उठो! जागो!

लक्ष्य की प्राप्ति तक रूको नहीं! -जयन्ती जैन


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नाराजगी कैसे आत्म-विनाशक है ?

नाराजगी से हम दूसरों को दोषी मान कर उनके प्रति बुरे विचार करते हैं । बुरे विचार स्वयं को सचमुच नाराज कर देते हैं । कितनी गजब बात है कि दूसरों से नाराज होकर उसको हानि पंहुच सके या नहीं, लेकिन स्वयं के मन में नाराजगी के भाव खुद को नाराज कर देते हैं ।complaints

अपने से असंतुष्ट होना बड़ा अपराध है । दूसरों से नाराजगी स्वयं से नाराजगी का हिस्सा है । यह आत्मघातक है । नाराजगी से क्रोध आता है जो हारमोन्स को असंतुलित करता है । क्रोध कुछ जहरीले रसायन उत्पन्न करता है जो पाचन व अन्य संस्थान को प्रभावित करते हैं ।
नाराजगी आत्म सम्मान को आहत करती है । ऐसे में व्यक्ति अपनी निगाह में गिर जाता है । इससे प्रसन्नता घटती है व निराशा बढ़ती है । नाराजगी हमारा अवचेतन स्वीकार लेता है । तब यह वास्तविक बनकर हमारे भविष्य को हानि पंहुचाती है । नाराजगी सम्बन्धी विचार मस्तिष्क को अशान्त करते हैं । ये विचार स्वयं ही अपने मन में नाराज होकर आग लगाते रहते हैं । तब अशान्ति डेरा डाल देती है।
नाराजगी शिकायत भाव का ही दूसरा नाम है । जो संतोष व सहजता का दुश्मन है । शिकायतें करना अवसाद बढ़ाता है । दोषारोपण करना स्वयं को कमजोर बनाता है । अपने को सीमित करता है । असीम के बोध को रोकता है ।
नाराजगी व्यक्ति को विद्रोही बनाती है । समाज विरोधी चिन्तन को बढ़ाती है । यह कुण्ठा बढ़ाती है । आगे बढ़ने से रोकती है । अगले की अच्छाईयां को नहीं देखने देती है । हम दूसरों से या स्वयं से अप्रसन्न होकर अपना ही अहित करते हैं । अपने को ही पीसते हैं । अपनी धुनाई करने में लाभ किसी को नहीं है । नाराजगी से सिर्फ मूड ही नहीं खराब होता है, होने वाले का बल टूटता है ।
लम्बी नाराजगी और असंतोष कैंसर जैसे रोगों को आमन्त्रित करते हैं । कैंसर रोगी अपने से नाराज ही होते हैं ।
नाराजगी में क्रोध आता है । क्रोध अच्छे खासे व्यक्ति को पागल बना देता है । क्रोध में कई बार हृदय रोग हो जाता है । क्रोध में आत्महत्या कर लेता है । क्रोध में दूसरों को मार देता है ।


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जीवन शैली बदलेंः आत्मचिकित्सक बनें

स्वस्थ होने में साझेदारी

एक बार जब रोग हो गया है तो रोने, मूड़ खराब करने, चिन्ता करने से यह ठीक नहीं होगा। मात्र जीवन का उद्देश्य एवं भाव समझने व उसका ध्यान रखने से जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदल सकती है, फलस्वरूप रोगी अपने दर्द व भय का सामना बेहतर तरीके से कर सकता है। जीवन में उद्देश्य होने से पीड़ा कम हो जाती है। अर्थात जीवन का लक्ष्य बनाएं। वर्तमान में जीएं।

केवल डाॅक्टर और दवाई ही इलाज नहीं करते वरन् ये सहयोगी है, रोगी के भीतर के डाॅक्टर के कार्य में ।डाॅ. अस्लाम ने बताया है कि ‘‘मजबूत जिजीविषा और मस्तिष्क के संतुलित होने से अन्तःस्त्र्रावी ग्रन्थियां स्वस्थ बनाने वाले रसायन बनाती है।’’

जीवन के अस्तित्व में, ईश्वर में, अपनी चिकित्सा में आस्था रखने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। सकारात्मक भाव व विचारों से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। अर्थात् स्वस्थ होने में विचारों की महत्वपूर्ण भूमिका है। विचार अनुकूलन की शक्ति का प्रयोग करें…………… स्वस्थ होने के विचार निरन्तर करते रहे।
जीवन शक्ति बढ़ाने के लिए प्रार्थना करें।

प्रभु आप जीवन के स्रोत हो
मुझे खुलकर अपना मधु पीने दो
मेरे दिल के अन्दर आप उठोे
अनन्त सम्भावनाओं को खोलो।

