‘‘तनाव कैसे दूर करें’’ नामक पुस्तिका उपलब्ध है। उक्त पुस्तिका को आप डाउनलोड माई बुकलेट्स के टेग से डाउनलोड कर सकते है। छपी हुई पुस्तक आप मुझसे मंगवा भी सकते हंै।
पुस्तिका की विषय वस्तु
इस सदी ने हम सबको तनावग्रस्त कर रखा है। तेज रफ्तार एवं प्रतिद्वन्दिता ने हम सबको दौड़ा रखा है। इन तनावों ने व्यक्ति की सारी उपलब्धियों पर भी पानी फेर दिया है। ऐसे में सफल व्यक्ति स्वयं अपनी सफलता का आनन्द नहीं उठा पा रहा है। बहुत कुछ पा कर भी व्यक्ति व्यथित एवं बेचैन है। कुछ व्यक्ति असफलता एवं अप्राप्ति से बैचेन है। सर्वत्र अशांति व्याप्त है। तनाव के कारण देह व्याधियों को आमन्त्रित करती है।
अगर उपरोक्त बातें आपके बारे में है तो यह पुस्तक आपके चाहने पर आपकी मदद कर सकती है। पुस्तक में तनाव को कम करने की व्यावहारिक विधियों का संकलन है। जिनका प्रयोग कर आप लाभ उठा सकते हैं। यह आपकी मदद कर सकती है।
तनाव भगाने के लिए समय ही नहीं संकल्प चाहिये। इच्छा शक्ति बिना कोई भी प्रविधि कार्य नहीं करती है। इस हेतु अपनी प्रविधि व स्वयं पर श्रद्धा चाहिये। भावना पूर्वक कार्य करने पर ही लाभ मिल सकता है।शब्द बहुत असमर्थ संकेत है, पर यदि उन्हे चित्त की परिपूर्ण शान्ति एवं मौन में सुना जा सके तो वे समर्थ हो जाते है। शब्द का कोई वजूद नहीं होता है। वे तो मात्र लेखक व पाठक के बीच सेतु का कार्य करते है। शब्दों को समझ कर तनाव कम करने वाले आप है। तनाव भगाएॅं, मस्त रहें।
सहयोग हेतु विशेष निवेदन
यह पुस्तिका मैंने इस विषय पर बड़ी पुस्तक लिखने के लिए बीज रूप मंे-संक्षिप्त रूप में परीक्षण हेतु लिखी है। क्योंकि आपके फीडबेक के आधार पर ही एक नई पुस्तक का सृजन होगा। पाठकों के फीडबेक से पुस्तक व्यवहारिक एवं सच्चाई के करीब हो जाती है। आप सब भी टिप्पणी देकर मेरे सहयोगी हो सकते है। इस पुस्तिका पर आपके विचार सादर आंमत्रित है। आप अपने तनाव को जितने के अनुभव भी भेज सकते है जो आपके नाम के साथ अगली पुस्तक के अन्दर जोड़े जाऐगंेे, जो हिन्द पाॅकिट बुक्स से शीघ्र ही आएगी।
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Posted by Rajendra Maheshwari on दिसम्बर 7, 2010 at 8:32 अपराह्न
aapke guldaste k liye ek kali hamari bhi.
प्रभु को भी प्रिय है सरलता
सतपुड़ा के वन प्रांत में अनेक प्रकार के वृक्ष में दो वृक्ष सन्निकट थे। एक सरल-सीधा चंदन का वृक्ष था दूसरा टेढ़ा-मेढ़ा पलाश का वृक्ष था। पलाश पर फूल थे। उसकी शोभा से वन भी शोभित था। चंदन का स्वभाव अपनी आकृति के अनुसार सरल तथा पलाश का स्वभाव अपनी आकृति के अनुसार वक्र और कुटिल था, पर थे दोनों पड़ोसी व मित्र। यद्यपि दोनों भिन्न स्वभाव के थे। परंतु दोनों का जन्म एक ही स्थान पर साथ ही हुआ था। अत: दोनों सखा थे।
कुठार लेकर एक बार लकड़हारे वन में घुस आए। चंदन का वृक्ष सहम गया। पलाश उसे भयभीत करते हुए बोला – ‘सीधे वृक्ष को काट दिया जाता है। ज्यादा सीधे व सरल रहने का जमाना नहीं है। टेढ़ी उँगली से घी निकलता है। देखो सरलता से तुम्हारे ऊपर संकट आ गया। मुझसे सब दूर ही रहते हैं।’
चंदन का वृक्ष धीरे से बोला – ‘भाई संसार में जन्म लेने वाले सभी का अंतिम समय आता ही है। परंतु दुख है कि तुमसे जाने कब मिलना होगा। अब चलते हैं। मुझे भूलना मत ईश्वर चाहेगा तो पुन: मिलेंगे। मेरे न रहने का दुख मत करना। आशा करता हूँ सभी वृक्षों के साथ तुम भी फलते-फूलते रहोगे।’
