भूत-प्रेतादि बाधा वास्तव में स्नायविक मनोविकार है। इन बाधाओं से ग्रस्त रोगी का मानसिक संतुलन सदैव ठीक नहीं रहता है। रोगी असंबद्ध बातें करता है, या फिर असमय ही मौन हो जाता है। अकेला बातें करता है, तो कभी उसका शरीर अकड़ जाता है। रोगी को कभी-कभी उन्माद के दौरे भी पड़ने लगते हैं। ऐसे में कभी वह रोता है, तो कभी हँसता है। कभी किसी को पुकारता है, तो कभी किसी को धमकियाँ देता है। रोगी एकटक देखता रहता हे, जिससे उसकी पलकें कम झपकती हैं। अनेक बार रोगी स्वयं पर नियन्त्रण खो देने के कारण घर की वस्तुओं को इधर-उधर फेंक देता है, अपने कपड़े फाड़ डालता है और कभी-कभी उन्हें जला डालता है।स्व-सम्मोहन की दशा में रोगी अपनी दबी हुई कामनाओं और कुण्ठाओं को व्यक्त करता है। इस प्रकार वासनाओं केा वह जितना-जितना उघाड़ता जाता है, उतना-उतना वह स्वस्थ होता जाता है।
मनोरोगियों के लिए पद्मपुरा एक मानसिक चिकित्सालय है। जैनधर्म का अतिशय क्षेत्र पद्मपुरा नवरात्रि के दिनों में भूत-प्रेतादि से ग्रस्त रोगियों के लिए आकर्षण का एक विशिष्ट केन्द्र रहता है। ऐसे अधिकांश रोगी यहाँ आ कर शान्ति अनुभव करते हैं और अपने रोग-का-शमन करने में सफल होते हैं। आज भूत-प्रेतों में आस्था बढ़ाने का समय नहीं है; बल्कि अपनी आत्मा को पहिचान कर उसमें आस्था बढ़ाने का समय आ गया है।
भूत-प्रेतादि बाधा वास्तव में स्नायविक मनोविकार है। इन बाधाओं से ग्रस्त रोगी का मानसिक संतुलन सदैव ठीक नहीं रहता है। रोगी असंबद्ध बातें करता है, या फिर असमय ही मौन हो जाता है। अकेला बातें करता है, तो कभी उसका शरीर अकड़ जाता है। रोगी को कभी-कभी उन्माद के दौरे भी पड़ने लगते हैं। ऐसे में कभी वह रोता है, तो कभी हँसता है। कभी किसी को पुकारता है, तो कभी किसी को धमकियाँ देता है। रोगी एकटक देखता रहता हे, जिससे उसकी पलकें कम झपकती हैं। अनेक बार रोगी स्वयं पर नियन्त्रण खो देने के कारण घर की वस्तुओं को इधर-उधर फेंक देता है, अपने कपड़े फाड़ डालता है और कभी-कभी उन्हें जला डालता है।
मनोवैज्ञानिकों ने उपर्युक्त मानसिक रोगों के कारण बतायें हैं। उनका कहना है कि अधिकांश स्थितियों में कारण शारीरिक नहीं, मानसिक होते हैं। दरअसल जब कभी कोई व्यक्ति अपनी मूल आवश्यकताओं (इंस्टिक्ट्स) को उचित रुप से संपूरित नहीं कर पाता है जब सामाजिक दबाव उसे अतृप्त रहने को विवश कर देते हैं; तब उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। जैसे एक किशोरी का बाल-विवाद कर दिया जाता है, तब वह अपनी कम उम्र, अज्ञान एवं अक्षमता के कारण ससुराल में स्वयं को समायोजित नहीं कर पाती है, तब उसका अवयस्क मन टूट जाता है। सीधी माँगें जब सरल तरीके से पूरी नहीं हो पाती हैं, तब वे मार्ग बदल कर प्रकट होती है। यदि मनोविज्ञान की भाषा में लिखें तो चेतन मन की माँगें अचेतन में पहुँच कर रुपान्तरित होकर प्रकट होती है। इस प्रकटीकरण को मनोविकार कहते हैंै। शहरों में प्रेतादि की कम चर्चा होने से उसे ‘मानसिक रोगी माना जाता है, जबकि गाँवों में उसे प्रेतादि से पीड़ित कहा जाता है।
