Posts Tagged ‘अलसी’
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मई
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Stress Management. Tagged: अलसी, कैंसर, खुद- इलाज, जीवन प्रबन्धन, भोजन, समय प्रबन्धन, सेहत. 1 टिप्पणी
हमे अपने पूर्वजों द्वारा खाए जाने वाले तेल हमारे जीन्स में बसे होते हैं । अतः अपने पूर्वजों द्वारा खाए जाने वाले तेल ही खाना उचित है । जैसे पंजाबी सरसों का व दक्षिण भारतीय नारियल का तेल खाता रहा है, इन्हे खाए तो ठीक है । एक व्यक्ति को प्रतिदिन अधिकतम तीन चम्मच घी/तेल आदि वसा का प्रयोग करना चाहिये । वैसे नारियल के तेल में मिडियम चैन फेटीएसीड्स के होने से खाने में अच्छा माना जाता है ।
भोजन पकाने में अधिक स्माकिंग पाॅईन्ट वाला तेल खाना चाहिए ताकि छोंकने पर ट्रान्सफैट कम से कम बने । अधिक तलने पर प्रत्येक तेल ट्रान्सफैट बन जाता है, अतः उससे बचे ।
सभी प्राकृतिक/सहज तिलहन से बने तेल खाना स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक है । सरसों, तिल, मूंगफली, नारियल के कच्ची घाणी से निकले तेल श्रेष्ठ है । सोया, सफोला, राईसब्रान आदि से निकले तेल को खाने योग्य बनाने हेतू रिफाइण्ड करना पड़ता है । केन्सर फैलाने वाले फास्फोरिक एसिड, हेक्जीन एवं कास्टिक सोड़ा रिफाइण्ड में प्रयुक्त होते हैं । इससे रिफाइण्ड तेल हानिकारक है । कृत्रिम तरिके से निकाले गये तेल सभी अखाद्य है, जिन्हें कृत्रिम तरिके से तैयार किया जाकर खाद्य बनाया गया है, इस प्रकार रिफाइण्ड कर अखाद्य तेल को खाद्य बनाया जाता है । रिफाइण्ड की बजाय फिल्टर्ड तेल खाना स्वास्थ्यवर्द्धक है । कच्ची घाणी व एक्सपेलर से निकले तेल खाना चाहिए ।
तेल की पैकिंग पर लिखे किसी भी वाक्य से अप्रभावित रहें । जैसा कि कुछ तेल की पैंकिग पर लिखा होता है कि इसमें काॅलस्ट्रोल नहीं है । किसी भी वनस्पति तेल में काॅलस्ट्रोल नहीं होता है । काॅलस्ट्रोल हमारे शरीर में जाकर बनता है । जैतुन का तेल अच्छा होता हैं, लेकिन इसका प्रयोग पकाने में ठीक नहीं है ।
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अप्रै
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Personality, Self-Healing, Stress Management, Uncategorized. Tagged: अलसी, ऊर्जा, एकाग्रता, क्षमता, खुद- इलाज, तनावमुक्ति, धन्यवाद, ब्लॉग लेखन, शिखर पर मिलेगे, समय प्रबन्धन, सेहत. 2s टिप्पणियाँ
यह एक आयुर्वेदिक पेय है जो निम्न मसालों से तैयार करें । इसके सेवन से सभी प्रकार की थकान तत्काल मिट जाती है । एक पाव हर्बल पेय बनाने हेतु निम्न मात्रा में सामग्री लें ।
1. सौंठ – 60 ग्राम
2. काली मिर्च – 25 ग्राम
3. सौंफ – 25 ग्राम
4. धनिया – 25 ग्राम
5. तेज पता – 25 ग्राम
6. ईलाइची छोटी – 12 ग्राम
7. ईलाइची बड़ी – 12 ग्राम
8. दाल चीनी – 12 ग्राम
9. लौंग – 12 ग्राम
10. अजवाईन – 12 ग्राम
11. जायफल – 3 ग्राम
12. पीपल – 3ग्राम
इन उपरोक्त सामग्री को अलग-अलग कुट पीस कर पाउडर बनाकर फिर मिक्स करे । एक कप पानी में उपरोक्त एक चम्मच मिक्स पाउडर को उबाल कर स्वादानुसार शक्कर मिलावें । इस प्रकार ऊर्जा पेय पिने के लिए तैयार है । यह सम्मेदशिखर की 20 किमी0 पैदल यात्रा करने पर पिलाया जाता है । यात्री थकान उतार कर पुनः 10 किमी0 चलते हैं । यह बढि़या हर्बल चाय है, पीकर लाभ देखें ।
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अप्रै
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Meditation, Personality, Self-Healing, Spirituality, Uncategorized. Tagged: अलसी, अवचेतन मस्तिष्क, एकाग्रता, कैंसर, खुद- इलाज, लुईस हे, सकारात्मकता, सेहत. Leave a Comment
