उठो! जागो!

लक्ष्य की प्राप्ति तक रूको नहीं! -जयन्ती जैन


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छवियों के पीछे जीवन: टूटता मन

मीडिया ने हमारी पारम्परिक सांस्कृतिक एकता को खत्म कर दिया है । टीवी पर नामी कलाकारों के कार्यक्रम देख कर उन कलाकारों को अच्छा मान हम अपना गाना, नाचना व नाटक करना भुलते जा रहे हैं । इससे हम सृजनशील रहते व मस्ती लुटते थे । आज टीवी, कम्प्यूटर पर इनको देख कर निष्क्रीय व निठल्ले होते जा रहे हैं । कर्ता से हम देखने वाले होते जा रहे हैं । इससे भावनात्मक विकास व लगाव कम हो गया है व हम एकाकी होते जा रहे हैं । दूसरों को श्रेष्ठ मानने से स्वयं हीन भावना बढ़ा रहे हैं । image
टीवी/इन्टरनेट ने एक काल्पनिक दुनिया रच दी है । जिसमे व्यक्ति जीते हुए वास्तव में स्वयं से पलायन करता है । उसका मन एक काल्पनिक दुनिया में विचरण करता है । तब वह वास्तविक दुनिया से कट जाता है । काल्पनिक जगतवत् वह व्यवहार अपनों से करता है व वैसी प्रतिक्रिया की आशा करता है । जब उसे इस अनुरूप आचरण नहीं मिलता है तो वह निराश हो जाता है । इस प्रकार अपनों से दूर होता जाता है । वास्तविक जगत उसे कचोटने लगता है । काल्पनिक जगत ओर रूचिकर लगता जाता है । सितारे नायक बन जाते हैं । इस तरह यथार्थ से कटना अवसाद को बढ़ाता है । व्यक्ति को अकेला कर देता है व तनावग्रस्त रहता है ।
टीवी में दिखाये जाने वाले नारी/पुरूष वास्तव में वैसे नहीं होते हैं । उनकी ग्लेमरस व मेचों छवि निर्मित होती है । इसे बनाने में तकनीकी, मशीनों व ढेर सारे व्यक्तियों की भूमिका होती है । वह छवि वास्तविक नहीं होती है । इसमे उनकी मात्र अदाकारी होती है । वास्तविक जीवन में दूर-दूर तक भी वैसे वे नही हो सकते हैं न ही होते हैं । हमारे मनोरंजन या कोई उत्पादन बेचने वैसी छवि जानबुझ कर प्रस्तुत की जाती है ताकि हम उसे वैसा माने । उस मोहक छवि को हम मन में बसा कर जीवन में खोजते हैं, जो कहीं हो नहीं सकती है तब न मिलने पर उदास होते हैं ।
मीडिया से हम थोड़ा बहुत मनोरंजन पाते हैं लेकिन छवियां मन में बैठाने से कहीं अकेले पड़ जाते हैं । टीवी देखने से सम्बन्ध उपेक्षित होते जा रहे हैं । सम्बन्धों मंे संवाद की कमी होती जा रही है । सूचनात्मक सवांद तो मोबाईल से बढ़ा है लेकिन भावनात्मक लगाव परस्पर घटते जा रहे हैं । नए मूल्य अनुसार भावनाओं को कमजोरी माना जाता है । सम्बन्धियों व मित्रों के घर जाना कम हो गया है व वहां जाने पर भी कई बार सब टीवी देखने लगते हैं । स्वयं की निगाह में कमतर मिलने पर टुटते हैं । अंततोगत्वा हमें यह निष्क्रिय मनोरंजन छोटा भी बना देता है ।
हमारे पूर्वज जीवन भर में जितनी सुन्दर स्त्रियां नहीं देखते थे, उससे ज्यादा हम एक दिन में टीवी पर देखते हैं । इस तरह सुन्दरता का भूत खड़ा किया जाता है । इससे दर्शक भटक जाता है । वैसी छवियां/सुन्दरता जीवन में खोजता है । इस तरह व्यक्ति असंतुष्ट हो जाता है एवं नारी हीन भावना की शिकार होती है । टीवी पर आने वाले तीन चैथाई कार्यक्रमों में अप्रत्यक्ष रूप से सेक्सूलिटी/कामवासना बढ़ाने वाले होते हैे । नारी सौन्दर्य का मादक बना कर दिखाया जाता है । बच्चे इन्हे देख कर शीघ्र्र अवांछित सीख जाते हैं । आज सेक्सुलिटी की बाढ़ टीवी की देन है । दिन भर इस तरह के कार्यक्रमों को देखने से भला चंगा व्यक्ति भ्रष्ट हो जाता है।
टीवी से मधुमेह, मोटापा व हृदय रोग होते हैं । एक शोध केे अनुसार एक घंटा टीवी देखने से 22 मिनट उम्र घटती है । टीवी देखने से बच्चों की आंखे कमजोर होती है इससे उन्हे चश्मा पहनना पड़ता है । टीवी मनोरंजन कम व हमे भटकाता ज्यादा है । मन को बेलगाम यह करता है । मन को अस्थिर यह करता है। उसे गहरे कुएं मे यह धकेलता है । अतृप्त यह करता है । निराशा व बेचैनी यह फैलाता है। सपने यह दिखाता है । दिन में तारे यह दिखाता है । टीवी अशान्ति का डिब्बा है । इसे बुद्धु बक्सा वैसे ही नहीं कहते हैं ? हम इससे सपने खरीदते हैं । छवियां ग्रहण करते हैं । यथार्थ से दूर होते हैं ।

