Posts Tagged ‘अनुभव’
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मई
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, आत्मछवि, कृतज्ञता, कैंसर, खुद- इलाज, धन्यवाद, निर्णय, प्रार्थना, मन, शुभ कामनाएँ, सकारात्मकता, सेहत. 1 टिप्पणी
आरोग्यधाम, प्रशान्ती कुटीर बैंगलोर में दिनांक 26.04.2013 से 03.05.2013 तक पत्नी सहित समग्र चिकित्सा हेतु रहा । यह स्वामी विवेकानन्द योग अनुसंधान संस्थान, (एस. व्यासा) डिम्ड विश्वविद्यालय का एक अंग है ।
यहां पर योग, आयुर्वेद व नेचुरोपेथी के स्वतन्त्र महाविद्यालय है । यहां योग पर रिसर्च सबसे अधिक हुई हैं एवं अनेक शोध पत्र चिकित्सा, मनोविज्ञान, के अन्तर्राष्ट्रिय जरनल्स छप चुके हैं । यहां पर योग चिकित्सा, आधुनिक विज्ञान, आयुर्वेद, नेचुरोपेथी व फिजियोथैरेपी के आधार से कई रोगों का सफलतापूर्वक ईलाज किया जाता है ।
पत्नी मीना के जोड़ों व सर्वाईकल दर्द में बहुत राहत मिली । वह विगत पांच वर्षों से दाई करवट सो नहीं पा रही थी, वह सोने लगी । वहां पर मीना के दर्द उठने पर तत्काल योगा करा कर पेन किलर देने की तरह दर्द दूर कर दिया ।योग, मसाज, लेप, स्टीम बाथ, सोना बाथ आदि से रीढ़ की हड्डी के सभी प्रकार के दर्द को दूर करने में विशेषज्ञता हासिल है ।
मेरा रक्तचाप 110/70 पर रहने लगा । नाड़ी शोधन व भ्रामरी का जबरदस्त प्रभाव देखा ।
गुरूजी डाॅ0 एच0आर0 नागेन्द्र भूतपूर्व अन्तरिक्ष वैज्ञानिक हैं जो अन्तरिक्ष की यात्रा को छोड़कर अन्तर्मन की यात्रा करा रहे हैं एवं विश्व प्रसिद्ध आधुनिक चिकित्सक डाॅ0 आर0 नागरत्ना दीदी का व्यवहार एवं सेवा अनुकरणीय है ।यह 100 एकड़ में निर्मित प्राकृतिक वातावरण से युक्त है । यहां का स्टाफ, थिरापिस्ट व डाॅक्टर सहयोगी हैं ।
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फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Self-Healing, Spirituality, Stress Management. Tagged: अनुभव, अलसी, असफलता, आयुर्वेदिक नुस्खे, कैंसर, खुद- इलाज, डाॅ0 बुडवीज, नकारात्मता, प्रसन्नता, प्रार्थना, मन, सेहत. 3s टिप्पणियाँ
अमरीका में प्रकाशित “द हैन्ड बुक ऑफ नेचुरल हैल्थ” में डॉ. बुडविज ने लिखा है कि कृत्रिम हाइड्रोजिनेटेज फैट स्वास्थ्य के लिए एक विष के सिवा कुछ नहीं है तथा स्वस्थ और निरोग शरीर के लिए आवश्यक वसा अम्ल बहुत जरूरी है प्रसिद्ध डाॅ0 योहाना बुडविज मूलतः वसा विशेषज्ञ थी जिन्होंने पेपर क्रोमेटिक तकनीक विकसित की है। डाॅ0 बुडविज के अनुसार रिफाईन्ड तेल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। वैज्ञानिक यूडो इरेसमस की पुस्तक ‘‘फेट्स देट हील फेट्स देट कील’’ बताती है कि परिष्कृत तेल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। रिफाइंड तेल में कैंसर पैदा करने वाले घातक तत्व होते है।
