Archive for the ‘success’ Category
21
मई
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, आत्मछवि, कृतज्ञता, कैंसर, खुद- इलाज, धन्यवाद, निर्णय, प्रार्थना, मन, शुभ कामनाएँ, सकारात्मकता, सेहत. 1 टिप्पणी
आरोग्यधाम, प्रशान्ती कुटीर बैंगलोर में दिनांक 26.04.2013 से 03.05.2013 तक पत्नी सहित समग्र चिकित्सा हेतु रहा । यह स्वामी विवेकानन्द योग अनुसंधान संस्थान, (एस. व्यासा) डिम्ड विश्वविद्यालय का एक अंग है ।
यहां पर योग, आयुर्वेद व नेचुरोपेथी के स्वतन्त्र महाविद्यालय है । यहां योग पर रिसर्च सबसे अधिक हुई हैं एवं अनेक शोध पत्र चिकित्सा, मनोविज्ञान, के अन्तर्राष्ट्रिय जरनल्स छप चुके हैं । यहां पर योग चिकित्सा, आधुनिक विज्ञान, आयुर्वेद, नेचुरोपेथी व फिजियोथैरेपी के आधार से कई रोगों का सफलतापूर्वक ईलाज किया जाता है ।
पत्नी मीना के जोड़ों व सर्वाईकल दर्द में बहुत राहत मिली । वह विगत पांच वर्षों से दाई करवट सो नहीं पा रही थी, वह सोने लगी । वहां पर मीना के दर्द उठने पर तत्काल योगा करा कर पेन किलर देने की तरह दर्द दूर कर दिया ।योग, मसाज, लेप, स्टीम बाथ, सोना बाथ आदि से रीढ़ की हड्डी के सभी प्रकार के दर्द को दूर करने में विशेषज्ञता हासिल है ।
मेरा रक्तचाप 110/70 पर रहने लगा । नाड़ी शोधन व भ्रामरी का जबरदस्त प्रभाव देखा ।
गुरूजी डाॅ0 एच0आर0 नागेन्द्र भूतपूर्व अन्तरिक्ष वैज्ञानिक हैं जो अन्तरिक्ष की यात्रा को छोड़कर अन्तर्मन की यात्रा करा रहे हैं एवं विश्व प्रसिद्ध आधुनिक चिकित्सक डाॅ0 आर0 नागरत्ना दीदी का व्यवहार एवं सेवा अनुकरणीय है ।यह 100 एकड़ में निर्मित प्राकृतिक वातावरण से युक्त है । यहां का स्टाफ, थिरापिस्ट व डाॅक्टर सहयोगी हैं ।
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मई
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अवचेतन मन, अवचेतन मस्तिष्क, आत्मछवि, प्रबल इच्छा, बदलना, लेखक, शिक्षान्तर, सेहत. Leave a Comment
देह अपना उपचार स्वतः करती है
अपने हाथ की तरफ देखें यह ठोस दिखता है, दरअसल यह ठोस नहीं है। अगर आप इसे किसी अच्छे माइक्रोस्कोप के नीचे रखेंगे, तो आपको ऊर्जा की बहुत सी तरंगें दिखेंगी। हमारी देह ठोस नहीं है, यह मस्तिष्क की तरंगों के अधीन है।
सभी बीमारियाँ पहले मस्तिष्क में जन्म लेती हैं। जब तक मानसिक पेटर्न उस अनुरूप न बन जाय, तब तक वह शरीर पर प्रकट नहीं होती है। अचेतन रूप से रोग उत्पन्न करने के स्थान पर हम सचेतन रूप से स्वास्थ्य कैसे उत्पन्न करें? अपने शरीर का प्रिन्टआउट बदलने के लिये हमें अपने मस्तिष्क के साफ्टवेअर को नये सिरे से लिखना सीखना पड़ेगा। हम ही अपने रोगों को चुनते हंै, उन्हे नियन्त्रित करते हैं एवं उन्हें बढ़ने की सुविधाएॅ देते है। हम रोगों का चेतन मन द्वारा चयन नहीं करते हंै, यह चयन मन के अचेतन स्तर पर छुपे हुऐ तलो पर चुपचाप होता है। यदि कोई ऐसी क्षमता हमारे पास है तो उसे नियन्त्रित करने की क्षमता भी होनी चाहिये। यह पुस्तिका इस बारे में बताती है।
