उठो! जागो!

लक्ष्य की प्राप्ति तक रूको नहीं! -जयन्ती जैन


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देह गगन के सात समंदर : सैन्नी एवं स्नोवा का आत्म खोजी उपन्यास:

देह गगन के सात समंदर वैसे एक कथ्य व शैली के हिसाब से उपन्यास है लेकिन वास्तव में यह एक आधुनिक उपनिषद की तरह है ।यह उपन्यास नहीं बल्कि जीवन शास्त्र है । इसमें स्वयं की खोज एवं स्वयं को पाने का वृतान्त है ।

सैन्नी एवं स्नोवा

सैन्नी एवं स्नोवा

यह एक रहस्यदर्शी, दार्शनिक एवं अन्र्तयात्रा वृतान्त है जो स्वयं की खोज में लगे हुए है । नायक एवं उसकी टोली देह के पार की अन्वेशक है । यह आत्मखोज परक उपन्यास है ।
प्रेम एवं मैत्री, अस्तित्व एवं सौन्दर्य, पुरूष और स्त्री एवं धर्म एवं अध्यात्म पर इसमे गहन चर्चा की हुई है । शब्द के पार जाने की कला इसमे बतायी हुई है । कला एवं कलाकार, कविता एवं साहित्य, मन एवं उसके पार पर बहुत विस्तृत चर्चा है ।

स्त्री व पुरूष सम्बन्धों में गहराई व आत्मीयता बढ़ने से जीवन का रहस्य समझा जा सकता है । पारम्परिक ढर्रे पर जीने से बेहोशी बढ़ती है । स्त्री-पुरूष सम्बन्धों में अपूर्णता जीवन में अपूर्णता का कारण है । स्वयं को जानने की दिशा में यह एक मार्ग है । अपने भीतर के विपरित लिंग से मिलने में बाहर का साथी मात्र सहायक है । असल तो अपनी ही देह के विपरित लिंग से मिलना है। दूसरों के बहाने हम अपने ही ठिकाने तलाश रहे हैं । सजगता व्यक्ति को नये आयाम देती है ।

नर-नारी के स्वाभाविक देहयोग और देहभोग तक से डरते रहेगें, जिसके बिना हम न स्वयं को जान सकते है, न ही दूसरे को । दमन व भय ने नारी को अधुरा बना दिया है । वह समर्पण व प्रेम से वंचित होने से खण्डित है ।
आज देह लोलुपता के विकास की जगह सहभागी चेतना का विकास आवश्यक है।आत्मा स्थिर या तैयार नहीं होती है । यह एक घटना है, संज्ञा नही है । इसे रचना पड़ता है । इसका निर्माण दृष्टा होने पर होता है ।

इसके लेखक मनाली के रहने वाले सैन्नी एक यायावर है जो हिमालय में घुमते हुए अपनी खोज में व्यस्त है। परम्परागत व संगठित धर्मों के विरूद्ध है। सच्चे अध्यात्म के राही है।


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रोग एवं उपचार का विज्ञान(अंतिम भाग)

द हीलिंग कोड़ नामक चर्चित पुस्तक एलेक्जेण्डर लाॅयड एवं बेन जाॅनसन द्वारा लिखी गयी । इसमें उपचार संहिता का विस्तृत वर्णन किया हुआ है । लेखक एलेक्जेण्डर लाॅयड अपनी पत्नि होप का ईलाज 12 वर्ष की खोज के बाद इस विधि से करने में करने में सफल रहे।साथ ही अन्य विधि भी है ।

