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जन
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भावनात्मक असंतुलन की दशा में स्नायविक संस्थान में निम्न संकेत होते है।
- त्वचा जब जगे झनझनाने
- तन जायें जब पेशियाँ और पीड़ा करे प्रदान
- गर्दन जाये अकड़ जब और आये कलेजा मुँह को
- पत्थर-से प्रतीत होने लगें जब उदर में
- आन्त्रिक संस्थान में क्रिकेट
- आन्त्रपुच्छ का जब उखड़े मिजाज
- उदर जब कराये हवाई सैर
- आये डकार जब दूसरा चैंक जायें
- भावावेश करे जब रक्त-धमनियों का शिकार
- कांकालिक पेशियाँ जब नृत्य करे
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जन
Posted by jayantijain in Life-Management, Spirituality, Stress Management, Bloging, Art of Living, Articles. Tagged: अनुभव, अवचेतन, अवचेतन मन, अवचेतन मस्तिष्क, खुद- इलाज, जीवन प्रबन्धन, टिप्पणी, बदलना, भाग्य, मन, मस्तिष्क, लेखन, सेहत. 2s टिप्पणियाँ
मेरे भीतर अभी भी कामदेव जीवित है। मैंने उनका सामना कई तरह से किया। काम-भोग को देखा, भोगा लेकिन प्यास अभी भी कायम है। अवचेतन का प्रभाव गहरा होता है।
यह आग अभी तक क्यों दहक रही है। किशोर अवस्था में जैसी प्यास थी, नारी जितनी अच्छी लगती थी आज भी उतनी ही आकर्षित करती है। चुपके से नारी, उसके उभारों को देखना, उसके अन्तः वस्त्रों कोे देखना अभी भी मन को अच्छा लगता है। काम को उत्तेजित करने वाले व काम सम्बन्धी बातों में अभी भी रस मौजूद है। नैसर्गिक माँग अनैसर्गिक ओर हो जाती है, कई बार। आखिर यह मन कब तक यूं ही भटकता रहता है?
इससे उसमें कुछ नया न मिलता है, फिर भी चाह मरती नहीं है। वही प्रयोग बार-बार होता है। भोगने के बाद कुछ घंटे तृप्ति तो रहती है। फिर कुछ समय बाद वासना अंगड़ाई लेती है। उपलब्ध में कमी नजर आती है व अप्राप्त आकर्षित करती है। यह खेल यथावत जारी है। जबकि ओशो को समझने के बाद भावनाओं का दमन अधिक न किया। जागृत रहने का प्रयत्न किया। फिर भी मन से वासना न गई।
शायद मैंने शर्तों पर सोचा है। ऐसी सुन्दर है, इतनी वफादार हो, पूर्व समर्पित हो तभी पूर्ति होगी। अन्यथा प्राप्त में कमी निकाल कर उसे बेकार कर देता हूँ व कहीं ओर से पूर्ति का सपना देखता हूँ। कई बार अपनों से शिकायत नहीं, फिर भी गैर मन को सुहाते है। मन कभी प्रयोग करना चाहता हूँ। कभी निकटता आकर्षित कर लेती हूँ तो कभी मौके का लाभ देखता हूँ।
शरीर के तल पर मिलन से मन का तल तृप्त नहीं होता। विचार के तल पर मिलन चाहिए। प्रेमपूर्ण चित्त नहीं है। आध्यात्मिक तल पर प्रेम को जाना नहीं है। इसलिए कामुकता जीवन से गई नहीं है।
समाजिक वर्जना ने सेक्स ओबशेसन पैदा किया है। सेक्स को दबाने के क्रम वह मरा नहीं बल्कि जहरीला हो गया है। यह जहर मुझे बेहोश करता है व मादाएं मुझे लुभाती है। सजगता से जीवन यापन नहीं कर पाता हूँ।
अधुरा भोग प्सास मिटाता नहीं है। पूर्णता में भोगने का समग्र मन न था। अर्थात् मैं समर्थ न था। विचारों के साथ भोगा जो तृप्त न हुआ। तभी तो भयभीत हूँ, खण्डित हूँ, अधुरा हूँ,एवं अप्रामाणिक हूँ। मूच्र्छा में जीने के कारण समग्र भोग न पा सका।
मैं सिद्धान्त, शास्त्र एवं विचारों से बंधा हुआ हूँ। अतः सेक्स को सूक्ष्म रूप से अचेतन रूप से दबाता रहा हूँ। एक तरफ नीति शास्त्र के बंधन है, तो शिक्षा के ताप अपनी जगह पर है।
मैं भीड़ से, समाज से, दूसरो से प्रभावित होता हूँ। उनसे डर कर सेक्स को दबाता रहा हूँ। सेक्स पर परिवार, पड़ौसियों की मर्यादा के नियम है। उनकी बुद्धि से भी चलता हूँ। मैं अकेला नहीं हूँ। सामाजिक रीति-रिवाज, प्रचलन, फैशन, कला सब सेक्स के विरुद्ध है। एक तरह से उससे नाराज होना लड़ना ही है। मैं सेक्स से बंध गया क्योंकि मैं सेक्स को पराजित करना चाहता हूँ। यह लड़ाई क्या सेक्स को भाव नहीं दे रही है?
