Posts Tagged ‘अवचेतन मस्तिष्क’

स्वसंवाद द्वारा अचेतन मन को स्वास्थ्य के पक्ष में करें

देह अपना उपचार स्वतः करती है


अपने हाथ की तरफ देखें यह ठोस दिखता है, दरअसल यह ठोस नहीं है। अगर आप इसे किसी अच्छे माइक्रोस्कोप के नीचे रखेंगे, तो आपको ऊर्जा की बहुत सी तरंगें दिखेंगी। हमारी देह ठोस नहीं है, यह मस्तिष्क की तरंगों के अधीन है।01
सभी बीमारियाँ पहले मस्तिष्क में जन्म लेती हैं। जब तक मानसिक पेटर्न उस अनुरूप न बन जाय, तब तक वह शरीर पर प्रकट नहीं होती है। अचेतन रूप से रोग उत्पन्न करने के स्थान पर हम सचेतन रूप से स्वास्थ्य कैसे उत्पन्न करें? अपने शरीर का प्रिन्टआउट बदलने के लिये हमें अपने मस्तिष्क के साफ्टवेअर को नये सिरे से लिखना सीखना पड़ेगा। हम ही अपने रोगों को चुनते हंै, उन्हे नियन्त्रित करते हैं एवं उन्हें बढ़ने की सुविधाएॅ देते है। हम रोगों का चेतन मन द्वारा चयन नहीं करते हंै, यह चयन मन के अचेतन स्तर पर छुपे हुऐ तलो पर चुपचाप होता है। यदि कोई ऐसी क्षमता हमारे पास है तो उसे नियन्त्रित करने की क्षमता भी होनी चाहिये। यह पुस्तिका इस बारे में बताती है।
असाध्य मानसिक या शारीरिक रोग की जड़ें सदा ही गहरे अवचेतन मन में होती है। छिपी हुई जड़ांे को उखाडकर रोग को ठीक किया जा सकता है। मनुष्य की देह (सिक्रेशन) सबसे अधिक दवाएँ बनाने का कारखाना है । हमारी देह के उपचार में काम आने वाली सभी दवाओं के केमिकल्स हमारी देह में बनाए जाते है। इन सब दवाओं का निर्माण हमारी सोच एवं भावनाओं पर निर्भर है। नकारात्मक सोच व नकारात्मक भावनाओं से हमारे सिक्रेशन प्रभावित होते हंै। दुनिया के सबसे धीमे मारने वाले भंयकर जहर भी इसी देह में बनते है।
सतुंलित,सहज व नैसर्गिक देह स्वतः अपना उपचार करती है। देह में एक नैसर्गिक क्षमता है। अपना उपचार करती है। यह स्वतः अपने को संतुलित करती है। जब देह का ताप बढ़ जाता है तो देह स्वतः ही उन रसायनों का निर्माण करती है जो ताप घटाने में सहायक होते हैं। यह कार्य स्वतः चलता रहता है जब तक कि इस नैर्सगिक प्रकिया को बिगाड़ न दिया जाए । बिगड़ने पर देह ताप समान नहीं रख पाती है तभी हमें ताप बढ़ने का ज्ञान होता है।
हमारी स्थूल देह के पीछे क्वान्तम भौतिकीय देह है जो कि सूक्ष्म है, अदृश्य है। स्थूल देह का जन्म इसी सूक्ष्म देह की बदौलत है। उसमें परिवर्तन इसी के आधार पर होते हंै।
वातावरण वास्तव में हमारी देह का विस्तार है।जैसे दो तारो व ग्रहो के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध न होने के उपरान्त वं आपस में भी सम्बंन्धित है। वैसे ही हमारी देह के अणुओं के बीच सम्बन्ध न होने के बावजूद आपस में सम्बन्धित है।
हमारी देह का रूपाकार किसी शिल्प कृति से कम नहीं है।भीतर बैठी प्रज्ञा का यह आवरण मूर्ति के रूप में दिखता है। इसके निश्चित आकार-प्रकार हंै। इसके साथ ही हमारी देह के परमाणु बहती हुई नदी की तरह है। हमारी देह में कुछ भी स्थाई नहीं है। हमारी कोशिकाओं के प्रत्येक कण बदलते जाते हैं। हमारी रक्त कणिकाएँ नब्बे दिन में बदल जाती हैं। हड्डियों का ठोस ढांचा जिसके चारों ओर शरीर लिपटा रहता है, वह स्वयं भी एक सौ बीस दिन में पूरी तरह बदल जाता है।

