव-देह और ब्रह्मांडीय-देह एक ही है। मानवीय-मस्तिष्क और ब्रह्मांडीय-मस्तिष्क एक ही हैं। यही वेदों का मूलभूत संदेश और सिद्धांत है।हम किस प्रकार सोचते हैं, महसूस करते है, स्मरण करते हैं, और कल्पना करते हैं, ये सारी बातें हमारी देह को प्रभावित करती है। लेकिन स्व-संवाद की कमी के कारण हम अपने से दूर चले गये है। स्व संवाद का अर्थ है-आपके मन में चलने वाला वार्तालाप। लोग बाहर से तो अपने आपको बदल लेते हैं परंतु अंदर से वैसे ही रहते हैं। जब तक आप अपने बारे में जो खयालात रखते हैं, उन्हें नहीें बदलते, तब तक आप अंदर से स्वयं को नहीं बदल सकते। आपके विचार आपको जो खबर देते हैं, आप अपने आपको वही मान लेते हैं। इसलिये पहले आपको अपने अंदर चलने वाले विचारों को बदलना हेगा। स्व संवाद बदलने से आप अंदर से बदल जाते हैं, यही स्व संवाद का जादू है।

अपने शरीर के संकेतों को सुनें। हमारा शरीर अपने ऊपर होने वाली ज्यादतियों का विरोध प्रकट करता है। शरीर की थकान,सोने की इच्छा,काम न करने का मन, सरदर्द आदि ऐसे संकेत हैं। जब कभी पानी पीने का भाव जगे, शौच एवं पेशाब करने की इच्छा हो तो उसे तत्काल पूरा करें, संकोच की जरूरत नहीं है।
अन्र्तप्रेरणा सुनंे और जीना सीखें। हम अपनी व्यस्तता के कारण अपने से ही बहुत दूर चले गयें हैं । इस संसार में हमारा दूसरों से बहुत कम संवाद हैं एवं स्वयं से भी संवाद नहीं के बराबर हैं । हम अपने अन्र्तमन के संकेतों व संदेशों को ग्रहण नहीं करते है। जब आप अपनी बात नहीं सुनते है तो दुनिया में किसी ओर की बात कैसे सुन सकते हैं । हम अपनी सबसे ज्यादा अनदेखी करते हैं। कई बार मनुष्य का अचेतन घटनाओं का विश्लेषण कर कुछ सूचनाएं व संकेत देता है लेकिन तब हम उस पर ध्यान नहीं देते हैं । आपका शरीर, मस्तिष्क, मन और आत्मा निरन्तर कुछ न कुछ किसी न किसी रूप में आपसे कहते रहते हैं। अपनी अन्र्तप्रेरणा ही आपकी सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक है । इस स्त्रोत का लाभ उठाकर व्यक्ति चाहै हेे जितनी उन्नति कर सकता हैं । पाओलो कोएलो ने एल्केमिस्ट को साफ तौर पर ऐसे संकेत ग्रहण करते हुए दिखाया है । वह प्रकृति द्वारा दिए जाने वाले संकेतों एवं लक्षणों को महत्व देने के कारण ही सफल होता हैं।

