Posts Tagged ‘अवचेतन मन’

स्वसंवाद द्वारा अचेतन मन को स्वास्थ्य के पक्ष में करें

देह अपना उपचार स्वतः करती है


अपने हाथ की तरफ देखें यह ठोस दिखता है, दरअसल यह ठोस नहीं है। अगर आप इसे किसी अच्छे माइक्रोस्कोप के नीचे रखेंगे, तो आपको ऊर्जा की बहुत सी तरंगें दिखेंगी। हमारी देह ठोस नहीं है, यह मस्तिष्क की तरंगों के अधीन है।01
सभी बीमारियाँ पहले मस्तिष्क में जन्म लेती हैं। जब तक मानसिक पेटर्न उस अनुरूप न बन जाय, तब तक वह शरीर पर प्रकट नहीं होती है। अचेतन रूप से रोग उत्पन्न करने के स्थान पर हम सचेतन रूप से स्वास्थ्य कैसे उत्पन्न करें? अपने शरीर का प्रिन्टआउट बदलने के लिये हमें अपने मस्तिष्क के साफ्टवेअर को नये सिरे से लिखना सीखना पड़ेगा। हम ही अपने रोगों को चुनते हंै, उन्हे नियन्त्रित करते हैं एवं उन्हें बढ़ने की सुविधाएॅ देते है। हम रोगों का चेतन मन द्वारा चयन नहीं करते हंै, यह चयन मन के अचेतन स्तर पर छुपे हुऐ तलो पर चुपचाप होता है। यदि कोई ऐसी क्षमता हमारे पास है तो उसे नियन्त्रित करने की क्षमता भी होनी चाहिये। यह पुस्तिका इस बारे में बताती है।
असाध्य मानसिक या शारीरिक रोग की जड़ें सदा ही गहरे अवचेतन मन में होती है। छिपी हुई जड़ांे को उखाडकर रोग को ठीक किया जा सकता है। मनुष्य की देह (सिक्रेशन) सबसे अधिक दवाएँ बनाने का कारखाना है । हमारी देह के उपचार में काम आने वाली सभी दवाओं के केमिकल्स हमारी देह में बनाए जाते है। इन सब दवाओं का निर्माण हमारी सोच एवं भावनाओं पर निर्भर है। नकारात्मक सोच व नकारात्मक भावनाओं से हमारे सिक्रेशन प्रभावित होते हंै। दुनिया के सबसे धीमे मारने वाले भंयकर जहर भी इसी देह में बनते है।
सतुंलित,सहज व नैसर्गिक देह स्वतः अपना उपचार करती है। देह में एक नैसर्गिक क्षमता है। अपना उपचार करती है। यह स्वतः अपने को संतुलित करती है। जब देह का ताप बढ़ जाता है तो देह स्वतः ही उन रसायनों का निर्माण करती है जो ताप घटाने में सहायक होते हैं। यह कार्य स्वतः चलता रहता है जब तक कि इस नैर्सगिक प्रकिया को बिगाड़ न दिया जाए । बिगड़ने पर देह ताप समान नहीं रख पाती है तभी हमें ताप बढ़ने का ज्ञान होता है।
हमारी स्थूल देह के पीछे क्वान्तम भौतिकीय देह है जो कि सूक्ष्म है, अदृश्य है। स्थूल देह का जन्म इसी सूक्ष्म देह की बदौलत है। उसमें परिवर्तन इसी के आधार पर होते हंै।
वातावरण वास्तव में हमारी देह का विस्तार है।जैसे दो तारो व ग्रहो के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध न होने के उपरान्त वं आपस में भी सम्बंन्धित है। वैसे ही हमारी देह के अणुओं के बीच सम्बन्ध न होने के बावजूद आपस में सम्बन्धित है।
हमारी देह का रूपाकार किसी शिल्प कृति से कम नहीं है।भीतर बैठी प्रज्ञा का यह आवरण मूर्ति के रूप में दिखता है। इसके निश्चित आकार-प्रकार हंै। इसके साथ ही हमारी देह के परमाणु बहती हुई नदी की तरह है। हमारी देह में कुछ भी स्थाई नहीं है। हमारी कोशिकाओं के प्रत्येक कण बदलते जाते हैं। हमारी रक्त कणिकाएँ नब्बे दिन में बदल जाती हैं। हड्डियों का ठोस ढांचा जिसके चारों ओर शरीर लिपटा रहता है, वह स्वयं भी एक सौ बीस दिन में पूरी तरह बदल जाता है।