असाध्य मानसिक या शारीरिक रोग की जड़ें सदा ही गहरे अवचेतन मन में होती है। छिपी हुई जड़ांे को उखाडकर रोग को ठीक किया जा सकता है। मनुष्य की देह (सिक्रेशन) सबसे अधिक दवाएँ बनाने का कारखाना है । हमारी देह के उपचार में काम आने वाली सभी दवाओं के केमिकल्स हमारी देह में बनाए जाते है। इन सब दवाओं का निर्माण हमारी सोच एवं भावनाओं पर निर्भर है। नकारात्मक सोच व नकारात्मक भावनाओं से हमारे सिक्रेशन प्रभावित होते हंै। दुनिया के सबसे धीमे मारने वाले भंयकर जहर भी इसी देह में बनते है।
सतुंलित,सहज व नैसर्गिक देह स्वतः अपना उपचार करती है। देह में एक नैसर्गिक क्षमता है। अपना उपचार करती है। यह स्वतः अपने को संतुलित करती है। जब देह का ताप बढ़ जाता है तो देह स्वतः ही उन रसायनों का निर्माण करती है जो ताप घटाने में सहायक होते हैं। यह कार्य स्वतः चलता रहता है जब तक कि इस नैर्सगिक प्रकिया को बिगाड़ न दिया जाए । बिगड़ने पर देह ताप समान नहीं रख पाती है तभी हमें ताप बढ़ने का ज्ञान होता है।
हमारी स्थूल देह के पीछे क्वान्तम भौतिकीय देह है जो कि सूक्ष्म है, अदृश्य है। स्थूल देह का जन्म इसी सूक्ष्म देह की बदौलत है। उसमें परिवर्तन इसी के आधार पर होते हंै।
वातावरण वास्तव में हमारी देह का विस्तार है।जैसे दो तारो व ग्रहो के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध न होने के उपरान्त वं आपस में भी सम्बंन्धित है। वैसे ही हमारी देह के अणुओं के बीच सम्बन्ध न होने के बावजूद आपस में सम्बन्धित है।
हमारी देह का रूपाकार किसी शिल्प कृति से कम नहीं है।भीतर बैठी प्रज्ञा का यह आवरण मूर्ति के रूप में दिखता है। इसके निश्चित आकार-प्रकार हंै। इसके साथ ही हमारी देह के परमाणु बहती हुई नदी की तरह है। हमारी देह में कुछ भी स्थाई नहीं है। हमारी कोशिकाओं के प्रत्येक कण बदलते जाते हैं। हमारी रक्त कणिकाएँ नब्बे दिन में बदल जाती हैं। हड्डियों का ठोस ढांचा जिसके चारों ओर शरीर लिपटा रहता है, वह स्वयं भी एक सौ बीस दिन में पूरी तरह बदल जाता है।
18
अप्रै
Posted by jayantijain in Life-Management, Personality, Self-Healing, Stress Management, success. Tagged: असफलता, नकारात्मता, प्रबल इच्छा, मस्तिष्क, लेखक, सेहत, Beliefs, success, Value of life. 1 टिप्पणी
हम अपनी आदतों व धारणाओं में जीते हैं । उन्हीं मे अपने को सुरक्षित समझते हैं । फलस्वरूप हम नई धारणा ग्रहण कम करते है । अर्थात अपने को बदलते नही है । जबकि समय के साथ परिवर्तन जरूरी है । जो लोग नहीं बदलते है वह रूक जाते है । उनकी सोच व धारणाओं के बन्दी होकर रह जाते हैं । अन्धी धारणाओं के शिकार श्रीमाधोपुर में शिवजी से मिलने के क्रम में पूरे परिवार ने जहर खा लिया। यह नहीं बदलने व अपनी धारणाओं को सच मानने का ज्वलंत उदाहरण है । 
