होली तो बस एक बहाना है रंगों का, ये त्यौहार तो है आपस में दोस्ती और प्यार बढ़ने का, चल सारे गिले सिक्वे दूर कर के, एक दुसरे को खूब रंग लगते हैं मिलकर होली मानते हैं!
होली की आपको हार्दिक शुभकामनायें!
Related Posts:
26 मार्च
होली तो बस एक बहाना है रंगों का, ये त्यौहार तो है आपस में दोस्ती और प्यार बढ़ने का, चल सारे गिले सिक्वे दूर कर के, एक दुसरे को खूब रंग लगते हैं मिलकर होली मानते हैं!
होली की आपको हार्दिक शुभकामनायें!
Related Posts:
2 फ़र
वृहदारण्यक उपनिषद् मे लिखा है किः-
जो कुछ तुम हो, वह तुम्हारी प्रबल इच्छा है ।
जैसी तुम्हारी इच्छा है, वैसा ही तुम्हारी संकल्प है ।
जैसा तुम्हारा संकल्प है, वैसा ही तुम्हारा कर्म है ।
जैसा तुम्हारा कर्म है, वैसा ही तुम्हारा भाग्य है ।
अथार्त व्यक्ति अपनी इच्छा एवं सपनों का ही प्ररिणाम होता है । आज हम जो कुछ हैं वह अपनी इच्छाओं के अनुसार हैं । हम जैसा सोचते हैं वैसे ही बनते हैं । तब वैसी ही मनःस्थिति होती है तद्अनुरूप ही कदम उठाते हैं । अपनी सोच के अनुसार ही कर्म करते हैं । क्योंकि हमारी इच्छा से ही संकल्प पैदा होता है एवं संकल्प अनुसार कर्म करते हैं तथा कर्म ही हमारा भाग्य बनाते हैं । क्योंकि कर्मों के अनुसार ही फल आता है । इस तरह हम अपने भविष्य के निर्माता है । इसीलिए नेपोलियन ने लिखा है कि हम ही अपने भाग्य निर्माता हैं । अपना जहाज संसार में अपने सोेच के अनुसार ही चलाते हैं । उसी अनुरूप विजय मिलती है । सफलता प्राप्ति में इच्छा शक्ति की प्रमुख भूमिका है ।
13 जन
यहाँ सब स्वार्थीं व बेईमान नहीं है। लेकिन दुःख की बात यह है कि बुरे लोगों का वर्चस्व है। अधिकांश लोग भले व सहायता प्रदान करने वाले है। गुणवान लोगों की यहाँ कद्र नहीं होती है क्योंकि वे संगठीत नहीं है। देश की आजादी हेतु कुर्बानी देने वाले क्या स्वार्थीं थे? क्या सूरज, पानी, हवा, पृथ्वी, आकाश आपसे किराया माँगते है? वेदव्यास से लेकर आज तक लेखक, कलाकार,सृजक आपसे व्यक्तिगत कुछ नहीं लेते है। वे सब आपको ज्ञान, संस्कृति, विचार, भावनाओं से आपको समृद्ध करते है। यह जीवन भले लोगो की अच्छाई के कारण ही चल रहा है।
कुछ लोग चोर-डाकू, हत्याएँ, बलात्कार करते है इससे सारा समाज बुरा नहीं हो गया। यह हमारी नकारात्मकता है कि हम कुछ बुरे लोगों के आधार पर पूरे समाज को दोष देते है।
अच्छे लोगों में दोस्ती प्रायः कम होती है। क्योंकि अच्छाई हमेशा अकेली रहती है। अच्छाई का अहंकार व्यक्ति को दूसरों से जुड़ने नहीं देता। जबकि बुरे व्यक्ति प्रायः शीघ्र ही दोस्ती कर लेते है। क्योंकि एक साथ बुरा काम करने से परस्पर अपनापन आ जाता है। तभी तो कहाँ जाता है कि दारू पीने वालो की दोस्ती मजबूत होती है। बुराई हमेशा अपने परिवार को बढ़ाती है। जबकि अच्छाई अकेले रहना पसन्द करती है। समय आ गया है कि अच्छे लोगों को भी एक-दूसरे को सहयोग करना होगा।
हमें इस धारणा को समाप्त करना है कि सब लोग खराब है। बेवजह अनेक लोग बहुत बढि़या है। मानवता, जीवन, हमारी उन्नति इन्हीं को बदोलत है। यहाँ सर्वत्र प्रेम है, परोपकार के भाव है, सत्य है, नैतिकता है। खुशियाँ बाँटने को बहुत लोग तत्पर है। अच्छाईयाँ समाप्त नहीं हुई है-हम देख नहीं पा रहे है?
