मन की दूसरी विशेषता यह है कि वह सदा दूसरों की तरफ देखता है। वह स्वयं की तरफ नहीं देखता है। मन कभी भी अपना दोष नहीं देखता है। प्रारम्भ से ही उसकी नजर दूसरों पर रहती है। इस कारण सम्यक विश्लेषण हो नहीं पाता है। कभी भी वस्तुस्थिति का सही पक्ष प्रकट नहीं होता है। उसके छिपे रहने से सारी गड़बड़ हो जाती है। हमारा मन दूसरे पर ही मंडराता रहता है। दूसरों को सुखी मान कर चलता है। दूसरों को देखने के कारण वह तुलना करता रहता है। फिर उससे तुलना कर नरक गढ़ लेता है। तभी कृष्णमूर्ति ने ‘‘माइण्ड विदाउट मेजर’’ नामक पुस्तक लिखी है। जिसमें उन्होंने लिखा है कि हम तुलना कर हर चीज को समस्या बना लेते है। इस कारण वस्तु को समग्रता में समझ नहीं पाते है।
मन कभी भी अपने पास नहीं आता है। स्वयं के पहलू को ध्यान में नहीं रखता है। पर को देख कर ही निर्णय करता है जो कि अधुरे होते है। वह दूसरे को देखने का सरल रास्ता चुनता है। साथ ही दूसरों का सुख देखता है एवं अपना दुःख ही देखता है। इस कारण सदैव दूसरे को सुखी मानता है व स्वयं को दुःखी मानता है। इसलिए वह कभी पूरी तरह वास्तविकता को देख नहीं पाता है। उसकी सोच हमेशा पूर्वाग्रह पर आधारित होती है।
दुसरो को देखने के कारण सारे दुःख है जबकि जीवन स्वयं के पास है।
( To be continued…..)


Posted by ajaykumarjha on दिसम्बर 28, 2011 at 3:17 अपराह्न
अगली कडी की प्रतीक्षा रहेगी । प्रेरणापद और खूबसूरत बातें
Posted by SinghStyleStudio on दिसम्बर 29, 2011 at 8:38 पूर्वाह्न
Well, keep exploring mind …
Posted by कुमार राधारमण on दिसम्बर 30, 2011 at 11:23 पूर्वाह्न
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में उसकी बात भी उसकी हैसियत से ही सुनी जाती है(यद्यपि कई बार ऐसा भी होता है कि किसी को सुनने से भी उसकी हैसियत बनती है)। व्यक्ति अपने व्यवहार को सापेक्षिक कैसे न माने?
Posted by मन की तीसरी विशेषता तर्क आधारित सोचना एवं इसे अपने पक्ष में करें « उठो! जागो! on जनवरी 3, 2012 at 7:38 अपराह्न
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