विज्ञापनों से प्रभावित मन भटकता है। बाजारवाद मन को वासना में ले जाता है। बुद्ध ने इसी कारण वासना को दुष्पूर कहा है। यह पूरी नहीं होती। ऐसा इसका स्वभाव है। जबकि उपनिषद् कहते है भोगो तो छुटेगा। अर्थात् मैं इस ऊर्जा को समझ न पाया। इसके नियमों को पहचान न सका।
सेक्स में समय-शून्यता, शरीर-शून्यता व अहं-शून्यता की झलक मिलती है। यह झलक मैं बार-बार लपकना चाहता हूँ।
मैं प्रेमपूर्ण नहीं हूँ। मेरा मन घृणा, ईष्र्या, चिन्ता से भरा है। इसलिए मैं कामूक हूँ।
मेरी दृष्टि काम के प्रति सही नहीं रही। विरोध की दृष्टि से काम बढ़ा। मैंने उसे सहज नहीं लिया। उसे दुष्टमन समझा। इससे काम को बल मिलता रहा।
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जन
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महाराजा जनक संसार में रहते हुए कैसे ऋषिवत जीते
मन के निर्णय या ज्ञान को हम अपना समझ बैठते है। जैसा कि आँख, नाक, कान, जिन्हा व स्पर्श इन्द्रिय की सीमा है। वे भी अपनी सीमा से बाहर अनुभव नहीं कर पाते है। वैसे ही मन भी अपनी सीमा से बाहर जाकर अनुभव नहीं कर सकता है। जबकि सत्य इसके पार होता है तभी चेतना के अनुभव पर उपनिषद् के ऋषियों ने नेति-नेति की बात कहीं है। मन के इसी स्वभाव के कारण हमारे जीवन में हर चीज भली-बुरी थोड़े समय में समस्या बन जाती है। हम किसी भी सम्बन्ध, घटना, वस्तु, व्यक्ति से सुख उठाते-उठाते अचानक दुःख पाने लग जाते है। हमारी प्राप्ति कब व्यर्थ हो जाती है हमें पता ही नहीं लगता है।
मित्रों, वैसे मन हमारा दुश्मन नहीं है। यह चेतन ने ही बनाया है। आकार से उपर उठने, निराकार को जानने मन के पार जाना पड़ता है। बेईमान होने का अवसर होने पर ईमानदार होना ही उपयोगी है।
संसार हम अपनी मन की आंख से देखते है। हम जगत को हमारे मन के चश्मे से देखते है। अर्थात् ‘‘जो है’’ कि बजाय ‘‘जो नहीं है’’ वह स्व-निर्माण कर देखता है। अर्थात् हम अपना ही प्रक्षेपण करते है। अपनी बुद्धि व स्वार्थ से देखते है। इस अर्थ में हम अन्धे हो जाते है।
महाराजा जनक संसार में रहते हुए कैसे ऋषिवत जीते है? शक्तिशाली होकर भ्रष्ट नहीं थे। जीवन जीने की कला के गुरु है। इस मन को पहचान कर ही वे घर में वैरागी थे। सब कार्य करते हुए भी अकत्र्ता थे, उनकी क्रिया में अक्रिया थी। सारे उपद्रवों के वे दृष्टा थे। यह कला मन के स्वभाव को जान कर ही संभव है। इस कला का सार यही है। अपने भीतर उठते विचार, भाव व शब्दीकरण को सतत देखो। दो विचारों, के बीच पड़ते अन्तराल को देखो। इसी तरह साक्षी भाव बढ़ेगा, मन मिटेगा। अन्यथा मन को मिटाया नहीं जा सकता है।
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जन