क्या किमो से कैन्सर ठीक होता है ? लोथर हरनाइसे की विश्व प्रसिद्ध कृति ‘‘किमोथेरेपी हिल्स कैन्सर एण्ड दी वर्ड इज फ्लेट’’

एलोपैथी के अतिरिक्त भी कैंसर का इलाज कई तरीकों से होता है । इसका उद्देश्य कैन्सर रोगियों को वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति से अवगत कराना है । इसने एलोपैथी के साथ-साथ वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों का अध्ययन कर बताया है कि बुडविझ प्रोटोकोल इनमे से श्रेष्ठतम है । यह कैंसर रोगियों एवं उनके सम्बन्धियों के लिए एक विश्व कोष है जिसको पढ़ कर उपचार कराने का सही निर्णय ले सकते हैं । लोथर हरनाइसे ने दुनिया भर में कई वर्षों तक शोध कर इसे लिखा है ।Chemotherapy heals cancer
इसके अनुसार रोगी को 3 म् का पालन करना चाहिए ।
पहला म् (इट हेल्दीवेल) स्वस्थ आहार से है । इसमे रोगी को ठण्डी विधि से तैयार अलसी का तेल व पनीर का मिक्सर विभिन्न सुखे मेवे व फलों के साथ दिया जाता है ।
बुडविझ के आहार के साथ-साथ दूसरा म् (एलीमीनेट टाॅक्सीन्स) शरीर के विषाक्त पदार्थो को बाहर निकालना है । इसमे एनिमा लगा कर शरीर को निर्विष बनाया जाता है । इसमे पहले शुद्ध पानी का एनिमा लगाया जाता है । इसके बाद काफी एनिमा व एल्डी तेल एनिमा प्रमुख है ।
तृतीय म् (ईनर्जी) ऊर्जा के जागरण से है । जीवन का लक्ष्य तय कर जीना मुख्य है । दिशा तय कर ही दशा बदली जा सकती है । इसमे आत्मदर्शन द्वारा सकारात्मक होना व स्वस्थ होने के भाव में जीना प्रमुख है ।

लेखक एक जाने माने कैंसर शौध विशेषज्ञ है । जो दुनिया भर में घुम-घुम कर सभी देशों में उपलब्ध कैंसर उपचार सम्बन्धी विधियों का विश्लेषण करते रहे हैं ।

यह पुस्तक मुलतः जर्मन भाषा में लिखी गयी है । इसका अंग्रेजी संस्करण उपलब्ध हैै

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लुईस हे की अवधारनाये जिनसे उनका कैंसर ठीक हुआ

अवचेतन की धुलाई होली पर:शुभकामनाएँ

 अवचेतन  की  धुलाई होली   परहोली तो बस एक बहाना है रंगों का, ये त्यौहार तो है आपस में दोस्ती और प्यार बढ़ने का, चल सारे गिले सिक्वे दूर कर के, एक दुसरे को खूब रंग लगते हैं मिलकर होली मानते हैं!
होली की आपको हार्दिक शुभकामनायें!

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चैतन्य द्वारा , विचारों द्वारा रोगों की चिकित्सा कैसे करें ?

