उठो! जागो!

लक्ष्य की प्राप्ति तक रूको नहीं! -जयन्ती जैन


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मानना घातक है, जानना समझदारी है

                                                                                                           jeevan vidhya  मान्यता अर्थात बिना जाने सुख का स्त्रोत मानना है । मानना अर्थात किसी आश्वस्ति पर स्वीकारना है । यह संवेदना पर आधारित होता है । मानने में क्या नकारात्मकता है ? मानना कैसे विनाशक है ? मानना सदैव गलत भी नही होता है । मानना छोड़, उसको जांचने की जरूरत बता रहे हैं ।

                                                                    मान्यता का परीक्षण करता चल, पंहुच जायेगा अपनी मंजिल । हम मानने के आधार पर जीते हैं । इसे देख नहीं पाते हैं व इसे ही स्वतः सच मान लेते हैं । मान्यताएं जिनसे हम संचालित है उनका परीक्षण करने की आवश्यकता है । मान्यताएं पराधीनता की सूचक है क्योंकि उनका आधार दूसरे हैं । उनके आधार पर हम प्रामाणिक जीवन नहीं जी सकते हैं ।

                                                                         ‘एक रूका हुआ फैसला’ नामक हिन्दी फिल्म दिखाई जिससे निर्णय प्रवृति जांचने मिली कि कैसे हम अपने स्वार्थवश या अज्ञानवश जल्दबाजी में निर्णय करते हंै । अपनी-2 मान्यता के आधार पर सोचते हैं। यह नहीं करना है । फिर धिरे-धिेरे संवाद से मान्यताएं बदलती है । प्रारम्भ में जूरी के ग्यारह सदस्य आरोपी को कसुरवार मानते हैं । यह सब धिरे-धिरे बदल कर उसे बेकसुर मानने लगते हैं । तर्क द्वारा शान्ति से अपनी बात खुले मन से करने पर सच्चाई की दिशा में प्रयत्न किए जा सकते हंै । किसी के साथ अपने पूर्वाग्रहों व अनुकरण के कारण अन्याय न करें । मनुष्य मनुष्य बीच सम्बन्ध न्याय पर ही टिके हुए हैं । अतः व्यवहार बढ़ाना है तो न्याय पर ध्यान देना चाहिए ।

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रोगों का असली कारण अचेतन में होता है

इस प्रगतिक्रम मंे उतरते-उतरते इन दिनों आरोग्यशास्त्र के क्षेत्र मंे इस तथ्य को खोज निकाला गया है कि शारीरिक रोगों के सन्दर्भ मंे आहार-विहार, विषाणु आक्रमण आदि को तो बहुत ही स्वल्प मात्रा में दोषी ठहराया जा सकता है। रुग्णता का असली कारण व्यक्ति की मनःस्थिति है।
सुविख्यात मनःशास्त्री एच. एलेनवर्गर के शोधग्रन्थ ‘‘ए हिस्ट्री आॅफ डायनिमक साइकियाट्री’’ के अनुसार शरीर की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष क्रियाओं पर पूरी तरह मानसिक अनुशासन ही काम करता है।
यह मोटा निष्कर्ष हुआ। बारीकी मंे उतरने पर पता चलता है कि अमुक शारीरिक लोग अमुक मनोविकार के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं और वे तब तक बने ही रहते हैं जब तक कि मानसिक स्थिति मंे कारगर परिवर्तन न हो।
आहार-विहारजन्य साधारण रोग तो शरीर की निरोधक जीवनी शक्ति ही अच्छी करती रहती है। उसी का श्रेय चिकित्सकों को मिल जाता है। सच्चाई तो यह है कि एक भी छोटे या बड़े रोग का शर्तिया इलाज अभी तक संसार के किसी भी कोने में, किसी भी चिकित्सक के हाथ नहीं लगा है। कोई भी औषधि अपने आश्वासन को पूरा कर सकने में सफल नहीं हुई है। अँधेरे मंे ढेले फेंकने जैसे प्रयास ही चिकित्सा क्षेत्र में चलते रहते हैं।
शरीर शास्त्री भी अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि आरोग्य और रुग्णता की कुंजी मनःक्षेत्र में सुरक्षित है। अब क्रमशः औषधि उपचार का महत्त्व घटता जा रहा है और मानसोपचार को प्रमुखता दी जा रही है।
मानव मन के विशेषज्ञ एरिके फ्राम के गं्रथ ‘‘मैंन फार हिमसेल्फ’’ के अनुसार मानसिक विकृतियों में से सामयिक उलझनों के कारण तो बहुत थोड़े से होते है।अधिकतर उनका कारण नैतिक होता है। भीतर दो व्यक्तित्व उत्पन्न हो जाते है और जिनमें निरन्तर संघर्ष चलता रहता है। फलस्वरूप रोग खड़े हो जाते है।
मनीषी एल. के फ्रैंक के ग्रंथ ‘‘सोशल एनालिसिस’’ के अनुसार विक्षिप्त, अर्ध-विक्षिप्त और विक्षिप्ता के सन्निकट सनकी लोगों से प्रायः आधा समाज भरा पड़ा है। यमलोक के अधिपति चित्रगुप्त को अचेतन मन ही समझा जाना चाहिए। उनका कार्य क्षेत्र यमलोक वह मन संस्थान जिसमें प्रतिफल को परिणत कर सकने की ईश्वर प्रदत क्षमता मौजूद है। यम, नियमन व्यवस्था एवं अनुशासन को कहते है। मस्तिष्क को यमलोक और उसकी मूलभूत सत्ता को , चित्त को चित्रगुप्त की संज्ञा देकर शास्त्रकारों ने सही चित्रण किया है। ईश्वर ने सर्वत्र स्व संचालित पद्वति रखी है।ताकि न्याय व्यवस्था अगल से न करनी पड़ी।