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मन की तीसरी विशेषता तर्क को महत्त्व देना है। वह तर्क से ही समझाता व समझता है। तर्क द्वारा समग्र को नहीं समझा जा सकता है। क्योंकि तर्क भी वस्तुओं को खण्डित करता है। तर्क मन की ही ईजाद है। उसके द्वारा उसके पार सोच नहीं पाते है। तर्क शास्त्र ऐसा ज्ञान है ‘‘जो है’’ उसको नहीं सिद्ध करें एंव ‘‘जो नहीं है’’ उसको प्रमाणित कर दे। अर्थात् यह वायवीय है। बातुनी है, उपरी-उपरीे है। इसको जीवन में समझने का आधार नहीं बनाया जा सकता। जैसे की प्लेट में रखे दो अमरुदों को तर्क तीन सिद्ध कर सकता है। एक पहला जो है, व दूसरा दो नम्बर का अमरुद। अब एक एवं दो जोड़ो-यह तीन होता है। जबकि प्लेट में दो अमरुद ही है। तर्क द्वारा तीन अमरुद सिद्ध किये जा सकते है लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता है।
लेकिन मन के अधिन व्यक्ति को यह बात तो गले नहीं उतरती है। हमारी आदत तर्क प्रधान हो गई है। जबकि तर्क भी एक साधन है समझने-समझाने का। वह भी सब कुछ नहीं है। जिसके कारण जीवन को गहरे सत्यों को हम समझ नहीं पाते है। तर्क ही ज्ञान की कसौटी नहीं है। तर्क से सत्य को पकड़ा नहीं जा सकता। लेकिन तर्कातीत को ख्याल में लेने में मात्र तर्क सहायह है। जैसे तबला बजाने वाला बजाने के पूर्व हथोड़े से तबला ठोंकता है, वह संगीत नहीं है। वह संगीत की पूर्व तैयारी है। इस कारण जीवन में अन्धेरा छिटकता नहीं है।
मन का स्वभाव ही ऐसा है। फिर इसके कहने पर चल कर हम दुःखी होते है व कर्म भाग्य आदि को दोष देते रहते है। अरे! मन रूपी में नाव में ही छेद है तो भवसागर कैसे पार लगेगा। इस नांव में तो एक नहीं तीन-तीन बड़े छेद है। मन की इस स्वभाव, विशेषता व इसकी कुशलता को ध्यान में रख कर निर्णय लें।
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दिस
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मन की दूसरी विशेषता यह है कि वह सदा दूसरों की तरफ देखता है। वह स्वयं की तरफ नहीं देखता है। मन कभी भी अपना दोष नहीं देखता है। प्रारम्भ से ही उसकी नजर दूसरों पर रहती है। इस कारण सम्यक विश्लेषण हो नहीं पाता है। कभी भी वस्तुस्थिति का सही पक्ष प्रकट नहीं होता है। उसके छिपे रहने से सारी गड़बड़ हो जाती है। हमारा मन दूसरे पर ही मंडराता रहता है। दूसरों को सुखी मान कर चलता है। दूसरों को देखने के कारण वह तुलना करता रहता है। फिर उससे तुलना कर नरक गढ़ लेता है। तभी कृष्णमूर्ति ने ‘‘माइण्ड विदाउट मेजर’’ नामक पुस्तक लिखी है। जिसमें उन्होंने लिखा है कि हम तुलना कर हर चीज को समस्या बना लेते है। इस कारण वस्तु को समग्रता में समझ नहीं पाते है।
मन कभी भी अपने पास नहीं आता है। स्वयं के पहलू को ध्यान में नहीं रखता है। पर को देख कर ही निर्णय करता है जो कि अधुरे होते है। वह दूसरे को देखने का सरल रास्ता चुनता है। साथ ही दूसरों का सुख देखता है एवं अपना दुःख ही देखता है। इस कारण सदैव दूसरे को सुखी मानता है व स्वयं को दुःखी मानता है। इसलिए वह कभी पूरी तरह वास्तविकता को देख नहीं पाता है। उसकी सोच हमेशा पूर्वाग्रह पर आधारित होती है।
दुसरो को देखने के कारण सारे दुःख है जबकि जीवन स्वयं के पास है।
( To be continued…..)