5 जन
दोस्तो,मेरे प्रणाम स्वीकारे एवं आप सबको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ !
मेरे भीतर बैठी विराट सत्ता आपके भीतर विराजमान परम सत्ता को सर झुकाती है। आपके निकटस्थ मित्र शरीर को प्रणाम जिसके होने से आपका जीवन हैं। दुनिया के सबसे बडे सुपर कम्प्यूटर आपके मस्तिष्क को प्रणाम। उस दिल को नमन जो आपके जन्म से आज तक साथ दे रहा है। उन फेफड़ों को प्रणाम जो आज तक आपको श्वास लेने में मदद दे रहे है। अस्थि तन्त्र को प्रणाम जो आपके शरीर को आकार दिये हुए हैं। उस पाचन शक्ति को नमन जो पहले दिन से आपके भोजन को ऊर्जा में बदलते है।उस स्नायू तन्त्र को प्रणाम जो दुनिया में व्याप्त समस्त टेलिफोन जाल से सात गूना बड़ा है।अन्तः स्त्रावी ग्रन्थियों व प्रजनन तन्त्र को प्रणाम जो शरीर व दुनिया को सन्तुलित रखने में जिनका योगदान है।
परम सत्ता से प्रार्थना है कि नव वर्ष में आपकी सभी कामनाएँ पूरी करें।आप सबसे महत्वपूर्ण है।आप अनुपम व अद्वितीय हैं चुँकि आप ही जगत हैं।
31 दिस
नया वर्ष आ रहा है । जैसा कि संकल्प लेने का प्रचलन है । अपना पुनरावलोकन करने का समय है । गत वर्ष की उपलब्धियों व अनुपलब्धियों पर मनन की आवश्यकता है ।
स्वयं को जानने-समझने का अवसर है । अपनी आदतें, सपनों व प्रयत्नों को परीक्षण करने का समय है । आदतों को सफलता में सहायक अच्छी आदतों व हानिकारक बुरी आदतों को पहचानना है । हम आदतों मंे ही जीते हैं । आदतें बदलकर ही स्वयं को बदल सकते हैं । एच.डी. थोरो ने लिखा है कि वस्तुए नही बदलती, हम ही बदलते हैं । अतः स्वयं को बदलने की जरूरत है ।
एक विचार को बोइए, एक कर्म को जन्म दीजिए,
एक कर्म को बोइए, एक आदत को जन्म दीजिए,
एक आदत को बोइए, एक चरित्र को जन्म दीजिए,
एक चरित्र को बोइए, एक सफलता को जन्म दीजिए ।
हमे जीवन में स्थायित्व पंसद है । बदलने में सदैव भय रहता है, इसलिए कोई भी बदलना नही चाहता है । परिवर्तन में असुरक्षा है, नयापन है । आदतें व्यक्ति ने अपनी स्थिति, सोच व लक्ष्य के आधार पर बनती है । जीने के बीच रास्ता निकली हुई होती है । आदतों में स्थायित्व होता है व व्यक्ति उनसे एकाकार हो जाता है । उसमे वह रमा हुआ होता है । आदतें उसके जिने की शैली हो जाती है । उसका अपनत्व हो जाता है । उनको वह न्यायोचित ठहराने लगता है । आदतें उसके जीवन मूल्य में समा जाती है । वह उन्हे मूल्य देने लगता है ।
समय बीत रहा है । समय रूपी नदी में इसके साथ हम सब बह रहे हैं । इसके साथ अपने में परिवर्तन करते रहना है, तभी अपटूडेट रहेंगे । नही तो पिछड़ जाऐंगे । जो समय के साथ नहीं बदलता है वह पिछे रह जाता है ।
आप सबको नव वर्ष की शुभकामनाएं !