कैन्सर चिकित्सा हेतु ऊर्जा का जागरण एवं सोच में परिवर्तन जरूरी

हम ऊर्जा के पूंज है । जब तक ऊर्जा का बहाव आसानी से पूरी तरह शरीर में होता रहता है तब तक हम स्वस्थ रहते हैं । हमारे ऊर्जा पथ में ज्योंहि बाधा पहुंचती है, शरीर रूग्ण हो जाता है । ऊर्जा पथ मे विकृति शरीर को विकृत कर देती है ।Image ऊर्जा पथ की चाबी हमारे स्वस्थ मन, भाव एवं विचार के अधीन है । स्वस्थ मन के होने पर ऊर्जा निर्बाध बहती रहती है । स्वस्थ भाव व मन के होने पर ही कोशिकिय श्वसन अच्छा होता है । निर्बाध आक्सीजन का बहना कोशिकिय श्वसन के लिए जरूरी है । शरीर में इसका दौड़ना इन्ही भावों व विचारों के अधीन है ।
कैन्सर अर्थात शरीर में ऊर्जा का संचरण सही तरीके से नहीं हो रहा है । ऊर्जा पथ को कैन्सर कोशिकाओं ने अपने नियन्त्रण में ले लिया है । रोगी की सोच एवं भाव अराजक है । कैन्सर होने का अर्थ है कि मन भी विकार ग्रस्त है । अतः सर्व प्रथम मन को कैन्सर केन्द्र से मुक्त करना पड़ता है । भाव एवं विचार की दिशा बदले बिना कैन्सर कौशिकाओं पर नियन्त्रण कठिन है । मात्र पोषक आहार एवं निर्विषिकरण से इसे रोकना मुश्किल है । इस हेतु मन में दबे भावों, गुस्से, ईष्र्या, दुःख, हार, बदले के भाव आदि का रेचन जरूरी है ।

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अवचेतन की धुलाई होली पर:शुभकामनाएँ

 अवचेतन  की  धुलाई होली   परहोली तो बस एक बहाना है रंगों का, ये त्यौहार तो है आपस में दोस्ती और प्यार बढ़ने का, चल सारे गिले सिक्वे दूर कर के, एक दुसरे को खूब रंग लगते हैं मिलकर होली मानते हैं!
होली की आपको हार्दिक शुभकामनायें!

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सुखी होने अन्तर्यात्रा करें व अन्तर्मन की सुनंे

कला साहित्य को मनोरंजन बना रहा है बाजार

हमारे जीवन में आंख खोलने वाले, स्वयं को राह दिखाने वाले, मूल्य सीखाने वाले कला-साहित्य आज स्वयं बाजार के शिकार है । जो दीपक है उसे ही बाजार अपने अनुसार करने हेतू प्रयत्नरत है । प्रेमचन्द की बजाय शिवखेड़ा पढ़ा जाता है । विशुद्ध साहित्य नही बल्कि प्रेरक साहित्य बिकता है ।art bazar
सिस्टम मनुष्य पर भारी पड़ रहा है । उजाले पर ही पहरे बैठे हैं । आज सब ताकत बाजार के हाथ है । बाजार की शक्ति निर्धारक होती जा रही है । इससे बचना कठिन है । बाजार हर चीज को कीमत में आंकता है । मुनाफा जीवन का मन्त्र हो गया है । हर चीज रूपयों से तोली जाने लगी है ।
मीडिया पूंजीपतियों के चुंगल में है । विज्ञापन दाता क्या छपेगा या दिखेगा हम करते है । मीडिया मालिकों को मूल्यों से सरोकार नहीं है । वे टी.आर.पी. से चलते हैं । सही बात मौलिक दृष्टि गोल है । मांग के अनुरूप परोसा जाने लगा है ।

हम कोन हैं एवं शरीर का महत्व क्या हैं ?