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दिस
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मन की पहली विशेषता विचार करना है। हम अपनी जीवन यात्रा में हर चीज का सामना विचार से करते हैं। वैसे विचार बाह्य जगत में/सांसारिक उन्नति में जरुरी है। उसका अपना जीवन में महत्त्व है। उससे मैं इन्कार नहीं करता हूँ। लेकिन आन्तरिक जगत में, निराकार के जगत में विचार समस्याएँ पैदा करता है। भौतिक क्षेत्र में तो फिर भी विचार सहायक हो जाते है लेकिन भाव जगत में, निराकार के क्षेत्र में, चेतना के सम्बन्ध में विचार आधारित निर्णय भटकाने वाले होते है। हमें विचार को छोड़ किसी अन्य साधन/दृष्टि का पता नहीं है।
विचार की अपनी सीमाएं होती है जिसे हम भूल जाते है। विचार वस्तु को खण्डित कर देखता है। वह समग्र को एक साथ देख नहीं पाता है। अतः कई बार वस्तुओं के पक्ष को देख कर उन्हें दो में बांट देता है-प्रेम-घृणा, लाभ-हानि, हार-जीत, मेरा-तेरा, यह-वह आदि। इस तरह देखने से ये सब समस्याएं हो जाते है। क्योंकि प्रेम-घृणा एक ही भाव के दो रूप है, दो किनारे है। प्रेम और घृणा दों चीजें नहीं है। दोनों के परमाणु एक ही है। कभी पूरा प्रेम नहीं होता, न ही पूरी तरह हम घृणा करते है। जब हम प्रेम करते है तो साथ घृणा भी जन्मती है, जिसे विचार तत्समय देख नहीं पाता। मानें कि यह एक से सौ तक की मात्रा है। यही विचार की सबसे बड़ी सीमा है, कमजोरी है। तभी तो जिससे प्रेम होता है उसी से हमारी लड़ाई भी होती है।
वैसे ही जीत-हार भी दो नहीं होते है। हर जीत में कुछ हार होती है। इसी तरह हर हार में कुछ जीत भी छिपा होती है जिसे विचार देख नहीं पाते है। पाना-खोना भी पूर्ण नहीं होते है। हर खोने में कुछ पाना होता है। पाने में कुछ खोना छिपा रहता है। अतः विभाजित कर देखने के कारण समझ कमजोर हो जाती है, अधुरी रह जाती है। इस कारण हम सही निर्णय नहीं कर पाते है।
विचार वस्तु को खण्डित कर देखता है अर्थात् वस्तु एवं भाव का एक ही पक्ष देखता है अर्थात् समग्र को देख नहीं पाता हैै। ऐसे में हम अधुरे ज्ञान से निर्णय कर आगे बढ़ते है जो बाद में वहीं फैसले गलत लगते है। तभी जो कभी मित्र लगता है वहीं कभी वही दुश्मन दिखता हैै। आज तक जो अपना है वह कल पराया दिखता है। जबकि विचार की सीमा को ध्यान में रखे तो पछताना कम हो सकता है। बुद्धि तो उधार विचारों को ही समझने की भ्रान्ति में पड़ जाती है। बुद्धि की संवेदना सतही होती है। सागर के अन्दर का अन्तस्तल उपरी लहरों को पता नहीं होता है।
( To be continued…..)