गृहणियों को खाना बनाने के लिए रिफाइंड तेल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। बल्कि फील्टर्ड तेल का प्रयोग करना चाहिए। इससे भी अच्छा कच्ची घाणी से निकला तेल होता है। हमें कच्ची घाणी से निकला नारियल तेल ,सरसों का तेल या तील का तेल काम में लेना चाहिए। क्योंकि ये तेल हानिकारक नहीं होते है।
तेलों का परिष्करण एक आधुनिक तकनीक है। जिसमें बीजों को 200-500 डिग्री सेल्सेयस के बीच कई बार गरम किया जाता है। घातक पैट्रोलियम उत्पाद हेग्जेन का प्रयोग तेल को रंगहीन और गन्धहीन बनाने के लिए किया जाता है। कई घातक रसायन कास्टिक सोड़ा, फोसफेरिक एसीड, ब्लीचिंग क्लेज आदि मिलाए जाते है ताकि निर्माता हानिकारक व खराब बीजों से भी तेल निकाले तो उपभोक्ता को उसको पता न चले। इसलिए इन तेलों को गन्ध रहित, स्वाद रहित व पारदर्शी बनाया जाता है। रिफाइंड, ब्लीच्ड एवं डिओडोराइन्ड की प्रक्रिया में तेल के अच्छे तत्व समाप्त हो जाते है व घातक जहर घुल जाते है।
तेलों की सेल्फ लाईफ बढ़ाने के लिए तेलों का निकल तथा हाइडाªेजन की मदद से हाइड्रोजिनेशन किया जाता है। यह तेल सफेद ठोस कड़ा और देखने में घी जैसा लगता है। यह तेल जो कभी खराब नहीं होता इसमें होते है। केमिकल्स द्वारा परिवर्तित फैटी एसीड, ट्रांसफेट और निकिल के अवशेष होते है जो शरीर के लिए चयापचित करना कठिन है। इस पूरी प्रक्रिया में बीजों में विद्यमान वनस्पतिक तत्व , विटामिन आदि पूरी तरह नष्ट हो जाते है।
सबसे बढि़या तेल जैतून का तेल होता है जो हमारे यहाँ बहुत मंहगा मिलता है। इसके बाद तिल का तेल (शीसेम आॅयल) एवं सरसों का तेल खाना चाहिए। मूंगफली के तेल में कोलोस्ट्राल की मात्रा ज्यादा होती है अतः वह भी कम खाना चाहिए। तलने के प्रक्रिया में तेल में मौजूद फैटी एसीड ट्रांस फैटी एसीड में बदल जाते है और उसमें उपस्थित सारे एन्टी आॅक्सीडेन्ट नष्ट हो जाते है। इसलिए तलना भी हानिकारक है। इसलिए तली-गली चीजें नहीं खानी चाहिए।
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फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Meditation, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, अवचेतन मन, असफलता, कृतज्ञता, खुद- इलाज, धन्यवाद, प्रसन्नता, मन, शिक्षान्तर. 3s टिप्पणियाँ
व्यवसाय आपके लिये है, आप व्यवसाय के लिये नहीं है। धन्धा पेट के लिये है, आप धन्धे के लिये नहीं है। जीवन जीने के लिये मिला है, व्यवसाय में डूबने के लिये नहीं। यह मंत्र जिसकी समझ में आ जाता है वह व्यावसायिक जीवन का दास न होकर उसका आनन्द उठाता है।
अपने कार्य, व्यवसाय, नौकरी से प्रेम कर उसका आनन्द उठायें। अपने काम की नकारात्मक बातें याद कर घृणा न करें। कई लोग अपने व्यवसाय को अपने अनुरूप न पाकर उससे शिकायत करते रहते हैं। यह असंतोष उनके जीवन को खोखला करता है व मन को अशांत करता है। इससे वे सदैव नाराज रहते हैं। जबकि वस्तुतः कोई भी व्यवसाय बडा या छोटा, अच्छा या बुरा नहीं होता है। यह उसके प्रति हमारी सोच है। व्यवसाय हमारे पेट के लिए होता है हम व्यवसाय के लिए नहीं बने हैं।
