मैं एक 12 वर्ष की लड़की तसनीम के बारे में बताना चाहूँगा। 6 वर्ष पहले एक गांव छोड़ कर शहर में आकर बस गये। तब से वह अंध विद्यालय में निरन्तर पढ़ने जा रही थी। पर वह कुछ भी नहीं सीख पाई । उसके माता-पिता ने सोचा कि वह दिमाग से कमजोर है। अतः उन्होंने शहर के कई चिकित्सकों से परामर्श लिया, पर सब व्यर्थ रहा। फिर उन्होंने मुम्बई हाॅस्पिटल में भी दिखाया। कोई लाभ नहीं हुआ।
एक दिन वह लड़की अपने पिता के साथ मेरे घर आई। मंैने उससे पूछा कि वह क्यों नहीं पढ़ना चाहती है? उसका उत्तर था, ‘‘पढ़ने का कोई लाभ नहीं है।’’ मैंने उसे उसकी बुआ अजब के जीवन के बारे में बताया। उसके केरियर के बारे में बताया कि कैसे अजब ने लकवाग्रस्त होते हुए भी अपना केरियर बनाया। उससे पूछा कि क्यों तुम्हारी मां घर में ही रहती हैं और तुम्हारी बुआ नौकरी करती हैं। मंैने दोनों का अन्तर उसे समझाया। जब उसे समझ में आया कि अजब, उसकी बुआ,अधिकारी अपनी पढ़ाई की वजह से बनी हुई हैं। वह किसी पर आश्रित नहीं हंै। और चूंकि उसकी मां पढ़ी-लिखी नहीं हंै, उसे घर में ही रहना पड़ता हंै। मंैने, तसनीम को समझाया कि उसमें और उसकी माँ में भी अन्तर है।
मंैने उससे कुछ प्रश्न किये,‘‘तुमसे कौन शादी करेगा ?’’ ‘‘एक दिन जब तुम्हारे माता-पिता नहीं होंगे, कौन तुम्हारी देख-भाल करेगा ?’’ ‘‘क्या तुम अपनी बुआ की तरह अधिकारी बनना चाहोगी ?’’अजब अधिकारी कैसे बनी, यह मंैने उसे समझाया। इस पाँच मिनिट की वार्ता से वह सीखने-पढ़ने को तैयार हो गई। उसके पश्चात् उसने एक माह में ही वह सब सीख लिया जो वह पिछले पाँच वर्षों में नहीं सीख सकी थी। मंैने सिर्फ अध्ययन की आवश्यकता की प्रेरणा दी। मंैने उसकी मान्यताओं को, विश्वासों को बदला। मंैने आधारभूत आवश्यकताओं पर प्रहार किया और वह प्रेरित हो गई। तसनीम अभी 44-रजा काॅलोनी, अम्बामाता स्कीम में रहती है।
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यदि हम सोचते हैं कि हम हारेगें तो हारे हुए हैं।

