उठो! जागो!

लक्ष्य की प्राप्ति तक रूको नहीं! -जयन्ती जैन


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प्राणिक हीलिंग क्या है व इससे उपचार कैसे होता है ?

बिना दवा के रोग ठीक करने की कला प्राणिक हीलिंग है।प्राणशक्ति उपचार एक पुराना विज्ञान एवं उपचार की एक कला है जो सम्पूर्ण दृश्य शरीर के लिए प्राणशक्ति जैसा कि ओजस्वी ऊर्जा अर्थात सूक्ष्म ऊर्जा का उपयोग करती है । प्राण को बढ़ाने हेतू ही प्राणायाम करते हैं ।Pranic Healingमास्टर चो कोक् सुई द्वारा यह पुनः खोजी जाकर स्थापित की गई है । इसके परीक्षण हेतु 2 वर्कशाॅप किए । प्राचीन विद्या जिसे सीखने में वर्षाें लगते थे वह दो दिन में सीखी जा सकती है ।
यह कोई जादु, अन्ध विश्वास या सम्मोहन कला नहीं है । यह कोई परासामान्य विद्या नहीं, बल्कि प्रकृति के उन नियमों पर आधारित है जिससे हम अनभिज्ञ हैं । यह एक वैज्ञानिक विद्या है जो प्राण ऊर्जा पर आधारित है । प्राण शरीर और इसमें स्थित चक्रों को देख कर रोग का पता लगाया जाता है। इलाज के पूर्व इसी द्वारा जांच की जाती है । इस ऊर्जा से कई प्रकार के रोगों का उपचार किया जाता है । रैकी, एक्यूप्रेशर, स्पर्श चिकित्सा, मानसिक उपचार, विश्वास उपचार, एक्यूपन्चर, चुम्बक थैरेपी, आदि अनेक चिकित्सा प्रणालियां प्राण ऊर्जा पर ही आधारित है ।
क्या यह प्लेस्बो प्रभाव है या वास्तव में इससे उपचार होता है । प्राण सूक्ष्म ऊर्जाएं होती है जो स्थूल शरीर बनाती है । इसी सूक्ष्म शरीर को आभामण्डल कहते हैं । किरलियन फोटोग्राफी द्वारा आभामण्डल का फोटो लेना इसका प्रमाण है । इसमे रोगी को स्पर्श नहीं किया जाता है न ही कोई दवाई दी जाती है ।

( to be continued……..)


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कब तक गलतियों व क्षमा का क्रम चलेगा ?

प्रिय आत्मन,

 

kshama-yachna

मुझसे गलतियां हुई है। मेरी चुकें बढी है, व्यवहार में रूखा हूं, आपके प्रति कुछ अप्रिय कहा है एवं किया है। इसका खेद है। औपचारिक क्षमा नहीं, दिल पर हाथ रख कर क्षमा चाहता हूं।

अपनें अन्तर में झांकनें पर भूले स्पष्ट दिखती है, जिसकी सजा भी आप दे सकतें हो।

एक प्रश्न मन में आता है कब तक यह क्रम गलतिया करना व क्षमा मांगता रहूगा?

क्षमा प्रार्थी

जयन्ती-मीना जैन

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प्रणव की गुंजन से कैंसर ठीक होता है