अपने व्यवसाय को सकारात्मक व अच्छा समझ कर हम भी अच्छे बन सकते हैं। हाँ, कुछ व्यवसायों से रिटर्न कम या ज्यादा हो सकता है। व्यवसायों की अपनी अच्छाईयाँ, बुराईया होती हंै। यदि हम अपने व्यवसाय को स्वीकार कर ले तो कोई कठिनाई नहीं है। अपने काम से प्यार करें। हर व्यवसाय में नामचीन लोग हुऐ है। हर व्यवसाय से लोग आगे बढ़ें हैं। दम पेशे में कम, व्यक्ति में अधिक होता है।
कृष्ण के निष्काम कर्म की भावना व्यवसाय के क्षेत्र पर भी लागू होती है। हमें अपने व्यवसाय को कत्र्तव्य समझकर करना चाहिये। निष्काम का अर्थ लक्ष्य बिना कर्म करना नहीं है। निष्काम का अर्थ फल की आसक्ति नहीं रखते हुए कर्म करने से है।
व्यवसाय चुनने के पहले सारा दिमाग लगा दो। अपने मन-माफिक है या नहीं समझ ले। एक बार व्यवसाय विशेष को चुन लिया फिर उसका बुरा पक्ष नहीं देखें। उसका सामना करने के उपाय खोजंे। उसमें भी बहुत सारी चुनौतियां व अच्छाईयां हैं।
हर व्यवसाय में बहुत अवसर हो सकते है। व्यवसाय को अपने ढंग से करंे। उसमें नई राहे खोजंे, अपने व्यवसाय के सफलतम लोगों का अध्ययन कर अपना विश्लेषण करें व अपने कार्य क्षेत्र के दिग्गजों से सम्पर्क में रहें।
व्यावसायिक जीवन में प्रसन्न रहने हेतु उसमें सफल होना जरूरी है। इसलियेे व्यावसायिक दक्षता हासिल करें। अपने व्यवसाय में निपुण होना, उसकी बारीकी को जानना, उसके हेतू उचित सम्पर्क व साथ रहना आना चाहिये। प्रोफेशन में लापरवाही नहीं चलती। प्रतिद्वन्द्विता का जमाना है। सावधान व सजग रहें ताकि धोखा न खा जाएं।
मनुष्य जीवन का अधिकतम् समय अपने व्यवसाय के प्रबन्धन में चला जाता है। व्यावसायिक जीवन संतुलित व प्रसन्नता देने वाला होना चाहिए। अपने व्यवसाय को भार, मजबूरी या खराब समझेेंगे। तो कभी भी आप उससे खुशी नहीं पा सकते ।
वारेन बफेट विश्व के दूसरे नम्बर के सबसे धनाढ्य व्यक्ति शेयर बाजार में निवेश करते हैं लेकिन उलझते नहीं है। निश्चित समय पर पूरी तन्मयता से काम करते है। फिर अपनी मौेज करते है। वे अपने साथ मोबाइल नहीं रखते व घर/ टेबल पर कम्प्यूटर के आगे नहीं बैठे रहते हैं। इतने जोखिम भरे प्रोफेशन में भी मस्ती से रहते हैं। इसका कारण है कि वे अपने धन्धे से दूरी रखने में कुशल हंै। घर पर, बिस्तर पर अपने पेशे को नहीं लाते हैं।
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फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Spirituality, Stress Management, success, Uncategorized. Tagged: अनुभव, अलसी, कृतज्ञता, जीने की कला, टिप्पणी, तनावमुक्ति, भाग्य, मन, मस्तिष्क, विवाह, समय प्रबन्धन. Leave a Comment
किसी भी खतरनाक बीमारी का डाइग्नोसिस रोगी एवं उसके परिजनों को डरा देता है। रोगी जीते हुए भी मृत्यु का अनुभव करता है एवं परिजन भय एवं चिंता में डूब जाते है। एड्स, कैन्सर एवं हेपेटाइटिस-बी जैसी जानलेवा बीमारियों में रोगी एवं उसके परिजन अपना सामान्य जीवन नहीं जी पाते और मृत्यृ का आसन्न भय सबको व्यथित कर देता है।