बच्चों को पंख देता है, साथ ही काट भी डालता है । नन्हे मन को युवा बना देता है । डायलाॅगबाजी सीखा देता है । बच्चों मे भेद भूला देता है । बच्चे को शैतान बनाता है । नए तरह के अन्धविश्वास सीखाता है । यथार्थ से दूर करता है । एक काल्पनिक जगत में जीना सीखाता है ।
टीवी कैसे घर वालों को बेघर बनाता है । यह घर में आग लगाता है । दर्शकों को भटकाता है । भेजा खराब करता है । सम्बन्धों को विकृत करता है । अपनों में दूरी पैदा करता है ।


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मुद्रा अर्थव्यवस्था बनाम पवित्र अर्थशास्त्र का प्रणेता चाल्र्स आईन्सटीन

मुद्रा अर्थव्यवस्था म्यूजिकल कुर्सी दौड़ की तरह है जिसमे अभ्यर्थी 60 है व कुर्सीयां 55 होती है । इसमें ज्योंहि म्यूजिक बन्द होता है तब कुर्सियों पर बैठने हेतु प्रतिस्पद्र्धा होती है । संख्या कम होने का भाव रहता है । कमी का बोध छिना झपटी को प्रेरित करता है । इसी भाव से मनुष्य अकेला होता जाता है, मन में स्वयं से दूर होता है । समाज से दूर हो जाता है । GiftEconomy
सृष्टि में सबके लिए पर्याप्त है । सब का काम चल सकता है । इसी बोध से अर्थशास्त्र पवित्र हो जाता है । सब इस पर भरोसा न कर पाने केे लिए संघर्ष करते हैं । तब संघर्ष प्रधान अर्थशास्त्र प्रधान हो जाता है ।
यह मुद्रा अर्थशास्त्र विज्ञान के साथ मिल कर उद्योग प्रधान हो गया है । इससे कृषि जमीन कम होती जा रही व उद्योग बढ़ रहे हैं । उद्योग बेरोजगारी व नियन्त्रण बढ़ा रहे हैं । अमीर-गरीब के बीच खाई बढ़ रही है । तकनीकी विकास ने इन्सान को मशीन बना दिया है जिससे सम्बन्ध टूटते जा रहे हैं । मानवता, दया, प्यार, भाईचारा कम होता जा रहा है ।
संक्रमण में जब सब कुछ बदल रहा है । मुद्रा, उपहार एवं संव्यवहार की बदलती प्रकृति सबको बदल सकती है । मुद्रा के संव्यवहार ने सबको बांटा है तो उपहार के संव्यवहार सबको जोड़ भी सकते हैं ।
चमत्कार अभी भी हो सकते हैं । उसकी झलके शिक्षान्तर, स्वराज, दरिया दिल दुकान, उपहार-संस्कृति में देखी जा सकती है । यहां पर पानी को सिर्फ पानी या एच2ओ न मान कर जल देवता माना जाता है । यह भारतीय संस्कृति की बड़ी विशषता है जो मानवता को सही राह दिखा सकती है ।
मुद्रा अर्थव्यवस्था ने हममे अलगाव, संघर्ष एवं कमी अभाव को बढ़ाया है, आपसी सामजंस्य को तोड़ा है एवं अन्तहीन उन्नति का सपना दिखाया है । प्रतिस्पद्र्धा व सफलता के युग में ठहराव शान्ति पवित्र अर्थशास्त्र से सम्भव है ।  r