कारण – अच्छी स्मृति अच्छे भाव पैदा करती है । तनाव जनक स्मृति तनाव पैदा करती है । स्मृति ऊर्जा सूचना तन्त्र को बनाती है । अच्छी स्मृति से बुरे भाव पिघल जाते है । अच्छी स्मृति की तस्वीरें बुरे भाव व बुरी तरंगो को समाप्त करती है । कोशिकिय स्मृति को बदल देती है । उपचार होने लगता है । जिससे डीएनए बदल जाता है । यह अचेतन स्तर पर जाकर तस्वीरें बनाती है । स्वस्थ तस्वीर विकृत तस्वीर को बदल देती है । हमारा हृदय तस्वीरों को ही देखता है । वह तस्वीरों से ही संचालित है ।
अचेतन से विनाशकारी तस्वीरें छुते हुए शरीर को चेतन मन की हानिकारक बातों की तरह नुकसान पंहुचाती है । कई लोग इस तरह स्वयं की बीमार बनाते रहते हंे ।
जब दुसरे के लिए प्रार्थना करनी हो:-
मैं प्रार्थना करता हूं कि प्रभु कृपा, विश्व पे्रम, जीवन-शक्ति एवं दिव्य प्रकाश —– मीना में —भर रहा है । उसके —-उच्च रक्तचाप—-(बीमारी) सम्बन्धी ज्ञात एवं अज्ञात नकारात्मक सोच, सम्बन्धित तस्वीरें, अस्वास्थकर विश्वास, विनाशकारी कोशिकिय स्मृतियां एवं उससे जुड़ी सभी शारीरिक समस्याओं का कारण प्रकट होता है एवं उससे उनका उपचार हो रहा है । मैं प्रार्थना करता हूं कि यह इलाज 100 गुणा से भी अधिक हो ! इस प्रार्थना का प्रभाव मीना को उपलब्ध हो !
तत्काल प्रभाव  ( Instant Impact) तकनीक:-
परिस्थितिजन्य तनाव को भगाने तत्काल प्रभाव (Instant Impact) तकनीक श्रेष्ठ है ।
1-तनाव को मापे,
2-दोनों हथेलियों को मिलाये
3-तनाव को शरीर पर देखें – शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक
4-पावर श्वसन लें – मुंह से श्वांस ले व नाक से छोड़े । समस्त श्वांस गहरी हो व नाभि तक जाएं । इस तरह का श्वसन 10 सैकण्ड में परिस्थितिजन्य तनाव घटा देता है । इसे पावर श्वसन कहते हंे ।
हृदय के भावों को खोजें:-
हृदय के भावों को पहचाने व मिटाएं-अपने दिल में छुपे भावों को पहचाने फिर उनका समाधान करें । भावों को बदलो सब बदल जाऐगा । दिल की शक्ति मस्तिष्क की शक्ति से कई गुना ज्यादा है । मुख्यतः हमारे भावों को 12 भागों में बांटा जाता है ।
1-क्षमा नहीं करना
2-हानिकारक कर्म
3-गलत धारणाएं
4-प्रेम बनाम स्वार्थ
5-खुशी बनाम अवसाद
6-शान्ति बनाम चिन्ता
7-धैर्य बनाम निराशा
8-दया बनाम कठोरता
9-अच्छाई बनाम अच्छा होना
10-विश्वास बनाम नियन्त्रण
11-विनम्रता बनाम घमण्ड
12-आत्म नियन्त्रण बनाम नियन्त्रण न होना


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रोग एवं उपचार का विज्ञान:द हीलिंग कोड़ नामक चर्चित पुस्तक से