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दिस
Posted by jayantijain in Art of Living, Life-Management, Personality, Self-Healing, Stress Management, success. Tagged: अनुभव, खुद- इलाज, जीवन प्रबन्धन, टिप्पणी, बदलना, ब्लॉग लेखन, भाग्य, मन, सेहत. 2s टिप्पणियाँ
जनक सम्राट होकर ऋषिवत कैसे जीते थे?
विगत दस दिनों की मौन यात्रा में मन से मुलाकात हुई जिसकी प्रकृति व स्वभाव अनुभव किया जिससे जीवन में कितने उपद्रव होते है उनका बोध स्पष्ट हुआ। मन को समझ कर उसको शान्त किया जा सकता है व उसी से जीवन में आनन्द व शान्ति प्राप्त होते है।
मन को शान्त होने, आनन्द पाने, ईश्वर पाने या होने में मन सम्बन्घी ज्ञान की भूमिका है। वरन् यह इतना समर्थ है कि हमारा उपयोग कर लेता है। इससे आनन्द-शान्ति न लें तो यह जीवन में निरन्तर दौड़ता रहता है। अशान्त इसी को नहीं समझने के कारण होते है। यह विचारों के साथ तादात्म्य कर स्वयं बहुत कुछ बन जाता है। अहं यही बनता है। सारे उपद्रव करने में, शरीर को बचाने में, भटकाने में यह उस्ताद है। नित्य व स्थायी को भूला देता है। यश-प्रतिष्ठा, धन, स्त्री के प्रति मोह पैदा करता है। धर्म में आई सारी विकृतिया इसीकी बदौलत है। यह बस हमें उपर ही उपर भ्रमित किये रहता है। यह प्रत्येक चीज को देर-सबेर समस्या बना लेता हैं। यह कही तृप्त नहीं होता है। प्राप्त को बेकार व अप्राप्य को सदैव श्रेष्ठ बता कर उधर दौड़ाता रहता है। यह रूप बदलने, चाल बदलन में बड़ा माहिर हैै। यह अपनी बात व कथन पर अडि़ग नहीं रहता है।
मन की विशेषताओं को जान लेने पर हम इसको पहचान लेते है। अपने क्रिया-कलापों में, विचारों में यह कैसे घूसा बैठा है। इसकी पहचान कर इसके प्रति तटस्थ हो जाए तो यह स्वतः मर जाता है। मौन व साक्षी होकर ही इसको मिटाया जा सकता है। वरन् प्रत्येक उपाय में यह सूक्ष्म रूप से घुस जाता है। तभी तो संयम, नियम, संकल्पों की धज्जी यह रोज उड़ाता है। संयम को प्रतिष्ठा बना देता है। करुणा में अहं बन कर घूस जाता है। बुद्धपुरुषों की वाणी को यह सम्प्रदाय बना देता है। प्रत्येक को यह अपनी आँख से देखता है। यह अपने हिसाब से समझता व अर्थ निकालता है। तभी तो कहा जाता है कि मन के मैत न चालिए। लेकिन यह इतना कुशल है कि उस पर फेंके गए प्रत्येक पत्थर को अपना रंग दे देता है। तभी तो जीवन की चाबी इसने हथिया ली है। विचार आया नहीं, भाव आया नहीं, तर्क आया नहीं की गई भैंस पानी में, मन हमें शिकार बना लेता है।
(To be continued……)
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दिस
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Life-Management, Personality, success. Tagged: अनुभव, कृतज्ञता, टिप्पणी, नकारात्मता, ब्लॉग लेखन, मस्तिष्क, लेखक, विवाह. 5s टिप्पणियाँ
विवाह का अर्थ विशेष उत्तरदायित्व ग्रहण करना है। यह एक शौक, मजबूरी, परम्परा, समझौता एवं बंधन नहीं है। यह स्वयं की अपूर्णताओं को पूरा करने का अवसर है। अपनी विशेषताओं को जीने व अधुरेपन को भरने का मौका है।
