Archive for the ‘Spirituality’ Category
13
जून
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management. Tagged: कैंसर, खुद- इलाज, तनावमुक्ति, नकारात्मता, भाग्य, लुईस हे, शुभ कामनाएँ, सेहत. Leave a Comment
स्वस्थ होने के लिए स्वस्थ मानसिकता बहुत जरूरी है । बीमार मन को लेकर हम तन को स्वस्थ नहीं कर सकते हैं । मानसिकता को स्वस्थ बनाने हेतु प्रिय व पसंद के लोगों के बीच रहे जो आपकी ऊर्जा तन्त्र को मजबूत करें । जिनके होने से आपको सकारात्मक ऊर्जा मिले ।आपकी भावनाएं अच्छी होती हो उन लोगों के संग रहे । जिन लोगों को मिलने पर ऊर्जा खर्च होती हो, अच्छा न लगता हो, उनसे दूर रहे । ये नकारात्मक लोग आपकी घनात्मक ऊर्जा को पी जाते हैं । अतः ऐसे लोगों से दूर रहने की आवश्यकता है । अपनी कमजोरियों व दुःखों की बाते न करें । हंसते-गाते रहे ।
अपने लक्ष्य व इच्छाओं की अपनों से चर्चा करें । अपने जीने का मकसद स्पष्ट करें इससे आपको स्वस्थ होने का मार्ग खूलेगा । आपके शरीर की कोशिकाएं स्वतन्त्रता महसूस करेगी। जिससे उनमे बल उत्पन्न होगा ।
हम सब एक तरह के विचार एवं भाव में जीते है । हमारी अपनी धारणाएं है । जिनको बदलने की सख्त जरूरत है, जिसे लोथर हरनाइसे सिस्टम जम्पस कहता है । इस मनोवृति को बदलना बहुत आवश्यक है । तभी तो कहावत है कि रोग का नहीं रोगी का उपचार करो ।
रोगी में स्वस्थ होने की इच्छा, सपना और दृष्टि होनी चाहिए । उसमे जीने की, स्वस्थ होने की तमन्ना होनी चाहिए । अन्यथा कोई भी चिकित्सक चिकित्सा नहीं कर सकता है । रोगी का स्वस्थ होने का मनोबल व सहयोग आवश्यक है।
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मई
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Self-Healing, Spirituality, Stress Management. Tagged: अलसी, कैंसर, खुद- इलाज, प्रार्थना, मन, लुईस हे, सेहत. 1 टिप्पणी
सामान्यतः डाॅक्टर लोग रोगी को देख कर रोगों का ईलाज करते हैं । जबकि रोगी का ईलाज किया जाना चाहिए । क्योंकि प्रत्येक रोगी भिन्न है । प्रत्येक रोगी की कोशिकाएं, डीएनए, प्रतिरोध क्षमता भिन्न होती है ।
एक व्यक्ति का आंतरिक संगठन व संरचना कई तरह से भिन्न होती है । वे एक भौतिक ईकाइ नही है । सबकी अपनी-अपनी विशेषताएं व कमजोरियां है । अतः रोगों को देखकर ईलाज करना उचित नहीं है । तभी तो कहावत है कि एक को बैंगन पच एवं दूसरे को वायु करता है।
मच्छर कई लोगों को काटता है लेकिन सभी को मलेरिया नही होता है । हम सब के शरीर में टीबी के वाइरस है लेकिन सब को टीबी नहीं हुई है । क्यों ? प्रत्येेक व्यक्ति की प्रतिरोध क्षमता भिन्न-2 होती है । मलेरिया परजीवी कुछ व्यक्तियों में बुखार फैला देते हैं । कुछेक व्यक्ति इससे घायल हो जाते हैं । सबके शरीर इनके विकास में सहायता नहीं करते हैं । यह साइको-बायलोजिकल माडल है।
प्रकृति भी प्रत्येक व्यक्ति को समाज की तरह समान नहीं मानती है । क्योंकि सब में कुछ बड़ी समानताओं के उपरान्त असमानताएं भी होती है । तभी तो आज समाज सबको समान मानकर व्यववहार करता है जो उचित नहीं होता है । तन्त्र की असफलता के पिछे सबको समान मानना बड़ा कारण है ।
डाॅक्टर शरीर का ईलाज करता है । हम मात्र शरीर नहीं है । मनुष्य शरीर, मन व चेतना का गठजोड़ है । चिकित्सा विज्ञान के अनुसार ‘‘आप शरीर को ठीक रखो, मन अपने आप ठीक हो जाएगा ।’’ की कहावत बायोमेडिकल माडल अनुरूप है । जो यह मानता है कि शरीर को ठीक कर दो । बाकी सब स्वतः ठीक हो जाएगा । यह ठीक नहीं है।