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क्या हम दुर्घटनाऐं भी आकर्षित करते हैं ?

दुर्धटनाएं वास्तव में दुर्घटना नहीं होती है। आकस्मिक न होकर चाहने से होती है। अपने जीवन में दूसरी चीजों की तरह हम स्वयं उसे चाहते हैं ।Accidents ऐसा नहींे है कि हम जरूरी ही ये कहते हैं, ‘मैं चाहता हूं कि मेरी दुर्घटना हो जाए ।‘ लेकिन हमारे मानसिक विचार ऐसे होते हैं, जो हमारी और दुर्घटना को आकृष्ट करते हैं । कुछ लोगों के साथ अधिक दुर्घटनाऐं होती है और कुछ को जीवन भर खरोंच तक नहीं लगती ।
दुर्घटनाएं क्रोध की अभिव्यक्ति होती है । जब हम स्वयं से नाराज होते है। स्वयं को सजा देना चाहते है। वे अंदर भरी हुई कुंठाओं का संकेत देती है, जो अपने लिए न बोल पाने की मजबूरी महसूस करने से आती है । दुर्घटनाएं किसी के शासन के खिलाफ विद्रोह का भी संकेत हाती है । हम इतने पागल हो जाते हैं कि लोगों को चोट पहुचाना चाहते हैं, लेकिन उसकी बजाय हमे चोट लग जाती है । हमारे आमन्त्रण पर ही दुर्घटनाएं होती है।


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नाराजगी कैसे आत्म-विनाशक है ?

नाराजगी से हम दूसरों को दोषी मान कर उनके प्रति बुरे विचार करते हैं । बुरे विचार स्वयं को सचमुच नाराज कर देते हैं । कितनी गजब बात है कि दूसरों से नाराज होकर उसको हानि पंहुच सके या नहीं, लेकिन स्वयं के मन में नाराजगी के भाव खुद को नाराज कर देते हैं ।complaints

अपने से असंतुष्ट होना बड़ा अपराध है । दूसरों से नाराजगी स्वयं से नाराजगी का हिस्सा है । यह आत्मघातक है । नाराजगी से क्रोध आता है जो हारमोन्स को असंतुलित करता है । क्रोध कुछ जहरीले रसायन उत्पन्न करता है जो पाचन व अन्य संस्थान को प्रभावित करते हैं ।
नाराजगी आत्म सम्मान को आहत करती है । ऐसे में व्यक्ति अपनी निगाह में गिर जाता है । इससे प्रसन्नता घटती है व निराशा बढ़ती है । नाराजगी हमारा अवचेतन स्वीकार लेता है । तब यह वास्तविक बनकर हमारे भविष्य को हानि पंहुचाती है । नाराजगी सम्बन्धी विचार मस्तिष्क को अशान्त करते हैं । ये विचार स्वयं ही अपने मन में नाराज होकर आग लगाते रहते हैं । तब अशान्ति डेरा डाल देती है।
नाराजगी शिकायत भाव का ही दूसरा नाम है । जो संतोष व सहजता का दुश्मन है । शिकायतें करना अवसाद बढ़ाता है । दोषारोपण करना स्वयं को कमजोर बनाता है । अपने को सीमित करता है । असीम के बोध को रोकता है ।
नाराजगी व्यक्ति को विद्रोही बनाती है । समाज विरोधी चिन्तन को बढ़ाती है । यह कुण्ठा बढ़ाती है । आगे बढ़ने से रोकती है । अगले की अच्छाईयां को नहीं देखने देती है । हम दूसरों से या स्वयं से अप्रसन्न होकर अपना ही अहित करते हैं । अपने को ही पीसते हैं । अपनी धुनाई करने में लाभ किसी को नहीं है । नाराजगी से सिर्फ मूड ही नहीं खराब होता है, होने वाले का बल टूटता है ।
लम्बी नाराजगी और असंतोष कैंसर जैसे रोगों को आमन्त्रित करते हैं । कैंसर रोगी अपने से नाराज ही होते हैं ।
नाराजगी में क्रोध आता है । क्रोध अच्छे खासे व्यक्ति को पागल बना देता है । क्रोध में कई बार हृदय रोग हो जाता है । क्रोध में आत्महत्या कर लेता है । क्रोध में दूसरों को मार देता है ।