हमारा शरीर एक अद्भुत संयंत्र है जो महच्चेतना की एक अनुपम सृष्टि है। मनुष्य द्वारा निर्मित कोई भी सयंत्र, यहाँ तक कि अत्याधुनिक सुपर कम्प्यूटर भी, इसकी तुलना में अत्यंत तुच्छ है। भौतिक संयंत्र को बाहरी ऊर्जा से संचालित किया जाता है, स्विच आॅफ कर दें तो संयंत्र निष्क्रिय हो जाता है। हमारा शरीर जीवन-पर्यन्त आत्म- चेतना की  अन्तर-ऊर्जा से प्रतिक्षण संचालित होता रहता है, निरंतर सक्रिय रहता है। विशालता एवं यांत्रिकता की दृष्टि से यह एक अद्भुत संरचना है।who am I

इसके भीतर प्रतिघन मिलीमीटर रक्त में पचास लाख रक्त कण (रेड काॅप्सर््यूल) और पचास हजार लाख श्वेत रक्त कण दौड़ते है, मस्तिष्क में सतह सक्रिय सात करोड़ कोशिकाएँ (सेल्स) हैं और साढ़े पाँच फीट के आकारवाले शरीर में दस अरब सनायु – तंत्र हैं। वस्तुतः यह एक ऐसा सूक्ष्म ब्रह्याण्ड (माइक्रो यूनिवर्स) है जो आत्म-चेतना की ऊर्जा से सतत् संचालित रहता है और प्रत्येक सात वर्ष पर अपने पुराने पुर्जो का स्वतः नवीनीकरण कर लेता है। ये हैं इस स्थूल भौतिक शरीर की कुछ अद्भुत विलक्षणताएँ। किन्तु इनमे भी अधिक विस्मयकारी है इसके भीतर छिपी हुई अन्य विशेषताएँ जैसे पंच-इन्द्रियाँ, पंच-तन्मात्राएँ, पंच-प्राण, मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार, राग-विराग की कल्पना ओैर आत्म-चेतना का अखण्ड प्रवाह जो कभी पाणिनि-पतंजलि, कभी वाल्मीकि-कालिदास, कभी तुलसी-टैगोर और कभी विवेकानन्द-गाँधी के रुप में उद्वेलित हो उठता है। यह है हमारे शरीर और उसमें निहित चेतना का चमत्कार!

सफलता हेतु व्यक्ति को बदलने मे कविता भी सक्षम

 

पं0 नरेन्द्र मिश्र, वीर रस के राष्ट्रीय कवि से मुलाकात पर उनसे चर्चा के दौरान यह समझ में आया कि कविता भी परिवर्तन का एक माध्यम है । कविता पढ़ कर भी व्यक्ति बदल सकता है । नये मूल्यों को सिखाने में कविता की बड़ी भूमिका है । Poem changes
कविता भाव प्रधान होती है । उसका प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रभाव बहुत गहरा, सूक्ष्म व व्यापक होता है । यह सीधे दिल को छूती है । अचेतन को प्रभावित करती है । इसमे संप्रेषणिता बहुत जबरदस्त होती है । मात्र तुकबन्दी व गेय होने से कविता बढि़या नहीं हो जाती है । उसमे संप्रेषण की क्षमता से कविता बड़ी होती है । संप्रेषणशिलता ही कविता की जान है। कविता व्यक्ति को बदलने का सशक्त माध्यम है । इसके द्वारा किसी भी व्यक्ति को समझाना सरल होता है । तभी तो कवि सम्मेलन में श्रोताओं को प्रेरित होते देखा जाता है ।
कविता अगर सच्ची कविता हो तो असर छोड़ती ही है । कविता में उसके अपने गुण होने चाहिए । पूर्व में युद्ध क्षैत्र में वीर रस की कविता सुनकर योद्धा युद्ध के लिए प्रेरित होते रहे हैं । राणा प्रताप भी पाथल-पीथल की एक कविता पढ़ कर निराशा से बाहर आ जाते हैं, और मुगलांे को पुनः युद्ध करने के लिए ललकारते हैं । अपना खोया साहस पुनः प्राप्त करते है । कविता ही उन्हें स्वयं के गौरव की याद दिलाती है । इस तरह महाराणा प्रताप का रूपान्तरण होता है ।
आज के संदर्भ में छिछली चुटकले रूपी कविताओं एवं तुकबन्दियों के कारण हम उसकी शक्ति भूल गये हैं । कविता को मात्र मनोरंजन का साधन समझने लगे है । जबकि एक समय में निराला ने पृथ्वीराज कपूर को फिल्म के लिए कविता लिखने के लिए मना कर दिया था । कविता ढंग से समयानुकूल उदाहरण सहित रची हुई होनी चाहिए । सही प्रासंगिक कविता आग जैसे बदलाव लाती है ।

प्यार का प्रतिउत्तर व आन्नद कैसे पाएँ?