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प्राणिक हीलिंग क्या है व इससे उपचार कैसे होता है ?(अंतिम भाग)

इस विधि द्वारा जब अपना व मित्रों पर उपचार किया तो इसका ज्ञान हुआ। यह बहुत कारगार व श्रेष्ठ विद्या है जो कई रहस्यों को खोलती है । ऋषि-मुनि कैसे आशिर्वाद देते थे जो पूरे होते थे । गंावों में मन्त्रित पानी देना, नीम की पतियां व झाडु से झाड़ना, झाड़ फुंक का आधार प्राणिक हीलिंग में मिला । sarve bhavantuइसमे हमारे आभामण्डल की सफाई व इसे ऊर्जित कर उपचार किया जाता है। प्राण ऊर्जा ही स्थूल शरीर बनाती है। अतः प्राण् ऊर्जा को व्यवस्थत करनें से स्थूल शरीर ठीक होता है। शरीर अपनी चिकित्सा करने में दक्ष है। प्राणऊर्जा शरीर के रसायन की बदलनें में समर्थ है।यह इसे बढ़ाता है।प्राण शरीर से आई नकारात्मकता व कालीऊर्जा को सफाई कर कम किया जाता है व अर्जित करनें के क्रम में स्वस्थ्य ऊर्जा दी जाती है। प्राण शरीर की दरारें भर जाती है व स्थ्वास्थ्य किरणें संग्रहित की जाती है।
यह सामान्य रोगों में तो बहुत कारगर है लेकिन जटिल रोगों में रोगी के जीवन की गुणवता जरूर बढ़ाता है । रोगी अन्य दवाईयां भी लेता है । स्थूल शरीर में प्रकट हुआ रोग स्थूल दवाओं से भी ठीक होता है। अतः अन्य दवाऐं लेतें रहना है। यह रोगी के ठीक होने की क्षमता को तीन गुणा बढ़ाता है । सफलता के लिए उन्नत प्राणिक हिलर चाहिए । व्यक्ति स्वयं भी सीख कर अपना उपचार कर सकता है । मुझे छोटे-छोटे प्रयोगों द्वारा इसकी यथार्थता का परिचय मिला । मैं इसकी सहायता से अपनों की सामान्य चिकित्सा भी करने लगा हूं । अभी मैं इसका विद्यार्थी हूं । इसलिए इस परअधिक कहना कठिन है । आप अपने विचार प्रस्तुत कर सकते हैं ।

 

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प्राणिक हीलिंग क्या है व इससे उपचार कैसे होता है ?

बिना दवा के रोग ठीक करने की कला प्राणिक हीलिंग है।प्राणशक्ति उपचार एक पुराना विज्ञान एवं उपचार की एक कला है जो सम्पूर्ण दृश्य शरीर के लिए प्राणशक्ति जैसा कि ओजस्वी ऊर्जा अर्थात सूक्ष्म ऊर्जा का उपयोग करती है । प्राण को बढ़ाने हेतू ही प्राणायाम करते हैं ।Pranic Healingमास्टर चो कोक् सुई द्वारा यह पुनः खोजी जाकर स्थापित की गई है । इसके परीक्षण हेतु 2 वर्कशाॅप किए । प्राचीन विद्या जिसे सीखने में वर्षाें लगते थे वह दो दिन में सीखी जा सकती है ।
यह कोई जादु, अन्ध विश्वास या सम्मोहन कला नहीं है । यह कोई परासामान्य विद्या नहीं, बल्कि प्रकृति के उन नियमों पर आधारित है जिससे हम अनभिज्ञ हैं । यह एक वैज्ञानिक विद्या है जो प्राण ऊर्जा पर आधारित है । प्राण शरीर और इसमें स्थित चक्रों को देख कर रोग का पता लगाया जाता है। इलाज के पूर्व इसी द्वारा जांच की जाती है । इस ऊर्जा से कई प्रकार के रोगों का उपचार किया जाता है । रैकी, एक्यूप्रेशर, स्पर्श चिकित्सा, मानसिक उपचार, विश्वास उपचार, एक्यूपन्चर, चुम्बक थैरेपी, आदि अनेक चिकित्सा प्रणालियां प्राण ऊर्जा पर ही आधारित है ।
क्या यह प्लेस्बो प्रभाव है या वास्तव में इससे उपचार होता है । प्राण सूक्ष्म ऊर्जाएं होती है जो स्थूल शरीर बनाती है । इसी सूक्ष्म शरीर को आभामण्डल कहते हैं । किरलियन फोटोग्राफी द्वारा आभामण्डल का फोटो लेना इसका प्रमाण है । इसमे रोगी को स्पर्श नहीं किया जाता है न ही कोई दवाई दी जाती है ।