प्रत्येक मरीज अपने अंदर खुद के डाॅक्टर को लेकर चलता है। वे हमारे (डाॅक्टरों के) सामने इस सच्चाई की जानकारी के बिना ही आ जाते हैं। हम अपना सर्वोतम तभी कर सकते हेैं जब हम मरीज के अंदर रहने वाले डाॅक्टर को ही काम करने का अवसर प्रदान करें।
-डा. अल्बर्ट श्वीट्जर

चेतना में विचार उत्पन्न हुआ और हमारा निर्माण हुआ। हम विचारों द्वारा बने हैं। अर्थात् चेतना ही जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है। जैसा कि उपनिषद् में लिखा है-प्रत्येक भावना शरीर में संवेदना उत्पन्न करती है। प्रत्यके भावना शरीर में अलग-अलग तरह से संवेदना उत्पन्न करती है। भावना मंे डूब जाने पर हम विचार का महसूस करने लगते हैं और संवेदन को नहीं देख पाते हैं। जैसे ही मन विचार में पड़ा और हम श्वास को देख नहीं पाते है।यही हमारी बेहोशी है। रोग का भाव एवं विचार मन मंे आने पर हम रोगी हो जाते हैं।01
हम जैसे ही संवेदन को देखने में समर्थ हो जाते हैं, तो संवेदन बदलने लग जाते हंै, मिट जाते हैं। इस तरह हम सकारात्मक भावना द्वारा स्वयं को सकारात्मक बना सकते है। स्वयं के प्रति सजग होकर हम अपना नियन्त्रण अपने हाथ मंे लेते हैं। इस तरह हम अपने बदलते मन को देखने मंे समर्थ हो जाते है । अर्थात् हम स्वयं की श्रेष्ठ भावनाओं और विचारों द्वारा चिकित्सा भी कर सकते हंै। स्वसम्मोहन के द्वारा भी स्वयं की चिकित्सा की जा सकती है। अपने दिमाग की प्रोग्रामिंग बदलकर हम अपने को स्वस्थ बना सकते हंै। चिकित्सा के भाव एवं विचार पैदा कर हम अपनी चिकित्सा कर सकते हंै।

जैसे पौधे के बीज मंे पूरी संरचना छिपी रहती हैं वैसे ही हमारी कोशिका के डी. एन. ए. में हमारे व्यक्तित्व/चेतना का पूरा प्रोग्राम अंकित होता है। बीज को प्रभावित कर जैसे पौधे में परिवर्तन लाते है, वैसे ही डी. एन. ए. को बदल कर पूरे जीवन में परिवर्तन लाया जा सकता है।

हमारे व दुनिया के बीच सम्बन्ध हमारी चेतना/मन से ही, या उसके कारण से ही होता है।

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वारेन बफेट के अनुसार खुश रहने की चाबीः पेशे से प्यार

व्यवसाय आपके लिये है, आप व्यवसाय के लिये नहीं है। धन्धा पेट के लिये है, आप धन्धे के लिये नहीं है। जीवन जीने के लिये मिला है, व्यवसाय में डूबने के लिये नहीं। यह मंत्र जिसकी समझ में आ जाता है वह व्यावसायिक जीवन का दास न होकर उसका आनन्द उठाता है।Waren  Buffet
अपने कार्य, व्यवसाय, नौकरी से प्रेम कर उसका आनन्द उठायें। अपने काम की नकारात्मक बातें याद कर घृणा न करें। कई लोग अपने व्यवसाय को अपने अनुरूप न पाकर उससे शिकायत करते रहते हैं। यह असंतोष उनके जीवन को खोखला करता है व मन को अशांत करता है। इससे वे सदैव नाराज रहते हैं। जबकि वस्तुतः कोई भी व्यवसाय बडा या छोटा, अच्छा या बुरा नहीं होता है। यह उसके प्रति हमारी सोच है। व्यवसाय हमारे पेट के लिए होता है हम व्यवसाय के लिए नहीं बने हैं।

अपने व्यवसाय को सकारात्मक व अच्छा समझ कर हम भी अच्छे बन सकते हैं। हाँ, कुछ व्यवसायों से रिटर्न कम या ज्यादा हो सकता है। व्यवसायों की अपनी अच्छाईयाँ, बुराईया होती हंै। यदि हम अपने व्यवसाय को स्वीकार कर ले तो कोई कठिनाई नहीं है। अपने काम से प्यार करें। हर व्यवसाय में नामचीन लोग हुऐ है। हर व्यवसाय से लोग आगे बढ़ें हैं। दम पेशे में कम, व्यक्ति में अधिक होता है।