जो लोग धारणाओं को तोल नहीं पाते है, वे उसे सच मानकर सोच बन्द कर देते हैं । एक तरह से कहे कि उन्हे सोचना नहीं आता है । उनकी उन्नति रूक जाती है । मेरी एक घनिष्ठ साथी जिनका वजन बढ़ता जा रहा था । वे वजन घटाने की बात सुनती नहीं थी । उन्होने अपनी धारणाओं के विरूद्ध बदलना स्वीकार नहीं कर आत्महत्या कर ली ।
हमारे नहीं बदलने के कई कारण है । पहला कारण ‘‘मै भी समझता हूं’’ की धारणा व्यक्ति को सच महसूस कराती है । दूसरा कारण बदलने के खतरे से भी व्यक्ति बच जाता है । धारणा बदलने पर नए कर्म करने पड़ते है, जिससे व्यक्ति बचना चाहता है । अतः व्यक्ति बदलता नहीं है ।
जो समय के साथ नहीं बदलते हैं वे टुट जाते है । अतः समय के साथ बदलने वाले जीतते है ।
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अप्रै
Posted by jayantijain in Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, success. Tagged: कैंसर, क्षमता, खुद- इलाज, प्रबल इच्छा, प्रार्थना, मन, लुईस हे, सेहत. Leave a Comment
*मनुष्य कभी मरता नहीं ,वह अपनी हत्या करता है।(Man never dies, he kills himself.)
*डाॅक्टरों से अधिक इलाज भोजन करता है।(Diet cures more than doctors.)
*चालीस की उम्र में व्यक्ति या तो आधा डाॅक्टर बन जाता है या मूर्ख रहता है।(A man at 40 is either a physician or a fool.)
*ठोस को पिओं एवं द्रव को चबाओ (Drink your solids and eat your liquid.)
#परहेज इलाज से बेहतर है। (Preventaion is better than cure.)
#तन्दुरूस्ती हजार नियामत।
#रहे निरोगी जो कम खाय, काम न बिगाड़े जो गम खाए।
#यदि अपथ्य नियमित तो औषध क्या कर सकती?
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21
मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Stress Management, success. Tagged: अलसी, ऊर्जा, कैंसर, तनावमुक्ति, प्रसन्नता, मन, लुईस हे, शिक्षान्तर. 1 टिप्पणी
हमारे आज के भोजन में माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट की मात्रा उपलब्ध नहीं है जो कि हमारे 20-30 वर्ष के पूर्व के भोजन मे सहज उपलब्ध थी । आज का हमारा भोजन प्राकृतिक नहीं है । पहले सब्जियों से माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट मिलते थे । आज हमारी सब्जियां जैविक नहीं रही । तभी जैविक सब्जियांे का बाजार विकसित हो रहा है ।
सब्जियों को उगाते-2 हमारी खेतों की टोप सोइल अब बंजर हो गई । फिर इसको उगाने में रसायनिक खाद डालते हैं जिसमे माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट नहीं होते हैं । फिर इनका उत्पादन बढ़ाने का हम भिन्न-2 तरह के रसायन इन पर डालते हैं । किड़ों से बचाने पेस्टीसाइड्स डालते हैं । इस कारण हमें पहले अपने आहार में सब्जियों के सेवन से आवश्यक माइक्रो-न्यूट्रीटेन्ट में मिल जाते थे जो आज प्राप्त नहीं हो रहे हैं ।
पहले हम प्राकृतिक खनिज नमक खाते थे जिसमे सोडियम क्लोराइड के अलावा अन्य 94 खनिज तत्व मिलते थे । जो अब परिष्कृत नमक खाते हैं जिसमे सिर्फ सोडियम क्लोराइड व आयोडिन होते हैं । अन्य अच्छे खनिज भी फिल्टर के दौरान हटा दिये जाते हैं ।