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मई
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, आत्मछवि, कृतज्ञता, कैंसर, खुद- इलाज, धन्यवाद, निर्णय, प्रार्थना, मन, शुभ कामनाएँ, सकारात्मकता, सेहत. 3s टिप्पणियाँ
आरोग्यधाम, प्रशान्ती कुटीर बैंगलोर में दिनांक 26.04.2013 से 03.05.2013 तक पत्नी सहित समग्र चिकित्सा हेतु रहा । यह स्वामी विवेकानन्द योग अनुसंधान संस्थान, (एस. व्यासा) डिम्ड विश्वविद्यालय का एक अंग है ।
यहां पर योग, आयुर्वेद व नेचुरोपेथी के स्वतन्त्र महाविद्यालय है । यहां योग पर रिसर्च सबसे अधिक हुई हैं एवं अनेक शोध पत्र चिकित्सा, मनोविज्ञान, के अन्तर्राष्ट्रिय जरनल्स छप चुके हैं । यहां पर योग चिकित्सा, आधुनिक विज्ञान, आयुर्वेद, नेचुरोपेथी व फिजियोथैरेपी के आधार से कई रोगों का सफलतापूर्वक ईलाज किया जाता है ।
पत्नी मीना के जोड़ों व सर्वाईकल दर्द में बहुत राहत मिली । वह विगत पांच वर्षों से दाई करवट सो नहीं पा रही थी, वह सोने लगी । वहां पर मीना के दर्द उठने पर तत्काल योगा करा कर पेन किलर देने की तरह दर्द दूर कर दिया ।योग, मसाज, लेप, स्टीम बाथ, सोना बाथ आदि से रीढ़ की हड्डी के सभी प्रकार के दर्द को दूर करने में विशेषज्ञता हासिल है ।
मेरा रक्तचाप 110/70 पर रहने लगा । नाड़ी शोधन व भ्रामरी का जबरदस्त प्रभाव देखा ।
गुरूजी डाॅ0 एच0आर0 नागेन्द्र भूतपूर्व अन्तरिक्ष वैज्ञानिक हैं जो अन्तरिक्ष की यात्रा को छोड़कर अन्तर्मन की यात्रा करा रहे हैं एवं विश्व प्रसिद्ध आधुनिक चिकित्सक डाॅ0 आर0 नागरत्ना दीदी का व्यवहार एवं सेवा अनुकरणीय है ।यह 100 एकड़ में निर्मित प्राकृतिक वातावरण से युक्त है । यहां का स्टाफ, थिरापिस्ट व डाॅक्टर सहयोगी हैं ।
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मई
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अवचेतन मन, अवचेतन मस्तिष्क, आत्मछवि, प्रबल इच्छा, बदलना, लेखक, शिक्षान्तर, सेहत. Leave a Comment
देह अपना उपचार स्वतः करती है
अपने हाथ की तरफ देखें यह ठोस दिखता है, दरअसल यह ठोस नहीं है। अगर आप इसे किसी अच्छे माइक्रोस्कोप के नीचे रखेंगे, तो आपको ऊर्जा की बहुत सी तरंगें दिखेंगी। हमारी देह ठोस नहीं है, यह मस्तिष्क की तरंगों के अधीन है।
सभी बीमारियाँ पहले मस्तिष्क में जन्म लेती हैं। जब तक मानसिक पेटर्न उस अनुरूप न बन जाय, तब तक वह शरीर पर प्रकट नहीं होती है। अचेतन रूप से रोग उत्पन्न करने के स्थान पर हम सचेतन रूप से स्वास्थ्य कैसे उत्पन्न करें? अपने शरीर का प्रिन्टआउट बदलने के लिये हमें अपने मस्तिष्क के साफ्टवेअर को नये सिरे से लिखना सीखना पड़ेगा। हम ही अपने रोगों को चुनते हंै, उन्हे नियन्त्रित करते हैं एवं उन्हें बढ़ने की सुविधाएॅ देते है। हम रोगों का चेतन मन द्वारा चयन नहीं करते हंै, यह चयन मन के अचेतन स्तर पर छुपे हुऐ तलो पर चुपचाप होता है। यदि कोई ऐसी क्षमता हमारे पास है तो उसे नियन्त्रित करने की क्षमता भी होनी चाहिये। यह पुस्तिका इस बारे में बताती है।
असाध्य मानसिक या शारीरिक रोग की जड़ें सदा ही गहरे अवचेतन मन में होती है। छिपी हुई जड़ांे को उखाडकर रोग को ठीक किया जा सकता है। मनुष्य की देह (सिक्रेशन) सबसे अधिक दवाएँ बनाने का कारखाना है । हमारी देह के उपचार में काम आने वाली सभी दवाओं के केमिकल्स हमारी देह में बनाए जाते है। इन सब दवाओं का निर्माण हमारी सोच एवं भावनाओं पर निर्भर है। नकारात्मक सोच व नकारात्मक भावनाओं से हमारे सिक्रेशन प्रभावित होते हंै। दुनिया के सबसे धीमे मारने वाले भंयकर जहर भी इसी देह में बनते है।