कृष्ण के निष्काम कर्म की भावना व्यवसाय के क्षेत्र पर भी लागू होती है। हमें अपने व्यवसाय को कत्र्तव्य समझकर करना चाहिये। निष्काम का अर्थ लक्ष्य बिना कर्म करना नहीं है। निष्काम का अर्थ फल की आसक्ति नहीं रखते हुए कर्म करने से है।
व्यवसाय चुनने के पहले सारा दिमाग लगा दो। अपने मन-माफिक है या नहीं समझ ले। एक बार व्यवसाय विशेष को चुन लिया फिर उसका बुरा पक्ष नहीं देखें। उसका सामना करने के उपाय खोजंे। उसमें भी बहुत सारी चुनौतियां व अच्छाईयां हैं।
हर व्यवसाय में बहुत अवसर हो सकते है। व्यवसाय को अपने ढंग से करंे। उसमें नई राहे खोजंे, अपने व्यवसाय के सफलतम लोगों का अध्ययन कर अपना विश्लेषण करें व अपने कार्य क्षेत्र के दिग्गजों से सम्पर्क में रहें।
व्यावसायिक जीवन में प्रसन्न रहने हेतु उसमें सफल होना जरूरी है। इसलियेे व्यावसायिक दक्षता हासिल करें। अपने व्यवसाय में निपुण होना, उसकी बारीकी को जानना, उसके हेतू उचित सम्पर्क व साथ रहना आना चाहिये। प्रोफेशन में लापरवाही नहीं चलती। प्रतिद्वन्द्विता का जमाना है। सावधान व सजग रहें ताकि धोखा न खा जाएं।
मनुष्य जीवन का अधिकतम् समय अपने व्यवसाय के प्रबन्धन में चला जाता है। व्यावसायिक जीवन संतुलित व प्रसन्नता देने वाला होना चाहिए। अपने व्यवसाय को भार, मजबूरी या खराब समझेेंगे। तो कभी भी आप उससे खुशी नहीं पा सकते ।
वारेन बफेट विश्व के दूसरे नम्बर के सबसे धनाढ्य व्यक्ति शेयर बाजार में निवेश करते हैं लेकिन उलझते नहीं है। निश्चित समय पर पूरी तन्मयता से काम करते है। फिर अपनी मौेज करते है। वे अपने साथ मोबाइल नहीं रखते व घर/ टेबल पर कम्प्यूटर के आगे नहीं बैठे रहते हैं। इतने जोखिम भरे प्रोफेशन में भी मस्ती से रहते हैं। इसका कारण है कि वे अपने धन्धे से दूरी रखने में कुशल हंै। घर पर, बिस्तर पर अपने पेशे को नहीं लाते हैं।

प्यार का प्रतिउत्तर व आन्नद कैसे पाएँ?

प्यार का प्रदर्शन आवश्यक है। यदि आप किसी को प्यार करते हो तो उसको प्रकट करिये, दिखाइयें। व्यस्तता से भरे जीवन में प्यार को छिपाने की आवश्यकता नहीं है। अपनी चाहत सामान्य लोगो से तो कहनी ही पड़ेगी। वे आपके प्यार को अन्यथा समझ न पाऐगे तो प्यासे ही रहेंगे। सबसे कमजोर व दुःखी को प्यार की ज्यादा जरुरत है।  Express your Love
यह सत्य है कि बुद्व पुरुषों या ज्ञानियों के सामने चाहत प्रदर्शित करने की जरुरत नहीं हेै। चूंकि आपके प्यार एवं समर्थन की उन्हें जरुरत नहीं है। लेकिन आम जन न तो आपके प्यार को पहचान सकता है, न प्रेम से परिपूर्ण है। उसे आपसे प्यार चाहिए इसलिए प्रदर्शित करों। तभी अमिताभ बच्चन बागवान में कहता है कि अधिकांश लोग अपनी पत्नी के प्रति प्यार को व्यक्त नही करते है। मैं यह गलती नहीं करता। मैं अपनी पत्नी के प्रति प्यार का बार-बार व्यक्त करता हूँ।
वह अन्यथा आपके प्यार से वंचित रह जायेगा। इसलिए प्यार के प्रदर्शन में बुराई नहीं है। व्यक्त करना समय की मांग है। अतः उसे व्यक्त करने की कला जानो। सम्बन्धों की दीवार इसी से मजबूत होगी।
माना कि कोई तुमसे प्यार करता है तो आप चाहते है न कि वह अभिव्यक्त करे। आप इसका आन्नद उठाओं। ठीक अन्य साथी भी उसी प्रकार को प्यार को प्रकट करने पर ही आन्नदित होते है ।