यर्थाथ में रोग हमारी अस्वस्थता का सूचक है। खतरनाक रोग मृत्यु का भय खड़ा कर संबंधित व्यक्तियों को डरा देता है। मृत्यु तो एक सहज, स्वाभाविक अनिवार्य प्रक्रिया है। यह कोई विशेष बात नहीं है। प्रतिक्षण हम मृत्यु की तरफ आगे बढ़ रहे हेैं।जिन्हें असाध्य रोग नहीं है उनकी उम्र रुकी नहीं रहती है। आयुक्षय सदैव सभी का जारी रहता है। अतः डर का कोई औचित्य नहीं है। स्व में स्थित व्यक्ति को ही स्वस्थ कहते हैं। वास्तव में असाध्य रोग की समस्या भय से उत्पन्न होने के कारण भय की समस्या है।
भय का सामना आशावादी दृष्टिकोण के साथ किया जाना चाहिए। प्रथमतः होनी को स्वीकारने के अतिक्ति और कोई मार्ग नहीं है। मृत्यु को स्वीकारने से डर समाप्त हो जाता है। फिर भय के निकल जाने से आत्मविश्वास बढ़ता है। समय पर असाध्य रोग का पता चल जाना अभिशाप नहीं वरदान है। रोगी इससे सचेत हो जाता है। रोगी के परिजन भी बेहतर इलाज का प्रबंध कर सकते हैं। रोग के ज्ञान से परिवार में तद्नुरुप योजनाएं बनाई जा सकती हैं। इससे निर्णय लेने में सुविधा रहती है। ताकि रोगी को अच्छे से अच्छे चिकित्सक का इलाज मिल सके एवं उसकी सुश्रुषा अच्छी तरह की जा सके। इससे अनेक बार असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं।
समय पर रोग का ज्ञान होने से व्यक्ति अपनी मानसिकता बदल पाता है। हिम्मत एवं धैर्य के साथ रोग का सामना किया जा सकता है। परमार्थिक चिंतन की तरफ ध्यान देकर शारीरिक चिंताओं को कम करने का अवसर मिलता है। रोगी अपने में वैचारिक परिवर्तन लाकर नकारात्मक चिंतन पर लगाम लगा सकता है। सकारात्मक चिंतन द्वारा रोग कि विरुद्ध लड़ने की प्रतिरोधात्मक शक्ति बढ़ाई जा सकती है। सारे दर्द शरीर में नहीं, मस्तिष्क में होते हैं। सारे तनाव का केन्द्र मन है। अतः मन को व्यवस्थित करने का इससे अवसर मिलता है। साथ जीवन मन से चलता है, तभी तो कहते हैं कि मन के जीते जीत है मन के हारे हार।
पूर्वज्ञान रोगी से रोगी अपने शेष जीवन का महत्व जान जाता है। ऐसे में वह अपनी गलत आदतों एवं लारवाहियों को छोड़ सकता है।
आखिर मनुष्य दीर्घ जीवन जीना क्यों चाहता है? जब आयु हमारे हाथ में नहीं है तो हम इसकी कामना क्यों करते हैं? कुछ और वर्ष जीकर भी हम क्या कर लेंगे। थोड़ा सा धन, बड़ा पद एवं प्रतिष्ठा अर्जित कर उसका क्या करेंगे, धन तिजोरियों में, पद कार्यालयों में एवं प्रतिष्ठा लोगों की स्मृति में रहती है। आज तक यह सब अर्जित किया है उसका परिणाम सामने है ।क्या हम अपनी पांचवी पीढ़ी को जानते हैं? किसी को नाम ज्ञात भी हो तो उसके क्या अर्थ हैं? उस शख्त को क्या लाभ है? अर्थात जीवन का लंबा होना नहीं, बेहतर होना महत्वपूर्ण है।
