जिसने मरना सीख लिया जीने का अधिकार उसी को

जीवन में संघर्ष आगे बढ़ाता है। हमें विपरित परिस्थितियों सबल सक्षम व सशक्त बनाती है। अन्धेरे के बाद प्रकाश आता है। कठिनाईयों से दुःख पैदा होता है एवं उसका सामना करने में संघर्ष है। संघर्ष करने वाला ही आगे बढ़ता है। चालर्स डार्विन ने संघर्ष करने वाले को ही जीवित रहने का पात्र माना है। कठिनाईयों को वह चुनौती के रुप में लेता है। तभी तो कहां जाता है कि जिसने मरना सीख लिया जीने का अधिकार उसी को है।

संघर्ष अभिशाप नहीं, वरदान है। इससे भागने की जरुरत नहीं है। जो संघर्ष करते है वो पाते है। आगे बढ़ने वाले हार कर बैठते है नहीं है। जीतता वहीं है जो संघर्ष करता है। विजय बैठे-बैठे नहीं मिलती है। सफलता संघर्ष के बाद ही मिलती है। परिस्थितियों से, तन्त्र से, समस्याओं से जो लड़ नहीं सकते वे अन्तः हारते है। लड़ने वाले ही जीतते है। इसे न दर्शन माने ,न ही बनाएं। आगे बढ़ने का यह व्यावहारिक व सहज मार्ग है जिसे अपनाएँ।

संघर्ष करने वालो की कमी नहीं है। जो भी गरीबी, को छोड़ अपने परिश्रम से आगे बढ़ा है। नेपोलियन जीवन भर लड़ता रहा तो एक दिन सम्राट बना। स्टीफन हांकिग, शरीर से अक्षम होते हुए भी ब्रह्याण्ड के रहस्य जानने में सफल हुए है।

जीवन में संघर्ष का योगदान

जीवन में कमजोर वहीं रह जाता है जिसने कभी कठिनाईयाँ न देखी हो। वह जीवन के सभी रंग नहीं देख पाता है। व्यक्ति अपनी सुख की दुनिया में रहने से अपनी सुप्त शक्तियों को जगा नहीं पाता है। जैसा कि हम जानते है कि तितली के कीड़े को यदि तितली बनने के उपक्रम में मदद करने पर वह मर जाता है। वह स्वयं से संघर्ष करने पर ही स्वस्थ तितली बनती है।

संघर्ष के बिना जीवन में आनन्द नहीं है। जो संघर्ष नहीं करते है वे घर पर ही बैठे रहते है। आगे बढ़ने के लिए कठिन मार्ग चुनना पड़ता है। तभी तो चाणक्य चंद्रगुप्त मौर्य से कहता है कि किसी भी कार्य को करने के दो मार्ग होते है। सरल मार्ग मंजिल पर ले जाता है। लेकिन कठिन मार्ग धीरे पहुँचाता है लेकिन निश्चित पहुँचाता है। यह नए अनुभवों के साथ पहुँचाता है।

जिस कार्य को करने में थोड़ा खतरा न हो, कोई चुनौती न हो, वह कार्य बड़ी सफलता नहीं दिला सकता है। संघर्ष से नई दृष्टि खुलती है, नए लोगों से मुलाकात होती है। अपनी लापरवाही या कमजोरी की पोल खुलती है। मन में उठती कायरता का ज्ञान होता है। स्वयं के आत्मविश्वास का नाप-तोल भी हो जाता है। स्वयं के व्यवहार व दूसरों के अपनत्व का पता चलता है।

मैं स्वयं अपने अनुभव से यह बात कह सकता हूँ कि मुझे बपचन में गरीबी, परिवार के झगड़े, पिता की डाट-फटकार व पिटाई, माता-पिता की सातवीं संतान होने से बहुत सी बातें सीखने को मिली, जिस कारण आगे बढ़ने का ज्ञान जन्मा। इसी से मैं मजबूत हुआ वह प्रेरित होता रहा तभी मैं आगे बढ़ पाया। मेरी बैचेनी, मेरी निराशा ने सदैव कुछ समय बाद मुझे आगे बढ़ने हेतु धक्का दिया। उन्हीं की बदोलत संघर्ष की प्रेरणा मिली व मार्ग खोजा। तभी तो स्वेट मार्डन ने लिखा है कि जो बैठे रहते है उनका भाग्य भी बैठे रहता है। जो प्रयत्न करते है उनका भाग्य भी साथ देता है।

जिसने मरना सिख लिया है जीने का अधिकार उसी को। जो डर गया वो मर गया। हार से ही जीत का मार्ग प्रशस्त होता है।

ऐसे में आलसी व्यक्ति पलायन करने की सोचता है। लेकिन इनसे बचा नहीं जा सकता। संघर्ष से बचना आत्महत्या है। स्वयं को कमजोर ही बनाए रखना है। कमजोरी किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। कमजोरी किसी भी समस्या का नहीं। पीछे हटने में समाधान नहीं है।

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2 responses to this post.

  1. कहते हैं,एक मोड़ विशेष पर आकर,जीवन और मृत्यु का भेद मिट जाता है।

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