हम ऊर्जा के पूंज है । जब तक ऊर्जा का बहाव आसानी से पूरी तरह शरीर में होता रहता है तब तक हम स्वस्थ रहते हैं । हमारे ऊर्जा पथ में ज्योंहि बाधा पहुंचती है, शरीर रूग्ण हो जाता है । ऊर्जा पथ मे विकृति शरीर को विकृत कर देती है ।
ऊर्जा पथ की चाबी हमारे स्वस्थ मन, भाव एवं विचार के अधीन है । स्वस्थ मन के होने पर ऊर्जा निर्बाध बहती रहती है । स्वस्थ भाव व मन के होने पर ही कोशिकिय श्वसन अच्छा होता है । निर्बाध आक्सीजन का बहना कोशिकिय श्वसन के लिए जरूरी है । शरीर में इसका दौड़ना इन्ही भावों व विचारों के अधीन है ।
कैन्सर अर्थात शरीर में ऊर्जा का संचरण सही तरीके से नहीं हो रहा है । ऊर्जा पथ को कैन्सर कोशिकाओं ने अपने नियन्त्रण में ले लिया है । रोगी की सोच एवं भाव अराजक है । कैन्सर होने का अर्थ है कि मन भी विकार ग्रस्त है । अतः सर्व प्रथम मन को कैन्सर केन्द्र से मुक्त करना पड़ता है । भाव एवं विचार की दिशा बदले बिना कैन्सर कौशिकाओं पर नियन्त्रण कठिन है । मात्र पोषक आहार एवं निर्विषिकरण से इसे रोकना मुश्किल है । इस हेतु मन में दबे भावों, गुस्से, ईष्र्या, दुःख, हार, बदले के भाव आदि का रेचन जरूरी है ।
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अप्रै
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Book Review, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, Uncategorized. Tagged: अलसी, अवचेतन मन, कृतज्ञता, कैंसर, निर्णय, प्रबल इच्छा, मन, मनोवृती, मस्तिष्क, लुईस हे, सेहत. Leave a Comment
एलोपैथी के अतिरिक्त भी कैंसर का इलाज कई तरीकों से होता है । इसका उद्देश्य कैन्सर रोगियों को वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति से अवगत कराना है । इसने एलोपैथी के साथ-साथ वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों का अध्ययन कर बताया है कि बुडविझ प्रोटोकोल इनमे से श्रेष्ठतम है । यह कैंसर रोगियों एवं उनके सम्बन्धियों के लिए एक विश्व कोष है जिसको पढ़ कर उपचार कराने का सही निर्णय ले सकते हैं । लोथर हरनाइसे ने दुनिया भर में कई वर्षों तक शोध कर इसे लिखा है ।
इसके अनुसार रोगी को 3 म् का पालन करना चाहिए ।
पहला म् (इट हेल्दीवेल) स्वस्थ आहार से है । इसमे रोगी को ठण्डी विधि से तैयार अलसी का तेल व पनीर का मिक्सर विभिन्न सुखे मेवे व फलों के साथ दिया जाता है ।
बुडविझ के आहार के साथ-साथ दूसरा म् (एलीमीनेट टाॅक्सीन्स) शरीर के विषाक्त पदार्थो को बाहर निकालना है । इसमे एनिमा लगा कर शरीर को निर्विष बनाया जाता है । इसमे पहले शुद्ध पानी का एनिमा लगाया जाता है । इसके बाद काफी एनिमा व एल्डी तेल एनिमा प्रमुख है ।
तृतीय म् (ईनर्जी) ऊर्जा के जागरण से है । जीवन का लक्ष्य तय कर जीना मुख्य है । दिशा तय कर ही दशा बदली जा सकती है । इसमे आत्मदर्शन द्वारा सकारात्मक होना व स्वस्थ होने के भाव में जीना प्रमुख है ।
लेखक एक जाने माने कैंसर शौध विशेषज्ञ है । जो दुनिया भर में घुम-घुम कर सभी देशों में उपलब्ध कैंसर उपचार सम्बन्धी विधियों का विश्लेषण करते रहे हैं ।
यह पुस्तक मुलतः जर्मन भाषा में लिखी गयी है । इसका अंग्रेजी संस्करण उपलब्ध हैै
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मार्च
Posted by jayantijain in Uncategorized. Tagged: अभिवादन, अलसी, अवचेतन मन, अवचेतन मस्तिष्क, जीवन प्रबन्धन, प्रसन्नता, मन, विवाह, शुभ कामनाएँ, होली. Leave a Comment
होली तो बस एक बहाना है रंगों का, ये त्यौहार तो है आपस में दोस्ती और प्यार बढ़ने का, चल सारे गिले सिक्वे दूर कर के, एक दुसरे को खूब रंग लगते हैं मिलकर होली मानते हैं!
