स्त्री एवं पुरुष की षारीरिक भिन्नता, भिन्न हाॅरमोन्स एवं लालन-पालन में भिन्नता के होने से भावनात्मक आवष्यकतायें अलग-अलग होती हैं। महिलाओं और पुरुषों का यह पता ही नहीं होता कि उनकी भावनात्मक आवश्यकतायें अलग-अलग होती हैं क्योंकि उनकी देह, संस्कार व सोच भिन्न-भिन्न होते है। इसीलिये वे एक-दूसरे को प्रेम करने का आदर्श तरीका नहीं जानते हंै। सामान्यतः पुरुष वही देते हैं, जो वे चाहते हैं। इसी तरह महिला भी वही देती हैं, जो वे चाहती हैं। दोनों ही यह गलत समझ बैठते हैं कि सामने वाले को भी उन्हीं चीजों की जरूरत होगी, जिनकी उन्हें जरूरत होती है। इसी कारण दोनों ही असंतुष्ट और दुखी रहते हैं।
सच तो यह है कि पुरुष और महिलायें दोनों ही प्रेम अपने तरीके से देते हैं, परंतु उस तरीके से नहीं देते, जिस तरीके से सामने वाले पार्टनर को चाहिये इसलिए प्रेम पहुँचता नहीं है।
जाॅन ग्रे अपनी पुस्तक मेन आर फ्राॅम मार्स एण्ड विमेन आर फ्राॅम विनस मंे लिखा है कि बारह प्रकार से प्रेम की अनुभूति कोे अभिव्यक्त किया जा सकता है जिनमें से छह अनुभूतियाँ महिलाओं की मूलभूत भावनात्मक आवष्यकतायें हैं, जबकि छह अनुभूतियाँ पुरुषों की मूलभूत भावनात्मक आवष्यकतायें हैं।
महिला यह चाहती हैं पुरुष यह चाहते हैं
1.उनका ख्याल रखा जाये 1.उन पर विष्वास किया जाये
2.उन्हें समझा जाये 2.उन्हें स्वीकार किया जाये
3.उन्हें सम्मान दिया जाये 3.उन्हें सराहा जाये
4.वे निष्ठा चाहते हैं 4.वे तारीफ चाहते हैं
5.वे अपनी बात का समर्थन चाहती हैं 5.वे चाहते हैं कि उनसे संतुष्ट हुआ जाये
6.वे बार-बार आष्वस्त होना चाहती है 6.वे प्रोत्साहन चाहते हैं
मुख्यतः महिलायें बार-बार आश्वस्त होना चाहती हैं जबकि पुरुष प्रेरणा चाहते हैं।जब काई पुरुष बार-बार यह जताता है कि वह ख्याल रख रहा है, वह उसकी बात समझ रहा है, वह उसका सम्मान कर रहा है, वह उसकी बात का समर्थन कर रहा है और वह अपने पार्टनर के प्रति निष्ठावान है, तो महिला की सारी भावनात्मक आवश्यकतायें पूरी हो जाती हैं। पुरुष यह गलती करते हैं कि एक बार महिला को एहसास दिलाने के बाद वे समझते हैं कि बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं है, परंतु ऐसी बात नहीं है। महिला की छठी मूलभूत भावनात्मक आवष्यकता तभी पूरी होगी जब पुरुष बार-बार अपने प्रेम का इज़हार करे, जिंदगी भर करता रहे।
इसी तरह पुरुष को महिला के प्रोत्साहन की सख्त जरूरत होती है। इससे अपनी योग्यताओं और क्षमता में उसका विष्वास दुगुना हो जाता है।
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Posted by Lokendra Singh Durana on मई 27, 2011 at 8:22 पूर्वाह्न
सराहनीय प्रयास! शायद कुछ दमप्तीयों के रिस्ते दरार आने बच पाये ! सधन्यवाद
Posted by ‘जब मैंने मौत को बहुत नजदीक से देखा, तब मुझे मौत भी लाभकारी थी’ – स्टीव जाॅब्स « उठो! जागो! on अक्टूबर 22, 2011 at 3:51 अपराह्न
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