यह दो शरीरों को मिलन नहीं है। यह दो आत्माओं का पूर्णता की तरफ बढ़ने का मौका है। यह संस्कार से भी बढ़कर है। यह करार नहीं, प्रेम का शिखर पाने को मौका है।
यह जीवन जीने की यात्रा का अगला पड़ाव है। विवाह एक संकल्प है। विवाह में दो व्यक्ति अपनों के सम्मुख जीवन भर साथ निभाने की प्रतीज्ञा करते है।
जैसा की कहाँ जाता है कि विवाह से आपकी आँखे चार हो जाती है। इसमें आँखें ही नहीं हाथ, पाँव भी चार हो जाते है। मस्तिष्क भी दो हो जाते है जो कि ग्यारह के बराबर है।
कुछ विवाहित लोग विवाह के बारे में नकारात्मक बातें भी करते हैं। विवाह से फँस जाते है, ऐसा भी नहीं है। विवाह के बाद दुनिया मालूम पड़ती है। विवाह से जिम्मेदारियाँ जरुर बढ़ जाती है। विवाह करने वाले लड़के-लड़की गृहस्थ हो जाते है। उन्हें अपनी जिम्मेदारी स्वयं वहन करनी पड़ती है। उनका अपने परिवार की नींव विवाह से पड़ती है।
विवाह न अच्छा होता न बुरा। यह करने वाले की दृष्टि पर निर्भर है। समाज की आधारशीला विवाह है। इससे भिन्न समाज का अस्तित्व नहीं रह पाता है।
जब हम अकेले अपनी यात्रा जारी नहीं रख पाते हंै तब विवाह करना पड़ता है। विवाह अन्धें वे लगड़े को मिलकर यात्रा करने के समान है। दो अधुरे साथी मिलकर पूर्ण होते है। दो कमजोर विवाह से मजबूत बन कर उभरते है। जो व्यक्ति अकेले अपनी जिम्मेदारी लेने में समर्थ होते है वे अकेले मस्ती से रहते है। विवेकानन्द या अब्दुल कलाम जैसे व्यक्ति अकेले मस्ती से रहते भी है।
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दिस
Posted by jayantijain in Art of Living, Life-Management, Personality, Self-Healing, Stress Management. Tagged: अनुभव, असफलता, तनावमुक्ति, प्रबल इच्छा, प्रसन्नता, मनोवृती, सकारात्मकता, सेहत. 1 टिप्पणी
हम सभी अधुरे है। मन के अधीन जीते है इसलिए समग्रता में नहीं जी पाते है। हम सभी द्वन्द्व में जीते है। जीवन में साकार को ही आधार मानकर जीते है। तर्क के आधार पर जीते है। विचारों के सहारे जीते है इसलिए पूर्णता को नहीं जान पाते है। इसी कारण अधूरे है। इंसान पूर्ण होते ही भगवान बन जाता है। हम अपूर्ण होने के कारण पूरी तरह सुखी नहीं हो सकते है। हर रिश्ते में अपूर्णता है, शिकायतें है। सभी इच्छाएँ किसी की पूरी नहीं हो सकती है। इसलिए यहाँ कोई पूरी तरह सुखी नहीं हो सकता है। कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता, दूसरों के सपनों के अनुरूप पूरी तरह नहीं हो सकता है। यहाँ हमें इन्हीं में मार्ग निकालना पड़ता है। एक दूसरे को सहना पड़ता है। तभी तोे आदर्श प्रेमी भी शादी के बाद लड़ते देखे जाते है। हम कोई भी पूर्ण नहीं है तो सामने वाले से पूर्णता की आशा क्यों करते हैं? आदर्श सिर्फ कला जगत में होता है। संसार समझोता है। लोक व्यवहार में यही सब चलता है।