प्रतिदिन हमें आधा घंटे तक ऊँ का उच्चारण करना चाहिए है। ऊँ दुनिया का सबसे पवित्र अक्षर माना गया है। जिसका कोई निश्चित अर्थ नहीं है। यह निराकार व असीम को प्रकट करने वाला अक्षर है। उसका शब्दों द्वारा कोई अर्थ नहीं बताया जा सकता है। यह हमारे सूक्ष्म शरीर को ठीक करता है, लयबद्ध करता है। cancer
यह एक श्रेष्ठतम प्राणायाम है। ऊँकार की ध्वनि करने से शरीर के कम्पन सुधरते है। मन शरीर व भावों में संतुलन आता है। ऊँ की ध्वनि करने से उत्पन्न कम्पन हमारी भावनाओं को सुहाते है, दिल को अच्छे लगते है। मन के शोर को कम करते है। स्वयं के प्रति सजग करते है। इस तरह के कम्पन से अशान्ति कम होती है, शान्ति बढ़ती है। स्नायु तन्त्र शिथिल होता है। उत्तेजना कम होती है। अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ संतुलित होकर अपना स्त्राव सही करती है। शरीर में फैले विषैले पदार्थ बाहर निकलते है। हमारी रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है।
ऊँकार की ध्वनि से उत्पन्न कम्पन हमारे शरीर के स्नायुतन्त्र को संतुलित करते है। इनमें उत्पन्न विकार का शमन करते है। इससे उत्पन्न ध्वनि शरीर को व्यवस्थित करती है। शरीर अपने निज स्वभाव को प्राप्त होता है। असंतुलन,विकृति व अराजकता का नाश होता है। हमारे शरीर के प्रत्येक अणु को शान्ति मिलती है। उन्हें ठीक होने में मदद मिलती है।
श्री श्री रविशंकर ने कहा है कि प्रतिदिन आधा घंटा तक ऊँ का उच्चारण करने से कैंसर तक ठीक हो जाता है। उनका एक अनुयायी रोज गुंजन कर अपना कैंसर ठीक कर चुका है। उादहरण स्वरूप वह बताते है कि एक जर्मन व्यक्ति जो कि ऊँ से अनभिज्ञ था। लेकिन उसने अपनी बीमारी का सामना करने प्रातः उठ कर ऊँ के समान ध्वनि आधे घंटे तक करता था। वह इससे ठीक हो गया।

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अन्तर्जगत के सिकन्दर कैसे बनना ?

जीवन मंे बहुत कुछ हमारे भीतर पर आधारित है । हमारा बाह्य जीवन अन्तर्जगत से ही जन्म लेता है । सबके बीज़ हमारे प्रारम्भ से ही विद्यमान होते हैं । धर्म की भाषा में इस बीज़ को कारण शरीर कहते हैं । इसी मे से सूक्ष्म शरीर प्रकट होता है । सूक्ष्म शरीर ही स्थूल शरीर को बनाता है । अर्थात् हम जो कुछ हैं, जैसे हैं – वह सब अपनी आन्तरिक व्यवस्था के कारण है । हम अन्दर की प्रकृति, भाव व सोच से निर्मित होते व जीते हैं । बाहर तो तद्नुरूप व्यवस्था अन्तर्शक्ति जुटाती है या प्रकट करती है । हमारा सारे व्यवहार की जड़ हमारे मन में होती है । जैसा अन्दर होता है वही बाहर खिलता है । जैसे कि बीज के अन्दर ही पेड़ छिपा होता है । जो जिन्स इसके लिए जिम्मेदार है व सब बीज मे अन्तर्निहीत होते हैं ।subtle body
बाहर का सिकन्दर बहुत शीघ्र धुल धुसरित हो जाता है । एक मच्छर उसको निपटा देता है । सिकन्दर मलेरिया से मर जाता है । लेकिन भीतर का सिकन्दर स्थायी होता है । उसे कोई बाह्य कारक चुनौती नहीं दे सकता है । वह अपने भीतर से जीता है । समाज, पड़ौसी, प्रतिष्ठा, भय के कारण वह समझौते नहीं करता है। सुकरात को जहर पीने से बचने व भागने का समय मिला था, लेकिन वह बचना नहीं चाहते हैं । वह सजगता से जहर पीते हैं । क्योंकि वे भीतर से सिकन्दर थे । स्वविजेता थे । किसी दूसरे पर किसी तरह से निर्भर नहीं थे । अपनी जिम्मेदारी पर जीते हैं । किसी अन्य को दोष नहीं देते हैं एवं किसी को दुश्मन नहीं मानते हैं। सब को सहकारी मानते हैं व स्वयं की पूर्णता में जीते हैं । कहीं से अधुरापन/अपूर्णता नहीं है । स्वयं की पूर्णता को जानते, मानते व जीते हैं । बाहर की यात्रा खेल भाव में करते हैं । जल में कमलवत निर्लिप्त रहते हैं ।
चीन में लाओत्से को तत्कालीन सम्राट अपना प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे । उन्होने पद स्वीकारने से मना कर दिया । कहा कि जब केचुंआ सोने के पींजरे में रहने को तैयार नहीं होता है तो वह उससे कम बुद्धि वाले नहीं है । अपने स्वभाव में जीना सबको प्रिय है । फिर वह पद, मद एवं धन के कारण अपना बुनियादी कुदरत नहीं त्याग सकते हैं । अतः उन्होने क्षमा मांग ली । उन्होने अपनी स्वतन्त्रता लोभवश नहीं खोई ।
बाहरी चकाचैंध के कारण स्वत्व को भूलना उचित नहीं है । पदार्थ को पाने परमात्मा को नहीं छोड़ा जा सकता है । साकार को पाने निराकार को, अस्थायी को पाने नित्य स्थायी को अन्दर के सिकन्दर नहीं भूलते हैं। अपने स्वभाव को भूलना इन्हे मंजूर नहीं है । पर को पाने एवं जीतने के क्रम में स्व को विस्मृत करने पर सब कुछ खो जाता है । बाहर तो कुछ मिलता नहीं, प्यास बुझती नहीं, अतृप्ति बढ़ती जाती है । ऐसी बाहरी यात्रा भीतर के बादशाह नहीं करते हैं ।
बाहर से शंहशाह वहीं बनना चाहते हैं जो अन्दर से दरिद्र होते हैं । जिन्हें अपने भीतर के खजानों का बोध नहीं होता है । इसलिए बाहर की वस्तुओं से स्वयं को भरना चाहते हैं ।
कबीरदास जी ने सटीक लिखा है:
सबके पलते लाल, लाल बिना कोई नहीं ।
ये तो भया कंगाल गांठ खोल देखी नहीं ।।
हम अपूर्ण अपनी सोच के कारण हैं । अधुरापन अपने अज्ञान से है ।
इस हेतु सर्वप्रथम अपने पास आना पड़ता है । अभी तक जो बाहर का महत्व दे रखा है उसकी बजाय अन्दर को प्राथमिक बनाना पड़ता है ।

