डाॅक्टर ओ0 पी0 वर्मा रचित ‘‘अलसी महिमा’’नामक पुस्तिका प्रकाशित हुई है। उक्त पुस्तिका को आप Free Download My Booklets के टेग के नीचे अंकित नाम पर क्लिक कर उसे डाउनलोड करें। छपी हुई पुस्तक आप मुझसे मंगवा भी सकते हंै।
पुस्तिका की विषय वस्तुअलसी एक चमत्कारी आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक दैविक भोजन है। अलसी एक प्राणदायी औषधि है। कैंसर , ब्लड प्रेशर, अर्थाराइटीस, डाइबीटिज , अपच आदि का इलाज अलसी के सेवन से होता है। जिसका विस्तृत वर्णन पुस्तक में है।अलसी एक सम्पूर्ण आहार है, इसमें 18 प्रतिशत प्रोटीन 27 प्रतिशत फाइबर, 18 प्रतिशत ओमेगा-3 फैटी एसिड, लिगनेन व सभी विटामिन और खनिज लवणों का भण्डार है। अलसी रक्त को पतला बनाये रखती है। रक्त वाहिकाओं को स्वीपर की तरह साफ करती है। काॅलेस्ट्राल और ब्लड प्रेशर को सही रखती है। अलसी में फाइबर की मात्रा सबसे अधिक है। इसलिए यह ईसबगोल से भी ज्यादा लाभदायक है। तभी अलसी के लिए कहा जाता है कि यह कब्जासुर का वध करती है। अलसी शक्तिवर्धक एंव बाॅडी बिल्ंिडग में सहायक है। तभी डबल्यू एच ओ ने इसे सुपर फूड की संज्ञा दी है। इसके अतिरिक्त पुस्तक मंे डाॅ0 योहाना बुडवीज का कैंसर रोधी आहार-विहार,अलसी के व्यंजन, वसा जो कारक है वसा जो मारक है, अलसी चालीसा, अलसी सेवन से लाभार्थिंयों के अनुभव संग्रहीत है। ढ़ेर सारी अनेक बातें अलसी के आहार से चिकित्सा से सम्बन्धी मौजूद है।
लेखक के बारे में एलोपैथिक डाॅक्टर ओ0 पी0 वर्मा फ्लेक्स अवेयेरनेस सोसायटी के अध्यक्ष है। देश के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में ंअलसी पर आपके आलेख छपे है। दूरदर्शन पर वार्ताएं प्रसारित हुई है। इन्होंने नाॅबेल पुरस्कार के लिए नामांकित जर्मन डाॅ0 बुडवीज के आधार पर अलसी से चिकित्सा पर बहुत कार्य किया है। कैंसर जैसे घातक रोगों का इलाज अलसी के द्वारा डाॅ0 बुडवीज ने किया है,जिसे बुडवीज प्रोटोकोल के नामा से जाना जाता है।
(साभार- डॉ ओ पी वर्मा )
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Posted by स्वार्थ on मार्च 12, 2011 at 4:01 पूर्वाह्न
अलसी ने आजकल धूम मचायी हुयी है। भारत में अलसी के प्रयोग में एक व्यवहारिक दिक्कत है। इसके बारे में ऐसी धारणा है कि तासीर में यह गर्म होती है अतः भारत के गर्म प्रदेशों में गर्मियों में इसका उपयोग संभव नहीं है। पश्चिमी देश साल के ज्यादातर महीने ठंदे रहते हैं और गर्मियों में भी तापमान ठीक ठाक सा ही रहता है अतः वहाँ इसे १२ महीने उपयोग में लाया जा सकता है। अतः इसे प्रचारित करने वाले डाक्टर्स को इसकी गरम तासीर वाली धारणा को ध्यान में रखते हुये (१) इसे भारत में कैसे उपयोग में लाया जाये, इसकी देसी विधि बतानी चाहिये (बाहर की किताबों से अनुवादित विधि भारतीयों का नुकसान कर सकती है, क्योंकि वे विधियाँ वहाँ के नागरिकों के लिये वहाँ की जलवायु को ध्याम में रखते हुये विकसित की गयी हैं)
(२) भारत में कितनी मात्रा उचित है, और भारत में ही अलग अलग जलवायु में कितनी मात्रा लेनी चाहिये, उसकी उचित सलाह
(३) विदेशों में सलाद, पत्ते, सावरक्राट, चीज़, आदि आसानी से उपलब्ध हैं अतः भारतीय परिस्थितियों के अनुसार यदि आदर्श स्थितियां उपलब्ध न हों तो क्या व्यक्त्ति अलसी के बीजों को चम्मच भरकर दही में डालकर सुबह या दोपहर को खा सकता है। ऐसी आसान विधियां खोजी, विकसित और बतायी जानी चाहियें।