गलती सबसे होती है। गलती इंसान की मजबूरी है एवं यही हमारी सीमा है। भूल हो जाती है। अब सपनों में, चर्चा में वह अपनी गलती स्वीकार कर माफी मांग चुकी है। आपको माफ करना चाहिए। अतीत में बार-बार जाने की जरुरत नहीं है। संसार में जीने हेतु बहुत से जहर पीने पड़ते है। एक जहर यही सही। भौतिक जगत में स्वार्थ ऐसे ही नचाता है। पुत्र की शादी करनी ही है। सर्वश्रेष्ठ बहू होगी तो हमारे पुत्र से ही शादी क्यों रचायेगी। वह भी अपना अधुरापन मिटाने आपके बेटे से ब्याह करती है। अर्थात् वह अपने में पूर्ण नहीं है। उसे जीवन साथी की जरुरत है। किसी पूर्ण को शादी करने की जरुरत नहीं है।
अपनी तरह से श्रेष्ठ व्यवहार करो। यह हमारा सोचा-परखा निर्णय है। अपने पर भरोसा रखों। उन्होंने अच्छे व्यवहार का स्वांग किया होगा। हम असल में बढि़या व्यवहार अपनी तरह से करेंगे, फिर परिणाम जो भी हो। आशंका करके कांटे न बिछाएँ। अपनी नकारात्मकता हानिकारक है।
मेरी, या किसी की किस्मत कोई नहीं निगल सकता है। बहुत चालाक व घमण्डी होंगे। हमारा क्या बिगाड़ लेगें। हमें उनके घर जाकर कौनसा रहना है। बदमाश व्यापारी को भी वक्त सर्वेंक्षण निभाते है, जैसे निभा लेना। अपने-अपने गीत अपनी तरह से गाने ही पड़ते है। संसार या सत्य से भागने का विकल्प अधिक बुरा है।
अधुरापन, अपूर्णता, थोड़ी बेईमानी, थोड़ी सच्चाई, कभी खुशी कभी गम को ही संसार कहते है। यहाँ सब चलता है। इन सब के बीच रास्ता अपनी अक्ल से निकालना पड़ता है। फिर भी हँसना पड़ता है, हँसाना पड़ता है। एक तर्क, घटना, बात लेकर रोते रहने में सार नहीं है। इस क्रम में बहुत कुछ खोना पड़ सकता है। अतः बीच का व्यावहारिक पथ चुनों, संतुलित रहो। भावुक होने की जरुरत नहीं है। सब कुछ दाँव पर नहीं लगा है। हमारा जीवन हमारे हाथ में है। हमें कोई दुःखी नहीं कर सकता। हम अपने मालिक है। आप अनावश्यक खीचों मत। तुरन्त निर्णय करो। दो घोड़ों की सवारी न करें। मेरी बेहोशी अब अधिक नहीं चलेगी। जागो! जागो!
पूर्ण सुखी होने के आकांक्षी हो तो ‘‘जो है’’ उसका आनन्द लेना सीखो। संसार में तो इसी तरह होना निश्चित है। जब इसमें रहना है तो जैसा है वैसा स्वीकार करो, इसे अधुरा ही स्वीकारों। जीवन सहने का दूसरा नाम है। थोड़ा बहुत बेवकूफ बनना व सहना उचित है। संसार में थोड़े धोखे खाना भी सफल जीवन हेतु जरुरी है। इनसे सबक लो, इनको पहचानों व शान्त रहो। मानव की अपनी सीमाएँ है। व्यवहार की सीमाएँ है। दूसरे भी किसी न किसी से बँधे हुए है। वे कोई बुद्ध पुरुष नहीं है। उनकी अपनी समझ अनुसार कुछ गलती की है तो क्षमा कर आगे देखो। अत्यधिक मीनमेख घातक है। वे तो आपके स्नेह के आकांक्षी है। हमें मूर्ख बनाना, धोखा देना उनका व्यवसाय नहीं है। तीर्थकरों का जीवन बताता है कि संसार में सुख नहीं है। तभी तो वे आत्मज्ञान की राह पकड़ते हेतु वन को जाते है।
कोई दूसरा ऐसी गलती नहीं करेगा इसकी क्या गारन्टी है। एक बार बँध गए है तो निभा के देखो। एक मौका देना चाहिए।
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नव
