खेल के मैदान में अपनी श्रेष्ठता हासिल करने के लिए व्यक्ति को अमूमन तन, मन व आत्मा तीनों से श्रेष्ठ होना होता है। शक्ति के लिए शारीरिक तंदुरस्ती चाहिए, निश्चित परिस्थिति में समय पर अपना प्रदर्शन करनेे हेतु मानसिक सन्तुलन चाहिए व मूल्यों के अनुरूप जीने हेतु आत्म-बल चाहिए। इन तीनों ही प्रकार की क्षमताओं का का श्रेष्ठतम संगम खिलाडी में होता है। इसलिय मेरा एक आदर्श खेल जगत से है। श्रेष्ठ खिलाड़ी वही बन सकता है, जो इन तीनों में दक्षता के साथ सन्तुलन बना सके।

Wilma rudolph
अमेरिका के टेनेसी प्रान्त में एक रेलवे कूली के घर में 1940 में विल्मा ने जन्म लिया, जिसकी मां घर-घर जाकर झाड़ू-पोछे लगाती थी। वह नौ वर्ष तक जमीन पर कभी पांव रख कर नहीं चल सकी। चूंकि उसको चार वर्ष की उम्र में लकवा हो गया था। तब तक वह केलिपर्स के सहारे चलती थी। डाॅक्टरों ने कहा कि वह कभी भी जमीन पर अपने कदम सीधे नहीं रख पायेगी।
उसकी मां बड़ी धर्मपरायण, सकारात्मक मनोवृत्ति वाली साहसी महिला थी। मां की आदर्शवादी बातें सुन कर विल्मा ने कहा, ‘‘मां, मैं क्या कर सकती हूं जबकि मैं चल ही नहीं पाती हूं ?’’
‘‘मेरी बेटी, तुम चाहो जो प्राप्त कर सकती हो।’’ मां का उत्तर था।
‘‘क्या मैं दुनिया की सबसे तेज धावक बन सकती हूं ?’’
‘‘क्यों नहीं मेरी बेटी’’, ‘‘कैसे ? जबकि डाॅक्टरों के अनुसार मेरे लिए चल पाना संभव नहीं है।’’
‘‘ईश्वर में विश्वास, स्वयं पर भरोसा, मेहनत और लगन से तुम जो चाहो वह प्राप्त कर सकती हो।’’
इस पर मां की प्रेरणा व हिम्मत से 9 वर्ष की विल्मा ने केलिपर्स उतार फेंके व चलना प्रारम्भ किया। अचानक केलिपर्स उतार देने के बाद चलने के प्रयास में कई बार जख्मी होती रही, दर्द झेलती रही; लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी और कोई सहारा नहीं लिया। अन्ततोगत्वा साल-सवा साल के बाद वह बिना केलिपर्स के चलने में कामयाब हो गई। इस प्रकार 13 वर्ष की उम्र में उसने अपनी पहली दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और वह सबसे पीछे रही। उसके बाद दूसरी, तीसरी, चैथी दौड़ प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती रही और हमेशा आखिरी स्थान पर आती रही। लेकिन वह पीछे नहीं हटी। निरन्तर दौड़ प्रतियोगिताओं में भाग लेती रही, और अन्ततोगत्वा उसने एक दिन प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया।
15 वर्ष की उम्र में विल्मा टेनेसी स्टेट युनिवर्सिटी गयी, जहां वह एड टेम्पल नाम के एक कोच से मिली। विल्मा ने अपनी यह ख्वाहिश बताई कि मैं दुनिया की सबसे तेज धाविका बनना चाहती हूं। तब टेम्पल ने कहा, ‘‘तुम्हारी इसी इच्छाशक्ति की वजह से कोई भी तुम्हे नहीं रोक सकता, और साथ में मैं भी तुम्हारी मदद करूंगा। दौड़ की तकनीकी बारीकियां मैं तुम्हें सिखाऊंगा।’’
आखिर वह दिन आया जब विल्मा ओलम्पिक में हिस्सा ले रही थी। ओलम्पिक में दुनिया के सबसे तेज दौड़ने वालों से मुकाबला करना पड़ता है। विल्मा का मुकाबला जुत्ता हेन से था, जिसे कोई भी हरा नहीं पाया था। पहली दौड़ 100 मीटर की थी। इसमें विल्मा ने जुत्ता को हरा कर अपना पहला गोल्ड मेडल जीता। दूसरी दौड़ 200 मीटर की थी। इसमें भी विल्मा ने जुत्ता को दूसरी बार हराया और उसने दूसरा गोल्ड मेडल जीता। तीसरी दौड़ 400 मीटर की रिले रेस थी और विल्मा का मुकाबला एक बार फिर जुत्ता से ही था। रिले में रेस का आखिरी हिस्सा टीम का सबसे तेज एथलीट ही दौड़ता है। विल्मा की टीम के तीन लोग रिले रेस के शुरूआती तीन हिस्से में दौड़े और आसानी से बेटन बदली। जब विल्मा के दौड़ने की बारी आई, उससे बेटन छूट गयी। लेकिन विल्मा ने देख लिया कि दुसरे छोर पर जुत्ता हेन तेजी से दौड़ी चली आ रही है। विल्मा ने गिरी हुई बेटन उठायी और मशीन की तरह तेजी से दौड़ी तथा जुत्ता को तीसरी बार भी हराया और अपना तीसरा गोल्ड मेडल जीता। यह बात इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गयी कि एक लकवाग्रस्त महिला 1960 केे रोम ओलम्पिक में दुनिया की सबसे तेज धावक बन गयी।