भले ही सूक्ष्म मात्रा में लेकिन हमे आयोडिन, मेग्निश्यम, केल्शियम, सिलिका पूर्व के आहार में जो मिलते थे वो अब नहीे मिल रहे है । इसलिए हमे तथाकथित पौषक आहार के होते हुए भी पूरक आहार/सप्लीमेन्टरी डाइट की जरूरत है ।
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18
मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Book Review, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अलसी, कैंसर, मन, लेखक, शिक्षान्तर, शिखर पर मिलेगे, सेहत. 2s टिप्पणियाँ
डाॅ0 रे डी स्ट्रेंड ने एक पोषक तत्वों के बारे में उपयोगी किताब’’व्हाट योर डाॅक्टर डजन्ट नो अबाउट न्यूट्रिश्नल मेडिसिन मे बी किलींग यू’’ लिखी है जिसका हिन्दी अनुवाद ’’क्या आपका डाॅक्टर पोषक तत्वों के बारे में जानता है ?’’ े मंजुल पब्लिसींग हाउस भोपाल से छपी है । 
यह एक सत्य है कि दुनिया भर में डाॅक्टरों को दवाओं के जरिये बीमारियों का इलाज करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है । लेकिन उन्हे हमारे जीवन को स्वस्थ रखने के लिए महत्वपूर्ण और शक्तिशाली तरीकों के बारे में कोई ज्ञान नहीं दिया जाता है ।
यह पुस्तक आपको सिखाएगी कि क्यों सरकार द्वारा पोषक तत्वों की अनुशंसित मात्रा हमारे शरीर के प्राकृतिक रक्षातंत्र को बीमारियों के प्रति शक्तिशाली नहीं बना पाती है – और आपको पोषक तत्वों की कितनी मात्रा की आवश्यकता होती है ।
शरीर के अन्दर आॅक्सीजन का विघटन किस प्रकार विनाश उत्पन्न करता है और आप इससे हुई क्षति से कैसे निपट सकते हैं ।आप लगातार होने वाली एलर्जी और सायनस के संक्रमण से किस प्रकार लड़ सकते हैं ।
आपके डाॅक्टर द्वारा गंभीर क्षयकारी बीमारियों से बचाव के लिए दी गई दवाइयाॅं क्यों बेहतर नहीं होती है ।
बड़े दुख की बात है कि जब तक आपको किसी बीमारी का पता चलता है तब तक आप एक स्वस्थ और उत्साहपूर्ण जीवन खो देते हैं ।
रे स्ट्रैंण्ड की क्रांतिकारी पुस्तक
- आपको वर्तमान और भविष्य में अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के सरल उपायों के बारे में बताती है ।
- यह बीमारियों के कारण हुए नुकसान से भी छुटकारा दिलाती है ।
- अपने शरीर की प्राकृतिक उपचार शक्ति में बढ़ोतरी करें ।दिल की बीमारियों से बचाव के लिए कोलेस्टेराॅल का स्तर महत्वपूर्ण कुंजी क्यों नहीं है
- कैंसर, डायबिटीज, आर्थराइटिस, अल्जाइमर्स, फाइब्रोमाएल्जिया और अन्य बीमारियों की जड़ के बारे में चिकित्सा प्रमाण वास्तव में क्या बताते हैं
- बुढ़ापे को रोकने की सही रणनीति पर अमल करना अभी शुरू करें और खुद को आॅक्सीजन के हानिकारक प्रभावों से बचाएॅ
7
मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success, Uncategorized. Tagged: आत्मछवि, प्रसन्नता, ब्लॉग लेखन, लुईस हे, शिखर पर मिलेगे, शुभ कामनाएँ. Leave a Comment
हे शिक्षक!
