पूर्वाग्रहों के आधार से मत सोचों। आज के परिप्रेक्ष में उसे देखो। ताजा दृष्टि रखों। किसी और के कहने, से मत मानो। पूर्व में ऐसा था तो आज भिन्न भी हो सकता है। गंगा में तब और आज तक के बीच बहुत पानी बह चुका है।
साधू सन्त साम्प्रदायिक है। यह उनकी समस्या है। क्या आप उनके प्रति तटस्थ नहीं हो सकते हो? उनके बारे में टीका टिप्पणी अनुयायी वृत्ति के लोगों के सामने नासमझी है। इसमें आपका कद कम होगा, वे उनको नहीं आपको गलत समझेंगे। अतः टिका-टिप्पणी करना करना व्यर्थ लोगों का काम है। मर्मज्ञ शान्त रहते है, जानने वाला चुपचाप सुनते है।
एक चीटीं मुँह में नमक की डली रखे हुए है। फिर वह शक्कर का स्वाद परीक्षण पर सही नहीं पाती है। इससे स्पष्ट है कि शक्कर में मिठास कम नहीं है। दोष मुँह में पड़ी हुई नमक की डली का है। हम वैसे ही कोई न कोई पक्ष मन के किसी कोने में पाल कर दूसरे को देखते है। ऐसे में हमारी समझ सही नहीं है। अपनी समझ को सही व गहरा करना है तो अवचेतन में पड़ी गाँठ यानि पूर्वाग्रह को हटाना पड़ेगा।
हम निष्पक्ष हुए बिना सत्य को सही रूप में समझ नहीं सकते है। हमें पूर्वाग्रह से मुक्त होकर सोचना पड़ेगा। हम सभी किसी न किसी धारणा को आधार बना कर सोचते है। ऐसी सोच सत्य तक नहीं पहुँचाती है। ऐसे हमारी समझ धोखा खा जाती है। हम आग्रहों के शिकार हो जाते है। हमारे निर्णय तब पक्षपतापूर्ण होते है व वाँछित परिणाम नहीं आते है। तभी तो कहा जाता है कि तर्क सत्य तक नहीं पहुँचाते है। तर्क की एक सीमा होती है। तर्क में निश्चित पूर्वाग्रह होते है।
एक पक्ष के प्रति आग्रह रखने पर हम आग्रह रखने पर हम सम्यक् नहीं हो सकते है। जीवन में संतुलित होना महव्वपूर्ण है। संतुलन ही सामन्जस्य लाता है व समझ को बढ़ाता है।
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Posted by वाणी गीत on अक्टूबर 31, 2011 at 8:12 पूर्वाह्न
उपयोगी सलाह !
Posted by induravisinghj on अक्टूबर 31, 2011 at 8:42 पूर्वाह्न
प्रेरणादायक पोस्ट,सही कहा आपने-
दोष मुँह में पड़ी हुई नमक की डली का ही है।
Posted by तिनके on अक्टूबर 31, 2011 at 3:01 अपराह्न
पूर्वाग्रह मुक्त होना किसी के लिए आसान नहीं होता. निरंतर अभ्यास से इस दोष से मुक्ति पाई जा सकती है.
Posted by Durgesh Kumar Gupta on नवम्बर 5, 2011 at 2:05 अपराह्न
Bahut sahi,
This is good….
Posted by Dr. O.P.Verma on नवम्बर 19, 2011 at 4:16 अपराह्न
bahut sundar hai.
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Posted by मन की तीसरी विशेषता तर्क आधारित सोचना « उठो! जागो! on जनवरी 3, 2012 at 7:36 अपराह्न
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