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जीवन शैली बदलेंः आत्मचिकित्सक बनें

स्वस्थ होने में साझेदारी

एक बार जब रोग हो गया है तो रोने, मूड़ खराब करने, चिन्ता करने से यह ठीक नहीं होगा। मात्र जीवन का उद्देश्य एवं भाव समझने व उसका ध्यान रखने से जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदल सकती है, फलस्वरूप रोगी अपने दर्द व भय का सामना बेहतर तरीके से कर सकता है। जीवन में उद्देश्य होने से पीड़ा कम हो जाती है। अर्थात जीवन का लक्ष्य बनाएं। वर्तमान में जीएं।

केवल डाॅक्टर और दवाई ही इलाज नहीं करते वरन् ये सहयोगी है, रोगी के भीतर के डाॅक्टर के कार्य में ।डाॅ. अस्लाम ने बताया है कि ‘‘मजबूत जिजीविषा और मस्तिष्क के संतुलित होने से अन्तःस्त्र्रावी ग्रन्थियां स्वस्थ बनाने वाले रसायन बनाती है।’’

जीवन के अस्तित्व में, ईश्वर में, अपनी चिकित्सा में आस्था रखने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। सकारात्मक भाव व विचारों से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। अर्थात् स्वस्थ होने में विचारों की महत्वपूर्ण भूमिका है। विचार अनुकूलन की शक्ति का प्रयोग करें…………… स्वस्थ होने के विचार निरन्तर करते रहे।
जीवन शक्ति बढ़ाने के लिए प्रार्थना करें।

प्रभु आप जीवन के स्रोत हो
मुझे खुलकर अपना मधु पीने दो
मेरे दिल के अन्दर आप उठोे
अनन्त सम्भावनाओं को खोलो।

रोग हमारे अन्तर्मन की अराजकता व असंतुलन को दर्शाते है। मन के लयबद्ध व शान्त होने पर सब कुछ ठीक हो सकता है।

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एम आर लाला की कैंसर विजय कहानी

एम आर लाला एक प्रसिद्ध लेखक एवं चिन्तक है टाटा के अधिकृत जीवनी कार है। टाटा चेरीटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टी भी रहे हैं। इन्हें स्वयं को लसिका ग्रन्थियों में कैंसर-लिम्फोमा (नान हाजकिन्स) हुआ था।M R Lala Biographer of JRD Tata चिकित्सा के दौरान् साथी रोगी को किमोथेरेपी के डर को कम करने के बाबत् चर्चा करते थे। ठीक होने के बाद अन्य रोगियों के लाभार्थ कैंसर पर विजय नामक कृति की रचना की। जिसमें उन्होंने लिखा है कि मात्र दवाई से रोगी ठीक नहीं हो सकता है। ठीक होने के लिए रोगी का मनोबल, ठीक होने की जिजीविशा, अस्तित्व के प्रति आस्था और सकारात्मक होने की जरुरत है।
इस कृृति में कैंसर का मुकाबला करने की विधि ,दृष्टि एवं उदाहरण दिए गए है।। इसमें विस्तृत जीवन्त एवं अनुभवयुक्त वर्णन उपलब्ध है। लाला ने इसमें लिखा है कि कैंसर किसी व्यक्ति के शरीर पर हमला कर सकता है। लेकिन कभी उसकी आत्मा पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता। यह सच्चाई को चैंकाने वाला प्रमाण है कि सर्वोंत्तम चिकित्सकीय उपकरण चमत्कार कर सकते हैं, लेकिन वास्तविक चमत्कार अधिक सकारात्मक ओैर आनंदमय मानव मस्तिष्क की सहायता से होता है। रोगी के की स्वस्थ होने मंे आत्मबल बहुत बड़ी भूमिका है। दवाइयां भी आत्मबल के अभाव में निष्प्रभावी रहती है।

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वजन एवं खराब कोलस्ट्रोल (एल.डी.एल.) घटाने हेतु घरेलु आयुर्वेदिक नुस्खा

अपने किचन से निम्न मसाले बताई मात्रा अनुसार ले :
1. भुना हुआ जीरा – 50 ग्राम,
2. मैथीदाना – 50 ग्राम, ayurvedic nuskha
3. धनिया – 50 ग्राम,
4. सौंफ – 50 ग्राम,
5. काली मीर्च – 25 ग्राम,
6. लेंडी पीपल – 25 ग्राम,
7. सौंठ – 25 ग्राम
8. दालचीनी – 25 ग्राम
खराब कोलस्ट्रोल (एल.डी.एल.) व वजन घटाने के लिए उपरोक्त आठों चीजें कुट-पीस कर पाउडर बना ले । फिर प्रतिदिन आधा चम्मच दोनो समय भोजन के बाद एक कप गरम पानी में घोल कर लें । यह अच्छा पाचक व विरेचक भी है । उक्त प्रयोग से वजन भी कम होता है ।

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