महाराजा जनक संसार में रहते हुए कैसे ऋषिवत जीते
मन के निर्णय या ज्ञान को हम अपना समझ बैठते है। जैसा कि आँख, नाक, कान, जिन्हा व स्पर्श इन्द्रिय की सीमा है। वे भी अपनी सीमा से बाहर अनुभव नहीं कर पाते है। वैसे ही मन भी अपनी सीमा से बाहर जाकर अनुभव नहीं कर सकता है। जबकि सत्य इसके पार होता है तभी चेतना के अनुभव पर उपनिषद् के ऋषियों ने नेति-नेति की बात कहीं है। मन के इसी स्वभाव के कारण हमारे जीवन में हर चीज भली-बुरी थोड़े समय में समस्या बन जाती है। हम किसी भी सम्बन्ध, घटना, वस्तु, व्यक्ति से सुख उठाते-उठाते अचानक दुःख पाने लग जाते है। हमारी प्राप्ति कब व्यर्थ हो जाती है हमें पता ही नहीं लगता है।
मित्रों, वैसे मन हमारा दुश्मन नहीं है। यह चेतन ने ही बनाया है। आकार से उपर उठने, निराकार को जानने मन के पार जाना पड़ता है। बेईमान होने का अवसर होने पर ईमानदार होना ही उपयोगी है।
संसार हम अपनी मन की आंख से देखते है। हम जगत को हमारे मन के चश्मे से देखते है। अर्थात् ‘‘जो है’’ कि बजाय ‘‘जो नहीं है’’ वह स्व-निर्माण कर देखता है। अर्थात् हम अपना ही प्रक्षेपण करते है। अपनी बुद्धि व स्वार्थ से देखते है। इस अर्थ में हम अन्धे हो जाते है।
महाराजा जनक संसार में रहते हुए कैसे ऋषिवत जीते है? शक्तिशाली होकर भ्रष्ट नहीं थे। जीवन जीने की कला के गुरु है। इस मन को पहचान कर ही वे घर में वैरागी थे। सब कार्य करते हुए भी अकत्र्ता थे, उनकी क्रिया में अक्रिया थी। सारे उपद्रवों के वे दृष्टा थे। यह कला मन के स्वभाव को जान कर ही संभव है। इस कला का सार यही है। अपने भीतर उठते विचार, भाव व शब्दीकरण को सतत देखो। दो विचारों, के बीच पड़ते अन्तराल को देखो। इसी तरह साक्षी भाव बढ़ेगा, मन मिटेगा। अन्यथा मन को मिटाया नहीं जा सकता है।
Related posts:


Posted by Bhawanishankar Sharma on जनवरी 8, 2012 at 10:17 अपराह्न
श्रीमान जी मन के स्वरुप को आप पूरा नहीं समझे है , इन्द्रियार्थ संनिकर्ष के ज्ञान को मन आत्मा के समक्ष रखता है , तो जब मन अपना है तो उससे प्राप्त ज्ञान अपना कैसे नहीं है ? पूर्व में भी आपके इस विषय पर मैंने अपने कमेंट्स लिखे थे उनका भी अपने जवाब नहीं दिया
Posted by satish chandra sharma on जनवरी 10, 2012 at 12:04 अपराह्न
man ko samajhana atyant dushkar karya hai har thoda sa gyani admi yah samajhne lagta hai ki maine man ko samajh liya hai kintu yah ek bhool hai man ka dayra, shakti , ayam adi sabhi kuchh apar hai mer vichar se man ko smajhana asambhav hai man to apar shakti ka bhandar hai ise samajhn lene ya kaboo pa lene ka dawa karna niri murkhta hai man aur atma donon bhinn hain man main anek vichar uthte hain jin men se adhikkansh atma tak nahin pahunchte lekin man atma ke liye prerne strot ka kam karta hai
Posted by satish chandra sharma on जनवरी 10, 2012 at 12:26 अपराह्न
man ke ayamapar hain ,man ki shakti apar hai man ko jeetna asmbhav hai man aur atma abhinn hain aur ek doosre par dependent hain