द हीलिंग कोड़ नामक चर्चित पुस्तक एलेक्जेण्डर लाॅयड एवं बेन जाॅनसन द्वारा लिखी गयी । इसमें उपचार संहिता का विस्तृत वर्णन किया हुआ है । Healingcodeलेखक एलेक्जेण्डर लाॅयड अपनी पत्नि होप का ईलाज 12 वर्ष की खोज के बाद इस विधि से करने में करने में सफल रहे।साथ ही सात आधारभूत रहस्य बताए  है ।
रहस्य नम्बर 1- सभी रोगों का एक ही कारण होता है वह तनाव है ।
रहस्य नम्बर 2- हमारे सभी रोगों का कारण ऊर्जा समस्या है ।
रहस्य नम्बर 3- हृदय हमारे स्वस्थ होने के तन्त्र का अधिपति है ।
रहस्य नम्बर 4- मानव की हार्ड ड्राईव कोशिकीय स्मृतियां है जिसमे तस्वीरें ऊर्जा के रूप में होती है । 90 प्रतिशत तस्वीरें अचेतन में अवस्थित होती है ।
रहस्य नम्बर 5- आपका एन्टी वायरस प्रोग्राम आपको बीमार बनाता है ।
रहस्य नम्बर 6- मेरी धारणाएं ही मेरी कोशिकीय स्मृतियों को प्रभावित करती है। अवचेतन में छुपी धारणाएं स्वतः काम करती है । बीमारी की जड़ काटने तनाव गिराएं, उसे मिटाने स्मृति बदलें । रहस्य नम्बर 7- हृदय एवं मस्तिष्क में द्वन्द्व होने पर हृदय सदैव जीतता है ।
मुख्य विधि (उपचार संहिता)के चरण:-
1. तनाव को मापे – 1 से 10 के अनुपात में (10 सबसे बड़ा दर्द)
2. तनाव से जुड़ी भावनाएं व विश्वास को पहचानें
3. स्मृति में खोजें – जड़ तक जाएं – समान भाव स्थिति में कब थे
4. पूरानी स्मृति को मापे – उसका उपचार करें
5. प्रार्थना करें – उसके उपचार हेतू
मैं प्रार्थना करता हूं कि प्रभु कृपा, विश्व पे्रम, जीवन-शक्ति एवं दिव्य प्रकाश मुझमे भर रहा है । मेरे —-उच्च रक्तचाप—-(बीमारी) सम्बन्धी ज्ञात एवं अज्ञात नकारात्मक सोच, सम्बन्धित तस्वीरें, अस्वास्थकर विश्वास, विनाशकारी कोशिकिय स्मृतियां एवं उससे जुड़ी सभी शारीरिक समस्याओं का कारण प्रकट होता है एवं जिससे उनका उपचार हो रहा है । मैं प्रार्थना करता हूं कि यह इलाज 100 गुणा से भी अधिक हो !
6. चारों स्थिति में उक्त प्रार्थना – बासां पर, कनपटी पर, जबड़ों पर और कंठ के पास दोनो हाथ रख कर 30 सैंकण्ड तक दुहराएं । इससे आपके दिल के घाव भर जाते हंै । उससे बीमारी ठीक होती है ।

( to be continued…..)


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आत्मशक्ति/मस्तिष्क की क्षमता: मुनि अजितचन्द्र का महा श तावधान

जैन मुनि अजितचन्द्र सागर जी द्वारा दिनांक 04.03.2012 को मुम्बई में द्विशतावधान का प्रयोग किया गया ।

शतावधान

शतावधान

तीन हजार दर्शकों के साथ-साथ तत्कालिन विधान सभा स्पीकर श्री दिलीप पाटिल, उच्च न्यायालय के न्यायाधिश श्री कमल किशोर तातेड़ एवं न्यूरोलोजिस्ट डाॅ0 सुधीर शाह भी उपस्थित थे । दर्शकों द्वारा 200 प्रश्न व तथ्य रखे गए । जिनमे गणित के सवाल भी थे । मुनिश्री द्वारा सवालों व तथ्यों को पहले क्रमशः बताया फिर उलटा बताया गया । अन्त में लोगों ने प्रश्न क्रम बताया, उन्होने उत्तर दिया । फिर उन्होने उत्तर बताए उन्होने प्रश्न क्रम बताए । इससे हमारी आत्मा की शक्ति सिद्ध होती है ।

मुनि अजितचन्द्र ऊंझा में जन्म लिया एवं 12 वर्ष की उम्र में दिक्षा ग्रहण की । इसके बाद साढ़े छः वर्ष तक मौन रहे । उन्होने बताया कि साधना एवं ध्यान के द्वारा यह उपलब्धि प्राप्त की ।