4 दिस
मेरी माँ तुमने मेरे लिए बहुत कुछ किया, जिसे मै आज तक समझ न पाया। पुरुष वैसे भी स्त्री को समझने में असमर्थ हैं। मैं तुम्हारी सातवीं संतान था, तुम्हें मेरे जन्म पर भी बहुत पीड़ा हुई, उस पर भी मेरे जन्म के तीन दिन बाद तुम अवसाद का शिकार हो गई। एक माह तक डंूगरपुर अस्पताल में भर्ती रही, बहुत दुःख सहा। तब मै अपनी नानी के पास रहा। तुम्हारी हालत इतनी खराब थी कि अपने बच्चे को संभाल न सकती थी। 
मेरी मां सेलिब्रिटी नहीं थी, इसका मतलब यह नहीं कि वह एक महान मां नही थी । ग्लैमरस व प्रसिद्ध होने से ही कोई स्त्री महान मां नहीं हो जाती। अपनी तरह से सामान्य रहते हुए वह मेरे लिए असामान्य थी । वास्तव में सामान्यता बड़ी दुलर्भ हैं। मेरी मां में एक बलिदानी मां के सारे गुण थे । अपने बेटे के लिए दिन भर सचेत रहना, उसके हितों का संवर्धन करना व उसकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखना मुख्य था। वह मेरे हितों के लिए अपने पति से कमजोर होते हुए भी लड़ती थी । उसे अपने बच्चे कि लिए पति से पीटना तक मंजूर था ।
दुनिया में तुम्हारा नाम न था, इसका मतलब यह नहीं कि तुम किसी प्रसिद्ध माँ की तुलना में कम थी। तुम्हारा प्यार अपने बच्चों के प्रति किसी से कम न था। वास्तव मे तुम महान माँ थी। मेरे पिता कठोर अनुशासन प्रिय थे। वे बच्चों को अक्सर डाँटते रहते थे। मैं अपने पिता को गाली देने की मशीन समझता था। पिताजी जब भी मुझे क्रोध में डाँटते या पिटने को आतुर होते तब तुम ढाल बनकर आती थी । इस बीच पिता के हाथों कई बार स्वयं पीट जाती थी । तुम्हारी यह सुरक्षा कवच सदैव मुझे याद आता है ।
पिताजी रात्रि में भोजन खिलाने का विरोध करते थे । जैन धर्म के अनुसार रात्रि का भोजन निषेध है । तुम पिताजी की अनुपस्थिति में पीछे से हमे चुपचाप खाना खिलाती थी ।
आई, मां को हम इसी नाम से पुकारते थे । तुम्हारे बलिदानों से यह जीवन संवरता है । मेरे शरीर का कतरा कतरा तुम्हारे ऋण से ग्रस्त है । यह शरीर तुम्हारा अंश है । इसे आज अनुभव करता हूं।
मै आपके जीते जी आपका महत्व समझ न पाया । मेरी 37 वर्ष की उम्र मेें आप धरती से अचानक विदा हो गई । तब मुझे लगा कि मेेरे उपर आपका जो रक्षा कवच था, वह अब हट गया। मै शर्मिन्दा हुॅं कि आप के जीते जी कभी आपको समझ न पाया । पत्नी बार-बार कहती थी कि तुमने अपनी मां की परवाह न की । महत्वकांक्षा के घोड़ों पर सवार होने से मैं आपको समय न दे पाया । आज मातृदिवस को इसका बोध हो रहा है ।
मेरी मां एक औसत निम्न मध्यवर्गीय मां की तरह सामान्य औरत थी जिसने 12 बच्चों को जन्म दिया । वह सदैव गरीबी व उपेक्षा की शिकार रही । उसकी अपनी समस्याएं थी । वह अपनी सोच से हम बच्चों का सदैव बढिया ही सोचती थी । लेकिन मै उसे कभी समझ न पाया । मै बचपन से उद्ण्ड व क्रोधी लड़का था । विवशता के कारण बचपन में रोना बहुत रोता रहता था ।
वह मेरी सुरक्षा को लेकर सदैव चिन्तित रहती थी । मां का ध्यान सदैव बेटे की हरकतों पर रहता है कि अभी वह कहां है, सुरक्षित है या नहीं ?