आत्मज्ञान के प्रकाश में कोई भी व्यक्ति अपना प्रत्येक संग्राम लड़ सकता है। फिर असाध्य रोग क्या चीज है, जीवन को समग्रता में समझने पर प्रत्येक समस्या का समाधान संभव है। हम अपने पूर्वाग्रहों, आवेगों एवं वासनाओं से आच्छादित हैं।अतः जीवन का अर्थ नहीं समझते। अध्यात्म मार्ग के सहारे स्वयं को जान कर जानलेवा बीमारियों से लड़े तो नई ऊर्जा मिलती है। तभी जीवन में कायाकल्प संभव है।
प्रार्थना में भी असीम शक्ति होती है। भौतिक शरीर मात्र अणुओं के संचालन से ही नहीं संचालित होता है। डाॅक्टर की दवाई ही नहीं, प्राकृतिक शक्तियां एवं प्रभु का आशीष भी लाभकारी होते हैं।
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जन
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, अवचेतन मन, अवचेतन मस्तिष्क, कृतज्ञता, कैंसर, धन्यवाद, निर्णय, मन, विवाह. 1 टिप्पणी
प्यार का प्रदर्शन आवश्यक है। यदि आप किसी को प्यार करते हो तो उसको प्रकट करिये, दिखाइयें। व्यस्तता से भरे जीवन में प्यार को छिपाने की आवश्यकता नहीं है। अपनी चाहत सामान्य लोगो से तो कहनी ही पड़ेगी। वे आपके प्यार को अन्यथा समझ न पाऐगे तो प्यासे ही रहेंगे। सबसे कमजोर व दुःखी को प्यार की ज्यादा जरुरत है।
यह सत्य है कि बुद्व पुरुषों या ज्ञानियों के सामने चाहत प्रदर्शित करने की जरुरत नहीं हेै। चूंकि आपके प्यार एवं समर्थन की उन्हें जरुरत नहीं है। लेकिन आम जन न तो आपके प्यार को पहचान सकता है, न प्रेम से परिपूर्ण है। उसे आपसे प्यार चाहिए इसलिए प्रदर्शित करों। तभी अमिताभ बच्चन बागवान में कहता है कि अधिकांश लोग अपनी पत्नी के प्रति प्यार को व्यक्त नही करते है। मैं यह गलती नहीं करता। मैं अपनी पत्नी के प्रति प्यार का बार-बार व्यक्त करता हूँ।
वह अन्यथा आपके प्यार से वंचित रह जायेगा। इसलिए प्यार के प्रदर्शन में बुराई नहीं है। व्यक्त करना समय की मांग है। अतः उसे व्यक्त करने की कला जानो। सम्बन्धों की दीवार इसी से मजबूत होगी।
माना कि कोई तुमसे प्यार करता है तो आप चाहते है न कि वह अभिव्यक्त करे। आप इसका आन्नद उठाओं। ठीक अन्य साथी भी उसी प्रकार को प्यार को प्रकट करने पर ही आन्नदित होते है ।
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दिस
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, असफलता, कृतज्ञता, टिप्पणी, धन्यवाद, प्रार्थना, मन, विवाह, शुभ कामनाएँ. 4s टिप्पणियाँ
तुम अब पूर्व से पश्चिम में की तरफ जा रही हो । अपनीमातृभूमि से दूर जा रही हो ।विवाह करने के 15 दिन बाद ही दूसरी संस्कृति में रहने जा रही हो । इसलिए कुछ चर्चा इस सन्दर्भ में करना मंै उचित समझता हूं ।
यह मात्र एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की यात्रा नहीं है । यह एक संस्कृति व सभ्यता से दूसरी दिशा में जाना है । हमारी आध्यात्मिक संस्कृति से पश्चिमी भौतिकवादी संस्कृति में जाना है । वहां का जीवन यहां से पूरी तरह भिन्न है ।
भौतिकवादी संस्कृतिव्यक्ति प्रधान, धन प्रधानव बाह्य जीवन प्रधान हैैै। वहां सबसे बड़ा मूल्य धन को दिया जाता है । दूसरे सारे मूल्य वहां पर बाद में आतें है । पश्चिम की संस्कृति व्यक्ति या निजता को बहुत महत्व देती है । वहां उन्नति व विकास व्यक्तिगत होता है । प्रदर्शन को पश्चिम में महत्व दिया जाता है । आत्मविश्वास को मुख्य माना है ।