हे माँ! तुझे सलाम, मेरी माँ को प्रणाम

मेरी माँ तुमने मेरे लिए बहुत कुछ किया, जिसे मै आज तक समझ न पाया। पुरुष वैसे भी स्त्री को समझने में असमर्थ हैं। मैं तुम्हारी सातवीं संतान था, तुम्हें मेरे जन्म पर भी बहुत पीड़ा हुई, उस पर भी मेरे जन्म के तीन दिन बाद तुम अवसाद का शिकार हो गई। एक माह तक डंूगरपुर अस्पताल में भर्ती रही, बहुत दुःख सहा। तब मै अपनी नानी के पास रहा। तुम्हारी हालत इतनी खराब थी कि अपने बच्चे को संभाल न सकती थी। Mother
मेरी मां सेलिब्रिटी नहीं थी, इसका मतलब यह नहीं कि वह एक महान मां नही थी । ग्लैमरस व प्रसिद्ध होने से ही कोई स्त्री महान मां नहीं हो जाती। अपनी तरह से सामान्य रहते हुए वह मेरे लिए असामान्य थी । वास्तव में सामान्यता बड़ी दुलर्भ हैं। मेरी मां में एक बलिदानी मां के सारे गुण थे । अपने बेटे के लिए दिन भर सचेत रहना, उसके हितों का संवर्धन करना व उसकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखना मुख्य था। वह मेरे हितों के लिए अपने पति से कमजोर होते हुए भी लड़ती थी । उसे अपने बच्चे कि लिए पति से पीटना तक मंजूर था ।
दुनिया में तुम्हारा नाम न था, इसका मतलब यह नहीं कि तुम किसी प्रसिद्ध माँ की तुलना में कम थी। तुम्हारा प्यार अपने बच्चों के प्रति किसी से कम न था। वास्तव मे तुम महान माँ थी। मेरे पिता कठोर अनुशासन प्रिय थे। वे बच्चों को अक्सर डाँटते रहते थे। मैं अपने पिता को गाली देने की मशीन समझता था। पिताजी जब भी मुझे क्रोध में डाँटते या पिटने को आतुर होते तब तुम ढाल बनकर आती थी । इस बीच पिता के हाथों कई बार स्वयं पीट जाती थी । तुम्हारी यह सुरक्षा कवच सदैव मुझे याद आता है ।
पिताजी रात्रि में भोजन खिलाने का विरोध करते थे । जैन धर्म के अनुसार रात्रि का भोजन निषेध है । तुम पिताजी की अनुपस्थिति में पीछे से हमे चुपचाप खाना खिलाती थी ।
आई, मां को हम इसी नाम से पुकारते थे । तुम्हारे बलिदानों से यह जीवन संवरता है । मेरे शरीर का कतरा कतरा तुम्हारे ऋण से ग्रस्त है । यह शरीर तुम्हारा अंश है । इसे आज अनुभव करता हूं।
मै आपके जीते जी आपका महत्व समझ न पाया । मेरी 37 वर्ष की उम्र मेें आप धरती से अचानक विदा हो गई । तब मुझे लगा कि मेेरे उपर आपका जो रक्षा कवच था, वह अब हट गया। मै शर्मिन्दा हुॅं कि आप के जीते जी कभी आपको समझ न पाया । पत्नी बार-बार कहती थी कि तुमने अपनी मां की परवाह न की । महत्वकांक्षा के घोड़ों पर सवार होने से मैं आपको समय न दे पाया । आज मातृदिवस को इसका बोध हो रहा है ।
मेरी मां एक औसत निम्न मध्यवर्गीय मां की तरह सामान्य औरत थी जिसने 12 बच्चों को जन्म दिया । वह सदैव गरीबी व उपेक्षा की शिकार रही । उसकी अपनी समस्याएं थी । वह अपनी सोच से हम बच्चों का सदैव बढिया ही सोचती थी । लेकिन मै उसे कभी समझ न पाया । मै बचपन से उद्ण्ड व क्रोधी लड़का था । विवशता के कारण बचपन में रोना बहुत रोता रहता था ।
वह मेरी सुरक्षा को लेकर सदैव चिन्तित रहती थी । मां का ध्यान सदैव बेटे की हरकतों पर रहता है कि अभी वह कहां है, सुरक्षित है या नहीं ?
बच्चा मां को नहीं समझ पाता है । लेकिन मैं तो बड़ा होकर भी 50 के बाद उसके योगदान को अनुभव करता हुं । मेरी मां ने मेरे लिए वो सब किया जो एक मां कर सकती है ।