शरीर की भाषा समझें। जब हल्का सर दर्द हो तो उसे दो रुपये की गोली या पेनकिलर लेकर दबाने की कोशिश न करें। अच्छा हो कि विश्राम करें। कैसी विड़म्बना है कि आप अपने शरीर को रोगी बनाएँ व डाक्टर उसे ठीक करे। दवाइयाँ आपात काल के लिए है। सामान्य परिस्थिति में उनका सेवन ठीक नहीं है। डाॅक्टर व दवाइयाँ आपके लिए ही नहीं है; उनमें डाक्टर व दवा बाजार की ताकतेें शामिल हंै जो आपके पक्ष में नहीं है।
मानव-देह जीवित मन्दिर है। इसके होने से आप हैं। अस्तित्व इसके द्वारा आप को अभिव्यक्त करता है। अतः इसका ध्यान रखंे। शरीर के सकेतों को अनसुना न करें। यह गूंगा जरूर है, लेकिन प्राणवान है। अतः इसे मित्र बनाएँ।
अपने शरीर से संवाद नहीं होने से हमारा उस पर नियन्त्रण नहीं रहताहै। ऐसे में शरीर स्वंय मालिक हो जाता है। वह एक सीमा के बाद अपनी रिपेयरिंग नहीं कर सकता है। ऐसे में हमारी उम्र घटती है।इससे बुढ़ापा शीघ्र आ जाता है।
प्रतिदिन हम भोजन करते हैं। लेकिन क्या खाना चाहिए एंव कितना खाना चाहिए यह बहुत कम लोग जानते हैं। स्वाद के कारण हम इस शरीर पर कई बार अनावश्यक बोझ डाल देते हंैै। फिर कहते हंै कि मुझे अपच है, गैस रहती है। नोबेल पुरस्कार विजेता डा.लिनस पोलिंग ने कहा था कि आप लोग जो भोजन करते हैं वह पच्चीस प्रतिशत आप के लिए है, शेष पिचहतर प्रतिशत भोजन आप डाक्टरों के पेट के लिए करते हैं।
जब कभी हम नकारात्मक होते हैं तो तत्क्षण शरीर में अनेक तरह के हानिप्रद रसायन बनने लगते हैं। हमारा शरीर दुनिया की सबसे बड़ी फार्मास्युटिकल फैक्ट्री है। यह अपने मस्तिष्क के कमाण्ड पर अनेक तरह के रसायन बनाता है।
ईश्वर की सबसे बड़ी कृति इंसान है। हमारे पास सर्वश्रेष्ठ साधन है। प्रकृति की सारी व्यवस्था है। इसके उपरान्त भी हम अपने अहं व लोभवृत्ति के वश में होकर इस शरीर पर अनेक तरह के अनावश्यक बोझ लादे हुए हैं।
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अपने भीतर देखो, उसे संभालों सफलता निश्चित है

सुखी होने अन्तर्यात्रा करें व अन्तर्मन की सुने

ज्यादातर लोग कभी अपनी अन्तरात्मा की आवाज नहीं सुनते है।
                                                                                                                    - स्टीफन आर. कवि

हम अपने सूक्ष्म शरीर एवं भाव जगत् को व्यवस्थित करने के लिए आन्तरिक अवलोकन करते हंै।
शरीर एवं उपनिषद् सिखाते हैं,-‘यत् पिण्डे,तत् ब्रह्मांडे’। दीपक चोपड़ा ने लिखा है-मानव देह ब्र्रह्मांड की अभिव्यक्ति है। जिन तत्त्वों और शक्तियों से ब्र्रह्मांड बना है, उन्हीं से हमारा शरीर,मस्तिष्क एवं आत्मा भी बने हैं। सूक्ष्म और विराट दोनों एक ही है। मानव-देह और ब्रह्मांडीय-देह एक ही है। मानवीय-मस्तिष्क और ब्रह्मांडीय-मस्तिष्क एक ही हैं। यही वेदों का मूलभूत संदेश और सिद्धांत है।हम किस प्रकार सोचते हैं, महसूस करते है, स्मरण करते हैं, और कल्पना करते हैं, ये सारी बातें हमारी देह को प्रभावित करती है। लेकिन स्व-संवाद की कमी के कारण हम अपने से दूर चले गये है। स्व संवाद का अर्थ है-आपके मन में चलने वाला वार्तालाप। लोग बाहर से तो अपने आपको बदल लेते हैं परंतु अंदर से वैसे ही रहते हैं। जब तक आप अपने बारे में जो खयालात रखते हैं, उन्हें नहीें बदलते, तब तक आप अंदर से स्वयं को नहीं बदल सकते। आपके विचार आपको जो खबर देते हैं, आप अपने आपको वही मान लेते हैं। इसलिये पहले आपको अपने अंदर चलने वाले विचारों को बदलना हेगा। स्व संवाद बदलने से आप अंदर से बदल जाते हैं, यही स्व संवाद का जादू है।