बच्चा मां को नहीं समझ पाता है । लेकिन मैं तो बड़ा होकर भी 50 के बाद उसके योगदान को अनुभव करता हुं । मेरी मां ने मेरे लिए वो सब किया जो एक मां कर सकती है ।
30 नव
प्रिय बेटी ,
हमारी सामाजिक परम्परा अनुसार बेटी शादी होने पर घर से विदा होती है । वह एक ऐसा जहाज है जिसे समुद्र में जाना ही पड़ता है । इसके लिए बन्दगाह को छोड़ना ही पड़ता है । लेकिन बेटी माता-पिता के दिल से कभी विदा नहीं होती है । बेटी की जड़ें सदैव पीहर में ही रहती है । बेटी यह तुम्हारा पहला घर है । सदैव तुम्हारा बना रहेगा ।
तुम हमारे दिल में ही नहीं इस घर में भी पूर्ववत् ही सदैव रहोगी । यह घर पूर्ववत् तुम्हारा भी है । इसे पराया न समझना । यहां पर जो संस्कार, मूल्य व सोच पायी है यह तुम्हारे जीवन की आधार शीला है । ससुराल तुम्हारा अपना दूसरा घर होगा । तुम इस घर की आधी वारिश हो और सदैव रहोगी । तुम्हारा दान मैने नहीं किया है । मैने कन्यादान नही किया है । मेरी कन्या वस्तु नहीं है । मेरी बेटी एक व्यक्ति है । तुम्हारे साथी/दोस्त से तुम्हे मिलाया है ताकि साथ मिलकर बेहतर जी सको । गृहस्थ धर्म का पालन कर सको । ताकि जीवन की पूर्णताः प्राप्त कर सको एवं विश्व की सृजन वाटिका में अपना सहयोग दे सको । पुरूष व स्त्री दोनो एक दूसरे के बिना अधुरे हैं । तभी तो हमारे यहां अर्द्धनारीश्वर की कल्पना शिवजी में की गई है । स्त्री व पुरूष समान नही होकर एक दूसरे के सहयोगी है । स्वतंत्रा की वेदी पर सामन्जस्य की वृद्धि न खोयें । एक दूसरे के सहयोग से जीवन संवरता व सजता है । आज से तुम मुझे जरूर कुछ जिम्मेदारियों से मुक्त कर रही हो । अथार्त खुद अपनी जिम्मेदारी ले रही हो ।अब तुम समझदार हो गयी हो । इसे याद रखना । इससे आगे की यात्रा का भार तुम्हे वहन करना है, तुम समर्थ हो । किसी के भी माता-पिता सदैव साथ में नहीं रहते है एवं कोई भी बच्चा अपनी जिम्मेदारी लेने पर बच्चा नही रहता है ।
अपनी प्रतिक्रियाओं को जानो । बेहोशी में जवाब मत दो । सुनना एक कला है । छोटी-छोटी बात पर तत्क्षण बड़ी प्रतिक्रिया मत करो । पिता की तरह तनुक मिजाज मत रहना । सोच-समझ कर प्रतिक्रिया करना । गुरूजिएफ के अनुसार नकारात्मक प्रतिक्रिया के पूर्व चैबिस घंटे न रूक सको तो चैबिस मिनिट जरूर रूकना । इससे आप बहुत सारे झंझटों से बच जाओगे व गृहस्थ धर्म अच्छी तरह निभा पाओगे । घर की चारदिवारी के भीतर स्त्री का शासन हो व बाहर पुरूष का शासन अच्छा माना गया है ।
शादी एक समझौता भी है । अपने साथी को तत्काल जवाब मत दो । किसी को बदलना सरल नहीं है । लचीलापन पैदा करो । सहने वाला जीतता है । तर्क से बात नहीं बनती है । पति पर झुंझलाना ठीक नहीं है । बिगड़ी बात सम्भालना सीखो । झगड़े के बाद पुनः अपना बनाना आना चाहिये । इसमे तुम अपनी मम्मी से प्रेरणा ले सकती हो।