दिवाली आदि त्यौहार अवचेतन की धुलाई में सहायक

अवचेतन की धुलाई जीवन में मनोरंजन  में सहायक है।

मन को स्वस्थ करने हेतु मन का रंजन करना अत्यावश्यक है। खुशी का सृजन मन में ही होता है। अतः खुश रहने में मनोरजंन सहायक है। हम स्वयं जिस तरह का जीवन जी रहे हैं अब उसमें सुगन्ध, मिठास एंव मस्ती नहीं है, त्वरा नहीं है, उत्साह नहीं है, जीने की ललक नहीं है। ऐसे मेें हम जिस तरह से जी रहे हैं, उस पर विचारने की जरूरत है। उसे बदलने की दरकार है। इसे बदले बिना जीवन में रस, ऊर्जा, रगं नहीं आ सकते है।
अच्छे मनोरजनं का उद्देश्य हमारी विचार शक्ति को धार देना तथा भावनाओं को विकसित करना है। भावनाओं का विरेचन भी इससे होता है। हम जब देवदास की त्रासदी पर रोते हैं तो हमारा दुःख भी बहता है। भावनाओं का उदात्तीकरण देख कर भी उच्च भावनाएँ मजबूत होती है। बुरी भावनाओं का बुरा परिणाम देख कर हमारी बुरी भावनाएं कमजोर होती है। हमारी भावनाओं का रेचन हो जाता है। हमारा अवचेतन का बोझ हल्का हो जाता है।
मनोरजनं समय काटने का उपक्रम नहीं है। यह हमें अपने से परिचय कराता है। हमारी सोच को स्पष्ट करता है व नये उदाहरण से हमारी धारणाओं को पुष्ट करता है। यह हमारे भावजगत को फैलाता है। हमारे भीतर सच्चाई को सहलाता है। तभी तो इसे मन बहलाने का साधन भी कहते हैं। यह मन को नहीं हमारे दुखों को भी धोता है। व हमारे मुल्यों को मजबूत करता है। तभी तो कहते है कि मनोरंजन के वो साधन अच्छे हैं जो उच्च मूल्यों को बढ़ावा देतें हैं।
मनोरंजन के साधनों से मनुष्य के मन का बोझ हल्का होता है तथा मस्तिष्क और नसों का तनाव दूर होता है।इससे नव जीवन का संचार होता है। पाचन क्रिया भी ठीक होती है। देह को रक्त संचार में सहायता मिलती है।विज्ञान ने हमारी मनोवृत्ति को बहुत बदल दिया है। बहुत सारे साधनों से मनोरंजन के साथ- साथ पर्याप्त व्यायाम भी होता है। परन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि अति सर्वत्र बुरी है। इसलिये समयानुसार ही मनोरंजन के साधनों का लाभ उठाना चाहिये। मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञानार्जन भी होना चाहिये। सस्ता मनोरंजन बहुमूल्य समय को नष्ट करता है। मनोरंजन के साधन से हमारी रुचि, दृष्टिकोण एवं स्तर का पता चलता है। विनाश और पतन की ओर ले जाने वाले मनोरंजन से अवश्य बचना चाहिये। मनोरंजन वही बढि़या है जो हमारे ज्ञान एवं चरित्र-बल को विकसित करे। स्वस्थ और सोद्देश्य मनोरंजन किसी भी स्वस्थ व समृद्ध समाज की मूलभूत आवश्यकता भी होता है और पहचान भी।