अपने शरीर के संकेतों को सुनें। हमारा शरीर अपने ऊपर होने वाली ज्यादतियों का विरोध प्रकट करता है। शरीर की थकान,सोने की इच्छा,काम न करने का मन, सरदर्द आदि ऐसे संकेत हैं। जब कभी पानी पीने का भाव जगे, शौच एवं पेशाब करने की इच्छा हो तो उसे तत्काल पूरा करें, संकोच की जरूरत नहीं है।
अन्र्तप्रेरणा सुनंे और जीना सीखें। हम अपनी व्यस्तता के कारण अपने से ही बहुत दूर चले गयें हैं । इस संसार में हमारा दूसरों से बहुत कम संवाद हैं एवं स्वयं से भी संवाद नहीं के बराबर हैं । हम अपने अन्र्तमन के संकेतों व संदेशों को ग्रहण नहीं करते है। जब आप अपनी बात नहीं सुनते है तो दुनिया में किसी ओर की बात कैसे सुन सकते हैं । हम अपनी सबसे ज्यादा अनदेखी करते हैं। कई बार मनुष्य का अचेतन घटनाओं का विश्लेषण कर कुछ सूचनाएं व संकेत देता है लेकिन तब हम उस पर ध्यान नहीं देते हैं । आपका शरीर, मस्तिष्क, मन और आत्मा निरन्तर कुछ न कुछ किसी न किसी रूप में आपसे कहते रहते हैं। अपनी अन्र्तप्रेरणा ही आपकी सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक है । इस स्त्रोत का लाभ उठाकर व्यक्ति चाहै हेे जितनी उन्नति कर सकता हैं । पाओलो कोएलो ने एल्केमिस्ट को साफ तौर पर ऐसे संकेत ग्रहण करते हुए दिखाया है । वह प्रकृति द्वारा दिए जाने वाले संकेतों एवं लक्षणों को महत्व देने के कारण ही सफल होता हैं।

शरीर की भाषा समझें। जब हल्का सर दर्द हो तो उसे दो रुपये की गोली या पेनकिलर लेकर दबाने की कोशिश न करें। अच्छा हो कि विश्राम करें। कैसी विड़म्बना है कि आप अपने शरीर को रोगी बनाएँ व डाक्टर उसे ठीक करे। दवाइयाँ आपात काल के लिए है। सामान्य परिस्थिति में उनका सेवन ठीक नहीं है। डाॅक्टर व दवाइयाँ आपके लिए ही नहीं है; उनमें डाक्टर व दवा बाजार की ताकतेें शामिल हंै जो आपके पक्ष में नहीं है।
मानव-देह जीवित मन्दिर है। इसके होने से आप हैं। अस्तित्व इसके द्वारा आप को अभिव्यक्त करता है। अतः इसका ध्यान रखंे। शरीर के सकेतों को अनसुना न करें। यह गूंगा जरूर है, लेकिन प्राणवान है। अतः इसे मित्र बनाएँ।
अपने शरीर से संवाद नहीं होने से हमारा उस पर नियन्त्रण नहीं रहताहै। ऐसे में शरीर स्वंय मालिक हो जाता है। वह एक सीमा के बाद अपनी रिपेयरिंग नहीं कर सकता है। ऐसे में हमारी उम्र घटती है।इससे बुढ़ापा शीघ्र आ जाता है।
प्रतिदिन हम भोजन करते हैं। लेकिन क्या खाना चाहिए एंव कितना खाना चाहिए यह बहुत कम लोग जानते हैं। स्वाद के कारण हम इस शरीर पर कई बार अनावश्यक बोझ डाल देते हंैै। फिर कहते हंै कि मुझे अपच है, गैस रहती है। नोबेल पुरस्कार विजेता डा.लिनस पोलिंग ने कहा था कि आप लोग जो भोजन करते हैं वह पच्चीस प्रतिशत आप के लिए है, शेष पिचहतर प्रतिशत भोजन आप डाक्टरों के पेट के लिए करते हैं।
जब कभी हम नकारात्मक होते हैं तो तत्क्षण शरीर में अनेक तरह के हानिप्रद रसायन बनने लगते हैं। हमारा शरीर दुनिया की सबसे बड़ी फार्मास्युटिकल फैक्ट्री है। यह अपने मस्तिष्क के कमाण्ड पर अनेक तरह के रसायन बनाता है।
ईश्वर की सबसे बड़ी कृति इंसान है। हमारे पास सर्वश्रेष्ठ साधन है। प्रकृति की सारी व्यवस्था है। इसके उपरान्त भी हम अपने अहं व लोभवृत्ति के वश में होकर इस शरीर पर अनेक तरह के अनावश्यक बोझ  लादे हुए हैं।

( मेरी पुस्तक जियो तो ऐसे  जियो से)

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सफलता का मंत्रः रतन टाटा के अनुसार :अंतिम भाग