इससे हमारी मस्तिष्क की अपार क्षमता का ज्ञान हमें होता है । हम उसका कितना प्रयोग कहां कर रहे हंै । चैतन्य-आत्मशक्ति का प्रयोग देख कर प्रेरित होने की आवश्यकता है ।

 

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दीर्घ नहीं सार्थक जीवन श्रेष्ठ है

किसी भी खतरनाक बीमारी का डाइग्नोसिस रोगी एवं उसके परिजनों को डरा देता है। रोगी जीते हुए भी मृत्यु का अनुभव करता है एवं परिजन भय एवं चिंता में डूब जाते है। एड्स, कैन्सर एवं हेपेटाइटिस-बी जैसी जानलेवा बीमारियों में रोगी एवं उसके परिजन अपना सामान्य जीवन नहीं जी पाते और मृत्यृ का आसन्न भय सबको व्यथित कर देता है।

 सार्थक जीवन

सार्थक जीवन

यर्थाथ में रोग हमारी अस्वस्थता का सूचक है। खतरनाक रोग मृत्यु का भय खड़ा कर संबंधित व्यक्तियों को डरा देता है। मृत्यु तो एक सहज, स्वाभाविक अनिवार्य प्रक्रिया है। यह कोई विशेष बात नहीं है। प्रतिक्षण हम मृत्यु की तरफ आगे बढ़ रहे हेैं। जिन्हें असाध्य रोग नहीं है उनकी उम्र रुकी नहीं रहती है। आयुक्षय सदैव सभी का जारी रहता है। अतः डर का कोई औचित्य नहीं है। स्व में स्थित व्यक्ति को ही स्वस्थ कहते हैं। वास्तव में असाध्य रोग की समस्या भय से उत्पन्न होने के कारण भय की समस्या है।

भय का सामना आशावादी दृष्टिकोण के साथ किया जाना चाहिए। प्रथमतः होनी को स्वीकारने के अतिक्ति और कोई मार्ग नहीं है। मृत्यु को स्वीकारने से डर समाप्त हो जाता है। फिर भय के निकल जाने से आत्मविश्वास बढ़ता है। समय पर असाध्य रोग का पता चल जाना अभिशाप नहीं वरदान है। रोगी इससे सचेत हो जाता है। रोगी के परिजन भी बेहतर इलाज का प्रबंध कर सकते हैं। रोग के ज्ञान से परिवार में तद्नुरुप योजनाएं बनाई जा सकती हैं। इससे निर्णय लेने में सुविधा रहती है। ताकि रोगी को अच्छे से अच्छे चिकित्सक का इलाज मिल सके एवं उसकी सुश्रुषा अच्छी तरह की जा सके। इससे अनेक बार असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं।

समय पर रोग का ज्ञान होने से व्यक्ति अपनी मानसिकता बदल पाता है। हिम्मत एवं धैर्य के साथ रोग का सामना किया जा सकता है। परमार्थिक चिंतन की तरफ ध्यान देकर शारीरिक चिंताओं को कम करने का अवसर मिलता है। रोगी अपने में वैचारिक परिवर्तन लाकर नकारात्मक चिंतन पर लगाम लगा सकता है। सकारात्मक चिंतन द्वारा रोग कि विरुद्ध लड़ने की प्रतिरोधात्मक शक्ति बढ़ाई जा सकती है। सारे दर्द शरीर में नहीं, मस्तिष्क में होते हैं। सारे तनाव का केन्द्र मन है। अतः मन को व्यवस्थित करने का इससे अवसर मिलता है। साथ जीवन मन से चलता है, तभी तो कहते हैं कि मन के जीते जीत है मन के हारे हार।
पूर्वज्ञान रोगी से रोगी अपने शेष जीवन का महत्व जान जाता है। ऐसे में वह अपनी गलत आदतों एवं लारवाहियों को छोड़ सकता है।