रोग हमारे अन्तर्मन की अराजकता व असंतुलन को दर्शाते है। मन के लयबद्ध व शान्त होने पर सब कुछ ठीक हो सकता है।

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एम आर लाला की कैंसर विजय कहानी

एम आर लाला एक प्रसिद्ध लेखक एवं चिन्तक है टाटा के अधिकृत जीवनी कार है। टाटा चेरीटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टी भी रहे हैं। इन्हें स्वयं को लसिका ग्रन्थियों में कैंसर-लिम्फोमा (नान हाजकिन्स) हुआ था।M R Lala Biographer of JRD Tata चिकित्सा के दौरान् साथी रोगी को किमोथेरेपी के डर को कम करने के बाबत् चर्चा करते थे। ठीक होने के बाद अन्य रोगियों के लाभार्थ कैंसर पर विजय नामक कृति की रचना की। जिसमें उन्होंने लिखा है कि मात्र दवाई से रोगी ठीक नहीं हो सकता है। ठीक होने के लिए रोगी का मनोबल, ठीक होने की जिजीविशा, अस्तित्व के प्रति आस्था और सकारात्मक होने की जरुरत है।
इस कृृति में कैंसर का मुकाबला करने की विधि ,दृष्टि एवं उदाहरण दिए गए है।। इसमें विस्तृत जीवन्त एवं अनुभवयुक्त वर्णन उपलब्ध है। लाला ने इसमें लिखा है कि कैंसर किसी व्यक्ति के शरीर पर हमला कर सकता है। लेकिन कभी उसकी आत्मा पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता। यह सच्चाई को चैंकाने वाला प्रमाण है कि सर्वोंत्तम चिकित्सकीय उपकरण चमत्कार कर सकते हैं, लेकिन वास्तविक चमत्कार अधिक सकारात्मक ओैर आनंदमय मानव मस्तिष्क की सहायता से होता है। रोगी के की स्वस्थ होने मंे आत्मबल बहुत बड़ी भूमिका है। दवाइयां भी आत्मबल के अभाव में निष्प्रभावी रहती है।

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वजन एवं खराब कोलस्ट्रोल (एल.डी.एल.) घटाने हेतु घरेलु आयुर्वेदिक नुस्खा

अपने किचन से निम्न मसाले बताई मात्रा अनुसार ले :
1. भुना हुआ जीरा – 50 ग्राम,
2. मैथीदाना – 50 ग्राम, ayurvedic nuskha
3. धनिया – 50 ग्राम,
4. सौंफ – 50 ग्राम,
5. काली मीर्च – 25 ग्राम,
6. लेंडी पीपल – 25 ग्राम,
7. सौंठ – 25 ग्राम
8. दालचीनी – 25 ग्राम
खराब कोलस्ट्रोल (एल.डी.एल.) व वजन घटाने के लिए उपरोक्त आठों चीजें कुट-पीस कर पाउडर बना ले । फिर प्रतिदिन आधा चम्मच दोनो समय भोजन के बाद एक कप गरम पानी में घोल कर लें । यह अच्छा पाचक व विरेचक भी है । उक्त प्रयोग से वजन भी कम होता है ।

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हमारी हानि आलोचना से कैसे होती है ?

दूसरों के दोषों की चर्चा करना, दोषों को ध्यान में रखना आलोचना करना है ।criticise हम आलोचना करते वक्त अपना समय व ऊर्जा बेकार करते हैं । बुराई करना नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाना है । बुराई करते वक्त हम अपनी प्रसन्नता व आशा तोड़ते हैं । दूसरों की आलोचना हमें स्वयं से स्वयं को दूर करती है । इसमे हम अनावश्यक भटक जाते हैं । दूसरों केे गुण-दोषों की समीक्षा कर उसका महत्व बढ़ाना है ।
आलोचना ईष्र्या से भी की जाती है ं आलोचना का क्रम तुलनात्मकता को बढ़ाता है । तुलना करने पर अहं बढ़ता या घटता है । तुलना सहज स्वीकृति के विरूद्ध है । इससे अशान्ति बढ़ती है ।
दूसरों की बुराई करने में जो रस आता है वह हमारे मन व शरीर को दूषित करता है । यह दूषण आत्म विनाशक है । आलोचना करने से झगड़ा भी हो सकता है । यह हमारी नकारात्मकता को बढ़ाता है । दूसरों को अनुपस्थिति में दोष देना हमारे अहंकार का पोषण है ।
आलोचना करने पर गठिया होता है ।


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बातचीत में निर्णय नहीं सुनाए, प्रस्ताव रखें:जीवन विद्या