हमारी संस्कृति मानवीय मूल्यों पर आधारित है । यहां व्यक्तिगत सुख, स्वार्थ या धन को प्रमुखता कम दी गई है । यहां दूसरों की सेवा को परमार्थ माना जाता है । अध्यात्म में मानवता, परोपकार एवं त्याग को प्रधानता दी गई है । आन्तरिक विकास एवं सद्गुणों को यहां अधिक महत्व दिया है । यहां आत्मा को प्रधानता दी जाती है । यहां स्थायी एवं नित्य को महत्व दिया जाता है ।
घर से 15 हजार किलोमीटर दूर मां की जगह सद्व्यवहार आपकी रक्षा करेगा, ज्ञान आपका पिता बनकर सलाह देगा, वहां विवेक ही आपका भ्राता होगा । सद्गुण आपके रिश्तेदार होंगे । इन सबकी भूमिकाएं आपको निभानी है । अपनी जिम्मेदारी स्वयं लेनी है । अपना जहाज स्वयं को चलाना है । वहां तुम ही अपनी सारथी होगी । तुफानों में फंसे जहाज को बाहर लाने की जिम्मेदारी स्वयं की है । कोई दूसरा सार्थक मददगार न मिलेगा ।वहां पर तुम ही अपनी रक्षक, संरक्षक व मालकिन हो ।
बराबरी के नाम पर तुम्हे पुरूष नहीं बनना है । पुरूष व स्त्री समान नहीं भिन्न-भिन्न है । इस जैविक सत्य से इन्कार करना कठिन है । नारी का अर्थ सौन्दर्य, कोमलता, अपनत्व व प्रेम है । इससे घर में प्रेम रस पैदा होता है । परिवार जुड़ा रहता है । पश्चिम में इन मूल्यों को चुनौति मिलेगी । इसलिए संभलकर रहना । अपना स्त्रित्व न भूले ।
विवाह बंधन भी एक तरह का योगाभ्यास है ।अपनी बुरी आदतों रूपी बिगडैल घोड़ों पर नियन्त्रण स्वयं को करना है । जीवन की प्रोग्रामिंग में भी कम्प्यूटर-प्रोग्रामिंग की तरह सतत् सुधार करने पड़ते हैं, करते रहे, आगे बढ़ते रहें…………….
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अक्टू
Posted by jayantijain in Life-Management, Meditation, Personality, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, अवचेतन मन, असफलता, कृतज्ञता, खास बात, धन्यवाद, प्रार्थना, ब्लॉग लेखन, भाग्य, मन, मस्तिष्क, लुईस हे, लेखक. 8s टिप्पणियाँ
हम सब में कुछ खास बात है। हम सबमें किसी न किसी रूप मंे कोई न कोई विशेषता है।दूसरों की तुलना मंे अच्छाई हं।हम अद्वितीय हंै, अनुपम हंै, खास है।
यह दुर्भाग्य की बात है कि हम अपनी खास बात को स्पष्ट रूप से नही जानते हंै। हम अपने को वक्त नही देते है। स्वयं की अनदेखी करते हंै। स्वयं को भूल जाते है। अपने को महत्व नही देते, अपनी विशेषता नही खोजते है। परमात्मा ने, प्र्रकृति ने, अस्तित्व ने आपको, हमको, सबको सकारण बनाया है। हम उसी की योजना के अनुसार हेैं। वह व्यर्थ कुछ नहीं करता हैं। फिर हम बेकार के कैसे हो सकते हैं? हम उसी विराट के अंश है, चाहे कितने ही छोटे हों।
प्रयोग-आॅंखे बंद ( दो मिनट ) सब लोग क्रमशः पाँच चेहरे याद करें। कितनो को माता, पिता, पत्नी, बच्चे याद आए? किसी को खुद का चेहरा दिखा?