मेरी दुआएं सदैव तुम्हारे साथ है । तुम और अधिक पाओ । तुम्हे ओर ज्यादा मिले । वधु ससुराल में कैसे जिते दिल ? प्रेम में बड़ी शक्ति है । जब कोई कार्य प्रेम से नहीं हो सकता है तो वह भय से भी नहीं करा सकते हैं । परिवार में सम्बन्ध बहुत नाजुक होते हैं । इन सम्बन्धों को सम्भालना पड़ता है । उनके लिए विशेष कौशल की जरूरत पड़ती है जो तुम्हारे पास है । प्रारम्भ में ससुराल में सभी लोग विनम्रता की अपेक्षा रखते हैं ।
शादी के प्रति स्वप्निल न रहे, यथार्थ को स्वीकारें, अपनाएं । हम ज्यादा दिन रोमांटिक नहीं रह सकते । परिवार व जीवन की वास्तविकताओं से रूबरू होना पड़ता है । अतः कल्पनाओं से बचें । तथ्यों को स्वीकारें । 24 घंटे साथ रहने पर छोटी-छोटी बातें कई बार चिढ़ाती है । आपको संतुलन कायम रखना है । अपने लिए वक्त निकालना है ।
बड़ी समस्या हमसे शेयर करो । हमसे अनावश्यक बड़ी बात मत छुपाना । छोटी-छोटी वो बात जो भावी जीवन को खतरे में डाल सकती है, ऐसी हो तो जरूर बताएं। मम्मी-पापा चिन्ता करेगें-इस तर्क पर ध्यान न दे । बात बिगड़ेगी तो उन्हे ही परेशानी होगी । इसलिए अपनो से छिपाना मत ।
तुम्हारे मम्मी-पापा
(गत दिनों मेरी बेटी की शादी हुई उस पर निम्न संदेश दिया )
Related Posts:
13 नव
अवचेतन की धुलाई जीवन में मनोरंजन में सहायक है।
मन को स्वस्थ करने हेतु मन का रंजन करना अत्यावश्यक है। खुशी का सृजन मन में ही होता है। अतः खुश रहने में मनोरजंन सहायक है। हम स्वयं जिस तरह का जीवन जी रहे हैं अब उसमें सुगन्ध, मिठास एंव मस्ती नहीं है, त्वरा नहीं है, उत्साह नहीं है, जीने की ललक नहीं है। ऐसे मेें हम जिस तरह से जी रहे हैं, उस पर विचारने की जरूरत है। उसे बदलने की दरकार है। इसे बदले बिना जीवन में रस, ऊर्जा, रगं नहीं आ सकते है। 
अच्छे मनोरजनं का उद्देश्य हमारी विचार शक्ति को धार देना तथा भावनाओं को विकसित करना है। भावनाओं का विरेचन भी इससे होता है। हम जब देवदास की त्रासदी पर रोते हैं तो हमारा दुःख भी बहता है। भावनाओं का उदात्तीकरण देख कर भी उच्च भावनाएँ मजबूत होती है। बुरी भावनाओं का बुरा परिणाम देख कर हमारी बुरी भावनाएं कमजोर होती है। हमारी भावनाओं का रेचन हो जाता है। हमारा अवचेतन का बोझ हल्का हो जाता है।
मनोरजनं समय काटने का उपक्रम नहीं है। यह हमें अपने से परिचय कराता है। हमारी सोच को स्पष्ट करता है व नये उदाहरण से हमारी धारणाओं को पुष्ट करता है। यह हमारे भावजगत को फैलाता है। हमारे भीतर सच्चाई को सहलाता है। तभी तो इसे मन बहलाने का साधन भी कहते हैं। यह मन को नहीं हमारे दुखों को भी धोता है। व हमारे मुल्यों को मजबूत करता है। तभी तो कहते है कि मनोरंजन के वो साधन अच्छे हैं जो उच्च मूल्यों को बढ़ावा देतें हैं।