लकड़हारों ने आठ-दस प्रहार किए चंदन उनके कुल्हाड़े को सुगंधित करता हुआ सद्गति को प्राप्त हुआ। उसकी लकड़ी ऊँचे दाम में बेची गई। भगवान की काष्ठ प्रतिमा बनाने वाले ने उसकी बाँके बिहारी की मूर्ति बनाकर बेच दी। मूर्ति प्रतिष्ठा के अवसर पर यज्ञ-हवन का आयोजन रखा गया। बड़ा उत्सव होने वाला था।
यज्ञीय समिधा (लकड़ी) की आवश्यकता थी। लकड़हारे उसी वन प्रांतर में प्रवेश कर उस पलाश को देखने लगा जो काँप रहा था। यमदूत आ पहुँचे। अपने पड़ोसी चंदन के वृक्ष की अंतिम बातें याद करते हुए पलाश परलोक सिधार गया। उसके छोटे-छोटे टुकड़े होकर यज्ञशाला में पहुँचे।
यज्ञ मण्डप अच्छा सजा था। तोरण द्वार बना था। वेदज्ञ पंडितजन मंत्रोच्चार कर रहे थे। समिधा को पहचान कर काष्ट मूर्ति बन चंदन बोला – ‘आओ मित्र! ईश्वर की इच्छा बड़ी बलवान है। फिर से तुम्हारा हमारा मिलन हो गया। अपने वन के वृक्षों का कुशल मंगल सुनाओ। मुझे वन की बहुत याद आती है। मंदिर में पंडित मंत्र पढ़ते हैं और मन में जंगल को याद करता हुआ रहता हूँ।
पलाश बोला – ‘देखो, यज्ञ मंडप में यज्ञाग्नि प्रज्जवलित हो चुकी है। लगता है कुछ ही पल में राख हो जाऊँगा। अब नहीं मिल सकेंगे। मुझे भय लग रहा है। अब बिछड़ना ही पड़ेगा।’
चंदन ने कहा – ‘भाई मैं सरल व सीधा था मुझे परमात्मा ने अपना आवास बनाकर धन्य कर दिया तुम्हारे लिए भी मैंने भगवान से प्रार्थना की थी अत: यज्ञीय कार्य में देह त्याग रहे हो। अन्यथा दावानल में जल मरते। सरलता भगवान को प्रिय है। अगला जन्म मिले तो सरलता, सीधापन मत छोड़ना। सज्जन कठिनता में भी सरलता नहीं छोड़ते जबकि दुष्ट सरलता में भी कठोर हो जाते हैं। सरलता में तनाव नहीं रहता। तनाव से बचने का एक मात्र उपाय सरलता पूर्ण जीवन है।’
बाबा तुलसीदास के रामचरितमानस में भगवान ने स्वयं ही कहा है –
निरमल मन जन सो मोहिं पावा।
मोहिं कपट छल छिद्र न भावा।।
अचानक पलाश का मुख एक आध्यात्मिक दीप्ति से चमक उठा।
Posted by slc on मार्च 20, 2012 at 12:15 अपराह्न
babaki jai ho. baba mai bahut he dukhi ho, mera koi bhe sath nahi deraha hai. mai pichle saptah se apka tv programme dekh raha ho per mughe antrik shanti nahi mil rahi hai. mere parivar ko dushman ne bahut he niche dikhaya hai, meri ijjat, bete ka spa business sabkuch chaupat kar diya, spa ko banae kuch hi samay hua hai isme bahut investment personal laon lekar kiya gaya hai.abhi interest avam staff salary tatha other expenses nikalna durbhar horaha hai. dushman hamesha or girane ki tak mai hai. case kar rakha hai. baba dushman se bachao avam hamai puri madad karo. apka ashirwad hum par hamesa banarahe.mere pas na jak hai na cheque. dushman kali kamai se paise wala hai avam bahut he kharsa kar raha hai. hame sahara avam sujhav deve.
ak dukhi parivar.
Posted by आगे बढ़ने हेतु अपने मस्तिष्क का प्रयोग करों « उठो! जागो! on सितम्बर 21, 2011 at 9:17 पूर्वाह्न
[...] [...]
Posted by ravish kumar on मार्च 19, 2012 at 8:26 पूर्वाह्न
baba mai bahut tanaw me hu . futur kuch dikh nhi raha hai kya kru madad kre
Posted by satishchandra sharma (@SatishNews) on अप्रैल 7, 2012 at 11:28 पूर्वाह्न
your writihgs very good and inspiring thanks for guiding the world with your inspirstional thoughts