मैं जानता हूं और मानता हूं
कि न तो हर व्यक्ति सही होता है
और न ही होता हैं सच्चा
किंतु तुम्हें सिखाना होगा कि
कौन बुरा है और कौन अच्छा।
दुष्ट व्यक्तियों के साथ-साथ आदर्श प्रणेता भी होते हैं,
स्वार्थी राजनीतिज्ञों के साथ-साथ समर्पित नेता भी होते हैं
दुश्मनों के साथ-साथ मित्र भी होते हैं,
हर विरूपता के साथ सुन्दर चित्र भी होते हैं।
समय भले ही लग जाए, पर
यदि सिखा सको तो उसे सिखाना
कि पाए हुए पांच से अध्कि मूल्यवान है -
स्वयं एक कमाना।
पाई हुई हार को कैसे झेले, उसे यह भी सिखाना
और साथ ही सिखाना, जीत की खुशियां मनाना।
यदि हो सके तो उसे ईष्र्या या द्वेष से परे हटाना
और जीवन में छिपी मौन मुस्कान का पाठ पठाना।
जितनी जल्दी हो सके उसे जानने देना
कि दूसरों को आतंकित करने वाला स्वयं कमजोर होता है,
वह भयभीत व चिंतित है
क्योंकि उसके मन में स्वयं चोर होता है।
उसे दिखा सको तो दिखाना -
किताबों में छिपा खजाना।
और उसे वक्त देना चिंता करने के लिए
कि आकाश के परे उड़ते पंछियों का आह्लाद,
सूर्य के प्रकाश में मध्ुमक्खियों का निनाद,
हरी-भरी पहाडि़यों से झांकते पफूलों का संवाद,
कितना विलक्षण होता है – अविस्मरणीय, अगाध्
उसे यह भी सिखाना -
धेखे से सफलता पाने से असपफल होना सम्माननीय है।
और अपने विचारों पर भरोसा रखना अध्कि विश्वसनीय है।
चाहें अन्य सभी उनको गलत ठहरायें
परंतु स्वयं पर अपनी आस्था बनी रहे यह विचारणीय है।
उसे यह भी सिखाना कि वह सदय के साथ सदय हो,
किंतु कठोर के साथ हो कठोर।
और लकीर का फकीर बनकर,
उस भीड़ के पीछे न भागे जो करती हो – निरर्थक शोर।
उसे सिखाना
कि वह सबकी सुनते हुए अपने मन की भी सुन सके,
हर तथ्य को सत्य की कसौटी पर कसकर गुन सके।
यदि सिखा सको तो सिखाना कि वह दुःख में भी मुस्कुरा सके,
घनी वेदना से आहत हो, पर खुशी के गीत गा सके।
उसे यह भी सिखाना कि आंसू बहते हों तो उन्हें बहने दे,
इसमें कोई शर्म नहीं ़ ़ ़ कोई कुछ भी कहता हो ़ ़ ़ कहने दे।
उसे सिखाना -
वह सनकियों को कनखियों से हंसकर टाल सके
पर अत्यन्त मृदुभाषी से बचने का ख्याल रखे।
वह अपने बाहुबल व बु(िबल का अध्कितम मोल पहचान पाए
परंतु अपने हृदय व आत्मा की बोली न लगवाए।
वह भीड़ के शोर में भी अपने कान बन्द कर सके
और स्वतः की अंतरात्मा की सही आवाज सुन सकेऋ
सच के लिए लड़ सके और सच के लिए अड़ सके।
उसे सहानभूति से समझाना
पर प्यार के अतिरेक से मत बहलाना।
क्योंकि तप-तप कर ही लोहा खरा बनता है,
ताप पाकर ही सोना निखरता है।
उसे साहस देना ताकि वक्त पड़ने पर अध्ीर बने
सहनशील बनाना ताकि वह वीर बने।
उसे सिखाना कि वह स्वयं पर असीम विश्वास करे,
ताकि समस्त मानव जाति पर भरोसा व आस ध्रे।
यह एक बड़ा-सा लम्बा-चैड़ा अनुरोध् है
पर तुम कर सकते हो, क्या इसका तुम्हें बोध् है?
मेरे और तुम्हारे ़ ़ ़ दोनों के साथ उसका रिश्ता हैऋ
सच मानो, मेरा बेटा एक प्यारा-सा नन्हा सा पफरिश्ता है!