मनुष्य एक बरबाद परमात्मा है। उसे अपने भीतर असीम सुख प्राप्त है व उसको प्रकट कर परमात्मा बन सकता है। मनुष्य का जन्म आनन्द को पाने के लिए हुआ है। व्यक्तिगत जीवन, व्यावसायिक जीवन, पारिवारिक जीवन व सामुदायिक जीवन को संभालना, संवारना व रचनात्मक बनाना है, समरस बनाना है। इसमें सामन्जस्य स्थापित करना है। मेरा उद्देश्य आपके जीवन को ऊंचा उठाना है। इसमें आनन्द पैदा करना है। मनुष्य जीवन को समाज के उपयोगी बनाना है। संवेदनशील व नेतृत्व गुणों से युक्त बनाना है।
हम रोते हुए पैदा होते है लेकिन यहाँ से जाते वक्त हँस सकते है।
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सित
Posted by jayantijain in Articles, Bloging, Life-Management, Personality, success, Uncategorized. Tagged: अनुभव, अवचेतन मन, पटकथा, प्रबल इच्छा, ब्लॉग लेखन, लेखक, शिक्षान्तर, सफलता. 1 टिप्पणी
उदयपुर इन्टरनेशनल फिल्म फेस्टीवल के क्रम में स्क्रिप्ट राईटिंग पर वर्कशाॅप दिनांक 15.09.2012 को उदयपुर में श्री सुभाषकपूर द्वारा ली गयी । मैने भी इसमे भाग लिया ।
सुभाषकपूर की पहली फिल्म सलाम इण्डिया थी । ये सिधे पत्रकारिता से फिल्म निर्माण व निर्देशन में आये हैं । इन्होने कोई फिल्म कला का औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया है । अपनी फिल्म निर्माण की प्यास एवं रूची के बलबुते पर इस क्षेत्र में सफलता पाई । सफल पटकथा लेखक बनने के लिए लिखने का जुनून होना प्रथम शर्त है ।
सुभाषकपूर ने बताया कि फिल्म का आधार पटकथा ही होता है । इसमे कथा भी सामान्य एवं ज्ञात ही होती है । मात्र प्रस्तुतीकरण नवीन तरह का एवं अपने आप में रूचीप्रद व विशिष्ट होता है । अतः लेखक को बात अपने अन्दाज में इस तरह प्रस्तुत करनी चाहिए कि वह दर्शकोें को डूबा दे । पटकथा दर्शकों के वर्ग को तय कर उसके अनुरूप लिखनी चाहिए । हरेक वर्ग का अपना सोच, स्तर, बिम्बो की समझ, मूल्य, सपने एवं द्वन्द भिन्न-भिन्न होते हैं । यानि उनकी मनोवृति व अवचेतन को ध्यान में रख कर संवाद एवं पटकथा लिखनी चाहिए । वैसे संवाद लेखन पटकथा से भिन्न व्यक्ति भी कर सकता है । नाटक, स्क्रीन-प्ले व पटकथा में अन्तर होता है । बार-बार लिखने से कला स्वतः ही विकसित होती है ।
वैसे डायरेक्टर एवं कथा लेखक के बीच निरन्तर संवाद एवं समझ होने पर अच्छी पटकथा बनती है । डायरेक्टर पटकथा को दृश्यों के रूप में देखता है । संपादक भी पटकथा को माॅजता है ।
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अग
Posted by jayantijain in Art of Living, Life-Management, Personality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, अलसी, जियो तो ऐसे जियो, जीने की कला, जीवन प्रबन्धन, धन्यवाद, मन, शिक्षान्तर, समय प्रबन्धन. Leave a Comment
जीवन-मुर्गों की रूसी-कथा