सतुंलित,सहज व नैसर्गिक देह स्वतः अपना उपचार करती है। देह में एक नैसर्गिक क्षमता है। अपना उपचार करती है। यह स्वतः अपने को संतुलित करती है। जब देह का ताप बढ़ जाता है तो देह स्वतः ही उन रसायनों का निर्माण करती है जो ताप घटाने में सहायक होते हैं। यह कार्य स्वतः चलता रहता है जब तक कि इस नैर्सगिक प्रकिया को बिगाड़ न दिया जाए । बिगड़ने पर देह ताप समान नहीं रख पाती है तभी हमें ताप बढ़ने का ज्ञान होता है।
हमारी स्थूल देह के पीछे क्वान्तम भौतिकीय देह है जो कि सूक्ष्म है, अदृश्य है। स्थूल देह का जन्म इसी सूक्ष्म देह की बदौलत है। उसमें परिवर्तन इसी के आधार पर होते हंै।
वातावरण वास्तव में हमारी देह का विस्तार है।जैसे दो तारो व ग्रहो के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध न होने के उपरान्त वं आपस में भी सम्बंन्धित है। वैसे ही हमारी देह के अणुओं के बीच सम्बन्ध न होने के बावजूद आपस में सम्बन्धित है।
हमारी देह का रूपाकार किसी शिल्प कृति से कम नहीं है।भीतर बैठी प्रज्ञा का यह आवरण मूर्ति के रूप में दिखता है। इसके निश्चित आकार-प्रकार हंै। इसके साथ ही हमारी देह के परमाणु बहती हुई नदी की तरह है। हमारी देह में कुछ भी स्थाई नहीं है। हमारी कोशिकाओं के प्रत्येक कण बदलते जाते हैं। हमारी रक्त कणिकाएँ नब्बे दिन में बदल जाती हैं। हड्डियों का ठोस ढांचा जिसके चारों ओर शरीर लिपटा रहता है, वह स्वयं भी एक सौ बीस दिन में पूरी तरह बदल जाता है।
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अप्रै
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Meditation, Personality, Self-Healing, Spirituality, Uncategorized. Tagged: अलसी, अवचेतन मस्तिष्क, एकाग्रता, कैंसर, खुद- इलाज, लुईस हे, सकारात्मकता, सेहत. Leave a Comment
हम ऊर्जा के पूंज है । जब तक ऊर्जा का बहाव आसानी से पूरी तरह शरीर में होता रहता है तब तक हम स्वस्थ रहते हैं । हमारे ऊर्जा पथ में ज्योंहि बाधा पहुंचती है, शरीर रूग्ण हो जाता है । ऊर्जा पथ मे विकृति शरीर को विकृत कर देती है ।
ऊर्जा पथ की चाबी हमारे स्वस्थ मन, भाव एवं विचार के अधीन है । स्वस्थ मन के होने पर ऊर्जा निर्बाध बहती रहती है । स्वस्थ भाव व मन के होने पर ही कोशिकिय श्वसन अच्छा होता है । निर्बाध आक्सीजन का बहना कोशिकिय श्वसन के लिए जरूरी है । शरीर में इसका दौड़ना इन्ही भावों व विचारों के अधीन है ।
कैन्सर अर्थात शरीर में ऊर्जा का संचरण सही तरीके से नहीं हो रहा है । ऊर्जा पथ को कैन्सर कोशिकाओं ने अपने नियन्त्रण में ले लिया है । रोगी की सोच एवं भाव अराजक है । कैन्सर होने का अर्थ है कि मन भी विकार ग्रस्त है । अतः सर्व प्रथम मन को कैन्सर केन्द्र से मुक्त करना पड़ता है । भाव एवं विचार की दिशा बदले बिना कैन्सर कौशिकाओं पर नियन्त्रण कठिन है । मात्र पोषक आहार एवं निर्विषिकरण से इसे रोकना मुश्किल है । इस हेतु मन में दबे भावों, गुस्से, ईष्र्या, दुःख, हार, बदले के भाव आदि का रेचन जरूरी है ।
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अप्रै
Posted by jayantijain in Articles, Life-Management, Personality, Self-Healing, Spirituality, success. Tagged: कैंसर, क्षमता, खुद- इलाज, प्रबल इच्छा, प्रार्थना, मन, लुईस हे, सेहत. Leave a Comment
*मनुष्य कभी मरता नहीं ,वह अपनी हत्या करता है।(Man never dies, he kills himself.)