3. गहरी पर्यवेक्षण क्षमता
जीवन में सफलता प्राप्ता करने के लिए हमें आखं और कान खुले रखने चाहिए। वस्तुओं, घटनाओं, व्यक्तियों व उनके व्यवहार का बारीकी से अवलोकन करना जरुरी हैं। व्यवस्था पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए व्यवस्था को समझना जरुरी हैं। सभी चीजें शब्दों से न समझी जा सकती हैं न समझाई जा सकती हैं। इसलिए अशाब्दिक संप्रेषण की कला भी आनी चाहिए। शब्दों के पार का संप्रेषण आना चाहिए। व्यक्ति अपनी देह भाषा से सत्तर प्रतिशत बोलता हैं। शब्द तो मात्र संकेत करते हैं। इसलिए आगे बढ़ने के लिए देह भाषा का ज्ञान जरुरी हैं। इसी से समझ पैदा होती हैं। देश, काल, परिस्थिति, वित, नियम-कायदे, रूख को ध्यान में रख कर निर्णय लेना बुद्धिमता है। जल्दबाजी न करना, न निर्णय करने में देरी करना । पर्दे के पीछे को समझना सफलता पाने के लिए जरुरी हैं। व्यक्तियों के पीछे भावार्थ क्या है ?
4. विनम्रता
‘‘विद्या ददाति विनयम‘‘ उच्च अधिकारियों के पास शक्ति होती है । अतः उनमे अंहकार रखने या प्रदर्शन की जरूरत नहीं होती है । वास्तव में शक्तिशाली को उसके प्रदर्शन की जरुरत नहीं होती हैं। सामान्यतः असमर्थ लोग शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। समर्थ व्यक्ति को हमेशा विनम्र होने की जरुरत हैं। उनके निर्णय से बहुत से लोग प्रभावित होते हैं ।
उपरोक्त गुणों के होने पर मिस्त्री टाटा गु्रप के चेयरमैन हो सकते हैं तो कोई भी इन गुणों को जीवन में उतारकर आगे बढ़ सकता हैं।

सफलता का मंत्रः रतन टाटा के अनुसार

रतन टाटा के उत्तराधिकारी के रुप में सायरश मिस्त्री का चयन हुआ हैं। एक कमेटी ने 15 माह की जांच पड़ताल के बाद इनको चयनित किया हैं । पत्रकारो ने रतन टाटा से पूछा की किन गुणों के आधार पर आपने उनका चयन किया। रतन टाटा पहले तो टालते रहे लेकिन बाद में इनके चयन का कारण इनमे निम्न 4 विशेषताओं को बताया हैं।
1. कार्य सम्पादित करने की कला
हमारी सफलता हमारे काम करने की शैली तय करती हैं अर्थात काम करने का तरीका बहुत ही महत्वपूर्ण है । महर्षि पतंजलि ने भी ’’योगः कर्मसु कौशलं’’ लिखा हैं। उन्होनें तो कार्य सम्पादित करने की कौशल को ही योग बताया हैं। सभी उन्ही किताबों व अध्यापकों से पढ़ते है, कुछ अच्छे माक्र्स लाते हैं, कुछ फेल हो जाते हैं, क्यों ? सबके पास पढने के 5-7 घंटे ही होते हैं, मेहनत भी कई लोग करते हैं । फिर भी परिणाम भिन्न-भिन्न रहता हैं। इस सब के लिए पढ़ने का तरीका जिम्मेदार हैं।
पढने का तरीका सबका भिन्न-2 होता है । पढते वक्त एकाग्र होना, पढ़ने में रूचि, स्पीड रिडिंग, स्मरण शक्ति को बढाने का तरीका जानना, मस्तिक की शक्तियों का ज्ञान आदि से पढ़ने की कला विकसित होती हैं। पढ़ने की दक्षता उसकी कला से आती हैं।
हम आज काम कैसे करते हैं ? पेड़ काटने के पूर्व कुल्हाड़ी की धार देखने की आवश्यकता हैं। जब आठ घंटे में पेड़ काटना हो तो छः घंटे कुल्हाड़ी की धार तेज करने में लगाने पर सफलता के अवसर बढ़ जाते हैं।
कार्य करने की कला के मुख्य बिन्दु
कार्य को निर्धारित समय सीमा में पूरा करना
कार्य को आनन्द से करना
बिना चिढे, बिना चिढाये कार्य करना
परिणाम की चिन्ता बगैर कार्य करना
अधूरा/बीच में कार्य नहीं छोड़ना

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                                                                                                                        ( To be continued…)