एक प्राचीन रूसी कथा है।
एक बड़े टोकरे में बहुत से मुर्गे आपस में लड़ रहे थे। नीचे वाला मुर्गा खुली हवा में सांस लेने के लिए अपने ऊपर वाले को गिराकर ऊपर आने के लिए फड़फड़ाता है। सब भूख-प्यास से व्याकुल हैं। इतने में कसाई छुरी लेकर आ जाता है। एक एक मुर्गे की गर्दन पकड़कर टोकरे से बाहर खींचकर काटकर वापस फेंकता जाता है। सफाई कर पंख आदि बाहर फेंकता जाता है।कटे हुए मुर्गों के शरीर से गर्म लहू की धार फूटती है। भीतर के अन्य जिंदा मुर्गे अपने पेट की आग बुझाने के लिए उस पर टूट पड़ते है। इनकी जिंदा चोंचों की छीना-झपटी में मरा कटा मुर्गे का सिर गेंद की तरह उछलता लुढ़कता है। कसाई लगातार टोकरे के मुर्गे काटता जाता है। टोकरे के भीतर की खाद्य सामग्री में हिस्सा बांटने वालों की संख्या भी घटती है। इस खुशी में बाकी बचे मुर्गो के बीच से एकाध की बांग भी सुनायी पड़ती है। अंत में टोकरा सारे कटे मुर्गो सेे भर जाता है। चारों ओर खामोशी है, कोई झगड़ा या शोर नहीं है।
इस रूसी कथा का नाम है-जीवन।
ऐसा जीवन है। सब यहां मृत्यु की प्रतीक्षा में है। प्रतिपल किसी की गर्दन कट जाती है। लेकिन जिनकी गर्दन अभी तक नहीं कटी है, वे संघर्षरत हैं, वे प्रतिस्पर्धा में जुटे हैं। जितने दिन, जितने क्षण उनके हाथ में है, उनका उन्हें उपयोग कर लेना है। इस उपयोग का एक ही अर्थ है-किसी तरह अपने जीवन को सुरक्षित कर लेना है, जो कि सुरक्षित हो ही नहीं सकता।
सफलता सदैव खुशी, शांति व तृप्ति नहीं लाती है। सफलता हमारी प्रतिष्ठा जरुर बढ़ा देती है। सफलता के
साथ शान्ति के आने का कोई नियम नहीं है।
( मेरी पुस्तक जियो तो ऐसे जियो की प्रस्तावना से )
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जुला
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, success, Uncategorized. Tagged: अनुभव, अवचेतन मन, असफलता, नकारात्मता, निर्णय, मन, शिक्षान्तर. 2s टिप्पणियाँ
- बच्चों को प्रोत्साहित करते रहेंगे तो उनमें आत्मविश्वास बढ़ेगा।
- बच्चों के सुख दुःख में साथ देगें तो उनका दिल बड़ा होगा।
- बच्चों के गुणों की प्रसंशा करेंगे तो वे भी दूसरों की प्रशंसा करना सीखेगें।
- बच्चों के साथ मित्रता रखेंगे तो उनको भी ऐहसास होगा कि दुनिया सुंदर है वे
- जीवन का मकसद समझेगें।
- बच्चों को गलतियों के साथ अपनाएंगे तो वे भी आपकोे गलतियाँे होने पर अपनाएंगे।
- बच्चों को हमेशा डराते रहेगें तो वे डरपोक बनेंगे।
- बच्चों को अगर बार-बार दोष देंगे तो वे स्वयं को एवं आपको पसन्द नहीं करेंगे।
- बच्चों के साथ दुश्मनी भरा व्यवहार करेंगे तो वे झगड़ालू स्वभाव के बन जाएंगे।
- बच्चों को हमेशा तिरस्कृत करंेगे तो वे हताश हो जाएगें।
- बच्चों का उपहास करेंगे तो वे नीरस बन जाएंगे।
- बच्चों को लाचार बनाओगे तो उनके मन में संकोच उत्पन्न होगा।