प्यार का प्रदर्शन आवश्यक है। यदि आप किसी को प्यार करते हो तो उसको प्रकट करिये, दिखाइयें। व्यस्तता से भरे जीवन में प्यार को छिपाने की आवश्यकता नहीं है। अपनी चाहत सामान्य लोगो से तो कहनी ही पड़ेगी। वे आपके प्यार को अन्यथा समझ न पाऐगे तो प्यासे ही रहेंगे। सबसे कमजोर व दुःखी को प्यार की ज्यादा जरुरत है।  Express your Love
यह सत्य है कि बुद्व पुरुषों या ज्ञानियों के सामने चाहत प्रदर्शित करने की जरुरत नहीं हेै। चूंकि आपके प्यार एवं समर्थन की उन्हें जरुरत नहीं है। लेकिन आम जन न तो आपके प्यार को पहचान सकता है, न प्रेम से परिपूर्ण है। उसे आपसे प्यार चाहिए इसलिए प्रदर्शित करों। तभी अमिताभ बच्चन बागवान में कहता है कि अधिकांश लोग अपनी पत्नी के प्रति प्यार को व्यक्त नही करते है। मैं यह गलती नहीं करता। मैं अपनी पत्नी के प्रति प्यार का बार-बार व्यक्त करता हूँ।
वह अन्यथा आपके प्यार से वंचित रह जायेगा। इसलिए प्यार के प्रदर्शन में बुराई नहीं है। व्यक्त करना समय की मांग है। अतः उसे व्यक्त करने की कला जानो। सम्बन्धों की दीवार इसी से मजबूत होगी।
माना कि कोई तुमसे प्यार करता है तो आप चाहते है न कि वह अभिव्यक्त करे। आप इसका आन्नद उठाओं। ठीक अन्य साथी भी उसी प्रकार को प्यार को प्रकट करने पर ही आन्नदित होते है ।

दिवाली आदि त्यौहार अवचेतन की धुलाई में सहायक

अवचेतन की धुलाई जीवन में मनोरंजन  में सहायक है।

मन को स्वस्थ करने हेतु मन का रंजन करना अत्यावश्यक है। खुशी का सृजन मन में ही होता है। अतः खुश रहने में मनोरजंन सहायक है। हम स्वयं जिस तरह का जीवन जी रहे हैं अब उसमें सुगन्ध, मिठास एंव मस्ती नहीं है, त्वरा नहीं है, उत्साह नहीं है, जीने की ललक नहीं है। ऐसे मेें हम जिस तरह से जी रहे हैं, उस पर विचारने की जरूरत है। उसे बदलने की दरकार है। इसे बदले बिना जीवन में रस, ऊर्जा, रगं नहीं आ सकते है।
अच्छे मनोरजनं का उद्देश्य हमारी विचार शक्ति को धार देना तथा भावनाओं को विकसित करना है। भावनाओं का विरेचन भी इससे होता है। हम जब देवदास की त्रासदी पर रोते हैं तो हमारा दुःख भी बहता है। भावनाओं का उदात्तीकरण देख कर भी उच्च भावनाएँ मजबूत होती है। बुरी भावनाओं का बुरा परिणाम देख कर हमारी बुरी भावनाएं कमजोर होती है। हमारी भावनाओं का रेचन हो जाता है। हमारा अवचेतन का बोझ हल्का हो जाता है।
मनोरजनं समय काटने का उपक्रम नहीं है। यह हमें अपने से परिचय कराता है। हमारी सोच को स्पष्ट करता है व नये उदाहरण से हमारी धारणाओं को पुष्ट करता है। यह हमारे भावजगत को फैलाता है। हमारे भीतर सच्चाई को सहलाता है। तभी तो इसे मन बहलाने का साधन भी कहते हैं। यह मन को नहीं हमारे दुखों को भी धोता है। व हमारे मुल्यों को मजबूत करता है। तभी तो कहते है कि मनोरंजन के वो साधन अच्छे हैं जो उच्च मूल्यों को बढ़ावा देतें हैं।
मनोरंजन के साधनों से मनुष्य के मन का बोझ हल्का होता है तथा मस्तिष्क और नसों का तनाव दूर होता है।इससे नव जीवन का संचार होता है। पाचन क्रिया भी ठीक होती है। देह को रक्त संचार में सहायता मिलती है।विज्ञान ने हमारी मनोवृत्ति को बहुत बदल दिया है। बहुत सारे साधनों से मनोरंजन के साथ- साथ पर्याप्त व्यायाम भी होता है। परन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि अति सर्वत्र बुरी है। इसलिये समयानुसार ही मनोरंजन के साधनों का लाभ उठाना चाहिये। मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञानार्जन भी होना चाहिये। सस्ता मनोरंजन बहुमूल्य समय को नष्ट करता है। मनोरंजन के साधन से हमारी रुचि, दृष्टिकोण एवं स्तर का पता चलता है। विनाश और पतन की ओर ले जाने वाले मनोरंजन से अवश्य बचना चाहिये। मनोरंजन वही बढि़या है जो हमारे ज्ञान एवं चरित्र-बल को विकसित करे। स्वस्थ और सोद्देश्य मनोरंजन किसी भी स्वस्थ व समृद्ध समाज की मूलभूत आवश्यकता भी होता है और पहचान भी।