होली की आपको हार्दिक शुभकामनायें!
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मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Stress Management, success. Tagged: अलसी, ऊर्जा, कैंसर, तनावमुक्ति, प्रसन्नता, मन, लुईस हे, शिक्षान्तर. 1 टिप्पणी
हमारे आज के भोजन में माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट की मात्रा उपलब्ध नहीं है जो कि हमारे 20-30 वर्ष के पूर्व के भोजन मे सहज उपलब्ध थी । आज का हमारा भोजन प्राकृतिक नहीं है । पहले सब्जियों से माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट मिलते थे । आज हमारी सब्जियां जैविक नहीं रही । तभी जैविक सब्जियांे का बाजार विकसित हो रहा है ।
सब्जियों को उगाते-2 हमारी खेतों की टोप सोइल अब बंजर हो गई । फिर इसको उगाने में रसायनिक खाद डालते हैं जिसमे माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट नहीं होते हैं । फिर इनका उत्पादन बढ़ाने का हम भिन्न-2 तरह के रसायन इन पर डालते हैं । किड़ों से बचाने पेस्टीसाइड्स डालते हैं । इस कारण हमें पहले अपने आहार में सब्जियों के सेवन से आवश्यक माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट में मिल जाते थे जो आज प्राप्त नहीं हो रहे हैं ।
पहले हम प्राकृतिक खनिज नमक खाते थे जिसमे सोडियम क्लोराइड के अलावा अन्य 94 खनिज तत्व मिलते थे । जो अब परिष्कृत नमक खाते हैं जिसमे सिर्फ सोडियम क्लोराइड व आयोडिन होते हैं । अन्य अच्छे खनिज भी फिल्टर के दौरान हटा दिये जाते हैं ।
भले ही सूक्ष्म मात्रा में लेकिन हमे आयोडिन, मेग्निश्यम, केल्शियम, सिलिका पूर्व के आहार में जो मिलते थे वो अब नहीे मिल रहे है । इसलिए हमे तथाकथित पौषक आहार के होते हुए भी पूरक आहार/सप्लीमेन्टरी डाइट की जरूरत है ।
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मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Book Review, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अलसी, कैंसर, मन, लेखक, शिक्षान्तर, शिखर पर मिलेगे, सेहत. 2s टिप्पणियाँ
डाॅ0 रे डी स्ट्रेंड ने एक पोषक तत्वों के बारे में उपयोगी किताब’’व्हाट योर डाॅक्टर डजन्ट नो अबाउट न्यूट्रिश्नल मेडिसिन मे बी किलींग यू’’ लिखी है जिसका हिन्दी अनुवाद ’’क्या आपका डाॅक्टर पोषक तत्वों के बारे में जानता है ?’’ े मंजुल पब्लिसींग हाउस भोपाल से छपी है । 
यह एक सत्य है कि दुनिया भर में डाॅक्टरों को दवाओं के जरिये बीमारियों का इलाज करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है । लेकिन उन्हे हमारे जीवन को स्वस्थ रखने के लिए महत्वपूर्ण और शक्तिशाली तरीकों के बारे में कोई ज्ञान नहीं दिया जाता है ।
यह पुस्तक आपको सिखाएगी कि क्यों सरकार द्वारा पोषक तत्वों की अनुशंसित मात्रा हमारे शरीर के प्राकृतिक रक्षातंत्र को बीमारियों के प्रति शक्तिशाली नहीं बना पाती है – और आपको पोषक तत्वों की कितनी मात्रा की आवश्यकता होती है ।
शरीर के अन्दर आॅक्सीजन का विघटन किस प्रकार विनाश उत्पन्न करता है और आप इससे हुई क्षति से कैसे निपट सकते हैं ।आप लगातार होने वाली एलर्जी और सायनस के संक्रमण से किस प्रकार लड़ सकते हैं ।