5
मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: असफलता, जीने की कला, तनावमुक्ति, मन, लेखक, सकारात्मकता, समय प्रबन्धन. 4s टिप्पणियाँ
मैं एक सत्य घटना से अपनी बात प्रारम्भ करना चाहता हूं । सन् 1923 अमेरिका में – शिकागों के एजवाटर बीच पर तब के सबसे अमीर 9 व्यापारी एकत्रित हुए। जिनका कुल जमा धन दुनिया की कुल पूंजी का 50ः से अधिक था ।
एक शोधकर्ता ने 25 वर्ष बाद उन सबकी वापस खोज की गई तब उनकी स्थिति निम्न प्रकार पाई गई ।
धनिक का नाम व्यवसाय 25 साल बाद परिणाम
1. चाल्र्स श्वाब स्टील कम्पनी के मुख्यिा 5 साल ऋण में रह कर मरे
2. सेम्युअल इन्सूल सबसे बड़ी यूटिलिटी के अध्यक्ष विदेश में दिवालिए होकर मरे
3. हार्वड हाप्सन सबसे बड़ी गैस कम्पनी के मुखिया पागल हो गये
4. आइवर क्रुजर सबसे बड़ी अन्तर्राष्टीªय मैच कम्पनी के मुख्यिा गरीबी में मरे
5. लिआॅन फ्रेजिअर बैंक आॅफ इन्टरनेशनल सेटलमेन्ट के अध्यक्ष आत्महत्या
6. रिचार्ड व्हाटनी न्यूयार्क स्टोक एक्सचेन्ज के मुखिया जेल से रिहा
7. आर्थर क्राॅटन शेयर दलाल गरीबी में मरे
8. जेसी लीवरमारे शेयर दलाल आत्महत्या
9. अल्बर्ट फाॅल होर्डिंग के केबिनेट मन्त्री जेल से रिहा
इन 9 अरबपतियों में से 2 ने आत्महत्या कर ली थी । एक अरबपति पागल हो चुके थे । 2 अरबपति जेल से रिहा हुए थे एवं 4 अरबपति गरीब हो गये थे ।
अर्थात सिर्फ धन से सभी समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता है । जीवन शैली से उत्पन्न समस्याओं का समाधान जीवन शैली बदल कर ही किया जा सकता है । तनाव से उत्पन्न समस्याओं का समाधान आराम करके ही किया जा सकता है । धन से आराम की सुविधाएं खरीदी जा सकती है, आराम नहीं । हम स्वयं अपने लिऐ समस्या है । महावीर ने यही कहा है कि स्वयं को बदलने से उलझने मिटाई जा सकती है । समस्याएं डर व लालच जानते है, उनको जीतकर ही उनसे पार हुआ जा सकता है ।
जीवन जीने के लिए पैसे की समझ/वित्तिय साक्षरता/जीने की कला/संयम/स्वयं का ज्ञान होना चाहिऐ । अपनी आवश्यकताओं, उपभोग, सुविधाओं, खर्च, आय की समझ होनी चाहिये । जीवन का मात्र भौतिक तल ही नही है । मानसिक तल व चेतना तल पर भी जीवन है । जीवन का अर्थ ही एक तल नहीं है । स्याद्वाद को आर्थिक क्षैत्र में भी लागू करें ।
हमारा अनुभव व समाज कहता है किThe whole thing is that सबसे बड़ा रूपया । महावीर ने कहा नही The whole thing is that सबसे बडी Life है । हम है हमारा जीवन है । हमारी जीवन शैली है । हमारी सहजता है । प्रकृति है ।
1
मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अलसी, कृतज्ञता, खुश, जीने की कला, प्रसन्नता, ब्लॉग लेखन, मन, मस्तिष्क, शुभ कामनाएँ. Leave a Comment
हम सब खुशी चाहते हैं । जीवन में हमे यश नहीं, धन नहीं खुशी चाहिए । समाज में नाम नहीं जीवन में खुशी चाहिए। धन व प्रतिष्ठा से खुशी नहीं मिलती है। शांत होने पर ही सच्ची खुशी मिलती है । आज हमारी प्राथमिकताएं स्पष्ट नही है । हम यह भी नहीं जानते कि हमें क्या चाहिए । हमें खुशी कहां मिलती है इसका हमें ज्ञान नही है । दूसरों का पद एवं पैसा उन्हे सुख देता नजर आता है , जो कि वास्तव में सुख का कारण नहीं है । पद एवं पैसे की दौड़ में हमारी उम्र बिती जा रही है ।