आखिर मनुष्य दीर्घ जीवन जीना क्यों चाहता है? जब आयु हमारे हाथ में नहीं है तो हम इसकी कामना क्यों करते हैं? कुछ और वर्ष जीकर भी हम क्या कर लेंगे। थोड़ा सा धन, बड़ा पद एवं प्रतिष्ठा अर्जित कर उसका क्या करेंगे, धन तिजोरियों में, पद कार्यालयों में एवं प्रतिष्ठा लोगों की स्मृति में रहती है। आज तक यह सब अर्जित किया है उसका परिणाम सामने है ।क्या हम अपनी पांचवी पीढ़ी को जानते हैं? किसी को नाम ज्ञात भी हो तो उसके क्या अर्थ हैं? उस शख्त को क्या लाभ है? अर्थात जीवन का लंबा होना नहीं, बेहतर होना महत्वपूर्ण है।

आत्मज्ञान के प्रकाश में कोई भी व्यक्ति अपना प्रत्येक संग्राम लड़ सकता है। फिर असाध्य रोग क्या चीज है, जीवन को समग्रता में समझने पर प्रत्येक समस्या का समाधान संभव है। हम अपने पूर्वाग्रहों, आवेगों एवं वासनाओं से आच्छादित हैं।अतः जीवन का अर्थ नहीं समझते। अध्यात्म मार्ग के सहारे स्वयं को जान कर जानलेवा बीमारियों से लड़े तो नई ऊर्जा मिलती है। तभी जीवन में कायाकल्प संभव है।

प्रार्थना में भी असीम शक्ति होती है। भौतिक शरीर मात्र अणुओं के संचालन से ही नहीं संचालित होता है। डाॅक्टर की दवाई ही नहीं, प्राकृतिक शक्तियां एवं प्रभु का आशीष भी लाभकारी होते हैं।      (प्रकाशितः दैनिक भास्कर 4 फरवरी 1998)


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मेरी पुस्तक ‘तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ’ से तनावरोधी कैप्सूल

हम समस्याओं के कारण तनावग्रस्त नहीं हैं, बल्कि हमारे तनावग्रस्त होने से समस्याएँ हंै।

तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ

तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ

 हम समस्याओं के कारण तनावग्रस्त नहीं है बल्कि हमारे तनावग्रस्त होने से समस्याएँ है।

 हमारा मस्तिष्क बहुत बड़ी कृशि भूमि के समान है। यहाॅ हम खुशी या तनाव उगा सकते है। अगर खुशी के बीज नहीं बोएंगें तो तनाव स्वतः ही खरपतवार की तरह उग आयेगा।

 तनाव मुक्त होकर नाभि पर समश्वास के साथ जीना यानि विश्राम के साथ जीना बील गेट्स, विश्व के सबसे धनाढ्य व्यक्ति होने से बड़ी उपलब्धि है। चन्द्रमा पर जाने से भी बड़ी उपलब्धि तनाव मुक्त होना है।

 यह सच है कि स्वयं आपके सिवा और कोई भी आपको तनाव नहीं दे सकता।

 मानव के सोचने की योग्यता ही जानवर और मानव के बीच का अन्तर है। इसलिए जीवन की साधारण खुशियों का आनन्द लेने के लिए ’’सोचिए’’।

 तनाव और चिंताये ऐसे तथ्य हैं जिनका जोड़ आपको ’हार्ट अटैक’ कर सकता है।

 विश्व में कोई भी शक्ति हमें नुकसान नहीं पहॅुचा सकती,जब तक कि हम पहले,अपने आप को नुकसान,नहीं पहॅुचाते।

 आपको हरएक के साथ अच्छा बनने की जरूरत नहीं है। मिलकर कार्य करना सीखिए और यह सिद्ध मत कीजिए कि आप ज्यादा समझदार है।तनावपूर्ण रहने से बेवकूफ बनना अधिक अच्छा है।