(४) कुछ साल पहले तक उत्तर भारत में गांव देहात में कहीं कहीं अलसी के लड्डू बनाये जाने की परम्परा थी परंतु अब अलसी से वह सम्पर्क टूट गया है और पहले तो एक उचित विधि रही होगी, परंतु आज की पीढ़ी जब ऐसा प्रयास करेगी तो भूल जायेगी कि गर्म करने पर अलसी के गुण बदल जाते हैं और यह उस फायदे के लिये बेकार हो जाती है जिसके लिये इसे उपयोग में लाने की सलाह दी जाती है मसलन, कोलेस्ट्रोल घटाने के लिये। अतः इसे गर्म नहीं किया जाना चाहिये, यह चेतावनी भी विधियों में होनी चाहिये।
हरेक स्थिति में भारत में इसके फायदे के लिये इसकी अंतर्राष्ट्रीय विधियों का भारतीय्करण किये जाने की जरुरत है तभी यह यहाँ की जलवायु में लोगों को फायदा पहुँचा पायेगी।
आयुर्वेद में उपस्थित बातों से इसकी कड़ी जोड़े जाने की जरुरत है। आयुर्वेद में उपस्थित बातों से इसकी कड़ी जोड़े जाने की जरुरत है। ताकि यह रोज़मर्रा के जनजीवन का अंग बन जाये और केवल चिकित्सकों के हाथों में सीमित न रह जाये।
Posted by jayantijain on मार्च 12, 2011 at 11:01 अपराह्न
आप से सहमत हूँ लेकिन एलॉपथी तासीर को नहीं मानती . यधपि इसमे शोध की जरूरत है।
Posted by nirmla.kapila on मार्च 12, 2011 at 10:45 पूर्वाह्न
धन्यवाद इस जानकारी के लिये।
Posted by Za on मार्च 12, 2011 at 2:27 अपराह्न
Aabhar.
———
क्या व्यर्थ जा रहें हैं तारीफ में लिखे कमेंट?
Posted by AJAB on मार्च 13, 2011 at 4:03 अपराह्न
apki bat 100% sahi he.mene azmaya hua he
Posted by डॉ. ओ.पी.वर्मा on मार्च 16, 2011 at 8:50 अपराह्न
Dear Sir,
Very good. Comments are good.
Thanks.
Dr. OPVerma
Posted by Om Prakash on अप्रैल 11, 2011 at 6:40 अपराह्न
Sir main ALSI ke beej ko daily morning main muh se chaba leta hun or lar ke saath under leta hun or us ke baad main paani pee leta hun to keya ye galat hai.
yaa phir kabhi dahi main daal kar kha leta hun.
sahi khane ka tarika bataye main kuchh galat to nahi kar raha hun?? kindly suggest right use in HINDI please .
Posted by jay gopal singh on मई 31, 2011 at 12:53 अपराह्न
aap pls yeh batay ki alsi ka power kab tak chal sakta hay kareeb 100 gms grind kar kay 4 thims night may dahi kay sath leta hoo many aapki site par dekty hoy alsi leni suru ki ab tak karib 1.50 kg alsi le chuka hoo mujy suger bhi hay mery per kay panjey ki unglio kay bich may daray pad gaye thi ab mujy aaram hay sir plz aapsay eak req hay mujay harniya ki problam hay 2no side left dide jaida hay plz usky bary may koi ilaage hay plz batao vesy mujay koi derd nahi hay may opreson nahi karana chahta hoo thans four dr op verma
Posted by A K Sharma on सितम्बर 7, 2011 at 9:48 अपराह्न
kya roasted aur salted alsi useful hai.
akhilesh sharma
Posted by jayantijain on सितम्बर 8, 2011 at 7:55 अपराह्न
Dear Akhilesh ji,
It is useful but to have with chapaties is better
Posted by prem arya on जनवरी 11, 2012 at 7:06 अपराह्न
lok hitay blog hai . apka bahut bahut dhanyavad.
Posted by vipin yadav on मार्च 3, 2012 at 3:13 अपराह्न
alsi ke beej ko english mein kya bolte hai
Posted by jayantijain on मार्च 4, 2012 at 8:23 पूर्वाह्न
Linseed , flaxseed
Posted by jitender sharma on मार्च 22, 2012 at 12:05 अपराह्न
Sir main ALSI ke beej ko daily morning main muh se chaba leta hun or lar ke saath under leta hun or us ke baad main paani pee leta hun to keya ye galat hai.
yaa phir kabhi dahi main daal kar kha leta hun.
sahi khane ka tarika bataye main kuchh galat to nahi kar raha hun?? kindly suggest right use in HINDI please .