मनोरजंन का प्रबन्धन स्वंय को राजी रखने हेतु बहुत जरूरी है। किसी भी तरह से स्वंय को खुश रखंे। मनोंरजन उद्योग निरन्तर फैलता जा रहा है। इसकी दिशा व दशा किसी से छिपी नहीं है। कम से कम उसे आज स्वस्थ तो नहीं कहा जा सकता है। बाजारवाद व विज्ञापन इसे तय करते हैं। हम नहीं जानते कि मनोंरजन का स्वरूप कैसा होना चाहिए ? हमें कैसा मनोंरजन चाहिए ? हमें क्या अच्छा लगता है,व क्या हमें तरोताजा करता है? कहां हमें आनन्द आता है?
आज मनोंरजन के साधन बाजारवाद के शिकार हो गये है। उनमें तरह-तरह की विकृतियां आ गई है। तभी तो जीवन से स्वस्थ मनोंरजन गायब होता जा रहा है। फूहड़ता, हास्य, व्यंग्य, टांग खिंचाई ही रह गये है। सांस्कृतिक शून्यता के माहौल में नग्नता,अश्लीलता फूहड़ता ही राहत देते हंै। हमारे यहां सांस्कृतिक-शून्य कुछ ऐसा है कि ऊब के मारे लोग वक्त काटने के लिए मनोरजंन के नाम पर कुछ भी बरदाश्त कर लेते हैं।
ऊब का अर्थ है-अनचाहे काम में डूबे रहना। थकें मादें दर्शक ऊब के शिकार है।आज-कल सीरियल ऊब से ऊब को मारने के प्रयास हैं। यह वैसा ही है जैसा कि निराशा दूर करने के लिए शराब पीना। जबकि मेडिकल साईन्स शराब को निराशा बढ़ाने वाला पेय मानती है।

जैसे कि मैं आधी सदी पार करके भी नहीं जानता कि मुझे क्या अच्छा लगता है। मुझे कहां से ताजगी मिल सकती है ? फिल्म का स्वाद लेना मुझे नहीं आता है। निर्मल आनन्द से मेरा वास्ता कम ही पड़ता है। फिल्म का मजा कैसे लेना ?
मसाला फिल्में सार्थक फिल्म से कैसे भिन्न है। कला फिल्मों में क्या होता है ?

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हम सब में कुछ खास बात है: सुखी होने याद रखें

हम सब में कुछ खास बात है। हम सबमें किसी न किसी रूप मंे कोई न कोई विशेषता है।दूसरों की तुलना मंे अच्छाई हं।हम अद्वितीय हंै, अनुपम हंै, खास है।
यह दुर्भाग्य की बात है कि हम अपनी खास बात को स्पष्ट रूप से नही जानते हंै। हम अपने को वक्त नही देते है। स्वयं की अनदेखी करते हंै। स्वयं को भूल जाते है। अपने को महत्व नही देते, अपनी विशेषता नही खोजते है। परमात्मा ने, प्र्रकृति ने, अस्तित्व ने आपको, हमको, सबको सकारण बनाया है। हम उसी की योजना के अनुसार हेैं। वह व्यर्थ कुछ नहीं करता हैं। फिर हम बेकार के कैसे हो सकते हैं? हम उसी विराट के अंश है, चाहे कितने ही छोटे हों।
प्रयोग-आॅंखे बंद ( दो मिनट ) सब लोग क्रमशः पाँच चेहरे याद करें। कितनो को माता, पिता, पत्नी, बच्चे याद आए? किसी को खुद का चेहरा दिखा?
मनुष्य एक बरबाद परमात्मा है। उसे अपने भीतर असीम सुख प्राप्त है व उसको प्रकट कर परमात्मा बन सकता है। मनुष्य का जन्म आनन्द को पाने के लिए हुआ है। व्यक्तिगत जीवन, व्यावसायिक जीवन, पारिवारिक जीवन व सामुदायिक जीवन को संभालना, संवारना व रचनात्मक बनाना है, समरस बनाना है। इसमें सामन्जस्य स्थापित करना है। मेरा उद्देश्य आपके जीवन को ऊंचा उठाना है। इसमें आनन्द पैदा करना है। मनुष्य जीवन को समाज के उपयोगी बनाना है। संवेदनशील व नेतृत्व गुणों से युक्त बनाना है।
हम रोते हुए पैदा होते है लेकिन यहाँ से जाते वक्त हँस सकते है।