मानसिक रोगियों को पद्मपुरा (राजस्थान) में आकर शान्ति कैसे/किस प्रकार मिलती है? यह प्रश्न विचारणीय है। श्री पद्मप्रभु तीर्थकर तो करोड़ों वर्ष पूर्व सिद्ध हो चुके हैं। सिद्धशिला पर आरुढ़ विकल्पातीत श्री भगवान् को तो अब करुणा का भी विकल्प नहीं है; अतः उनका तो चिकित्सक बन कर आने का प्रश्न ही नहीं है। तब ऐसे में हमारा ध्यान शासन-देवताओं पर जाता है। प्रथमतः तो शासन-देवताओं का अस्तित्व ही विवादास्पद है। एक क्षण को मान लिया जाए कि उनका अस्तित्व तत्समय था, तो फिर आज उनकी पर्यायों के विद्यमान होने का प्रश्न ही नहीं है। पर्याय आज विद्यमान भी यदि हो तो वह किसी एक मन्दिर में ही उपस्थित क्यों रहे? शेष मन्दिरों में इसका क्या विद्धेष है? इस तरह यह स्पष्ट हुआ कि रोगों के शमन का कोई ब्राह्य चमत्कारिक कारण नहीं है।
वैसे भी जैन दर्शन प्रभु नहीं, उनके गुणों का उपासक है। वीतरागता का निमित्त रोगी के उत्पादन को मजबूत बना देता है, अर्थात् रोगी भक्त की आत्मिक शक्तियाँ भक्ति आदि से जागृत हो जाती हैं; परिणामस्वरुप वह स्वयं अपना चिकित्सक बन जाता है।
डाॅक्टर भी मनोविकारों की चिकित्सा में प्रायः दो कठिनाइयाँ अनुभव करते हैं। प्रथमतः तो मनोरोगी कभी अपनी चिकित्सा में सहयोग नहीं करता। दूसरे उपचार के दीर्घ होने पर वह धैर्य नहीं रखता है; लेकिन उक्त दोनों ही समस्याएँ पद्मपुरा में नहीं हैं। श्री पद्मप्रभु की इन बाधाओं की निराकरण-क्षमता से रोगी अवगत होने के कारण शीघ्र की समर्पित हो जाता है एवं उसका रुख सहयोगात्मक हो जाता है। दूसरी समस्या इसलिए नहीं आती है; क्योंकि वहाँ चालीस दिनों तक तो दिन में चालीस-चालीस बार चालीसा पढ़ना ही है; अतः रोगी का धैर्य भी बढ़ जाता है।
रोगी यहाँ देव-दर्शन और पूजा के अतिरिक्त चार विशेष त्रियाएँ भी करता है। वह णमोकार मन्त्र जपते हुए 108 बार प्रदक्षिणा देता है। श्री पद्मप्रभु की माला जपता है। श्री चालीसा का पाठ करता है एवं आरती उतारता है। इन सभी क्रियाओं से रोगी ‘स्व-सम्मोहित’ होता है। जब कभी रोगी इन क्रियाओं के करने में स्व-सम्मोहित हो जाता है उसे प्रेतादि का उपस्थित होना मानते हैं। स्व-सम्मोहन की दशा में रोगी अपने अचेतन से दिशा-निर्देश लेता है। ऐसे में रोगी अपनी दबी हुई कामनाओं एवं कुण्ठाओं को व्यक्त करता है। इस प्रकार वासनाओं को वह जितना-जितना उघाड़ता जाता है, उतना-उतना वह स्वस्थ होता जाता है।
इस प्रकार स्व-सम्मोहन की अवस्था में आना प्रारंभ करने के बाद रोगी का रुग्ण मन कमजोर होता जाता है। दूसरी तरफ मन सकारात्मक भाग (सुपरईगो) शक्तिशाली हो कर प्रकट होने लगता है, जिसे लोकरुढ़ि में ‘हाजरी’ आना कहते हैं। इस पर रोगी स्वयं तो तर्क-वितर्क द्वारा समझाता है; अर्थात् खण्डित मानसिकता को विचार-प्रत्यारोपण से दूर करता है। कभी-कभी-सुपरईगो’ के कमजोर पड़ने पर गन्धोदक का छिड़काव कर उसे पुनः शक्तिशाली बनाते हैं। अस्तु, धीरे-धीरे भाव आना और हाजरी आते-आते एक दिन यह द्वन्द्व भी मिट जाता है और रोगी पूर्ण स्वस्थ हो जाता है।
प्रदूषित वातावरण से दूर प्रकुति की गोद में बाड़ा पद्मपुरा स्थित है। वहाँ की स्वच्छ जलवायु, खुली हवा एवं शुद्ध आहार भी रोगों को स्वस्थ बनाने में मदद करते हैं। घर, परिवार, गाँव एवं समाज से दूर रहने के कारण मनोरोगी वैसे भी यहाँ अनेक तनावों से मुक्त रहता है। वहाँ रोगी को किसी प्रकार का भय नहीं होता।वह यहाँ आराम-देह जीवन जीते हुए प्रतिफल स्वस्थ होने की प्रबल भावना भाता है। अपने आराध्य की शरण में होने से उसके मस्तिष्क में विद्युत् चुम्बकीय तरंगों का प्रभाव भी अधिक होता है; फलस्वरुप वह धीरे-धीरे अपने मनोविकारों पर आत्मिक शक्तियाँ जागृत कर नियन्त्रण पा लेता है।