*डाॅक्टरों से अधिक इलाज भोजन करता है।(Diet cures more than doctors.)
*चालीस की उम्र में व्यक्ति या तो आधा डाॅक्टर बन जाता है या मूर्ख रहता है।(A man at 40 is either a physician or a fool.)
*ठोस को पिओं एवं द्रव को चबाओ (Drink your solids and eat your liquid.)
#परहेज इलाज से बेहतर है। (Preventaion is better than cure.)
#तन्दुरूस्ती हजार नियामत।
#रहे निरोगी जो कम खाय, काम न बिगाड़े जो गम खाए।
#यदि अपथ्य नियमित तो औषध क्या कर सकती?
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अप्रै
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Book Review, Personality, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, Uncategorized. Tagged: अलसी, अवचेतन मन, कृतज्ञता, कैंसर, निर्णय, प्रबल इच्छा, मन, मनोवृती, मस्तिष्क, लुईस हे, सेहत. 1 टिप्पणी
एलोपैथी के अतिरिक्त भी कैंसर का इलाज कई तरीकों से होता है । इसका उद्देश्य कैन्सर रोगियों को वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति से अवगत कराना है । इसने एलोपैथी के साथ-साथ वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों का अध्ययन कर बताया है कि बुडविझ प्रोटोकोल इनमे से श्रेष्ठतम है । यह कैंसर रोगियों एवं उनके सम्बन्धियों के लिए एक विश्व कोष है जिसको पढ़ कर उपचार कराने का सही निर्णय ले सकते हैं । लोथर हरनाइसे ने दुनिया भर में कई वर्षों तक शोध कर इसे लिखा है ।
इसके अनुसार रोगी को 3 म् का पालन करना चाहिए ।
पहला म् (इट हेल्दीवेल) स्वस्थ आहार से है । इसमे रोगी को ठण्डी विधि से तैयार अलसी का तेल व पनीर का मिक्सर विभिन्न सुखे मेवे व फलों के साथ दिया जाता है ।
बुडविझ के आहार के साथ-साथ दूसरा म् (एलीमीनेट टाॅक्सीन्स) शरीर के विषाक्त पदार्थो को बाहर निकालना है । इसमे एनिमा लगा कर शरीर को निर्विष बनाया जाता है । इसमे पहले शुद्ध पानी का एनिमा लगाया जाता है । इसके बाद काफी एनिमा व एल्डी तेल एनिमा प्रमुख है ।
तृतीय म् (ईनर्जी) ऊर्जा के जागरण से है । जीवन का लक्ष्य तय कर जीना मुख्य है । दिशा तय कर ही दशा बदली जा सकती है । इसमे आत्मदर्शन द्वारा सकारात्मक होना व स्वस्थ होने के भाव में जीना प्रमुख है ।
लेखक एक जाने माने कैंसर शौध विशेषज्ञ है । जो दुनिया भर में घुम-घुम कर सभी देशों में उपलब्ध कैंसर उपचार सम्बन्धी विधियों का विश्लेषण करते रहे हैं ।
यह पुस्तक मुलतः जर्मन भाषा में लिखी गयी है । इसका अंग्रेजी संस्करण उपलब्ध हैै
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मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Meditation, Self-Healing, Spirituality, Uncategorized. Tagged: अवचेतन मन, खुद- इलाज, टिप्पणी, नकारात्मता, प्रबल इच्छा, प्रसन्नता, प्रार्थना, मन, शिक्षान्तर, शुभ कामनाएँ, सकारात्मकता, सेहत. 4s टिप्पणियाँ