( to be continued……..)


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कब तक गलतियों व क्षमा का क्रम चलेगा ?

प्रिय आत्मन,

 

kshama-yachna

मुझसे गलतियां हुई है। मेरी चुकें बढी है, व्यवहार में रूखा हूं, आपके प्रति कुछ अप्रिय कहा है एवं किया है। इसका खेद है। औपचारिक क्षमा नहीं, दिल पर हाथ रख कर क्षमा चाहता हूं।

अपनें अन्तर में झांकनें पर भूले स्पष्ट दिखती है, जिसकी सजा भी आप दे सकतें हो।

एक प्रश्न मन में आता है कब तक यह क्रम गलतिया करना व क्षमा मांगता रहूगा?

क्षमा प्रार्थी

जयन्ती-मीना जैन

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प्रणव की गुंजन से कैंसर ठीक होता है

प्रतिदिन हमें आधा घंटे तक ऊँ का उच्चारण करना चाहिए है। ऊँ दुनिया का सबसे पवित्र अक्षर माना गया है। जिसका कोई निश्चित अर्थ नहीं है। यह निराकार व असीम को प्रकट करने वाला अक्षर है। उसका शब्दों द्वारा कोई अर्थ नहीं बताया जा सकता है। यह हमारे सूक्ष्म शरीर को ठीक करता है, लयबद्ध करता है। cancer
यह एक श्रेष्ठतम प्राणायाम है। ऊँकार की ध्वनि करने से शरीर के कम्पन सुधरते है। मन शरीर व भावों में संतुलन आता है। ऊँ की ध्वनि करने से उत्पन्न कम्पन हमारी भावनाओं को सुहाते है, दिल को अच्छे लगते है। मन के शोर को कम करते है। स्वयं के प्रति सजग करते है। इस तरह के कम्पन से अशान्ति कम होती है, शान्ति बढ़ती है। स्नायु तन्त्र शिथिल होता है। उत्तेजना कम होती है। अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ संतुलित होकर अपना स्त्राव सही करती है। शरीर में फैले विषैले पदार्थ बाहर निकलते है। हमारी रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है।
ऊँकार की ध्वनि से उत्पन्न कम्पन हमारे शरीर के स्नायुतन्त्र को संतुलित करते है। इनमें उत्पन्न विकार का शमन करते है। इससे उत्पन्न ध्वनि शरीर को व्यवस्थित करती है। शरीर अपने निज स्वभाव को प्राप्त होता है। असंतुलन,विकृति व अराजकता का नाश होता है। हमारे शरीर के प्रत्येक अणु को शान्ति मिलती है। उन्हें ठीक होने में मदद मिलती है।
श्री श्री रविशंकर ने कहा है कि प्रतिदिन आधा घंटा तक ऊँ का उच्चारण करने से कैंसर तक ठीक हो जाता है। उनका एक अनुयायी रोज गुंजन कर अपना कैंसर ठीक कर चुका है। उादहरण स्वरूप वह बताते है कि एक जर्मन व्यक्ति जो कि ऊँ से अनभिज्ञ था। लेकिन उसने अपनी बीमारी का सामना करने प्रातः उठ कर ऊँ के समान ध्वनि आधे घंटे तक करता था। वह इससे ठीक हो गया।

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अन्तर्जगत के सिकन्दर कैसे बनना ?