आपके डाॅक्टर द्वारा गंभीर क्षयकारी बीमारियों से बचाव के लिए दी गई दवाइयाॅं क्यों बेहतर नहीं होती है ।
बड़े दुख की बात है कि जब तक आपको किसी बीमारी का पता चलता है तब तक आप एक स्वस्थ और उत्साहपूर्ण जीवन खो देते हैं ।
रे स्ट्रैंण्ड की क्रांतिकारी पुस्तक
- आपको वर्तमान और भविष्य में अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के सरल उपायों के बारे में बताती है ।
- यह बीमारियों के कारण हुए नुकसान से भी छुटकारा दिलाती है ।
- अपने शरीर की प्राकृतिक उपचार शक्ति में बढ़ोतरी करें ।दिल की बीमारियों से बचाव के लिए कोलेस्टेराॅल का स्तर महत्वपूर्ण कुंजी क्यों नहीं है
- कैंसर, डायबिटीज, आर्थराइटिस, अल्जाइमर्स, फाइब्रोमाएल्जिया और अन्य बीमारियों की जड़ के बारे में चिकित्सा प्रमाण वास्तव में क्या बताते हैं
- बुढ़ापे को रोकने की सही रणनीति पर अमल करना अभी शुरू करें और खुद को आॅक्सीजन के हानिकारक प्रभावों से बचाएॅ
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मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Self-Healing, Stress Management, Uncategorized. Tagged: अलसी, कैंसर, खुद- इलाज, धन्यवाद, प्रबल इच्छा, मन. 4s टिप्पणियाँ
डायबिटीज या मधुमेह एक चयापचय विकृति या रोग है जिसमें ब्लड शुगर की मात्रा बहुत बढ़ जाती है, क्योंकि शरीर में ब्लड शुगरको नियंत्रित करने वाले इंसुलिन हार्मोन का बनना कम हो जाता है और/या इंसुलिन अपने कार्य को ठीक से नहीं कर पाता है।

डायबिटीज में अलसी कैसे खायें?
डायबिटीज के रोगियों के लिए अलसी एक आदर्श और अमृत तुल्य भोजन है, क्योंकि यह जीरो कार्ब भोजन है। अलसी ब्लड शुगर नियंत्रित रखती है, डायबिटीज के शरीर पर होने वाले दुष्प्रभावों को कम करती हैं। चिकित्सक डायबिटीज के रोगी केा कम शर्करा और ज्यादा फाइबर लेने की सलाह देते हैं। अलसी में फाइबर की मात्रा अधिक होती है। इस कारण अलसी सेवन से लंबे समय तक पेट भरा हुआ रहता है, देर तक भूख नहीं लगती है। यह बी. एम. आर. केा बढ़ाती है, शरीर की चर्बी कम करती है और हम ज्यादा कैलोरी खर्च करते हैं। अतः मोटापे के रोगी के लिये अलसी उत्तम आहार है। उपरोक्त सभी बातों का सीधा अर्थ हैः
- ऊर्जा का सर्वोत्तम स्रोत,
- ठससे शरीर में वसा का कम होना,
- स्नायु कोशिकाओं में थकान नहीं होना,
- ऑक्सीजन और अन्य पोषक तत्वों की उपयोगिता में वृद्धि,
- स्वास्थ्य में वृद्धि,
- यानी छरहरी बलिष्ठ मांसल देह
डायबिटीज में अलसी कैसे खायें
संतुलित भोजन में अलसी का समावेश आसान, सस्ता और दूरदर्शी कदम है, लेकिन इसके परिणाम बड़े चमत्कारी मिलते हैं।यदि आप ज्यादा फाइबर लेने के आदी नहीं हैं तो अलसी को कम मात्रा से शुरू करें और फिर धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाएं। अलसी का सेवन करने से पहले इसे पीसना जरूरी है। इसे मिक्सर के ड्राई ग्राइंडर में दरदरा पीसें। इसे दही, दूध, सब्जी, दलिया, सलाद आदि के साथ भी लिया जा सकता है। पानी भी ज्यादा पीयें। डायबिटीज के रोगी को पूरा फायदा लेने के लिए रोजाना 30 से 60 ग्राम अलसी खाना चाहिये।
