आत्मछवि बदले और अपने भाग्य विधाता बने

मेरे मित्र राज बापना ने उठो जागो देखकर पुछा कि 250 पेज की क्र्रति का सार एक वाक्य में बताओ ?तब में सोच में पड गया और थोडी देर बाद बताया कि मैने इस पुस्तक मे आत्म छवि  बढाने के बारे में लिखा है । सफलता प्राप्ति का जनक आत्मछवि है ।हम अपने मन में व्याप्त अपनी तसवीर से सन्चालित होते है ।हमारी तस्वीर का आधार हमारी धारणाएँ है।  हम आत्मछवि के अनुसार ही कर्म,व्यवहार व प्रतिक्रिया  करते है। आत्मछवि को पुरानी भाषा में आत्मविश्वास कहते है। आत्म छवि का कमजोर होना  मानसिक विकलांगता है । शारीरिक विकलांगता से बडी मानसिक विकलांगता हैं।
प्रोफेसर हाकिन्स शारीरिक रूप से अक्षम होते हुए भी विश्वविख्यात वैज्ञानिक हो सकते हंै तो फिर हम क्यों नहीं जीवन में सफलता प्राप्त कर सकते हैं ? निश्चय ही हम जीवन में इच्छित सफलता को प्राप्त कर सकते हैं। यदि सूरदास अन्धे होकर हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि हो सकते हंै; सुधाचन्द्रन, हिन्दी फिल्म “नाचे मयूरी” की हीरोइन, अपनी नकली टाँग से भी सफल नृत्य कर सकती है, तो हम क्यों नहीं अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते ?
शारीरिक अक्षमता एक यथार्थ है। अधिकतर असफल व्यक्ति वे हैं जिनका मानसिक विकास सीमित होता है। ऐसे लोगों को हम मानसिक रूप से अक्षम कह सकते हैं। वे अपनी दिमागी शक्ति और क्षमता का सही दिशा में एवं सही रूप में सफलता प्राप्ति हेतु उपयोग नहीं करते । लक्ष्यहीन अपनी सफलता के दरवाजे स्वयं ही बन्द कर लेते हंै । वे स्वयं नहीं जानते, वे क्या करना चाहते हंै ? जीवन में प्रमाद, आलस्य, बुरी आदतें लक्ष्यहीन होने के कारण होती हैं। कुछ ऐसे विश्वास पाल लेते हैं कि “मैं अमुक कार्य करने योग्य नहीं हूँ,” “मैं यह नहीं कर पाऊँगा”, “मैं वह नहीं कर पाऊँगा” आदि।  ऐसे लोग बहुत अधिक है जो निरुद्देश्य जीवन जी रहे हैं।

मैं सोचता हूँ, साधनों की कमी का होना मार्ग की एक-मात्र बाधा नहीं हो सकती । मेरा विचार है कि कोई भगवान आकाश में बैठा  हमारे भविष्य को तय नहीं करता । प्रकृति अपने नियमों से काम करतीहैं।
सफलता कुछ गिने-चुने लोगों की बपौती नहीं है। आप भी, कोई भी, बिना धन और विशेष सम्बन्धों के भी इच्छित सफलता प्राप्त कर सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इच्छित सफलता की प्राप्ति का अधिकार है और उसे प्राप्त करने की स्वाभाविक या प्रकृति-प्रदत्त शक्ति भी उसमें निहित है। आवश्यकता है अपने भीतर की शक्ति को उद्घाटित करने और उसको सही दिशा में प्रयुक्त करने की। सफलता की कोई सीमा नहीं होती। इसकी संभावनाएँ असीमित हंै; अनन्त हंै। जैसे आकाश की कोई सीमा नहीं है। आकाश अनन्त है, असीम है। कोई भी अपने भविष्य को सफलता के सूत्रों से बदल सकता है। यह आपके स्वयं के हाथ में है। अच्छी आत्मछवि के द्वारा ही हम प्रकृति से जुडते  है। अच्छी प्राकृतिक शक्तिया तभी साथ देती है।

आत्मछवि बदलकर हम अपना भाग्य बदल सकते है।जैसा कि हम जानते हैं और यह तय हैं कि हम अपने निर्माता स्वयं है। अपने भाग्य का निर्धारण हम स्वयं करते हैं। जैसी आत्मछवि हम बोएँगे, वैसा ही काटेंगे।

2 Responses to “आत्मछवि बदले और अपने भाग्य विधाता बने”

  1. manhanvillage Says:

    बहुत खूब भाई !

  2. shreesh k. pathak Says:

    आत्मछवि ..ये बात जम गयी ; सर..

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