- Wilma Rudolph
विल्मा से हमें क्या सीखना चाहिये ? इससे हमें शिक्षा मिलती है कि कामयाब लोग कठिनाइयों के बावजूद सफलता हासिल करते हैं, न कि तब जब कठिनाईयां नहीं होती। विल्मा शारीरिक रूप से अक्षम थी फिर भी धावक बनी। हमारी समस्या तो मात्र मनोवैज्ञानिक अक्षमता की है जिसे हम आसानी से दूर कर सकते हैं।
क्या आपने पोलियोग्रस्त अवस्था में विल्मा का उपरोक्त फोटो देखा है ? नहीं, तो देखो और पूछो कि एक लकवाग्रस्त महिला यदि आला धावक बन सकती है तो आप क्या कुछ नही प्राप्त कर सकते ? इन मनोवैज्ञानिक बाधाओं को आप आत्मविश्वास की सहायता से सरलता से पार कर सकते हैं।
110 करोड़ के देश में आज तक एथलेटिक्स में हम एक भी मेडल ओलम्पिक में नहीं जीत सके हैं। क्यों ? इस प्रकार आप भी अपना आदर्श चुन सकते हैं जो विवेकानन्द, सुभाषचन्द्र बोस, रतन टाटा अथवा ए पी जे अब्दुल कलाम या कोई अन्य भी हो सकते है।


Posted by Nishant on जुलाई 28, 2009 at 5:56 अपराह्न
बहुत सुन्दर और प्रेरणादायक पोस्ट. मैं भी इसपर लिख चूका हूँ. यहाँ देखें:- http://hindizen.com/2009/07/02/story-of-wilma-rudolph/
कुछ सुझाव १-मीडियम आकार में चित्र पोस्ट करें. २- पोस्ट का अलाइंमेंट जस्टिफाइड रखें.
आपकी ब्लॉगिंग से सबको लाभ पहुंचे, ऐसी कामना है.
Posted by jayantijain on जुलाई 29, 2009 at 1:16 अपराह्न
Thanks, Nishant ji
I have dedicated my book Utho Jago to wilma ji published by Hind Pocket Books
Posted by mayur on सितम्बर 6, 2010 at 2:22 अपराह्न
I am proud of you wilma. i am 14 year’s old. i seen your story.
Posted by mayur on सितम्बर 6, 2010 at 2:45 अपराह्न
I am proud of you wilma. i am 14 year’s old. i seen your story.