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मानना घातक है, जानना समझदारी है

                                                                                                           jeevan vidhya  मान्यता अर्थात बिना जाने सुख का स्त्रोत मानना है । मानना अर्थात किसी आश्वस्ति पर स्वीकारना है । यह संवेदना पर आधारित होता है । मानने में क्या नकारात्मकता है ? मानना कैसे विनाशक है ? मानना सदैव गलत भी नही होता है । मानना छोड़, उसको जांचने की जरूरत बता रहे हैं ।

                                                                    मान्यता का परीक्षण करता चल, पंहुच जायेगा अपनी मंजिल । हम मानने के आधार पर जीते हैं । इसे देख नहीं पाते हैं व इसे ही स्वतः सच मान लेते हैं । मान्यताएं जिनसे हम संचालित है उनका परीक्षण करने की आवश्यकता है । मान्यताएं पराधीनता की सूचक है क्योंकि उनका आधार दूसरे हैं । उनके आधार पर हम प्रामाणिक जीवन नहीं जी सकते हैं ।

                                                                         ‘एक रूका हुआ फैसला’ नामक हिन्दी फिल्म दिखाई जिससे निर्णय प्रवृति जांचने मिली कि कैसे हम अपने स्वार्थवश या अज्ञानवश जल्दबाजी में निर्णय करते हंै । अपनी-2 मान्यता के आधार पर सोचते हैं। यह नहीं करना है । फिर धिरे-धिेरे संवाद से मान्यताएं बदलती है । प्रारम्भ में जूरी के ग्यारह सदस्य आरोपी को कसुरवार मानते हैं । यह सब धिरे-धिरे बदल कर उसे बेकसुर मानने लगते हैं । तर्क द्वारा शान्ति से अपनी बात खुले मन से करने पर सच्चाई की दिशा में प्रयत्न किए जा सकते हंै । किसी के साथ अपने पूर्वाग्रहों व अनुकरण के कारण अन्याय न करें । मनुष्य मनुष्य बीच सम्बन्ध न्याय पर ही टिके हुए हैं । अतः व्यवहार बढ़ाना है तो न्याय पर ध्यान देना चाहिए ।

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रोगों का असली कारण अचेतन में होता है