मनोरजंन का प्रबन्धन स्वंय को राजी रखने हेतु बहुत जरूरी है। किसी भी तरह से स्वंय को खुश रखंे। मनोंरजन उद्योग निरन्तर फैलता जा रहा है। इसकी दिशा व दशा किसी से छिपी नहीं है। कम से कम उसे आज स्वस्थ तो नहीं कहा जा सकता है। बाजारवाद व विज्ञापन इसे तय करते हैं। हम नहीं जानते कि मनोंरजन का स्वरूप कैसा होना चाहिए ? हमें कैसा मनोंरजन चाहिए ? हमें क्या अच्छा लगता है,व क्या हमें तरोताजा करता है? कहां हमें आनन्द आता है?
आज मनोंरजन के साधन बाजारवाद के शिकार हो गये है। उनमें तरह-तरह की विकृतियां आ गई है। तभी तो जीवन से स्वस्थ मनोंरजन गायब होता जा रहा है। फूहड़ता, हास्य, व्यंग्य, टांग खिंचाई ही रह गये है। सांस्कृतिक शून्यता के माहौल में नग्नता,अश्लीलता फूहड़ता ही राहत देते हंै। हमारे यहां सांस्कृतिक-शून्य कुछ ऐसा है कि ऊब के मारे लोग वक्त काटने के लिए मनोरजंन के नाम पर कुछ भी बरदाश्त कर लेते हैं।
ऊब का अर्थ है-अनचाहे काम में डूबे रहना। थकें मादें दर्शक ऊब के शिकार है।आज-कल सीरियल ऊब से ऊब को मारने के प्रयास हैं। यह वैसा ही है जैसा कि निराशा दूर करने के लिए शराब पीना। जबकि मेडिकल साईन्स शराब को निराशा बढ़ाने वाला पेय मानती है।

जैसे कि मैं आधी सदी पार करके भी नहीं जानता कि मुझे क्या अच्छा लगता है। मुझे कहां से ताजगी मिल सकती है ? फिल्म का स्वाद लेना मुझे नहीं आता है। निर्मल आनन्द से मेरा वास्ता कम ही पड़ता है। फिल्म का मजा कैसे लेना ?
मसाला फिल्में सार्थक फिल्म से कैसे भिन्न है। कला फिल्मों में क्या होता है ?