प्रत्येक मरीज अपने अंदर खुद के डाॅक्टर को लेकर चलता है। वे हमारे (डाॅक्टरों के) सामने इस सच्चाई की जानकारी के बिना ही आ जाते हैं। हम अपना सर्वोतम तभी कर सकते हेैं जब हम मरीज के अंदर रहने वाले डाॅक्टर को ही काम करने का अवसर प्रदान करें।
-डा. अल्बर्ट श्वीट्जर
चेतना में विचार उत्पन्न हुआ और हमारा निर्माण हुआ। हम विचारों द्वारा बने हैं। अर्थात् चेतना ही जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है। जैसा कि उपनिषद् में लिखा है-प्रत्येक भावना शरीर में संवेदना उत्पन्न करती है। प्रत्यके भावना शरीर में अलग-अलग तरह से संवेदना उत्पन्न करती है। भावना मंे डूब जाने पर हम विचार का महसूस करने लगते हैं और संवेदन को नहीं देख पाते हैं। जैसे ही मन विचार में पड़ा और हम श्वास को देख नहीं पाते है।यही हमारी बेहोशी है। रोग का भाव एवं विचार मन मंे आने पर हम रोगी हो जाते हैं।
हम जैसे ही संवेदन को देखने में समर्थ हो जाते हैं, तो संवेदन बदलने लग जाते हंै, मिट जाते हैं। इस तरह हम सकारात्मक भावना द्वारा स्वयं को सकारात्मक बना सकते है। स्वयं के प्रति सजग होकर हम अपना नियन्त्रण अपने हाथ मंे लेते हैं। इस तरह हम अपने बदलते मन को देखने मंे समर्थ हो जाते है । अर्थात् हम स्वयं की श्रेष्ठ भावनाओं और विचारों द्वारा चिकित्सा भी कर सकते हंै। स्वसम्मोहन के द्वारा भी स्वयं की चिकित्सा की जा सकती है। अपने दिमाग की प्रोग्रामिंग बदलकर हम अपने को स्वस्थ बना सकते हंै। चिकित्सा के भाव एवं विचार पैदा कर हम अपनी चिकित्सा कर सकते हंै।
जैसे पौधे के बीज मंे पूरी संरचना छिपी रहती हैं वैसे ही हमारी कोशिका के डी. एन. ए. में हमारे व्यक्तित्व/चेतना का पूरा प्रोग्राम अंकित होता है। बीज को प्रभावित कर जैसे पौधे में परिवर्तन लाते है, वैसे ही डी. एन. ए. को बदल कर पूरे जीवन में परिवर्तन लाया जा सकता है।
हमारे व दुनिया के बीच सम्बन्ध हमारी चेतना/मन से ही, या उसके कारण से ही होता है।
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मार्च
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Book Review, Self-Healing, Spirituality, Stress Management, success. Tagged: अलसी, कैंसर, मन, लेखक, शिक्षान्तर, शिखर पर मिलेगे, सेहत. 2s टिप्पणियाँ
डाॅ0 रे डी स्ट्रेंड ने एक पोषक तत्वों के बारे में उपयोगी किताब’’व्हाट योर डाॅक्टर डजन्ट नो अबाउट न्यूट्रिश्नल मेडिसिन मे बी किलींग यू’’ लिखी है जिसका हिन्दी अनुवाद ’’क्या आपका डाॅक्टर पोषक तत्वों के बारे में जानता है ?’’ े मंजुल पब्लिसींग हाउस भोपाल से छपी है । 
यह एक सत्य है कि दुनिया भर में डाॅक्टरों को दवाओं के जरिये बीमारियों का इलाज करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है । लेकिन उन्हे हमारे जीवन को स्वस्थ रखने के लिए महत्वपूर्ण और शक्तिशाली तरीकों के बारे में कोई ज्ञान नहीं दिया जाता है ।
यह पुस्तक आपको सिखाएगी कि क्यों सरकार द्वारा पोषक तत्वों की अनुशंसित मात्रा हमारे शरीर के प्राकृतिक रक्षातंत्र को बीमारियों के प्रति शक्तिशाली नहीं बना पाती है – और आपको पोषक तत्वों की कितनी मात्रा की आवश्यकता होती है ।