जीवन मंे बहुत कुछ हमारे भीतर पर आधारित है । हमारा बाह्य जीवन अन्तर्जगत से ही जन्म लेता है । सबके बीज़ हमारे प्रारम्भ से ही विद्यमान होते हैं । धर्म की भाषा में इस बीज़ को कारण शरीर कहते हैं । इसी मे से सूक्ष्म शरीर प्रकट होता है । सूक्ष्म शरीर ही स्थूल शरीर को बनाता है । अर्थात् हम जो कुछ हैं, जैसे हैं – वह सब अपनी आन्तरिक व्यवस्था के कारण है । हम अन्दर की प्रकृति, भाव व सोच से निर्मित होते व जीते हैं । बाहर तो तद्नुरूप व्यवस्था अन्तर्शक्ति जुटाती है या प्रकट करती है । हमारा सारे व्यवहार की जड़ हमारे मन में होती है । जैसा अन्दर होता है वही बाहर खिलता है । जैसे कि बीज के अन्दर ही पेड़ छिपा होता है । जो जिन्स इसके लिए जिम्मेदार है व सब बीज मे अन्तर्निहीत होते हैं ।subtle body
बाहर का सिकन्दर बहुत शीघ्र धुल धुसरित हो जाता है । एक मच्छर उसको निपटा देता है । सिकन्दर मलेरिया से मर जाता है । लेकिन भीतर का सिकन्दर स्थायी होता है । उसे कोई बाह्य कारक चुनौती नहीं दे सकता है । वह अपने भीतर से जीता है । समाज, पड़ौसी, प्रतिष्ठा, भय के कारण वह समझौते नहीं करता है। सुकरात को जहर पीने से बचने व भागने का समय मिला था, लेकिन वह बचना नहीं चाहते हैं । वह सजगता से जहर पीते हैं । क्योंकि वे भीतर से सिकन्दर थे । स्वविजेता थे । किसी दूसरे पर किसी तरह से निर्भर नहीं थे । अपनी जिम्मेदारी पर जीते हैं । किसी अन्य को दोष नहीं देते हैं एवं किसी को दुश्मन नहीं मानते हैं। सब को सहकारी मानते हैं व स्वयं की पूर्णता में जीते हैं । कहीं से अधुरापन/अपूर्णता नहीं है । स्वयं की पूर्णता को जानते, मानते व जीते हैं । बाहर की यात्रा खेल भाव में करते हैं । जल में कमलवत निर्लिप्त रहते हैं ।
चीन में लाओत्से को तत्कालीन सम्राट अपना प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे । उन्होने पद स्वीकारने से मना कर दिया । कहा कि जब केचुंआ सोने के पींजरे में रहने को तैयार नहीं होता है तो वह उससे कम बुद्धि वाले नहीं है । अपने स्वभाव में जीना सबको प्रिय है । फिर वह पद, मद एवं धन के कारण अपना बुनियादी कुदरत नहीं त्याग सकते हैं । अतः उन्होने क्षमा मांग ली । उन्होने अपनी स्वतन्त्रता लोभवश नहीं खोई ।
बाहरी चकाचैंध के कारण स्वत्व को भूलना उचित नहीं है । पदार्थ को पाने परमात्मा को नहीं छोड़ा जा सकता है । साकार को पाने निराकार को, अस्थायी को पाने नित्य स्थायी को अन्दर के सिकन्दर नहीं भूलते हैं। अपने स्वभाव को भूलना इन्हे मंजूर नहीं है । पर को पाने एवं जीतने के क्रम में स्व को विस्मृत करने पर सब कुछ खो जाता है । बाहर तो कुछ मिलता नहीं, प्यास बुझती नहीं, अतृप्ति बढ़ती जाती है । ऐसी बाहरी यात्रा भीतर के बादशाह नहीं करते हैं ।
बाहर से शंहशाह वहीं बनना चाहते हैं जो अन्दर से दरिद्र होते हैं । जिन्हें अपने भीतर के खजानों का बोध नहीं होता है । इसलिए बाहर की वस्तुओं से स्वयं को भरना चाहते हैं ।
कबीरदास जी ने सटीक लिखा है:
सबके पलते लाल, लाल बिना कोई नहीं ।
ये तो भया कंगाल गांठ खोल देखी नहीं ।।
हम अपूर्ण अपनी सोच के कारण हैं । अधुरापन अपने अज्ञान से है ।
इस हेतु सर्वप्रथम अपने पास आना पड़ता है । अभी तक जो बाहर का महत्व दे रखा है उसकी बजाय अन्दर को प्राथमिक बनाना पड़ता है ।

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