Posted by jayantijain in Art of Living, Articles, Bloging, Life-Management, Personality, Self-Healing, Stress Management. Tagged: अनुभव, असफलता, कैंसर, क्षमता, खुद- इलाज, तनावमुक्ति, निर्णय, प्रबल इच्छा, सकारात्मकता, सेहत. 4s टिप्पणियाँ
मेरे मित्र श्री आर एस बोहरा, वरिष्ठ कर सलाहकार ने गत माह अपनी 35 वर्ष पुरानी तम्बाकू खाने की आदत छोड़ दी। व्यसन हमेशा दो ही तरीके से छूटते है या तो आत्मबल से या दैवबल से। पहले भी बोहरा कई बार संकल्प छोड़ने का प्रयत्न कर चुक है लेकिन दो-तीन घंटे से अधिक नहीं चला तब उन्होंने उन्होंने सोचा कि मैं दैवबल को पुकारु तो शयद मेरा व्यसन छुट जाएं या विचार कर राते को सोते समय रामायण के प्रंसग विभीषण का राम से प्रथम मिलन पर यह पूछना कि मैंने कानों से आपका सुयष सुना है। विभीषण ने कहाँ कि ‘‘श्रवण सुजसु सुनी आयहु प्रभु भंजन भव भीर, त्राहि-त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।’’ तब श्रीराम बोले हे विभीषण ‘‘जो नर होही चराचर द्रोही, आवे सभय सरन तकि मोहि, तजि मद मोह कपट-छल नाना, करहुँ सध्य तेहि साधु समाना।’’ अर्थात् विभीषणजी कहाँ कि महाराज मैंने ऐसा सुना है कि आपकी शरण अत्यन्त सुखदायी है और आप शरणागत को भयमुक्त कर देते है। श्रीराम बोले हे विभीषण यदि कोई मनुष्य समस्त विश्व का द्रोही हो जाएं (अर्थात् पूरे जगत से दुश्मनी मोल ले ले) परन्तु वह भयभीत होता हुआ भी कपट समस्त छल छोड़ कर मेरी शरण तक आ जाएं तब मैं उसे भयमुक्त करके उसे नवीन बना देता हूं और स्वाभाव साधु समान कर देता हूं।
इस प्रंसग से प्रेरित होकर अनुसार श्री बोहरा सोते वक्त प्रभु श्रीराम से विनती करते है कि मैं भी तेरी शरण आने को तैयार हूँ। मेरा तो तम्बाकू के अतिरिक्त कोई दुश्मन भी नहीं है। प्रभु फिर मैं आपकी कृपा से वंचित क्यों। मेरे को इस व्यसन रूपी नागपाश से मुक्त करें।
सुबह उठकर स्वतः ही श्रीनाथ जी जाने का विचार आता है एवं नाथद्वारा जाकर 4 दिन तक वह श्रीनाथजी जाकर प्रभु मन्दिर में रहे, मन्दिर में राधे-राधे का जाप जपते रहे।
निकोटिन की कमी के कारण 72 घंटे तक तम्बाकू बार-बार उठती रही। लेकिन उन्होंने निकोटिन किसी भी रूप में नहीं ली। मुँह में तुलसी पत्र डालकर राधे-राधे जपते रहे। तीन दिन बाद तम्बाकू की तलब उठनी बन्द हो गई किन्तु शारीरिक नियमों के अनुसार सरदर्द, कब्ज, सुस्ती आना, थकान आना, नींद उड़ जाना इत्यादि हुए लेकिन उन्होंने राधे-राधे के जाप कर उनका मुकाबला किया एवं साथ ही चिकित्सकीय सेवा ली। आज उन्हें सफलता पूर्वक निकोटिन से मुक्त हुए दो माह हो चुके है।
विचारणीय बिन्दु यह है कि अगर एक बोहरा 35 वर्ष पुरानी आदत संकल्प व श्रद्धा से छोड़ सकता है तो हम किसी भी व्यसन को क्यों नहीं छोड़ सकते है।
इच्छुक व्यक्ति से निवेदन है कि इस सन्दर्भ में यहाँ यह भी उल्लेखित करना उचित होगा कि जाॅन आर पोलिटो ने अपनी वेबसाइट ूीलुनपजण् बवउ पर एक पुस्तक फ्रीडम फ्रोम निकाटिन एन्ड जर्नी टू होम से भी मदद ली जा सकती है।
व्यसन पुनः हमें न घेर लें इसलिए याद रखें कि आज निकोटिन नहीं, किसी कीमत पर नहीं।