 कई बार, एक स्पष्ट और निर्भीक ’’नहीं ’’कहने से 100 सिरदर्दियों से बचा जा सकता है।

 तीर्थंकर महावीर के साधनाकाल में एक ग्वाले ने उनके कानों में कीले ठोकी तो भी वे विचलित न हुये। दूसरी तरफ हम स्वयं के माता पिता की डॅाट फटकार तक से घायल हो जाते है। महावीर के पैरो में सांप ने काटा तो भी वे तनावग्रस्त नहीं हुये और हम उसे देख कर ही डर जाते है। क्या कारण है?
 हम अपने सिवाय दूसरा कुछ नहीं बन सकते है। इसलिए कुछ बनने का प्रयास नहीं करना चाहिये। क्या गुलाब कभी चमेली बनने का प्रयास करता है ?

 दृश्य को अदृश्य धारण किए हुए है। साकार, निराकार के अधीन है। जो भी साकार एवं स्थूल है उसके लिए कहीं न कहीं निराकार एवं सूक्ष्म सहयोगी है। जब तक यह अनुभव न हो तब तक जीवित होते हुये भी हमारा जीवन से संबंध नहीं होता है। पदार्थ की सत्ता से ही हम अवगत है, चेतना की सत्ता को नहीं जानने हम उसे नकारते है। यही हमारी सबसे बड़ी भूल है।

 साक्षी रहो व स्वयं को ’फील’ करो।

 हम चेतना के जिस तल पर खड़े है,वहाँ संकट,विपरीत स्थितियां एवं कठिनाईयाॅ उसे बढ़ाने आती है।

 


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मेरी आने वाली पुस्तक ‘तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ’ के बारे में

 तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ                              तनाव कम करने पर यह सम्पूर्ण पुस्तक है जिसमें 16 उपाय तनाव कम करने पर दर्षाऐ हैं । लेखक स्वयं ने अपने जीवन में अनेक तरह के तनाव भोगे हैं एवं उनका सामना सफलता पूर्वक किआ हैं। तनाव आधुनिक जीवनशैली एवं आधुनिक विज्ञान की देन है। बीमारियों का सबसे बड़ा कारण तनाव है। तनाव हमारी आदत में आ गया है, जीवन में घुस गया है। इसे जीतना अब सरल नहीं रहा है। यह दिखाई भी नहीं पड़ता है। मोटे तौर पर तनाव एक   मानसिक स्थिति है। यह हमारे दिमाग में रहता है। तनाव हमेशा सिर से शुरू होता है। घटनाएँ सदैव तनाव का कारण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि आप घटनाओं को किस रूप में लेते और उनसे प्रभावित होते हैं। घटना की व्याख्या एवं विश्लेषण से हमारा रवैया तय होता है। हमारा रवैया ही तनाव होने और नहीं होने का कारण है।
हम तनावग्रस्त होने के कारण एवं अपनी अनेक तरह की कमजोरियों के कारण अपने विपुल ऊर्जा भण्डार का पूरा उपयोग नहीं कर पाते हैं। अदृश्य तनाव भी बन्धन है। मनोवैज्ञानिक विकलागंता शारीरिक विकलागंता की अपेक्षा बहुत हानिप्रद होती है। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आप परिस्थितियों एवं व्यक्तियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया और अनुभवों की व्याख्या को तनाव के सम्बन्ध में पहचान सकेंगे और आप तनाव के प्रभावों को कम करने में पुस्तक में वर्णित उपायों का प्रयोग कर सकेंगे।
यह सात भागों में विभाजित हैं। पुस्तक के अन्त में 22 ऐसे लोगो के अनुभव हैं जिन्होने अपने तनाव कैसे दुर किए हैं। ये भी तनाव छोडने के अनुभूत उपाय हैं । इस तरह यह पुस्तक लेखक की अकेली न होकर 22 व्यक्यिों की भी हैं।

                                                                                                                                                                                                                        

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