वास्तव में आयुर्वेद की तरह यह भी एक परम्परागत चिकित्सा-प्रणाली है। आज कुछ ओझे-सयाने अपने हितों के लिए इसका शोषण करते हैं; इस कारण इस पद्धति को नकारा तो नहीं जा सकता। प्रत्येक चिकित्सा-विधि में रोग के कारणों की व्याख्या की जाती है।मात्र इस पद्धति में जो कारण बताये गये हैं, उन्हें सही नहीं समझा गया; फलस्वरुप समाज में अनेक प्रकार के भय फैले और अन्धविश्वास पनपे; लेकिन इसके लिए चिकित्सा-पद्धति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता ।
बाड़ा के पद्मप्रभु, तिजारा के चन्द्रप्रभु, हसन टेकरी के पीर एवं बालाजी मेहन्दीपुर के हनुमान सभी आस्था-प्रधान चिकित्सा-पद्धति के मानसिक चिकित्सालय हैं। यद्यपि ये सभी केन्द्र परिष्कृत नहीं हैं, फिर भी मानोविकारों की चिकित्सा के प्रारम्भिक केन्द्र तो हैं ही, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
हमारा निवेदन है कि रोगी भी सत्य को जान कर मन, वचन और काम से पदृमप्रभु की निष्काम भक्ति करे, ताकि रोग शमन के साथ-साथ अपना आत्म-कल्याण भी कर सके।
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Posted by Lovely goswami on अप्रैल 4, 2010 at 1:36 अपराह्न
जब तक प्रेत – भूत और ईश्वर संबंधी धारणाएं पूरी तरह से खत्म नही होती ..इनका इलाज भी ऐसे ही करना होगा ..और कोई रास्ता भी नही है …
आपने इस संवेदनशील विषय पर लिखा इसके लिए आभार ..
Posted by dr.aalok dayaram on अप्रैल 4, 2010 at 2:46 अपराह्न
पद्मपरा में प्रेतादि बाधा निवारण के पीछे वैग्यानिक कारणों का अति सुन्दर विवेचन प्रस्तुत करता विद्वत्ता पूर्ण आलेख। हमारा समाज भी चूंकि ऐसी धारणाओं और विचार शैली का सहज अनुगामी है इसलिये मनोरोगी भी इन बातों में सहज आस्था के वशीभूत होकर आचरण करता है और उसे मनोवैग्यानिक लाभ मिलने लगता है। आलेख के लिये बधाई,शुभकामनाएं।
Posted by kshama on अप्रैल 6, 2010 at 2:59 अपराह्न
Abyaspoorn aalekh!
Posted by kshama on अप्रैल 6, 2010 at 3:01 अपराह्न
Abhyaspoorn aalekh!
Posted by Divya on अप्रैल 13, 2010 at 8:24 अपराह्न
quite informative !
Posted by क्षमा कर अवचेतन के तनाव से मुक्त हो « उठो! जागो! on सितम्बर 23, 2010 at 10:06 अपराह्न
[...] ‘पद्मपुरा’ में प्रेतादि बाधा-निवारणः… [...]
Posted by हँसकर दर्द को भगाए और रोग – प्रतिरोध शक्ति बढ़ाएं « उठो! जागो! on नवम्बर 10, 2010 at 8:43 पूर्वाह्न
[...] ‘पद्मपुरा’ में प्रेतादि बाधा-निवारणः… [...]
Posted by हँसकर दर्द को भगाए और रोग – प्रतिरोध शक्ति बढ़ाएं « उठो! जागो! on नवम्बर 17, 2010 at 8:49 अपराह्न
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Posted by क्या हमारा अचेतन मन ही यमलोक का चित्रगुप्त/विधाता है « उठो! जागो! on नवम्बर 24, 2010 at 5:56 अपराह्न
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Posted by Harihar vadodara on फ़रवरी 24, 2012 at 10:28 पूर्वाह्न
padmapura kya che sarnamu aapo.
Posted by jayantijain on फ़रवरी 25, 2012 at 8:09 पूर्वाह्न
Dear,
It is near Jaipur, jain temple