मनोरंजन के साधनों से मनुष्य के मन का बोझ हल्का होता है तथा मस्तिष्क और नसों का तनाव दूर होता है।इससे नव जीवन का संचार होता है। पाचन क्रिया भी ठीक होती है। देह को रक्त संचार में सहायता मिलती है।विज्ञान ने हमारी मनोवृत्ति को बहुत बदल दिया है। बहुत सारे साधनों से मनोरंजन के साथ- साथ पर्याप्त व्यायाम भी होता है। परन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि अति सर्वत्र बुरी है। इसलिये समयानुसार ही मनोरंजन के साधनों का लाभ उठाना चाहिये। मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञानार्जन भी होना चाहिये। सस्ता मनोरंजन बहुमूल्य समय को नष्ट करता है। मनोरंजन के साधन से हमारी रुचि, दृष्टिकोण एवं स्तर का पता चलता है। विनाश और पतन की ओर ले जाने वाले मनोरंजन से अवश्य बचना चाहिये। मनोरंजन वही बढि़या है जो हमारे ज्ञान एवं चरित्र-बल को विकसित करे। स्वस्थ और सोद्देश्य मनोरंजन किसी भी स्वस्थ व समृद्ध समाज की मूलभूत आवश्यकता भी होता है और पहचान भी।
मनोरजंन का प्रबन्धन स्वंय को राजी रखने हेतु बहुत जरूरी है। किसी भी तरह से स्वंय को खुश रखंे। मनोंरजन उद्योग निरन्तर फैलता जा रहा है। इसकी दिशा व दशा किसी से छिपी नहीं है। कम से कम उसे आज स्वस्थ तो नहीं कहा जा सकता है। बाजारवाद व विज्ञापन इसे तय करते हैं। हम नहीं जानते कि मनोंरजन का स्वरूप कैसा होना चाहिए ? हमें कैसा मनोंरजन चाहिए ? हमें क्या अच्छा लगता है,व क्या हमें तरोताजा करता है? कहां हमें आनन्द आता है?
आज मनोंरजन के साधन बाजारवाद के शिकार हो गये है। उनमें तरह-तरह की विकृतियां आ गई है। तभी तो जीवन से स्वस्थ मनोंरजन गायब होता जा रहा है। फूहड़ता, हास्य, व्यंग्य, टांग खिंचाई ही रह गये है। सांस्कृतिक शून्यता के माहौल में नग्नता,अश्लीलता फूहड़ता ही राहत देते हंै। हमारे यहां सांस्कृतिक-शून्य कुछ ऐसा है कि ऊब के मारे लोग वक्त काटने के लिए मनोरजंन के नाम पर कुछ भी बरदाश्त कर लेते हैं।
ऊब का अर्थ है-अनचाहे काम में डूबे रहना। थकें मादें दर्शक ऊब के शिकार है।आज-कल सीरियल ऊब से ऊब को मारने के प्रयास हैं। यह वैसा ही है जैसा कि निराशा दूर करने के लिए शराब पीना। जबकि मेडिकल साईन्स शराब को निराशा बढ़ाने वाला पेय मानती है।
जैसे कि मैं आधी सदी पार करके भी नहीं जानता कि मुझे क्या अच्छा लगता है। मुझे कहां से ताजगी मिल सकती है ? फिल्म का स्वाद लेना मुझे नहीं आता है। निर्मल आनन्द से मेरा वास्ता कम ही पड़ता है। फिल्म का मजा कैसे लेना ?
मसाला फिल्में सार्थक फिल्म से कैसे भिन्न है। कला फिल्मों में क्या होता है ?