अलसी की रोटी –डायबिटीज के रोगी को रोज सुबह 20 ग्राम और शाम को 20 ग्राम अलसी का सेवन करना चाहिये। अलसी को पीस कर आटे में मिला कर रोटी बना कर खाना चाहिये। यही खाने का सबसे अच्छा तरीका है।
अलसी का तेल -अलसी के तेल को भी दही या पनीर में मिला कर लिया जा सकता है। यह भी याद रखें कि अलसी के तेल में सिर्फ फैट्स होते हैं। फाइबर, प्रोटीन, लिगनेन, विटामिन और खनिज तत्व हमें सिर्फ बीज द्वारा ही प्राप्त होते हैं। ( courtsy Dr O P Verma)
1
मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अलसी, कृतज्ञता, खुश, जीने की कला, प्रसन्नता, ब्लॉग लेखन, मन, मस्तिष्क, शुभ कामनाएँ. Leave a Comment
हम सब खुशी चाहते हैं । जीवन में हमे यश नहीं, धन नहीं खुशी चाहिए । समाज में नाम नहीं जीवन में खुशी चाहिए। धन व प्रतिष्ठा से खुशी नहीं मिलती है। शांत होने पर ही सच्ची खुशी मिलती है । आज हमारी प्राथमिकताएं स्पष्ट नही है । हम यह भी नहीं जानते कि हमें क्या चाहिए । हमें खुशी कहां मिलती है इसका हमें ज्ञान नही है । दूसरों का पद एवं पैसा उन्हे सुख देता नजर आता है , जो कि वास्तव में सुख का कारण नहीं है । पद एवं पैसे की दौड़ में हमारी उम्र बिती जा रही है ।
हम अन्दर से अव्यवस्थित व टूटे हुए हैं। हमारे भीतर आन्तरिक दरार बड़ी है । हमारे मूल्य निश्चित नहीं है । हम बाहर कुछ व भीतर कुछ हैं ।
हमे अन्दर से व्यवस्थित, संतुलित व एकरूप होना है । कथनी व करनी के भेद को मिटाना है । वास्तविक उन्नति अन्दर से संतुलित व संगठित होना है।
अन्दर से स्थिर होना, मन में साम्यता-समता पैदा करना विकास है । हम अच्छे सूट व टाई से नहीं बड़े होते हैं ।
हमे अपने आन्तरिक उपद्रवों को मिटाना है । अब महत्वपूर्ण यह है कि स्वयं हमारे विचार कैसे चलते हैं ? भावनाएं कैसे आन्दोलित करती है । स्वयं से नाराजगी कितनी कम करते हैं ।
पदौन्नति नहीं आन्तरिक खुशी चाहिए । पदौन्नति बाहर के परिकर बढ़ाती है जो अशान्ती के कारण है । अतः पदोन्नति से ज्यादा शान्ति चाहिए । हमारा जीवन अन्दर से खोखला व बाहर से बड़ा व्यर्थ है ।
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फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Bloging, Personality, Spirituality, Uncategorized. Tagged: अलसी, अवचेतन मस्तिष्क, असफलता, धन्यवाद, मन, मस्तिष्क, लुईस हे, लेखक, विवाह. 1 टिप्पणी
हमारे जीवन में आंख खोलने वाले, स्वयं को राह दिखाने वाले, मूल्य सीखाने वाले कला-साहित्य आज स्वयं बाजार के शिकार है । जो दीपक है उसे ही बाजार अपने अनुसार करने हेतू प्रयत्नरत है । प्रेमचन्द की बजाय शिवखेड़ा पढ़ा जाता है । विशुद्ध साहित्य नही बल्कि प्रेरक साहित्य बिकता है ।
सिस्टम मनुष्य पर भारी पड़ रहा है । उजाले पर ही पहरे बैठे हैं । आज सब ताकत बाजार के हाथ है । बाजार की शक्ति निर्धारक होती जा रही है । इससे बचना कठिन है । बाजार हर चीज को कीमत में आंकता है । मुनाफा जीवन का मन्त्र हो गया है । हर चीज रूपयों से तोली जाने लगी है ।
मीडिया पूंजीपतियों के चुंगल में है । विज्ञापन दाता क्या छपेगा या दिखेगा हम करते है । मीडिया मालिकों को मूल्यों से सरोकार नहीं है । वे टी.आर.पी. से चलते हैं । सही बात मौलिक दृष्टि गोल है । मांग के अनुरूप परोसा जाने लगा है ।