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श्री चन्द्रप्रभ के गीता पर प्रसिद्ध प्रवचनः जागो मेरे पार्थ

’’जागो मेरे पार्थ’’ यह अपने नाम के अनुरूप जगाने वाली है । यह महाभारत के अर्जुन को नहीं हमारे मन में चलने वाली महाभारत को जीतने के सम्बन्ध में है । यह हमें जीने की कला बताती है ।
यह पुस्तक धार्मिक कम, सफलता संबंधी अधिक है । इसमें जीवन में आई उलझनों का सामना कैसे करें पर खुले मन से दिये दिये गये 18 प्रवचन है । यद्यपि इसका आधार भगवत गीता है लेकिन यह हिन्दु दर्शन की बजाय प्रेरक दर्शन से जुडी है ।
कृष्ण कहते हैं- तुम्हारा अन्तर्हदय ही कुरुक्षेत्र हैं और वही धर्मक्षेत्र भी। युद्ध बाहय नहीं, चित की वृत्तियों से हो, स्वयं के तमस से हो। क्रान्ति हो अन्धकार में प्रकाश की। बाहय युद्ध से समस्याओं का समाधान नहीं हो सकेगा। कृष्ण अन्तरमन में चल रहे युद्ध को जीतने की प्रेरणा देते हैं। वे अन्तर-युद्ध के प्रेरक हैं। अर्जुन तो प्रतीक है वीरत्व का, क्षात्रत्व का, फिसलने का।

यह आज के युवाओं को बोध देने में समर्थ है । यह आधुनिक शैली में निबन्ध है । इसमें कहीं संगठित धर्म या सम्प्रदाय का षोषण नहीं किया हुआ है । जैन सन्त होने से इसमें जैन उद्धरण बहुत है ।
लेखक श्री चन्द्रप्रभ एक प्रसिद्ध जैन सन्त है जो जैन सम्प्रदाय की सीमाओं से बंधे नहीं है । ध्यान व तत्व को जीवन में बहुत महत्व देते है । पुस्तक का प्रकाशन श्री जीतयशा फाउन्डेशन, जयपुर द्वारा किया गया है । पुस्तक की कीमत 50/- रू. है व पृष्ठ 256 है ।

आप अद्वितीय एवं अनुपम:आपका मस्तिष्क दुनिया का सबसे बड़ा सुपर कम्प्यूटर

विश्व के सबसे बड़े सुपर कम्प्यूटर का मालिक अमेरिका नहीं है। विश्व के सबसे बड़े सुपर कम्प्यूटर के मालिक आप हैं। यह आपके बालों के ठीक नीचे है। फिर भी हमारी हालत दयनीय क्यों है ? क्योंकि इस सुपर कम्प्यूटर को आॅपरेट करना हमको नहीं आता है, और यह यंत्र हमें चलाने वाला बन गया है। जिसे मनुष्य को चलाना चाहिये वह मनुष्य को चला रहा है। यंत्र बेचारा क्या करे, आॅपरेटर के अभाव में स्वयं चल पड़ा है। यह व्यक्तिगत कम्प्यूटर सार्वजनिक हो गया है। यह चेतन कम्प्यूटर यांत्रिक रूप से चल रहा है, क्योंकि इसे समाज, विचारधारा, पड़ौसी, अतीत, इज्जत, महत्त्वाकांक्षा, भय आदि शक्तियां चला रहीं हैं। जब जिसका कोई मालिक नहीं होता तो सारी दुनिया उसकी मालिक हो जाती है। आप सोये हुए हैं और अन्य शक्तियां आपके कम्प्यूटर को चला रही हैं जिसका नतीजा सामने है। हमारा समस्त जीवन नकारात्मक हो गया है। हम स्वतः ही अपने को नहीं पर को देखते हैं। जगत की या स्वयं की हर कमी, हर चीज के लिये दूसरों को जिम्मेदार ठहराते हैं। सदैव खामियों, कमजोरियों को ही देखते हैं। हम इच्छापूर्वक विचार करते नहीं है। विचार हमको जहां-तहां ले जाते हैं। हम कईं बार नकारात्मक आवेग में फंस जाते हैं।
आज का विकसित विज्ञान भी मस्तिष्क के बराबर की क्षमता का कम्प्यूटर बनाये तो उसे 10 घन किलोमीटर जगह चाहिये। 10 किलोमीटर लम्बी, 10 किलोमीटर चैड़ी एवं 10 किलोमीटर ऊंची जगह की जरुरत पड़ती है।
आपके मस्तिष्क की प्रत्येक कोशिका एक समय में 3 करोड़ घटनाएं प्रोसेस कर सकती हैं जो कि दनिया के सबसे बड़े सुपर कमप्यूटर की गति से बहुत अधिक है। एक मानव मस्तिष्क में 28 अरब कोशिकाएं होती हैं।

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