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’’जागो मेरे पार्थ’’ यह अपने नाम के अनुरूप जगाने वाली है । यह महाभारत के अर्जुन को नहीं हमारे मन में चलने वाली महाभारत को जीतने के सम्बन्ध में है । यह हमें जीने की कला बताती है ।
यह पुस्तक धार्मिक कम, सफलता संबंधी अधिक है । इसमें जीवन में आई उलझनों का सामना कैसे करें पर खुले मन से दिये दिये गये 18 प्रवचन है । यद्यपि इसका आधार भगवत गीता है लेकिन यह हिन्दु दर्शन की बजाय प्रेरक दर्शन से जुडी है ।
कृष्ण कहते हैं- तुम्हारा अन्तर्हदय ही कुरुक्षेत्र हैं और वही धर्मक्षेत्र भी। युद्ध बाहय नहीं, चित की वृत्तियों से हो, स्वयं के तमस से हो। क्रान्ति हो अन्धकार में प्रकाश की। बाहय युद्ध से समस्याओं का समाधान नहीं हो सकेगा। कृष्ण अन्तरमन में चल रहे युद्ध को जीतने की प्रेरणा देते हैं। वे अन्तर-युद्ध के प्रेरक हैं। अर्जुन तो प्रतीक है वीरत्व का, क्षात्रत्व का, फिसलने का।

यह आज के युवाओं को बोध देने में समर्थ है । यह आधुनिक शैली में निबन्ध है । इसमें कहीं संगठित धर्म या सम्प्रदाय का षोषण नहीं किया हुआ है । जैन सन्त होने से इसमें जैन उद्धरण बहुत है ।
लेखक श्री चन्द्रप्रभ एक प्रसिद्ध जैन सन्त है जो जैन सम्प्रदाय की सीमाओं से बंधे नहीं है । ध्यान व तत्व को जीवन में बहुत महत्व देते है । पुस्तक का प्रकाशन श्री जीतयशा फाउन्डेशन, जयपुर द्वारा किया गया है । पुस्तक की कीमत 50/- रू. है व पृष्ठ 256 है ।

आप अद्वितीय एवं अनुपम:आपका मस्तिष्क दुनिया का सबसे बड़ा सुपर कम्प्यूटर

विश्व के सबसे बड़े सुपर कम्प्यूटर का मालिक अमेरिका नहीं है। विश्व के सबसे बड़े सुपर कम्प्यूटर के मालिक आप हैं। यह आपके बालों के ठीक नीचे है। फिर भी हमारी हालत दयनीय क्यों है ? क्योंकि इस सुपर कम्प्यूटर को आॅपरेट करना हमको नहीं आता है, और यह यंत्र हमें चलाने वाला बन गया है। जिसे मनुष्य को चलाना चाहिये वह मनुष्य को चला रहा है। यंत्र बेचारा क्या करे, आॅपरेटर के अभाव में स्वयं चल पड़ा है। यह व्यक्तिगत कम्प्यूटर सार्वजनिक हो गया है। यह चेतन कम्प्यूटर यांत्रिक रूप से चल रहा है, क्योंकि इसे समाज, विचारधारा, पड़ौसी, अतीत, इज्जत, महत्त्वाकांक्षा, भय आदि शक्तियां चला रहीं हैं। जब जिसका कोई मालिक नहीं होता तो सारी दुनिया उसकी मालिक हो जाती है। आप सोये हुए हैं और अन्य शक्तियां आपके कम्प्यूटर को चला रही हैं जिसका नतीजा सामने है। हमारा समस्त जीवन नकारात्मक हो गया है। हम स्वतः ही अपने को नहीं पर को देखते हैं। जगत की या स्वयं की हर कमी, हर चीज के लिये दूसरों को जिम्मेदार ठहराते हैं। सदैव खामियों, कमजोरियों को ही देखते हैं। हम इच्छापूर्वक विचार करते नहीं है। विचार हमको जहां-तहां ले जाते हैं। हम कईं बार नकारात्मक आवेग में फंस जाते हैं।
आज का विकसित विज्ञान भी मस्तिष्क के बराबर की क्षमता का कम्प्यूटर बनाये तो उसे 10 घन किलोमीटर जगह चाहिये। 10 किलोमीटर लम्बी, 10 किलोमीटर चैड़ी एवं 10 किलोमीटर ऊंची जगह की जरुरत पड़ती है।
आपके मस्तिष्क की प्रत्येक कोशिका एक समय में 3 करोड़ घटनाएं प्रोसेस कर सकती हैं जो कि दनिया के सबसे बड़े सुपर कमप्यूटर की गति से बहुत अधिक है। एक मानव मस्तिष्क में 28 अरब कोशिकाएं होती हैं।

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