Related Posts:
30 अग
बहुत पुरानी कहानी है। किसी गांव में एक चतुर किसान रहता था। मरते समय वह अपनी वसीयत का बंटवारा निम्न प्रकार कर गया।
बड़े बेटे को उसकी सम्पति का आधा हिस्सा मिले, मंझले बेटे को एक चैथाई व उसकी सम्पति का छठाँ भाग सबसे छोटे बेटे को मिले। किसान की कुल जमा पूंजी उसकी ग्यारह गायंे थी। उसके मरने पर बंटवारे का चक्कर पड़ गया। गायों का बंटवारा 1/2, 1/4, 1/6, कैसे करें।
अन्त में गंाव के एक समझदार व्यक्ति ने कहा कि उसकी पूंजी में मेरी एक गाय मिला लो, फिर उसका बंटवारा कर दो। अब तो बात बहुत साफ हो गई। बड़े बेटे को बारह की आधी यानी छः गायें दे दी गई। मझले बेटे को बारह की चैथाई यानी तीन गायंे बांटी गई। छोटे बेटे को बारह का छठा हिस्सा दो गायें दे दी गई।इस प्रकार छः योग तीन योग दो कुल मिलाकर ग्यारह गायें तीनों बेटो में बांट दी गई। बची शेष गाय गांव के समझदार व्यक्ति को पुनः सोंप दी गई।
यह गाय शब्द है जो आपके भावों को जगा सके। यह मेरी गाय संकेत करती है आपको जगाने हेतु, आपकी पूंजी को प्राप्त करने में। अगर प्राप्त कर सके तो यह लेखक आभारी रहेगा।
23 जून
विश्व के सबसे बड़े सुपर कम्प्यूटर का मालिक अमेरिका नहीं है। विश्व के सबसे बड़े सुपर कम्प्यूटर के मालिक आप हैं। यह आपके बालों के ठीक नीचे है। फिर भी हमारी हालत दयनीय क्यों है ? क्योंकि इस सुपर कम्प्यूटर को आॅपरेट करना हमको नहीं आता है, और यह यंत्र हमें चलाने वाला बन गया है। जिसे मनुष्य को चलाना चाहिये वह मनुष्य को चला रहा है। यंत्र बेचारा क्या करे, आॅपरेटर के अभाव में स्वयं चल पड़ा है। यह व्यक्तिगत कम्प्यूटर सार्वजनिक हो गया है। यह चेतन कम्प्यूटर यांत्रिक रूप से चल रहा है, क्योंकि इसे समाज, विचारधारा, पड़ौसी, अतीत, इज्जत, महत्त्वाकांक्षा, भय आदि शक्तियां चला रहीं हैं। जब जिसका कोई मालिक नहीं होता तो सारी दुनिया उसकी मालिक हो जाती है। आप सोये हुए हैं और अन्य शक्तियां आपके कम्प्यूटर को चला रही हैं जिसका नतीजा सामने है। हमारा समस्त जीवन नकारात्मक हो गया है। हम स्वतः ही अपने को नहीं पर को देखते हैं। जगत की या स्वयं की हर कमी, हर चीज के लिये दूसरों को जिम्मेदार ठहराते हैं। सदैव खामियों, कमजोरियों को ही देखते हैं। हम इच्छापूर्वक विचार करते नहीं है। विचार हमको जहां-तहां ले जाते हैं। हम कईं बार नकारात्मक आवेग में फंस जाते हैं।
आज का विकसित विज्ञान भी मस्तिष्क के बराबर की क्षमता का कम्प्यूटर बनाये तो उसे 10 घन किलोमीटर जगह चाहिये। 10 किलोमीटर लम्बी, 10 किलोमीटर चैड़ी एवं 10 किलोमीटर ऊंची जगह की जरुरत पड़ती है।
आपके मस्तिष्क की प्रत्येक कोशिका एक समय में 3 करोड़ घटनाएं प्रोसेस कर सकती हैं जो कि दनिया के सबसे बड़े सुपर कमप्यूटर की गति से बहुत अधिक है। एक मानव मस्तिष्क में 28 अरब कोशिकाएं होती हैं।