शरीर के अन्दर आॅक्सीजन का विघटन किस प्रकार विनाश उत्पन्न करता है और आप इससे हुई क्षति से कैसे निपट सकते हैं ।आप लगातार होने वाली एलर्जी और सायनस के संक्रमण से किस प्रकार लड़ सकते हैं ।
आपके डाॅक्टर द्वारा गंभीर क्षयकारी बीमारियों से बचाव के लिए दी गई दवाइयाॅं क्यों बेहतर नहीं होती है ।
बड़े दुख की बात है कि जब तक आपको किसी बीमारी का पता चलता है तब तक आप एक स्वस्थ और उत्साहपूर्ण जीवन खो देते हैं ।
रे स्ट्रैंण्ड की क्रांतिकारी पुस्तक
- आपको वर्तमान और भविष्य में अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के सरल उपायों के बारे में बताती है ।
- यह बीमारियों के कारण हुए नुकसान से भी छुटकारा दिलाती है ।
- अपने शरीर की प्राकृतिक उपचार शक्ति में बढ़ोतरी करें ।दिल की बीमारियों से बचाव के लिए कोलेस्टेराॅल का स्तर महत्वपूर्ण कुंजी क्यों नहीं है
- कैंसर, डायबिटीज, आर्थराइटिस, अल्जाइमर्स, फाइब्रोमाएल्जिया और अन्य बीमारियों की जड़ के बारे में चिकित्सा प्रमाण वास्तव में क्या बताते हैं
- बुढ़ापे को रोकने की सही रणनीति पर अमल करना अभी शुरू करें और खुद को आॅक्सीजन के हानिकारक प्रभावों से बचाएॅ
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मार्च
Posted by jayantijain in Life-Management, Self-Healing, Spirituality, Stress Management. Tagged: अनमोल वचन, कैंसर, खुद- इलाज, तनावमुक्ति, प्रार्थना, लुईस हे, सेहत. 6s टिप्पणियाँ
- हमारे आहार एवं विचार का दपर्ण है-हमारा शरीर। -महर्षिं चरक
- रोगी होकर औषध-सेवन करने मंे जितनी जागरुकता दिखाते है, यदि आप उसका दशांश भी स्वस्थ रहने के प्रति जागरूक बन जाए तो यह निश्चित है कि रोग से पीडि़त न होना पड़ेगा। -आचार्य बालकृष्ण
- बिना मन को आरोग्य किए शरीर को अच्छा करने का प्रयत्न करते हैं, जबकि मन और शरीर एक ही हैं। इसीलिए उनकी पृथक्-पृथक् चिकित्सा नहीं होनी चाहिए। -प्लेटो
- कैंसर जैसा प्राणघातक रोग भी ’बाहरी हमला न होकर आन्तरिक विघटन की स्थिति हैं’।
- -कार्ल सिमन्टन
- कभी दूसरों से मत कहो कि तुम बीमार हो, न कभी बीमार ही बनो। बीमारी एक ऐसी वस्तु है ,जिसे पनपते ही रोकने का प्रयास करना चाहिए। – बुलवर लिटन बीमार होने पर भी बीमारी के अस्तित्व में विश्वास मत करो। इस प्रकार स्वागत न पाकर बीमारी रूपी अतिथि भाग जायेगा। -योगी कथामृत
- आप अणुओं और परमाणुओं की प्रवाहमान नदी हैं, जिन्हें ब्रह्यांड के प्रत्येक कोने से एकत्रित किया गया है। आप ऊर्जा के ऐसे भंडार हैं जिसकी लहरें एकीकृत क्षेत्र के कोनों तक विस्तृत होती है। आप बुद्धि के ऐसे भंडार हैं जो कभी रिक्त नहीं होगा, क्योंकि प्रकृति कभी रिक्त नहीं होगी। – दीपक चोपड़ा
- यदि मनुष्य चाहे तो अपनी चिकित्सा स्वयं कर सकता है और बहुत जल्दी सफल भी हो सकता है। -शेक्सपीयर
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