जीवन विद्या के इस सूत्र ने मुझे बहुत प्रभावित किया है । जीवन में फैसले न सुनाएं । अपना मत प्रस्तुत न कर अपनी बात प्रस्ताव के रूप में रखें । हमें आदेश नहीं पारित करने है । आपसी बातचीत में निर्णय न सुनाएं । निर्णय सुनाने से अहं बढ़ता है । हर वस्तु के बहुत आयाम होते हैं । सामान्यतः सभी आयामों को ध्यान में रख कर बात नहीं करते हैं । इसलिए फैसले न करें । अपनी बात को प्रस्ताव के रूप में पेश करें व मापने के लिए दूसरों को स्वतन्त्र करें । उनकी समझ पर भरोसा करें व उन्हंे अपने निर्णय करने दे ।
सदैव निर्णयात्मक होने की आवश्यकता नहीं है । हमारी जानकारी ही सीमित नहीं है बल्कि जानने का साधन मस्तिष्क की भी एक सीमा है । अतः किसी व्यक्ति, घटना, तथ्य, शास्त्र, धर्म, परम्परा, सम्प्रदाय, समुदाय के बारे में निर्णयक बात न करें ।
उद्देश्य के विचारार्थ अपनी बात तर्कपूर्ण ढंग से रखें । अपने विचार थोपने का प्रयत्न न करें । दूसरों की अपनी आजादी है । उसका सम्मान करें । सत्य अन्यथा भी हो सकता है । अपनी बात ही सही हो इसकी कोई गारन्टी नहीं है।
बात को प्रस्ताव के रूप में रखने से संवाद करने में सुविधा हो जाती है । सुनने वाले को पूरा महत्व मिलता है । इससे संवाद एक तरफ नहीं रहता है। इससे संवाद कौशल बढ़ता है । आलोचना करने से भी बच जाते हैं । संवाद नकारात्मक नही रहता है ।


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आभार होने की शक्ति को पहचाने एवं सफल होने उनका प्रयोग करें

आभारी होना अस्तित्व से सम्पर्क बढ़ाना है । आभार प्रकट करने में अनन्त शक्तियों से जुड़ना होता है । आभार शब्दों में नहीं, भावों में होता है । यह स्वयं की उस भावदशा का नाम है जो प्रकृति के साथ तदाकार होना है । कृतज्ञ होना शक्तिमान होना है । मन्त्रों में तभी तो सबको प्रणाम कहा जाता है । यही आभार मन्त्र-शक्ति बनता है । thanks
मैं आभारी हूं । हम सब अनेक शक्तियों की कृपा से है । उनके संयोजन से हमारा जीवन संभव है । मुझे उनकी कृपा का बोध सदैव रहना चाहिए । ऐहसानों को याद रखना ऐहसानमन्दी है ।
आकाश, वायु, जल, पृथ्वी एवं अग्नि इन पंच भूतो/शक्तियों का मैं आभारी हूं । मेरा अस्तित्व इनसे है । समस्त वनस्पति व जीव मेरे होने में कारण है, सहयोगी है । उनसे मैं निर्मित हूं । रचनाकार स्वयं से भिन्न नही है उससे हम अविभक्त है । अस्तित्व को प्रणाम कर शक्तियों का उपयोग सही दिशा में किया जा सकता है । स्वस्थ होने के लिए की गई प्रार्थना तभी कार्यकारी है।

कृतज्ञता बनाम कृतध्नता

कृतज्ञता की शक्ति बहुत हितकारी है । कृतध्नता नकारात्मकता है । नमक हलाली सकारात्मकता है । नमक हराम होना अपने से दूर जाना है । यह स्वयं अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारना है । अपने कर्मों से, अपनों से दुर जाना है । नमक हराम लोग स्थायी सम्बन्ध नहीं बना पाते हैं । ऐहसान स्वीकारने वाले दूसरों का दिल जीत लेते हैं । उनसे जुड़ जाते हैं ।
कृतज्ञ होना एक बड़ा गुण है । कृतज्ञ होने से व्यक्तित्व खिलता है । कृतध्नता अवगुण है । मतलबी, चालाक व धूर्त लोग काम निकालने को अपनी कला मान कर दूसरों की अच्छाई को स्वीकार नहीं करते हैं । वे हर कार्य का श्रेय खुद लेते हैं । दूसरों को मोहरा मानते हैं । उन्हे अपनी बाजीगरी पर भरोसा होता है । ऐसे लोग आभारी होना नहीं जानते हैं ।
जो लोग कृतज्ञ नहीं होते हैं वे अपने जीवन में असफल होते हैं । क्योंकि वे अपनी जिम्मेदारी नहीं लेते व दूसरों से अपना कार्य करवा कर भूल जाते हैं । इनमे वफादारी नहीं होती है । सहयोग करने वाले को वे लोग महत्व नहीं देते हैं । स्वयं उस डाल को काटते हैं जिस पर वे बैठते हैं ।

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