इस प्रगतिक्रम मंे उतरते-उतरते इन दिनों आरोग्यशास्त्र के क्षेत्र मंे इस तथ्य को खोज निकाला गया है कि शारीरिक रोगों के सन्दर्भ मंे आहार-विहार, विषाणु आक्रमण आदि को तो बहुत ही स्वल्प मात्रा में दोषी ठहराया जा सकता है। रुग्णता का असली कारण व्यक्ति की मनःस्थिति है।
सुविख्यात मनःशास्त्री एच. एलेनवर्गर के शोधग्रन्थ ‘‘ए हिस्ट्री आॅफ डायनिमक साइकियाट्री’’ के अनुसार शरीर की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष क्रियाओं पर पूरी तरह मानसिक अनुशासन ही काम करता है।
यह मोटा निष्कर्ष हुआ। बारीकी मंे उतरने पर पता चलता है कि अमुक शारीरिक लोग अमुक मनोविकार के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं और वे तब तक बने ही रहते हैं जब तक कि मानसिक स्थिति मंे कारगर परिवर्तन न हो।
आहार-विहारजन्य साधारण रोग तो शरीर की निरोधक जीवनी शक्ति ही अच्छी करती रहती है। उसी का श्रेय चिकित्सकों को मिल जाता है। सच्चाई तो यह है कि एक भी छोटे या बड़े रोग का शर्तिया इलाज अभी तक संसार के किसी भी कोने में, किसी भी चिकित्सक के हाथ नहीं लगा है। कोई भी औषधि अपने आश्वासन को पूरा कर सकने में सफल नहीं हुई है। अँधेरे मंे ढेले फेंकने जैसे प्रयास ही चिकित्सा क्षेत्र में चलते रहते हैं।
शरीर शास्त्री भी अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि आरोग्य और रुग्णता की कुंजी मनःक्षेत्र में सुरक्षित है। अब क्रमशः औषधि उपचार का महत्त्व घटता जा रहा है और मानसोपचार को प्रमुखता दी जा रही है।
मानव मन के विशेषज्ञ एरिके फ्राम के गं्रथ ‘‘मैंन फार हिमसेल्फ’’ के अनुसार मानसिक विकृतियों में से सामयिक उलझनों के कारण तो बहुत थोड़े से होते है।अधिकतर उनका कारण नैतिक होता है। भीतर दो व्यक्तित्व उत्पन्न हो जाते है और जिनमें निरन्तर संघर्ष चलता रहता है। फलस्वरूप रोग खड़े हो जाते है।
मनीषी एल. के फ्रैंक के ग्रंथ ‘‘सोशल एनालिसिस’’ के अनुसार विक्षिप्त, अर्ध-विक्षिप्त और विक्षिप्ता के सन्निकट सनकी लोगों से प्रायः आधा समाज भरा पड़ा है। यमलोक के अधिपति चित्रगुप्त को अचेतन मन ही समझा जाना चाहिए। उनका कार्य क्षेत्र यमलोक वह मन संस्थान जिसमें प्रतिफल को परिणत कर सकने की ईश्वर प्रदत क्षमता मौजूद है। यम, नियमन व्यवस्था एवं अनुशासन को कहते है। मस्तिष्क को यमलोक और उसकी मूलभूत सत्ता को , चित्त को चित्रगुप्त की संज्ञा देकर शास्त्रकारों ने सही चित्रण किया है। ईश्वर ने सर्वत्र स्व संचालित पद्वति रखी है।ताकि न्याय व्यवस्था अगल से न करनी पड़ी।


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क्या हम दुर्घटनाऐं भी आकर्षित करते हैं ?

दुर्धटनाएं वास्तव में दुर्घटना नहीं होती है। आकस्मिक न होकर चाहने से होती है। अपने जीवन में दूसरी चीजों की तरह हम स्वयं उसे चाहते हैं ।Accidents ऐसा नहींे है कि हम जरूरी ही ये कहते हैं, ‘मैं चाहता हूं कि मेरी दुर्घटना हो जाए ।‘ लेकिन हमारे मानसिक विचार ऐसे होते हैं, जो हमारी और दुर्घटना को आकृष्ट करते हैं । कुछ लोगों के साथ अधिक दुर्घटनाऐं होती है और कुछ को जीवन भर खरोंच तक नहीं लगती ।
दुर्घटनाएं क्रोध की अभिव्यक्ति होती है । जब हम स्वयं से नाराज होते है। स्वयं को सजा देना चाहते है। वे अंदर भरी हुई कुंठाओं का संकेत देती है, जो अपने लिए न बोल पाने की मजबूरी महसूस करने से आती है । दुर्घटनाएं किसी के शासन के खिलाफ विद्रोह का भी संकेत हाती है । हम इतने पागल हो जाते हैं कि लोगों को चोट पहुचाना चाहते हैं, लेकिन उसकी बजाय हमे चोट लग जाती है । हमारे आमन्त्रण पर ही दुर्घटनाएं होती है।

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