हम अन्दर से अव्यवस्थित व टूटे हुए हैं। हमारे भीतर आन्तरिक दरार बड़ी है । हमारे मूल्य निश्चित नहीं है । हम बाहर कुछ व भीतर कुछ हैं ।
हमे अन्दर से व्यवस्थित, संतुलित व एकरूप होना है । कथनी व करनी के भेद को मिटाना है । वास्तविक उन्नति अन्दर से संतुलित व संगठित होना है।
अन्दर से स्थिर होना, मन में साम्यता-समता पैदा करना विकास है । हम अच्छे सूट व टाई से नहीं बड़े होते हैं ।
हमे अपने आन्तरिक उपद्रवों को मिटाना है । अब महत्वपूर्ण यह है कि स्वयं हमारे विचार कैसे चलते हैं ? भावनाएं कैसे आन्दोलित करती है । स्वयं से नाराजगी कितनी कम करते हैं ।
पदौन्नति नहीं आन्तरिक खुशी चाहिए । पदौन्नति बाहर के परिकर बढ़ाती है जो अशान्ती के कारण है । अतः पदोन्नति से ज्यादा शान्ति चाहिए । हमारा जीवन अन्दर से खोखला व बाहर से बड़ा व्यर्थ है ।
20
फ़र
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Stress Management, success. Tagged: अवचेतन मस्तिष्क, कविता, कृतज्ञता, कैंसर, नकारात्मता, प्रबल इच्छा, प्रसन्नता, प्रार्थना, बदलना, मन, लेखक. Leave a Comment
पं0 नरेन्द्र मिश्र, वीर रस के राष्ट्रीय कवि से मुलाकात पर उनसे चर्चा के दौरान यह समझ में आया कि कविता भी परिवर्तन का एक माध्यम है । कविता पढ़ कर भी व्यक्ति बदल सकता है । नये मूल्यों को सिखाने में कविता की बड़ी भूमिका है । 
कविता भाव प्रधान होती है । उसका प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रभाव बहुत गहरा, सूक्ष्म व व्यापक होता है । यह सीधे दिल को छूती है । अचेतन को प्रभावित करती है । इसमे संप्रेषणिता बहुत जबरदस्त होती है । मात्र तुकबन्दी व गेय होने से कविता बढि़या नहीं हो जाती है । उसमे संप्रेषण की क्षमता से कविता बड़ी होती है । संप्रेषणशिलता ही कविता की जान है। कविता व्यक्ति को बदलने का सशक्त माध्यम है । इसके द्वारा किसी भी व्यक्ति को समझाना सरल होता है । तभी तो कवि सम्मेलन में श्रोताओं को प्रेरित होते देखा जाता है ।
कविता अगर सच्ची कविता हो तो असर छोड़ती ही है । कविता में उसके अपने गुण होने चाहिए । पूर्व में युद्ध क्षैत्र में वीर रस की कविता सुनकर योद्धा युद्ध के लिए प्रेरित होते रहे हैं । राणा प्रताप भी पाथल-पीथल की एक कविता पढ़ कर निराशा से बाहर आ जाते हैं, और मुगलांे को पुनः युद्ध करने के लिए ललकारते हैं । अपना खोया साहस पुनः प्राप्त करते है । कविता ही उन्हें स्वयं के गौरव की याद दिलाती है । इस तरह महाराणा प्रताप का रूपान्तरण होता है ।
आज के संदर्भ में छिछली चुटकले रूपी कविताओं एवं तुकबन्दियों के कारण हम उसकी शक्ति भूल गये हैं । कविता को मात्र मनोरंजन का साधन समझने लगे है । जबकि एक समय में निराला ने पृथ्वीराज कपूर को फिल्म के लिए कविता लिखने के लिए मना कर दिया था । कविता ढंग से समयानुकूल उदाहरण सहित रची हुई होनी चाहिए । सही प्रासंगिक कविता आग जैसे बदलाव लाती है ।