हमारा जीवन कहाँ व कैसे बीतता है:गधे,कुत्ते, उल्लू की तरह तो नहीं?

हमें अव्यवस्थित, असंतुष्ट किसने बना रखा है ? हमारा अपने जीवन में अपना क्या है? हम पूरे जीवन में प्यार मांगते ही रहते हैं; न प्यार किसी को देते हैं न ही प्यार पाते हैं। हमारी चाहतें, हमारे सपनें, हमारे मूल्य, हमारे संघर्ष-ये सब स्व प्रंबधन के बिना अर्थहीन हो रहे हैं और समस्या पैदा कर रहे है। स्व-प्रबन्धन इन्हें वरदान बना देता है। इमर्सन ने लिखा है कि प्रत्येक मनुष्य एक बरबाद परमात्मा है। प्रत्येक मनुष्य वास्तव में ईश्वर है, परन्तु मूर्खों जैसा अभिनय कर रहा है। तभी तो वाल्टर टैम्पिल ने कहा है कि केवल मनुष्य ही रोता हुआ पैदा होता है और निराशा में मरता है।

मैंने एक कहानी सुनी है। प्रारम्भ में प्राणियों को ईश्वर ने चालीस-चालीस वर्ष की उम्र दी थी। लोभवश वह और उम्र चाहता था। मनुष्य को अपनी उम्र कम नजर आ रही थी।गधे को भी उम्र चालीस वर्ष मिली थी। वह दूसरों का बोझ ढोने को व्यर्थ मानते हुए उम्र घटाने का निवेदन लेकर हाजिर था। ईश्वर ने गधे की बीस वर्ष की उम्र मानव को देना स्वीकार कर लिया। तब से हम चालीस वर्ष के बाद गधे की तरह जिम्मेदारियों का वहन करते हंै। बच्चों की शादी, घर का निर्माण, धन जोड़ने में डू़बे रहते हैं।
इधर कुत्ते को भी अपनी उम्र चालीस वर्ष व्यर्थ ही नजर आती थी। सारे समय भौंकना ही भौंकना। अतः वह भी प्रभु के दरबार में उम्र आधी कराने जा पहुँचा। आदमी फिर उम्र लेने को तैयार था जो बीस वर्ष कुत्ते की उम्र ले बैठा। तभी तो साठ वर्ष के बाद बूढ़े नसीहत देते रहते हैं और अपने परिजन उन्हें भौंकने वाला कुत्ता मानते रहते हैं।
इधर उल्लू भी अपनी उम्र आधी कराने पहुँच गया। ईश्वर ने आदमी से फिर पूछा। वह फिर उसकी उम्र लेने को तैयार था। इस तरह अस्सी वर्ष के बाद की उम्र उल्लू की उम्र ले बैठा। तभी तो अस्सी वर्ष के बाद बुढ़ापे में न सुनाई देता है न अधिक बोल सकता है न नीदं आती है न विश्राम कर पाता है। बस खाट पर

बैठे-बैैठे उल्लू की तरह देखता रहता है।

( मेरी पुस्तक जियो तो ऐसे  जियो  से )

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